मंगलवार, 31 मार्च 2009

हिजडा योनि में जन्म 002

(सारथी पर हाल ही में छपा शास्त्री जी का लेख) मुझे खुशी है कि यह वैज्ञानिक-सामाजिक लेखन परंपरा को पाठकों के लिये उपयोगी सिद्ध हो रही हैं. नीचे दी गई टिप्पणी इस बात का एक अच्छा उदाहरण है. माना जाता है कि प्रति टिप्पणी पीछे कम से कम दस लोग होते हैं जो वही बात लिखना चाहते थे लेकिन लिख न पाये. सारथी पर यह संख्या प्रति टिप्पणी कम से कम पच्चीस की है जो वही बात कहना चाहते थे लेकिन समयाभाव के कारण लिख न पाये.

(अन्तर सोहिल) आदरणीय,  नमस्कार!! जब से आपको पढना शुरू किया है, आपकी बातों पर(मुझे नही पता क्यों) सहज ही विश्वास हो जाता है। अभी तक मेरी विचारधारा यही थी कि हिजडे पैदाईशी नही होते, ये वो पुरुष होते हैं जो जानबूझ कर अपना लिंग बदल या विकृत कर लेते हैं या रूप बदल लेते हैं । श्री रूपेश जी ने भी जब तब लैंगिक विकलांगों का जिक्र किया, तब भी मैं अपने मानसिकता को सही रास्ते पर नही ला पाया। हालांकि मुझे लैंगिक विकलांगों से ना कोई कुंठा, नफरत और ना ही कोई लगाव है। मैं अर्धसत्य का भी नियमित पाठक हूं । क्योंकि कहीं भी कुछ लिखा जाता है तो मैं उसमें से कुछ (जिन्दगी) सीखने की कोशिश करता रहता हूं।

अब आपने बताया है तो सचमुच विश्वास हो गया है कि यह जन्मजात विकलांगता होती है। मैं आपसे, रूपेश जी से और सभी लैंगिक विकलांगों से अपनी मानसिकता के लिये क्षमाप्रार्थी हूं।

पिछले आलेख हिजडा योनि में जन्म 001 में जैसा मैं ने कहा कि एक मानव भूण में करोडों जीन होते हैं. भूण के विकास के साथ साथ इनकी अरबों प्रतियां बनाई जाती हैं. इस जटिल प्रक्रिया में करोडों बार गलतियां हो जाती हैं लेकिन जीन की गलतियों को सुधारने वाली जैव-रासायनिक प्रक्रियायें उनको सुधार देती हैं. इसके बावजूद करोडों गलतियों में से कई बार एकाध विकृत जीन सुधर नहीं पाता और उसके कारण बच्चे विकलांग पैदा होते हैं. जब यह विकलांगता यौनांगों की होती है तो बाह्य तौर बच्चा न तो पुरुष होता है न स्त्री. इनको हिजडा कहा जाता है. लेकिन चूंकि यह शब्द कई बार इन लोगों को नीचा दिखाने के लिये प्रयुक्त होता है, अत: “लैंगिक विकलांग”  का प्रयोग बेहतर, वैज्ञानिक एवं अधिक मानवीय है. मेरी जानकारी के अनुसार,  चिट्ठाजगत में इस शब्द का सबसे पहला प्रयोग डॉ रूपेश श्रीवास्तव ने अपने चिट्ठे आयुषवेद पर किया था. उनकी प्रेरणा से आरंभ किये गये चिट्ठे अर्धसत्य पर भी आप इसे देख सकते हैं.

  डॉ रूपेश के अथक प्रयास एवं प्रोत्साहन के कारण अर्धसत्य पर कई लैंगिक विकलांग चिट्ठालेखन की कोशिश करते हैं. इस तरह  लैंगिक विकलांगों को एक नवजीवन प्रदान करने के जरिये के रूप में हिन्दी चिट्ठाकारी उभर रहा है. मेरा अनुरोध है कि पाठगण इन लोगों को जरूर प्रोत्साहित करें एवं अर्धसत्य  पर नियमित रूप से टिपिया कर इस शुभ कार्य को अंजाम दें.

टिपियाते समय इस बात को न भूलें कि आनुवांशिकी की समस्या बढ रही है. इस कारण जो लोग सामान्य सामाजिक जीवन से वंचित हो जाते हैं उनके प्रति समाज की काफी बडी जिम्मेदारी है. निम्न दो टिप्पणियां इस बात को बडे सकारात्मक तरीके से प्रस्तुत करती हैं:

(दिनेशराय द्विवेदी) हम अन्य विकलांगों को जिस तरह से अपनाते हैं उसी तरह इन शिशुओं को भी अपना सकते हैं। इस तरह के अनेक लोग परिवारों में पलते हैं और जीवन जीते हैं। उन्हें परिवारों द्वारा अपनाने की आवश्यकता है।

(संजय बेंगाणी) लैंगिक विंकलांगों को विकलांगों को मिलने वाले आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए. और धनार्जन की वर्तमान व्यवस्था खत्म होनी चाहिए.

इस नजरिये के साथ आईये आज कुछ करें. (क्रमश:)

(मूल आलेख सारथी चिट्ठे पर शास्त्री जी के द्वारा लिखा गया था. उनकी विशेष व्यक्तिगत अनुमति के कारण इस लेखन परंपरा को  अर्धसत्य पर पुन: प्रकाशित किया जा रहा है.)

2 टिप्‍पणियां:

डा.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) ने कहा…

आदरणीय गुरूजी,मुझे ईश्वर ने जिस कार्य के लिये निमित्त बनाया है उसमें आप व अन्य गुरुवर्यसम महानुभावों के जुड़ जाने से प्रयासों में तीव्रतर गति आ रही है। जैसा कि आपने कहा था कि सामाजिक बदलाव बहुत धीमे होते हैं लेकिन जब आप जैसे लोग प्रभु की दया से साथ हों तब इन बदलावों में कम ही समय लगेगा। लोगों की संबंधित शंकाओं का आप बेहतर उत्तर दे सकते हैं इसलिये मनीषा दीदी ने कहा है कि वो अभी इस चिट्टे पर किसी के भी सवाल को आपको ही प्रेषित कर देंगी....
प्रभु मदद करें
प्रणाम

बेनामी ने कहा…

aapki reservation ki baat ekdam sahi hain

 

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आयुषवेद by डॉ.रूपेश श्रीवास्तव