मंगलवार, 30 दिसंबर 2008

ज्योतिष शास्त्र ने भी लैंगिक विकलांगों को नकार दिया है

कल मैं ने देखा कि भाई डा.रूपेश कम्प्यूटर पर किसी बच्चे की कुंडली बना कर कुछ देख रहे थे। भला कौन ऐसा है जो भविष्य न जानना चाहता होगा तो मैंने भी उस कुंडली नामक साफ़्टवेयर को समझने का प्रयास करा, जब भाई मरीजो की दवाओं में जुट गये लेकिन मैं तो हतप्रभ रह गयी कि ज्योतिष शास्त्र मेरे जैसे बदनसीबों के लिए है ही नहीं क्योंकि उसमें जातक के जन्म समय, स्थान आदि के विवरण के साथ मात्र लिंग के विवरण में पुरुष/स्त्री ही है। मैंने स्वयं को दो बार इसे आजमाया एक बार पुरुष लिख कर और दूसरी बार स्त्री लिख कर और पाया कि ऐसा करने पर मात्र लिंग का अंतर होने से जातक के फलादेश में अंतर है, भविष्य में अंतर है। अब मैं सोच रहीं हूं कि ये वही ज्योतिष शास्त्र है जिसके बारे में तमाम विद्वान इसकी गहाराई , सत्यता और प्रामाणिकता के लिये बह्स दर बह्स करे जाते हैं लेकिन यह तो मात्र लैंगिक अंतर की गाढ़ी सी लकीर ही देख कर भ्रमित हो जा रहा है। मेरा उन तमाम हिंदी ब्लागरों से अनुरोध है कि इस विषय पर समुचित स्पष्टीकरण प्रस्तुत करने का साहसपूर्ण शोध करें न कि चुप्पी साध जाएं वरना मेरे लिए ज्योतिष शास्त्र और पब्लिक टायलेट में कोई अंतर न रह जाएगा क्योंकि वहां भी हमारे लिये ऐसा ही संकट और भ्रम है।

शुक्रवार, 26 दिसंबर 2008

हमारी प्यारी मनीषा दीदी का जन्मदिन

अर्धसत्य,आयुषवेद और भड़ास परिवार ने मिल कर हमारी प्यारी मनीषा दीदी का जन्मदिन पूरे जोरशोर से मनाया। ये उनका पहला अनौपचारिक जन्मोत्सव रहा जिसमें कि उनके समुदाय से इतर अन्य लोग शामिल थे। एक तरफ़ दीप प्रज्ज्वलित कर के दीदी को रक्षा सूत्र बांधा, आरती उतार कर उनके उत्तम स्वास्थ्य व दीर्घायु की ईश्वर से प्रार्थना करी वहीं दूसरी ओर मोमबत्तियां फ़ूंक कर केक काटा गया( एक दूसरे के ऊपर केक उछाले भी गये मस्ती में आकर और पूरे घर में क्रीम ही क्रीम फर्श से लेकर दीवारों तक :))
आप ये सब झलकियां देख सकते हैं इन लिंक्स पर क्लिक करके.........
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शुक्रवार, 19 दिसंबर 2008

हिंदी ब्लागिंग ने दिया हिजड़ा होने का दंड/भड़ास से लैंगिक विकलांग मनीषा नारायण सहित तीन की सदस्यता समाप्त

वैसे भी मैंने जीवन में इतने दुःख तकलीफ़ और तिरस्कार को भोग लिया है कि अब तो यदि कुछ भी ऐसा हो तो कोई आश्चर्य नहीं होता लेकिन अब भी कहीं मन में कुछ मानवीय कमजोरियां शेष हैं जिनके कारण मैं कुछ स्थायी धारणाएं बना लेती हूं किसी भी व्यक्ति के बारे में, मुझे याद आते है वो दिन जब लगभग साल भर पहले मुझे भाई डा.रूपेश श्रीवास्तव अपने घर लेकर आये थे किस तरह हाथ पकड़ कर कंम्प्यूटर पर जबरदस्ती बैठाया था मैं डर रही थी कि कहीं कुछ खराब न हो जाए। हिंदी कम आती थी बस कामचलाऊ या फिर हिंदी में दी जाने वाली गन्दी गन्दी गालियां। भाई ने टाइप करना सिखाया तो अजीब लगा कि अंग्रेजी के की-बोर्ड से हिंदी और तेलुगू व तमिल कैसे टाइप हो रहा है। एक उंगली से टाइप करी पोस्ट शायद भड़ास पर अभी भी अगर माडरेटर भाई ने हटा न दी हों तो पड़ी होगी, एक कुछ लाइन की पोस्ट टाइप करने में ही हाथ दर्द करने लगा था। लिखना सीखा, हिंदी सीखी लेकिन मौका परस्ती न सीख पायी। एक पत्रकार और ब्लागर मनीषा पाण्डेय के नाम से समानता होने के कारण भड़ास पर बड़ा विवाद हुआ जिसमें कि तमाम हिंदी के ब्लागर उस लड़की की वकालत और भड़ास की लानत-मलानत करने आगे आ गये। मैंने सब के सहयोग से अपना वजूद सिद्ध कर पाया। मैं लिखती रही, "अर्धसत्य" (http://adhasach.blogspot.com) बनाया भाई साहब ने सहयोग करा। कुछ दिन पहले की बात है कि जब भड़ास के मंच पर एक सज्जन(?) ने डा.रूपेश श्रीवास्तव पर एक पोस्ट के रूप में निजी शाब्दिक प्रहार करा कि वे आदर्शवाद की अफ़ीम के नशे में हैं वगैरह...वगैरह। मैंने, भाईसाहब, मुनव्वर सुल्ताना(इन्हे तो भड़ास माता कह कर नवाजा जाता था) ने इसके विरोध में अपनी शैली में लिखा। अचानक इसका परिणाम जो हुआ वह अनपेक्षित था कि भड़ास पर से मेरी, मुनव्वर सुल्ताना और मोहम्मद उमर रफ़ाई की सदस्यता को बिना किसी संवाद या सूचना अथवा आरोप के बड़ी खामोशी से समाप्त कर दिया गया। इससे एक बात सीखने को मिली कि लोकतांत्रिक बातें कुछ अलग और व्यवहार में अलग होती हैं। माडरेटर जो चाहे कर सकता है इसमें लोकतंत्र कहां से आ गया, उनका जब तक मन करा उन्होंने वर्चुअली हमारा अस्तित्त्व जीवित रखा जब चाहा समाप्त कर दिया। मुझे अगर हिजड़ा होने की सजा दी गयी है तो मुनव्वर सुल्ताना और मोहम्मद उमर रफ़ाई को क्या मुस्लिम होने की सजा दी गयी है? यदि इस संबंध में भड़ास के ’एकमात्र माडरेटर’ कुछ भी कहते हैं तो वो मात्र बौद्धिकता जिमनास्टिक होगी क्योंकि बुद्धिमान लोगों के पास अपनी हर बात के लिये स्पष्टीकरण रेडीमेड रखा होता है बिलकुल ’एंटीसिपेटरी’..... वैसे तो चुप्पी साध लेना सबसे बड़ा उत्तर होता है बुद्धिमानों की तरफ से । आज मैं एक बात स्पष्ट रूप से कह रही हूं कि सच तो ये है कि न तो मुनव्वर सुल्ताना का वर्चुअली कोई अस्तित्त्व है और न ही मोहम्मद उमर रफ़ाई के साथ ही मनीषा नारायण का बल्कि ये सब तो फिजिकली अस्तित्त्व में हैं और वर्चुअली अस्तित्त्वहीन और न ही इनकी कोई सोच है अतः इन्हें किसी मंच से हटा देना इनकी हत्या तो नहीं है। मुझे और मेरे भाई को अभी बहुत कुछ सीखना बाकी है शायद हो सकता है कि आने वाले समय में हम सब भी बुद्धिमान हो सकें और हिंदी ब्लागिंग के अनुकूल दिमाग और दिल रख सकें।
आदतन ही सही लिखूंगी जरूर
जय जय भड़ास

बुधवार, 17 दिसंबर 2008

हिंदी ब्लागरों में मनीषा नारायण ने कोहराम मचा रखा है

दीदी का लिखना बड़ा ही कड़ा रहा है हमेशा से जैसा कि मैं जानता हूं। इन बातों के पीछे कि वे इतनी प्रेम से भरी होने के बाद भी अक्सर नाराज क्यों हो जाती हैं उसका कारण उनका अतीत रहा है। जो लोग उनसे अपेक्षा करते हैं कि मनीषा! तुमने हिंदी सीख लिया अब ब्लागिंग करती हो तो अपने सारे अतीत को भूल जाओ तत्काल जिससे कि तुम कभी व्यथित रही हो। जिंदगी की रेलगाड़ी में भी सीट पर जगह बनाने के लिये धक्का-मुक्की करनी पड़ती है इन्हें सहज ही कुछ नहीं मिला कभी भी। हिंदी ब्लागरों के तो नाक-भौं सिकुड़ गये जब पता चला कि एक "हिजड़ा" तालियां बजाना छोड़ कर उन शरीफों के संग सायबर जगत में ब्लागिंग करेगा। बहुत तिरस्कार सहना पड़ा इस आभासी दुनिया में भी ,एक ब्लाग है "भड़ास" जो कि काफ़ी कुख्यात है अपनी भाषा के कारण लेकिन वह मंच अश्लील हरगिज नहीं है। उस मंच पर मैं दीदी को ले गया सद्स्यता दी उन्होंने एक उंगली से किसी तरह लिखना शुरू करा। वहां आरोप लगाया तमाम नामचीन ब्लागरों ने खुल कर कि प्रमाण दिया जाए कि मनीषा नारायण का अस्तित्त्व है भी या काल्पनिक हैं फिर हैं तो लैंगिक विकलांग हैं या नहीं.........। एक बार फिर जब वणिक सोच ने भड़ास पर कब्जा जमा लिया तो अचानक वहां से मनीषा दीदी की सदस्यता को समाप्त कर दिया गया। इसे कहते हैं उसे हाशिये से भी बेदखल कर दो जो अब तक हाशिये पर था और ये शर्त रख दो कि बिलकुल भी आवाज न करे अगर गाली दी या नाराजगी व्यक्त करी तो गंदे मान लिये जाओगे और कहा जाएगा कि यही तुम्हारी औकात है वगैरह वगैरह...।
संबंधित पोस्ट्स देखिये
http://bharhaas.blogspot.com/2008/12/blog-post_15.html
http://bharhaas.blogspot.com/2008/12/blog-post_7241.html
http://bharhaas.blogspot.com/2008/12/blog-post_6981.html
http://bharhaas.blogspot.com/2008/12/blog-post_9693.html

अब दोबारा इंतजार है उस घेराबंदी का जब तमाम ब्लागिंग गिरोह एग्रीगेटर्स पर भी हमारे जैसे लोगों को प्रतिबंधित करा दें। हम अभी से मानसिक तौर पर तैयार हैं पर किसी के आगे गिड़गिड़ाएंगे नहीं।

गुरुवार, 4 दिसंबर 2008

ब्लागिंग से बदलाव की शुरूआत हो गयी है

आज मनीषा बहन ने मुझे बातों बातों में बताया कि उन्हें एक भाई ने एक मेल करा था जिसमें उस युवा भाई ने लिखा था कि मैं चाहता हूं कि विवाह के बाद मेरा कोई बच्चा लैंगिक विकलांग पैदा हो और मैं उसे खूब लिखा पढ़ा कर डाक्टर, इन्जीनियर या वकील बनाऊं ताकि समाज के सामने एक उदाहरण रख सकूं कि हमारे ये बच्चे किसी से कम नहीं होते हैं। मेरी आंखों में इस भावना के प्रति आदर से कुछ अन्जाने से आंसू आ गये। याद आये मुझे भाई दीनबन्धु जो कि ऐसी ही सोच रखते हुए किसी लैंगिक विकलांग बच्चे को सहर्ष गोद लेना चाहते हैं। अब लग रहा है कि शिक्षा के मार्ग से ब्लागिंग तक आने से बदलाव हो रहे हैं।

रविवार, 30 नवंबर 2008

बौद्धिक आतंकवाद यानि एड्स नामक अस्तित्त्वहीन बीमारी की अवधारणा



दुनिया भर में फैलाए गये एक अलग किस्म के आतंकवाद को आज जश्न के रूप में मनाया जा रहा है। ये बौद्धिक आतंकवाद उस आतंकवाद से कहीं ज्यादा खतरनाक है जो कि बम और बारूद से फैलाया गया है। कुछ बरस पहले इसे एड्स नामक बीमारी की अवधारणा के रूप में शुरू करा गया था और अब ये पूरे संसार में जड़ें जमा चुका है। इसलिये इसी खुशी को विश्व एड्स दिवस के रूप में मनाया जाता है। जबकि यह बीमारी वैसी ही है कि अंधेरे में भूत रहता है। इस विषय में डा.रूपेश श्रीवास्तव ने तो इस पूरे आतंकवाद से अकेले ही टकराने की ठानी है और यदि कोई भी इस विषय में अधिक जानना चाहे तो उनके लिखे शोधपत्र की प्रति मंगवा कर पढ़ ले। एड्स एक अस्तित्त्वहीन बीमारी है जिसे बड़े ही योजनाबद्ध तरीके से जमाया गया है।

गुरुवार, 27 नवंबर 2008

बंबई आतंकवाद !!

 

बंबई में जो कुछ हुआ उसके प्रति हर भारतीय शोक संतप्त है.

आतंकवादियों से लडते समय देश की सुरक्षा के लिये जिन शहीदों नें वहां अपनी जानें कुर्बान कीं उन सब के प्रति हम अपनी आदरंजली अर्पित करते हैं!!

बुधवार, 26 नवंबर 2008

ब्लागरों! आपका कोई लैंगिक विकलांग बच्चा हो तो उसे फेंकना मत मुझे दे देना......

आदरणीय वाचकों, आलोचकों, समीक्षकों, सहयोगियों,अभिभावकों
चूंकि मेरी धर्मपुत्री भूमिका रूपेश ने अपनी पोस्ट में लिखा है कि उसकी पोस्ट पर आयी किसी भी टिप्पणी को प्रकाशित न करा जाए इसलिये उसके विरोध के स्वर को समर्थन देता हुआ मैं भी ये कह रहा हूं कि यदि इन बच्चों को अपनी जगह बनानी है तो समाज की धारणाओं में थोड़ी नोच-खसोट और धक्का-मुक्की तो इन्हें करनी ही पड़ रही है वरना होना तो ये चाहिये कि जिस तरह महिलाओं की पत्रिकाओं को पुरुष चटकारे ले कर पढ़ते हैं और पुरुषों की पत्रिका स्त्रियां छिप कर पढ़ती हैं तो लैंगिक विकलांगता के प्रति इतना कौतूहल रखने वाले समाज को बहुत अच्छा प्रतिसाद देना चाहिये था लेकिन ऐसा हुआ नहीं। यहां ब्लागिंग में भी ढकोसलेबाज,मुखौटेधारी किस्म के लोग हैं जिन पर मुझे ही नहीं हम सबको संदेह है कि ये वही माता,पिता,भाई,बहन,चाचा,मामा,बुआ,फूफा आदि हैं जिन्होंने मेरे बच्चों को अपनी सड़ी सोच के चलते इस हाल में धकेल दिया है। यही लोग जिम्मेदार हैं जो मुंह छिपा रहे हैं अब इन बच्चों के सामने आ जाने से। हो सकता है कि अगर दुर्दैव से इनमें से किसी ब्लागर के घर कोई लैंगिक विकलांग बच्चा पैदा हो जाए तो ये उसे चोरी-छिपे मेरे घर के बाहर फेंक जाएं; इसलिये हे ब्लागरों में तुम्हारे ऐसे बच्चों को गोद में लेकर बोतल से दूध पिलाने, कंधे पर बैठा कर खेलने और उंगली पकड़ा कर चलना सिखाने के लिये तैयार हूं। हमारा स्वर तुम्हारी दुर्गंधित सोच का विरोध करने के लिये अब मुखर हो रहा है। जिन लोगों ने भूमिका रूपेश की पिछली पोस्ट पर हिजड़ा बन जाने की बात पर भी मुस्कराते हुये टिप्पणी करी है मैं उन्हें अपने पोस्ट से संलग्न करके सधन्यवाद प्रकाशित कर रहा हूं।
aapme badhiya likhne ki shakti hai...aur ye shakti har kisi me nahi hoti. ishwar ka shukriya karen ki aapka man ek lekhak ka hai. shubhkamnayen... Dileepraaj Nagpal
maine aapki saari post's dekhi. aapke shabdo mein kuchh to hai..main ho sakta hai koi tippani nahi kar saku par blog lagatar dekhta rahta hu.... संदीप शर्मा Sandeep sharma
अब देखना ये है कि आप भूमिका रूपेश जैसे बच्चों का विश्वास हासिल कर पाते हैं या नहीं वरना ऐसे बच्चे आपको ही वो भाई या बहन और माता-पिता मानते रहेंगे कि जिन्होंने उन्हें सड़को पर फेंक दिया है।

मेरी पोस्ट पर टिप्पणी करने से आप हिजड़े बन सकते हैं


जैसे-जैसे मैं लिखना तीखा करती जा रही हूं देख रही हूं कि लोग बिदक कर भाग रहे हैं। एक बड़ी साधारण सी बात कहना है कि यही पोस्ट अगर किसी लड़की की होती भले ही कितनी भी मूर्खतापूर्ण होती, बकवास होती या लटका-पटका की तुकबंदी जोड़ कर लिखनी वाली कोई कवियत्री होती तो उस पर कम से कम बीस-पच्चीस टिप्पणीकार लार टपकाते आ गये होते लेकिन हम लोगों का लिखा भी पढ़ लेने से लोगों को छूत लग जाती है, शायद लगने लगता है कि कहीं हमें भी "अर्धसत्य" पर टिप्पणी कर देने से या प्रोत्साहित कर देने से लैंगिक विकलांगता का इन्फ़ेक्शन न हो जाए और हम भी हिजड़े बन जाएं। मैं इस पोस्ट के द्वारा हम सबके धर्मपिता व गुरू डा.रूपेश श्रीवास्तव से निवेदन कर रही हूं कि अब वे कम से कम मेरी लिखी किसी भी पोस्ट पर कोई भी टिप्पणी न प्रकाशित करें। मुझे किसी की मक्कारी भरी सहानुभूति नहीं चाहिये। जब से मैंने लोगों के बनावटी मुखौटे नोचने खसोटने शुरू करे हैं हिंदी के छद्म शरीफ़ ब्लागरों में खलबली है, जवाब नहीं देते बनते इस बड़े-बड़े बक्काड़ और लिक्खाड़ लोगों से। हमारे कुनबे को हम खुद ही संवारने का माद्दा रखते हैं। मैं इस सोच से एक और फ़ायर-ब्रांड बहन को जोड़ रही हूं।

मंगलवार, 25 नवंबर 2008

माँबाप द्वारा त्यागे बच्चे!!

सामान्यतया लोग सिर्फ पुल्लिंग एवं स्त्रीलिंग के बारे में जानते है, लेकिन कुछ भाषाओं में नपुंसक लिंग भी होता है जो न तो स्त्रीलिंग होता है न पुल्लिंग. इस प्रकार वे इस बात को पहचानते हैं कि हर किसी वस्तु या व्यक्ति का स्त्री या पुरुष होना जरूरी नहीं है.



मनुष्य भी वास्तव में तीन लिंगों में जन्म लेता है: पुरुष के रूप में, स्त्री के रूप में, एवं एक तीसरे रूप में जो स्त्रीपुरुष के भेद से मुक्त है. इन लोगों की संख्या स्त्री एवं पुरुष की तुलना में इतनी कम होती है लोग अनजाने इनको असामान्य और अस्वीकार्य मान लेते हैं. लेकिन ऐसा हर समाज में नहीं होता है. कई समाजों में इनको अन्य लोगों के समान बराबर मिलता है. भारतीय समाज में भी यह परिवर्तन आना जरूरी है.



जब तक यह परिवर्तन नहीं आयगा, तब तक "अहं ब्रह्मास्मि" कहने वाला एक तबका दर्द सहता रहेगा. इनके दर्द को डॉ रूपेश ने एक हृदयस्पर्शी कविता में व्यक्त किया है जिसकी दो पंक्तियां हैं:



लज्जा का विषय क्यों हूं अम्मा मेरी?
अंधा,बहरा या मनोरोगी तो नहीं था मैं




मेरा अनुरोध है कि आप क्योंकि मैं हिजड़ा हूं.......... पर चटका लगा कर पूरी कविता एक बार जरूर पढें!

सोमवार, 24 नवंबर 2008

डा.रूपेश श्रीवास्तव सबके पिता बने.......

अब धीरे-धीरे नये बच्चे जो स्वयंभू सभ्य समाज और लैंगिक विकलांगों के समुदाय की परंपराओं के बीच थपेड़े खा रहे थे अब वे अर्धसत्य के द्वारा नयी सोच से जुड़ रहे हैं। अब एक फैसला करा है हमने कि एक और परंपरा को तोड़ेंगे और वह भी पुरजोर घोषणा करके। सारे बच्चे अपने नाम के आगे हमारे मार्गदर्शक डा.रूपेश श्रीवास्तव का नाम जोड़ेंगे यह करारा तमाचा है उन बायोलाजिकल माता-पिता की सड़ी हुई सोच के गाल पर जिन्होंने हमें परंपराओं के चलते सड़कों पर धक्के खाने के लिये छोड़ दिया था यानि कि अब हमारे भाईसाहब सबके पिता घोषित कर दिये गये हैं और भाईसाहब को इस बात पर कोई परेशानी नहीं है।

गुरुवार, 20 नवंबर 2008

बाथरूम में प्रवेश निषेध है!

क्या आपको जीवन के वे क्षण याद हैं जब आपको एकदम दौड कर बाथरूम की शरण में जाना पडा था. क्या वे क्षण याद हैं जब सारे बाथरूम भरे थे, एवं किसी के बाहर निकलने तक एक क्षण भारी हो रहा था.

लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि यदि कई बाथरूम खाली हों, लेकिन अपकी इमर्जेन्सी के बावजूद कोई आपको घुसने न दे -- सिर्फ इस गलती के लिये कि आप पुरुष या स्त्री नहीं, महज एक मानव हैं. ऐसे मानवों के साथ कैसा क्रूर व्यवहार होत है यह बहुत कम लोग जानते हैं.

कुछ लोग में मनीषा बहन ने जो लिखा है उसे मैं दुहराना चाहता हूँ क्योंकि बहुत कम लोग पुराने आलेख पढते हैं:
  • हमे तो मुंबई में सार्वजनिक टायलेट तक में इसी प्राब्लम का सामना करना पड़ता है कि जेन्ट्स टायलेट में जाओ तो आदमी लोग झांक कर देखना चाहते कि हमारे नीचे के अंग कैसे हैं और लेडीज टायलेट में जाओ तो औरतें झगड़ा करती हैं । बस यही हमारी दिक्कते हैं जो हमें जिंदगी ठीक से नहीं जीने देतीं और हम अलग से हैं ।

ये भी मानव हैं मेरे आपके समान. कुछ नहीं करें तो कम से कम इनके जीने के अधिकार को न छीनें!!

मंगलवार, 18 नवंबर 2008

ज्योत से ज्योत जलाते चलो......





पिछले किसी जन्म के सत्कर्म के फलस्वरूप इस जन्म में मेरे तारणहार मेरे गुरुदेव डा.रूपेश मुझे मिल गये। जो विद्या का प्रकाश उन्होंने मेरे भीतर जगाया है वो फैले उसी में उसकी सार्थकता है। पहले मैंने कम्प्यूटर सीखा, हिन्दी सीखी, ब्लागिंग सीखी और जीवन जीना सीखा। अब मैं खुद सक्षम हो गयी हूं कि किसी नये मित्र को सिखा सकूं। इसी ज्योत से ज्योत जलाने के मिशन में मैंने अपनी बड़ी गुरुबहन(लैंगिक विकलांग समुदाय में) रम्भा अक्का को भी कम्प्यूटर की शुरूआती जानकारियां देना शुरू करा था और अब वे स्वयं लिखने पढ़ने लगी हैं। मेरे पास इस खुशी को बताने के लिये शब्द नहीं है। ईश्वर हमारे इसे मिशन को कामयाब करे इसके लिये आप सबकी शुभेच्छाओं की आवश्यकता है, स्नेह बनाए रखें।

ब्लागर संदीप जी के सवाल का सहज उत्तर

मेरी किसी से सहानुभूति नहीं है। आप भले ही ना पुरुष में गिने जाते हों, ना महिला में, फिर भी नहीं। क्योंकि आपका एक गम तो स्पष्ट दिखाई दे रहा है, पर हिन्दुस्तान के जाने कितने ऐसे लोग हैं, जिनकी गिनती पुरुष अथवा स्त्रियों में तो होती है, परन्तु उनकी जिंदगी, जिंदगी नहीं है। आपका लिंग या योनी नहीं है, पर कई ऐसे लोग हैं, जिनमें किसी का हाथ नहीं होता, किसी का पैर नहीं होता, किसी की आंख नहीं होती, कोई बोल नहीं सकता, तो कोई देख नहीं सकता। मेरी यदि उनसे कोई सहानुभूति नहीं है, तो आपसे भी नहीं है। यह भूमिका मैंने केवल इसलिए लिखी कि आप मुझे यह ना समझें कि मैंने मात्र सहानुभूति के चलते आपको ई-मेल किया। फिर भी मेरा मात्र एक प्रश्न है- कि
सैक्स जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग है। आप द्वारा (आप जैसों) सैक्स नहीं करने पर क्या दिमाग कुंठित नहीं होता। और यदि सैक्स किया जाता है, तो कैसे? अन्यथा ना लें, केवल एक जिज्ञासा है - केवल सैक्स के विषय में ही नहीं। आपका जीवन कैसा है, आपको कब पता चला कि आप बाकी और लोगों से अलग हैं, मैं जानना चाहता हूं।
मेरा मोबाइल नंबर, सब-कुछ मेरे ब्लॉग पर आपको मिल जाएगा-
http://dard-a-dard.blogspot.com/
- संदीप शर्मा

संदीप जी सहानुभूति के दरकार तो अब हमें है ही नहीं कि यदि आप हमें सहानुभूति से देख लेंगे तो हमारी दुनिया बदल जाएगी। सत्यतः आपको किसी भूमिका के लेखन का भी कष्ट नहीं करना चाहिये था क्योंकि आपकी जिज्ञासा भी मात्र कमर के नीचे से ही ज्यादा संबद्ध है। अब मैं अपने भाई डा.रूपेश के संपर्क में आ जाने से मानसिक तौर पर इस तरह के सवालों के लिये मजबूती से तैयार हूं। दुःख है कि आपने अर्धसत्य की पुरानी पोस्ट्स को नहीं पढ़ा और वो भी उस पोस्ट को जो कि तमाम अन्य दिग्गज हिंदी ब्लागरों ने अर्धसत्य से लेकर अपने ब्लाग पर छापी थी। आपकी एक अत्यंत पुष्ट धारणा है कि सैक्स जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग है, कब इंकार है इस बात से लेकिन आपके जीवन का........। ईश्वर रचित हर ज्ञानेन्द्रिय व कर्मेन्द्रिय जीवन का महत्त्वपूर्ण अंग हैं। आप अर्धसत्य की इस पोस्ट को पढ़ें और इसके आस पास की दो-चार अन्य पोस्ट भी.........
http://adhasach.blogspot.com/2008/04/blog-post_06.html
आशा ही नहीं बल्कि पूर्णरूपेण विश्वास है कि आप कि जन्मांधों के विषय में भी अप इतने ही गहरे जिज्ञासु होंगे। अनुराग बनाए रहिये इसी तरह से ताकि आपके सवालों के उत्तर सहजता से दे सकूं।

रविवार, 16 नवंबर 2008

राजनीति में षंढ,शिखंडी,नपुंसक,किन्नर,हिजड़े,छक्के और बृहन्नलाएं

एक बार फिर से शबनम(मौसी) के बाद मध्यप्रदेश की राजनीति में एक "किन्नर" ने शिवपुरी विधानसभा क्षेत्र से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर पर्चा दाखिल करा है । लालीबाई पुकारे जाने वाले किन्नर के समर्थन में अनपढ़ और जाहिल बना कर रखे गये लैंगिक विकलांग बच्चों की एक बड़ी फौज खंडवा, भोपाल, ग्वालियर, कोलारस,सतनवाड़ा,जबलपुर,इंदौर,रीवा,सतना आदि स्थानों से एकत्र करके शिवपुरी पहुंचा दी गई है। बेचारे बच्चे अपना भला-बुरा तो समझते नहीं हैं इसलिये उन्हें उनके गुरू और नायक धर्म व परंपरा आदि के नाम पर जो समझा कर भेज देते हैं वो सब उसी को ब्रह्मवाक्य मान कर कभी बाहर निकलने की खुशी में तो कभी मजबूरी में करने लगते हैं। ये बच्चे लालीबाई को जिताने की कवायद में पैसा भी एकत्र करेंगे।
मेरी ओर से बस इतना कि शबनम(मौसी) ने चुनाव जीत कर लैंगिक विकलांगों के लिये क्या कर सकती थीं और क्या नहीं करा ये तो मैं आपको बताती चलूंगी लेकिन उस क्षेत्र के गुरूघंटालों के मुंह मेंराजनीति का खून लग गया है। जीतने के बाद जब उनसे पूछा जाता है कि आपने अपने समाज के उत्थान के लिये क्या करा तो उत्तर रटा हुआ है कि मैं हिजड़ों की नहीं "जनता" की नेता हूं इसलिये समाज या समुदाय विशेष की संकीर्ण बातें मुझसे मत करिये। राजनीति में हर तरह के लोग यानि षंढ, शिखंडी, नपुंसक,किन्नर, छक्के और बृहन्नलाएं आ जाएंगे पर लैंगिक विकलांगों को इस रेलम-पेल में हाशिये से भी अलग धकेला जा रहा है और कथित बुद्धिजीवी बस सहानुभूति के मालपुए छान कर मलाई चाटेंगे जिससे कि ’बिल गेट्स फाउंडेशन’ से सामाजिक मुद्दों पर शोध के लिये पैसा झटका जा सके। मैं इस बात की प्रबल संभावना जता रही हूं कि लालीबाई जीतेगी। आप क्या कहते हैं जरूर बताइये।

मंगलवार, 11 नवंबर 2008

भिन्न होना अपराध नहीं है!

लैंगिक विकलांग या हिजडे हर समाज में होते हैं. कम से कम 3 से 4 हजार पुराने एतिहासिक पुस्तकों में इनका वर्णन आता है, जिसमें सबसे महत्वपूर्ण है प्राचीन ईजिप्ट के पुस्तकों में.

मनुष्य समाज में हमेशा पुरुष एवं स्त्रियों की अधिकता रही है. शायद द्स लाख में एक होगा जो लैंगिक विकलांग पैदा होता है. लेकिन जिस तरह से कोई भी नवजात शिशु अपनी इच्छा से शारीरिक या मानसिक विकलांगता लेकर नहीं पैदा होता है उसी प्रकार कोई भी लैंगिक विकलांग अपनी मर्जी से यह विकलांगता लेकर नहीं पैदा होता है.

इस कारण हिजडों को असामान्य, अपराधी, या विचित्र समझने के बदले उनको भी मानव समझना जरूरी है. बाकी अगले पोस्ट में…

सोमवार, 10 नवंबर 2008

संवेदनशीलता या भय?

मनीषाबहन ने अपने आलेख मुखौटेधारी ब्लागरों को धिक्कार है,थू है उन पर.... में कुछ महत्वपूर्ण मुद्दे उठाये हैं. शास्त्री जी ने लैंगिक विकलांगों या हिजडों के बारे में अर्धसत्य की दुखद असलियत ! लिखा तो कई लोगों ने शास्त्री जी के चिट्ठे पर हमारे बारें में टिप्पणी की, लेकिन उन में से किसी ने भी अर्धसत्य पर एक टिप्पणी देने की हिम्मत नहीं की.

मुझे उम्मीद थी कि सारथी पर हमारे बारे में पढ कर कम से कम कुछ लोग अर्धसत्य को प्रोत्साहित करेंगे. मुझे अभी भी यह उम्मीद है कि समाज से डरने के बदले कम से कम कुछ मित्र हम लोगों के प्रति टिप्पणियों द्वारा संवेदनशीलता दिखायेंगे.

लैंगिक विकलांगों(हिजड़ॊं) से सीधे सवाल करिये




भूमिका ने मुखौटाधारी ब्लागरॊं की छ्द्म सहानुभूति पर जो अपने अंदाज में धिक्कारना शुरू ही करा था कि टिप्पणीकार ही अनाम, बेनाम और गुमनाम होने लगे। यदि आप इतना साहस जुटा पाएं कि हम लैंगिक विकलांगों के बारे में (जिन्हें आप शायद हिजड़ा कहना अधिक पसंद करते हैं) कुछ जानना है तो शालीन भाषा में मुझसे सवाल करें लेकिन पूरे परिचय के साथ जिसमें आपका नाम, फोन नम्बर, पता, ब्लाग का यू आर एल आदि बताएं जिससे कि पता चले कि आप वाकई गम्भीरता से कुछ ऐसा जानना चाहते हैं जो अब तक आपको पता नहीं है तो मैं आपके हर सवाल का इस चिट्ठे पर उत्तर दूंगी ये एक हिजड़े का वादा है आप मर्द और औरतों से। साथ ही एक छोटा सा विचार दे रही हूं कि जरा बिना लिंग या योनि की दुनिया में अपनी जगह की कल्पना करिये। यदि शरीर रचना संबंधी कोई सवाल होगा तो उसका उत्तर आपको हमारे मार्गदर्शक भाई डा.रूपेश श्रीवास्तव सहर्ष देंगे। आपके सवालों का मुझे इंतजार रहेगा, आप अपने सवाल मुझे मेरे ई-पते पर(manisha.hijda@gmail.com) पर भेज दीजिये।

शनिवार, 8 नवंबर 2008

मुखौटेधारी ब्लागरों को धिक्कार है,थू है उन पर....

पिछले कुछ दिनों से अर्धसत्य पर कुछ भी लिख पाना निजी कारणों से संभव नहीं हो पा रहा था। आज जब मामा जी डा.रूपेश श्रीवास्तव के घर गयी तो बच्चों के लिये काम करने वाली एक संस्था CRY के दो लोग बैठ कर उनसे पैसे जुगाड़ने के लिये तरह-तरह से समझा रहे थे और मामाजी हैं कि सुन रहे थे लेकिन जब मामा जी ने हमारे बारे में बात शुरू करी तो महानता का ताज सिर पर रख कर कट लिये। ब्लागिंग में भी ऐसे ही मुखौटेधारियों की कमी नहीं है जो बस एक दूसरे को महान-महान कह कह कर अंहकार की तुष्टि करते रह्ते हैं। जब शास्त्री जी ने सारथी पर हमारे बारे में लिखा तो टिप्पणियां करने लोग दौड़ पड़े कि हम भी उदार हैं, हम भी अर्धसत्य पढ़ते हैं, हम भी लैंगिक विकलांगो के प्रति सहानुभूति और प्रेम रखते हैं। उन मुखौटाधारियों को उस पेज पर धिक्कारने के बाद मैं आज उन लोगों के मुखौटे को अपने पन्ने पर भी धिक्कार रही हूं। हममें ऐसे किसी भी खोखली हड्डियों वाले मुखौटेधारी ब्लागर की सहानुभूति की जरूरत कहां है हम तो अपने मार्गदर्शक डा.रूपेश की दी हुई ताकत से ही नयी शुरूआत करने का साहस जुटा चुके हैं। ऐसे लोग अर्धसत्य न ही देखें तो बेहतर है क्योंकि हम तो शारीरिक लैंगिक विकलांग है,हिजड़े हैं लेकिन ऐसे लोग आत्मा के स्तर पर हिजड़े हैं, थू है थू है थू है ऐसे लोगों पर.........

शनिवार, 6 सितंबर 2008

क्या मैं आपका लिंग काट दूं?????


मैंने अपने मामाजी(डा.रूपेश श्रीवास्तव) के पास कुछ समाचार पत्रों की कटिंग्स और कुछ वीडियो क्लिपिंग्स देखी जिनके केंद्र में एक ही समाचार पर जोर था कि कुछ अपराधी किस्म के लोग अच्छे-भले पुरुषों का लिंग काट कर हिजड़ा बना कर अपनी टोली में शामिल कर लेते हैं।
अब मेरी बात को गौर से समझिये कि नुकसान पहुंचाने वाले से बदला लेना एक सहज सी इंसानी फितरत है, क्या आज तक आपने कोई समाचार देखा या पढ़ा कि किन्ही हिजड़ों ने जिस पुरुष का लिंग काटा था उसने बदला लेने की नियत से उन हिजड़ों में शामिल होकर उन हिजड़ों की हत्या कर दी हो या मारा-पीटा तक हो। क्यों????? क्या आपका लिंग मैं काट दूं तो आप मुझे जीवित छोड़ेंगे? आपका परिवार मुझे छोड़ देगा? क्या कानून मुझे माफ़ कर देगा? यदि मैं किसी द्स-बारह साल के लड़के का लिंग काट देती हूं तो क्या लिंग कटते ही उसकी याददाश्त भी गुम हो जाती है कि वह अपने माता-पिता के प्यार को भूल जाता है और उनके पास नहीं जाता बल्कि जिसने उसका लिंग काटा है उन्हीं लोगों के साथ उनके समुदाय में बड़े प्रेम से रहने लगता है और जिंदगी भर रहता है? अगर हिजड़े इतने बड़े सर्जन होते हैं जैसा कि उपन्यासकार जान इरविंग के १९९४ में प्रकाशित उपन्यास में उन्होंने लिखा है तो क्यों नहीं हिजड़े पुरुषों का लिंग काटने का झंझट करते हैं बल्कि लड़कियों की योनि की सिलाई कर दें बस मूत्रमार्ग भर छो़ड़ दें तो अधिक अच्छा विकल्प होगा, आपका क्या विचार है इस सुझाव पर? मैं ऐसे हजारों सवाल खड़े कर सकती हूं क्योंकि मैं इस बात के सत्य को जानती हूं और अब मेरी ज़हालत डा.रूपेश श्रीवास्तव द्वारा दी जा रही शिक्षा के प्रकाश से समाप्त हो रही है। सच ये भी है कि लैंगिक लक्षणों की अस्पष्टता को आधार बना कर एक समाज खुद को हजारों पीढ़ियों से जिंदा रखे है और कुछ क्रूर किस्म के खूंख्वार सफेदपोश लोग हमारे जैसे अभागे लैंगिक विकलांगों को "थर्ड सेक्स" की मान्यता दिलाने की वकालत कर रहे हैं ताकि उनकी हैवानियत भरी कुंठित यौन वरीयताएं (sexual preferences) कानूनी जामा पहना कर एक तरफ सुरक्षित रख दी जाएं। हमारे जैसे अभागे बच्चों को पहले तो पहले तो अपनी गलीज़ यौन कुंठा के लिये ऐसे लोग इस्तेमाल करते रहे और अब हमें बनाया जा रहा है "एड्स लाबी" के प्रचार का सामान। कोई तो इसे रोको..............

लैंगिक विकलांगों का गणेशोत्सव और हिंदू-मुस्लिम एकता


आजकल महाराष्ट्र में हर तरफ गणपति महोत्सव की धूम मची हुई है। इस देश के लोगों की फ़ितरत है कि कितनी भी समस्याएं हों फ़िर भी उत्सव मनाने के लिये अतिरिक्त ऊर्जा जगा ही लेते हैं। अपने अस्तित्त्व और नागरिकता के सवाल से जूझते हुए लैंगिक विकलांग समाज में भी यही बात है क्योंकि आखिर हैं तो ये भी शुद्ध भारतीय और इंसान भी। इसी के चलते मुंबई के उपनगर भिवंडी में गायत्री नगर क्षेत्र के कुछ लैंगिक विकलांग मित्रों ने इस बार एक मित्रमंडल का गठन कर पांच दिवसीय गणपति स्थापना करी। विदित हो कि इस क्षेत्र में बहुत सारे लैंगिक विकलांग रहते हैं। इस "किन्नर ग्रुप औफ़ गायत्रीनगर" नामक मित्र मंडल में शामिल लोगों में प्रमुख रानी, टीना, रोशनी, चंदा, नगीना, शबनम, सोनी, अंजली, उबाली आदि लैंगिक विकलांग हैं। यह इन लोगों का प्रथम गणेशोत्सव है। इसके लिये ये लोग गायत्रीनगर से पांच किलोमीटर दूर कुंभारवाड़ा से गणेश भगवान की मूर्ति को पूरे धूमधाम और उत्साह उल्लास से नाचते-गाते हुए लेकर आये। इस दौरान जो एक विशेष जिक्र करने वाली बात है कि चूंकि रमज़ान का महीना चल रहा है इस वजह से इस पांच किलोमीटर लंबे रास्ते में कई जगह पर इलाके के मुस्लिम भाईयों ने इन गणे भक्त लैंगिक विकलांगो का शरबत पिला कर स्वागत करा और स्थापना के स्थान तक साथ आकर इन लोगों का उत्साह बढ़ाया। कुल मिला कर यह उत्सव गणेशोत्सव के साथ ही हिंदू-मुस्लिम एकता का ही माहौल प्रस्तुत कर रहा है।

बुधवार, 3 सितंबर 2008

एक मैं और एक तू.....





एक विचार जो कि भीतर तक झिंझोड़ता रहता है कि सुंदरता क्या होती है और वो भी स्त्रैण सुंदरता। मैं जो दो चित्र प्रेषित कर रही हूं उन्हें जरा गौर से देखिये आपको अंतर स्पष्ट समझ में आ जाएगा कि एक व्यक्तित्त्व लाचारी, गरीबी, मजबूरी, जबरन मुस्कराने के प्रयास से भरा है और वहीं दूसरी ओर है अमीरी, आनंद, मुक्त हास्य, कुंठामुक्त। क्यों????? बस आधार है खूबसूरती , जबकि दोनो ही लैंगिक विकलांग हैं। एक गुमनाम है और दूसरा नामचीन "लक्ष्मी" जिन्हें आप सलमान खान के कार्यक्रम दस का दम से लेकर डिस्कवरी व नेशनल ज्योग्राफ़िक चैनल तक के कार्यक्रमों में देख चुके हैं। यह सब देख कर लगता है कि नाखूनों से अपने ऊपर की त्वचा और मांसपेशियों को खुरच-खुरच कर उधेड़ दूं ताकि मन इस असुंदरता की कुंठा से मुक्त हो जाए।

सोमवार, 1 सितंबर 2008

लैंगिक विकलांग व्यक्ति में कुछ अतिमानवीय अथवा दैवीय शक्ति होती है?


क्या आपको भी ऐसा लगता है कि लैंगिक विकलांग व्यक्ति में कुछ अतिमानवीय अथवा दैवीय शक्ति होती है? मुझे अक्सर जो अनुभव होते हैं वह सामान्य तो किसी कोने से नहीं होते लेकिन इन बातों को मैने अब समझ लिया है कि परिवर्तन की लहर में जैसे जैसे जोर आयेगा लोगों का व्यवहार बदलेगा लेकिन मुझे अजीब लगता है जब अत्यंत उच्च शिक्षित लोग भी मेरे जैसे अधूरे इंसान को देख कर ऐसे श्रद्धापूर्वक व्यवहार करने लगते हैं बच्चों के सिर पर हाथ रखने का आग्रह करने लगते हैं जैसे मैं कोई दिव्य शक्ति से संपन्न हूं। मैं रजनीश भाई और अपने गुरुदेव(मामाजी) डा.रूपेश श्रीवास्तव से आज यह पूछ रही हूं कि क्या उन्हें मुझमें कुछ दिव्यता दिखती है? क्या मैं साधारण इंसानों की तरह नहीं हूं? जिन्हें रजनीश भाई से आशीर्वाद लेना चाहिये वो मुझसे आशीर्वाद लेना चाहते हैं क्या विचित्र लोग हैं?

रविवार, 24 अगस्त 2008

रफ़्तार डॉट काम के ब्लाग रिव्यू में अर्धसत्य : पूजा बहन को धन्यवाद

सार्थक चीख
समाज में तिरछी नजरों से देखे जाने वाले एक वर्ग के व्यक्ति ने ब्लॉगजगत में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई है। ब्लॉग 'लैंगिक विकलांग' द्वारा बनाया गया है। ब्लॉगर अपने अनुभवों पर यहां बात करती हैं। आधासच डॉट ब्लॉगस्पॉट नाम से बनाया गया यह ब्लॉग समाज में होते परिवर्तन को रेखांकित करता है। परिवर्तन, जो वक्त के साथ आता ही है। ब्लॉग का टाइटल कहता हैः हम अधूरे इंसान अगर सच भी बोलें तो लोग कहते हैं उसे अर्धसत्य। ब्लॉग इसी साल बनाया गया है और आमतौर पर नियमित अपडेट होता है।
यह रिव्यू पूजा बहन ने लिख कर यह जाहिर करा है कि लोग अर्धसत्य की तरफ ध्यान दे रहे हैं, मैं अपनी उस उपस्थिति को आज के समाज में दर्ज करा पा रही हूं जिसे लगभग तीस साल पहले नकार दिया गया था और मेरे माता-पिता को मेरा जन्म प्रमाणपत्र यह कह कर नहीं दिया गया था कि न तो यह लड़का है न ही लड़की तो सर्टिफ़िकेट पर क्या लिखें? मेरे माता पिता ने मुझे बड़ी ही उहापोह में लड़का(क्योंकि लड़का नहीं था) मान कर पाला लेकिन ग्रेजुएशन तक आते-आते तो मुझे हर कदम पर चुभो-चुभो कर यह एहसास दिलाया गया कि मैं मानवों की सामजिक मुख्यधारा में स्वीकार्य नहीं हूं। तब मुझे सहारा दिया मेरी लैंगिक विकलांग गुरू "शीला अम्मा" ने जो खुद भी अपने समय में य तिरस्कार की पीड़ा भुगत चुकी होंगी। अब मैं अपने प्रेरणास्रोत व मार्गदर्शक से मिल चुकी हूं जो कि सही अर्थों में गुरुदेव कहलाने के अधिकारी हैं, जिन्होंने मुझे अच्छी हिंदी सिखाई, कम्प्यूटर सिखाया, ब्लागिंग सिखाया और यह बताया कि मैं ईश्वर की गलती नहीं बल्कि उनकी सर्वश्रेष्ठ रचना हूं जिसमे कि स्त्री और पुरुष दोनो के गुण हैं और अवगुण किसी के भी नहीं; जीवन को नया अर्थ मिल गया है। अब भगवान से प्रार्थना है कि मेरे भाई डा.रूपेश श्रीवास्तव का कद इतना बड़ा हो जाए कि हर लैंगिक विकलांग को इनका साया नसीब हो सके। एक बात और लिखना है कि अब तक जो शब्द मेरे जैसे लोगों के लिये प्रयोग करे जाते थे उनसे भाईसाहब असहमत थे जैसे कि हिजड़ा या किन्नर, तो उन्होंने एक सर्वथा नए सार्थक शब्द की रचना करी "लैंगिक विकलांग",जोकि अब प्रयोग में आने लगा है और आशा है कि आने वाले समय में हिंदी के शब्दकोश भी इस शब्द को स्वीकार लेंगे।

गुरुवार, 21 अगस्त 2008

निर्बल के बलराम और रक्षा का वचन

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आज मुझे मेरे सारे भड़ासी भाईयों और यशवंत दादा के साथ रजनीश की बहुत याद आयी है वैसे तो ये सब मेरे दिल में हैं....

मेरे डाक्टर मामा ने दिया रक्षा का वचन राखी के त्योहार पर....

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अब तक मैं सही तरीके से ब्लागिंग करना सीख ही नहीं पायी थी ये मेरी लापरवाही थी लेकिन अब सब कर सकती हूं।

शुक्रवार, 25 जुलाई 2008


कुछ दिन पूर्व मैने अपनी एक संस्मरण की पोस्ट डाली थी, मुंबई में भडास परिवार के मिलन से लेकर नए और अबूझ लेकिन अपने से रिश्तों की दास्ताँ थी, रुपेश भाई का प्यार तो मुनव्वर आपा का स्नेह, हरभुशनभाई का आत्मिक व्यवहार मगर सबसे जुदा हमारी मनीषा दीदी का प्रेम ऐसा की जैसे वो हमारी माँ हो या बड़ी बहन या फ़िर ऐसा रिश्ता की अधिकार के साथ हम एक दुसरे पर लाड प्यार या फ़िर गुस्सा भी कर सकें।
मेरा ये पोस्ट कहने को तो सिर्फ़ एक स्वजन मिलन कार्यक्रम जैसा था मगर सच कहें तो रिश्तों की नींव थी जो निश्चित ही बेहद मजबूती के साथ डाली गयी। मगर इस पोस्ट को डालने के बाद ही हमारी मनीषा दीदी ने एक प्यारा सा मेल मुझे कर दिया, कहने को सिर्फ़ ये का मेल है मगर मानवीय संवेदना का अथाह सागर, सच कहूं तो इसे कई बार पढ़ा और बार बार पढ़ा, अभी भी पढता हूँ और जब ये मेल आया तभी विचार की इसे भडास पर डालूँ , गुरुवार से सलाह भी लिया मगर एक छोटे भाई को भेजे इस निजी पत्र को सार्वजानिक करुँ या ना करुँ के ऊहापोह में रहा। मेल पढ़ें.......भाई,आपने जो तस्वीरें भड़ास पर डाली हैं उन्हें देख कर एक बार मैं रूपेश दादा से लिपट कर रो ली क्योंकि एक मेरा वो बायोलाजिकल परिवार था जो मुझे कब का भूल चुका है और एक आप लोग हैं जिनसे मेरा कोई रक्त संबंध न होने पर भी लगता है कि जन्म जन्म का साथ है। आज भाई के घर पर ही रुक गयी हूं।आपको बहुत सारा प्यार,अच्छे से नौकरी करो और खूब नाम कमाओ ताकि आपकी ये बहन आप सब पर गर्व कर सके।प्रेम सहितमनीषा दीदी
ये मेरी वो बहन है जो लैंगिक विकलांग है, समाज जिसे अछूत समझती है और जिम्मेदारी से भागने वाले हमारे समाज के मठाधीश का समाज के इन बच्चों के लिए कोई दायित्व नही मगर मेरे लिए ये मेरी बहन का केसा ख़त है जिसमे वर्णित संवेदना मुझे अभी के सम्पूर्ण मनुष्यों में नही नजर आती, एक छोटा सा संवाद छोटी सी मुलाक़ात मगर रिश्ते का जोड़ ऐसा की जैसे हमारी कई जन्मों की पहचान हो।
सच कहूं तो इसे सामने रखने का कार्य सिर्फ़ इसलिए की आज के समाज में सच्चे अर्थों में मेरे लिए तो मनीषा दीदी ही सबसे अपनी हैं क्यूंकि ऐसा प्रेम नि : स्वार्थ भाव मुझे नही लगता की आपको अपने घरों में भी मिलेगा।
दीदी हम आपके साथ हमेशा हैं।
आपके चरणों में इस छोटे भाई का चरणवंदन
आपका छोटा भाई
रजनीश के झा

बुधवार, 9 जुलाई 2008

सेक्स वेबसाइट का अर्धसत्य को प्रस्ताव.......



आज एक बार फिर से शिद्दत से एहसास हुआ था कि मैं बाकी सामान्य लोगों से अलग हूं क्योंकि मेरे बड़े भाई साहब डा.रूपेश श्रीवास्तव ने जिस तरह मुझे बताया कि उन्हें क्या और किससे प्रस्ताव आया... हमेशा की तरह से हम भाई-बहन मिले तो मैंने देखा कि भाई कुछ उदास से महसूस हो रहे हैं लेकिन अपनी उदासी को मुझसे छिपाने की नाकामयाब कोशिश कर रहे हैं। जब मैंने बहुत पूंछा तो उन्होंने बताया कि उन्हें किसी सेक्स वेबसाइट चलाने वाले ने फोन किया था कि क्या आप अर्धसत्य को उस वेबसाइट से जोड़ना चाहेंगे? हम लोग गे-लेस्बियन सेक्शन के साथ में एक नया सेक्शन हिजड़ों के लिये शुरू करने जा रहे हैं. हमारी व्यापारिक नीति व शर्तें ये...ये और वो ...वो हैं। यह जान कर थोड़ा सा पल भर को तो मुझे भी दुःख हुआ पर ये सोच कर कि इंटरनेट पर तो इस विषय की भरमार है तो वो बस एक व्यवसायी था जिसने हमें भी अपने जैसा समझा होगा और अपनी नीति बता दी, इस पर सहजता से उसे मना कर देना चाहिये बस लेकिन हम दोनो तो क्षुब्ध हो गये। शायद अभी हम दोनो को इन कटुताओं को झेलने के लिये और अधिक मजबूत होना पड़ेगा। हम लोगों ने इस विषय को चाय की चुस्की में ग़र्क करके जो कष्ट हुआ उसे निगल लिया और फिर चल पड़े हैं अपने रास्ते पर.......... ये सोच कर कि इस तरह के लोगों के अलावा ऐसे भी लोग तो हैं जो मुझे प्रेम करते हैं ,सम्मान देते हैं,आदर से दीदी कह कर पुकारते हैं। भाई ने खुद मुझे संबल दिया है किन्तु शायद मुझे भरमाने के लिये चिंतित दिखाते हैं खुद को कि वे भी साधारण इंसान हैं।

शनिवार, 21 जून 2008

एक विचार की शुरूआत: श्री दीनबंधु प्रसाद



किताबी शिक्षा अधिक न होने के बाद भी बेहद ऊंची सोच, उच्च आदर्श और स्वच्छ विचारों के धनी हैं श्री दीनबंधु भोलानाथ प्रसाद। बिहार के रोहतास जिले के एक गांव के रहने वाले तीस वर्षीय दीनबंधु जी ने दसवी कक्षा तक पढ़ाई करी है घर की माली हालत ज्यादा अच्छी न होने के कारण ज्यादा पढ़ न सके और नौकरी के लिये मुंबई आना पड़ा, मध्यरेल में प्वाइंट्समैन के पद पर कार्यरत दीनबंधु जी के तीन बेटे हैं। जब मैंने इनसे लैंगिक विकलांगो के विषय में बात करना शुरू करी तो उन्होंने जो विचार दर्शाए वे अत्यंत आशास्पद प्रतीत होते हैं कि भविष्य सुखद होगा। इनका मानना है कि माता-पिता स्वयं ही रूढ़ियों में जकड़े रहते हैं इसीलिये किसी लैंगिक विकलांग बच्चे की पैदाइश पर अकुला जाते हैं जबकि मां ने उतनी ही प्रसव पीड़ा झेली है जितनी कि सामान्य बच्चों के जन्म में होती है फिर क्यों उसका आंचल छोटा पड़ जाता है,क्यों वह मां अपने जने बच्चे को भले ही दुःखी हो कर, रोकर ही सही लैंगिक विकलांगों की टोली को सौंप देती है? दीनबंधु भरपूर आक्रोश में इस बात को कहते हैं कि यदि आप कुतिया कि पिल्ले को उठाने की कोशिश करें तो वह आपको एक पशु होकर भी अपना बच्चा नहीं ले जाने देती और भौंक कर, काट कर अपना विरोध जता देती है लेकिन एक इंसानी माता कैसे सहन कर लेती है कि कोई उसके बच्चे को ले जाए। मांओ की ममता लिंग पर टिकी सड़ी परंपरा के आगे बौनी हो जाती है। चिढ़ होती है उन बुद्धिजीवियों से जो महिला विमर्श पर सिर फोड़े रहते हैं और लैंगिक विकलांग बच्चे की बात आते ही सांप सूंघ जाता है इनकी बुद्धि को। सब को बदलाव की पहल करनी होगी कि हम अपने बच्चों से इतना प्रेम करें कि उन्हें किसी को देने से इन्कार कर सकें और यदि कोई जबरन उस बच्चे को ले जाए तो कानून का सहारा लें। क्या आज तक किसी माता-पिता ने पुलिस में इस बात की रिपोर्ट दर्ज कराई है कि हिजड़ों की टोली उनका बच्चा ले गई? दीनबंधु जी चाहते हैं कि उनका ये संदेश मांओ तक पहुंचे जिन्होंने उन बच्चों को भी नौ माह कोख में पाला होता है वे अपने बच्चों को रोकें इस नर्क में जाने से...........
आज दीनबंधु जी से बात करके लग रहा है कि ये तो विचार का पहला धमाका है जो कि एक चैन रिएक्शन के रूप में शुरू हो जाएगा, आज एक है कल सौ, हजार, लाख और करोड़ होते देर न लगेगी। मैं ईश्वर से प्रार्थना करती हूं कि अगर कुछ करना है तो दीनबंधु जी जैसी सोच रखने वाले कुछ लोग दुनिया में भेज दे ताकि मेरा काम सरल हो जाए।

शोषण का पोषण करते ये गुरूघंटाल

सभ्य समाज के ढांचे में प्रगतिवादी सोच को जब परंपराओं में कमी नजर आती है तो स्वाभाविक है कि नई सोच रूढ़ियों का विरोध करेगी। इस वैचारिक विरोध से ही समाज की कमियां क्रमशः दूर होती जाती हैं। स्वस्थ समज के लिये जो परंपराएं हानिकारक रहती हैं वे समाप्त हो पाती हैं। ऐसी है बुरी परंपराएं थीं - बाल विवाह, सती प्रथा, दहेज प्रथा, पशु बलि, बंधुआ मजदूरी,छुआछूत आदि। जब श्रेष्ठ लोगों ने इन बुरी परंपराओं को समझा कि ये समाज के विकास में बाधक हैं तो इनका पुरजोर विरोध किया लेकिन यकीन मानिये कि एक बहुत बड़ा वर्ग ऐसा भी था जिसने इन परंपराओं को अपनी सभ्यता की पहचान बताते हुए इनके पक्ष में हो कर इन्हें जीवंत रखने के लिये बाहुबल, धर्म और कानून आदि के हथियार उठा लिये। एक बारगी सामने से देखने से लगता है कि ये मात्र रूढ़िवादियों और प्रगतिवादियों के बीच असहमति का परिणाम है परंतु अंदर से पर्तें उघाड़ कर देखने पर ये मात्र निहित स्वार्थों की रक्षा के लिये होती लड़ाई थी।
लैंगिक विकलांगों के समाज में भी ठीक ऐसा ही चल रहा है। जब कोई लैंगिक विकलांग गुरू-शिष्य परंपरा से इस समाज में प्रवेश करता है तब गुरू कहलाने वाले शख्स के मन में सत्यतः ऐसा कोई भाव होता ही नहीं है गुरूजी तो बस सुंदर-कमाउ शिष्यों की कमाई पर नजरें गड़ाए रखते हैं ताकि जल्द से जल्द बैठ कर खाने की जुगाड़ हो सके। समय बीतता जाता है और नए नायक, गुरू और चेले इस परंपरा में जुड़ते जाते हैं लेकिन स्वार्थ पर टिकी शोषण की प्रक्रिया निरंतर सदियों से चलती चली आ रही है। हर गुरू का कर्तव्य होता है कि वह अपने जीवन के अनुभवों तथा जानकारियों के आधार पर अपने शिष्यों को खुद से दो कदम आगे बढ़कर बेहतर जीवन जीने की प्रेरणा दे। यही गुरू-शिष्य परंपरा की सार्थकता है। किन्तु लैंगिक विकलांगों के परंपरागत समाज में गुरू भी भीख ही मांगते थे या देहव्यापार करते व नाच-गाकर बधाई देते और शिष्य भी वही करते रहे। गुरू भी समाज की मुख्यधारा से बाहर बहते रहे और शिष्यों को भी रहस्यमय परंपराओं की आड़ में यही सब कराते रहे। किसी गुरू ने अपने शिष्यों को आजीविका के लिये किसी अन्य कार्य के लिये न तो प्रेरित करा और न ही यह प्रेरणा दी कि बेटा मैं तो न पढ़ सकी कम से कम तुम तो पढ़ सको इसलिये मैं तुम्हारे लिये घर पर ही ट्यूटर लगा देती हूं? किसी गुरू ने समाज द्वारा किये गये बहिष्कार के खिलाफ़ आवाज को इतना बुलंद क्यों नहीं किया कि कानून उस आवाज को सुन सकता? खुद तो जाहिल बने रहे और नए आने वाले बच्चों को भी जाहिल-बेहया बनाए रखा। कुछ जगहों से यदा-कदा आपको सूचनाएं मिलती होंगी कि अमुक शहर या गांव में फलां लैंगिक विकलांग ने अपने धन से स्कूल खोला है लेकिन क्या आज तक किसी ने देखा है कि उस स्कूल में कोई लैंगिक विकलांग बच्चा पढ़ रहा हो अपनी सही पहचान के साथ? अरे हिन्दुओं ने सरस्वती विद्या मंदिर बना लिये मुस्लिमों ने अंजुमन इस्लाम बना डाले अपने अपने समुदाय के बच्चों को पढा़-लिखा कर उनकी पहचान समाज में ऊंची उठाने के लिये लेकिन किसी लैंगिक विकलांग गुरू ने ऐसा हरगिज नहीं करा कि जो पीड़ा मैंने झेली है वो इन बच्चों को न उठाने दूंगी, इन्हें पढा़-लिखा कर इस काबिल बनाऊंगी कि आने वाले समय में ये अपने जायज़ हक़ के लिये सही तरीके से मांग कर सकें। ये स्कूल वगैरह खोलना मात्र प्रसिद्धि पाने के टोटके रहते हैं। अगर सचमुच गुरू पद के उच्च आदर्श को पालने के इच्छुक ये गुरू लोग होते तो समाज में चेतना लाने का प्रयास करते कि अपने बच्चों को किसी हिजड़ो की टोली को मत दो और अगर कोई जबरदस्ती करता है तो कानून का सहारा लेकर अपहरण का मामला दर्ज करवाओ, क्यों कोई गुरू किसी NGO को इस बात के लिये प्रेरित नहीं करता कि मेरे शिष्यों को प्रौढ़ शिक्षाकेंद्र ले जाओ .......... । ये गुरू बने हुए गुरूघंटाल जानते हैं कि अगर उन्होंने ऐसा करा तब तो अनिर्णीत लिंग के आधार पर जीवित इनका थोथा,खोखला और शोषण पर टिका समाज महज दो पीढ़ियों मे ही समाज की मुख्यधारा में विलीन हो कर लुप्त हो जाएगा और फिर इन्हें खाने के लिये मेहनत-मजदूरी या कोई रोजगार करना पड़ेगा जो कि ये गुरूघंटाल लोग नहीं चाहते यही कारण है कि ये लोग शोषण का पोषण कर उसे जीवंत बनाए हुए हैं। मुझे पता है कि मैं जिस बात की शुरुआत कर रही हूं उसका सुखद अंत देखने के लिये जीवित न रहूं लेकिन मेरे भाई जो कि सच्चे अर्थों में गुरूपद के अधिकारी हैं उनकी प्रेरणा से इस नए वैचारिक धरातल पर इन तथ्यों को ला रही हूं।

शनिवार, 14 जून 2008

वंदना बहन ने माना कि मैं किन्नर,यक्ष या गन्धर्व नहीं बल्कि इंसान हूं.......




आज मैंने वंदना बहन जी को दिये साक्षात्कार को उनकी साप्ताहिक पत्रिका "इंडिया न्यूज"(१४ जून-२० जून २००८) के अंक में छपे रूप में देखा और उस आलेख को पढ़ा तो मुझे वाकई यकीन हो चला कि मेरे भाई डा.रूपेश सही कहते हैं कि सभी पत्रकार एक जैसे नहीं होते। इसमें से वंदना बहन ने सिद्ध किया कि जिस तरह एक पत्रकार मेरी भावनाओं को आहत कर सकता है उसी तरह वंदना बहन की तरह के पत्रकार इन दुखों का मरहम भी अपनी लेखनी से लगा सकते हैं; अब पता चल रहा है कि इस काली स्याही के कितने रंग हैं और जहां एक ओर ये मुंह पर छिड़क कर मुंह काला और दाग़दार कर देती है वहीं दूसरी ओर जले हुए जख्म पर लगा देने से शीतलता प्रदान करके घाव को शीघ्र ही भर कर ठीक भी कर देती है। सच तो ये है कि मैं उस लेख को करीब सौ बार पढ़ चुकी हूं लेकिन यकीन कर पाना भी एक सपने जैसा ही लग रहा है कि कहीं ये भी एक सपना न हो जो किसी का धक्का लगने या ’अबे ओए छक्के.......’ की आवाज से टूट जाएगा। वंदना बहन जैसे लोग जो हमें सहज ही इंसान मानते हैं बिना किसी हिचकिचाहट के तो अब खुद पर यकीन हो चला है कि मैं किन्नर या यक्ष, गन्धर्व, नाग या देवी-देवता जैसी कुछ नहीं हूं बल्कि मेरे भाई की तरह सामान्य इंसान हूं। मैं एक बात पुरजोर रखना चाहती हूं कि "थर्ड सेक्स" जैसी अस्तित्त्वहीन बात को लोग ना जाने किस स्वार्थवश सच सिद्ध करने पर तुले हैं। मैंने वंदना बहन को देखा नहीं है पर पूरा भरोसा है कि वे दिल से तो मेरे भाई डा.रूपेश का ही नारी संस्करण हैं। उनसे एक विनती कर रही हूं कि कभी मुंबई आएं तो अवश्य मिलें ताकि उन्हें जोर से सीने से लगा कर प्यार कर सकूं और धन्यवाद की औपचारिकता करने की बजाय उन्हें अपने हाथ से बना खाना खिला सकूं। अब मैं कह सकती हूं कि मेरे लैंगिक विकलांग समाज के इतर मेरी दो बहनें और हैं जिनमें बड़ी हैं श्रीमती मुनव्वर सुल्ताना जो कि उर्दू स्कूल में शिक्षिका हैं और दूसरी वंदना भदौरिया जो कि एक ईमानदार पत्रकार हैं, जिनके ऊपर भाई की बात सही लागू होती है कि " पतनात त्रायते इति पत्रकारः" यानि कि जो पतन से बचाए वह ही पत्रकार है। ईश्वर से प्रार्थना है कि मेरी वंदना बहन इसी तरह से लोगों के कांटो भरे मार्ग को प्रशस्त करती रहें लेकिन उनके हाथ फूलों से भरे रहें.................

मंगलवार, 27 मई 2008

सपने अंकुरित होने लगे हैं

मैं समझ नहीं पा रही हूं कि मेरे दिल दिमाग में जो तेज सी विचारों कि आंधी चल रही है उसे शब्दों में कैसे लिखूं। मैं कल तक अपने आपको अपने अधूरेपन के लिये खुद को कोसती थी कि कब मौत आयेगी और इस नामुराद शरीर से मुक्त हो सकूंगी। लेकिनब मुझे जब से मुझे मेरे भाई मिले हैं मेरी तो दुनिया ही बदल गई है। हिजड़ा होने का लेबल उतर रहा है ,इस बात का एहसास हो रहा है कि हम तो बस एक प्रकार की विकलांगता के शिकार हैं जो कि किसी भी तरह से कमी नहीं है। तीन दिन पहले जब भाई ने मुझसे कहा कि कोई पत्रकार मुझसे बात करना चाहती है तो मैंने साफ़ मना कर दिया था कि मैं किसी पत्रकार से बात नही करना चाहती हूं क्योंकि इससे पहले मेरा अनुभव बहुत गन्दा रहा जिसे मैंने लिखा भी था । भाई ने बहुत समझाया कि सब लोग एक जैसे तो होते नहीं हैं तो फिर सब पत्रकार एक जैसे क्यों समझती हो? लेकिन वंदना बहन ने भी मेरे बारे में जो कहा उससे मैं इमोशनल हो गई बात करते करते और रोने लगी तो भाई ने बीच में आकर बात को सम्हाला। सच तो ये है कि मैं अपना अतीत भूलना चाहती हूं। दूसरि बात कि जब कोई ये कहता है कि मैंने ब्लागिंग करके बड़ा काम कर दिया तो ऐसा लगता है कि वो मुझे एहसास करा रहा है कि मैं सचमुच मे इस लायक नहीं हूं ये ऐसा मानते हैं वरना ऐसा क्यो बोलते ? क्या ब्लागिंग करना या कम्प्युटर सीखना ऐसा काम है जिसे आसमान से टपकने वालेलोग ही कर पाते है और मैने कर दिया तो चमत्कार हो गया। अब मेरे भीतर एक अजीब सी बात आ रही है जिससे मुझे अडचन हो रही है और खुशी भी हो रही है। पहले मै बड़े मजे से लोगो के आगे हाथ फैला कर एक दो रुपया मांग लेती थी लेकिन अब लगता है कि कुछ गलत हो रहा है मैं इस काम के लिये नहीं हूं। ताली बजाते ही सपना शुरु हो जाता है कि मैं एक बड़े मंच पर मालाएं पहना कर सम्मानित करी जा रही हूं। मैंने स्कूल खोला है जिधर सब लोग मेरे जिसे पढ़ रहे हैं कोई भीख नहीं मागने जा रहा और न ही हमे कोई पुलिस वाला सता रहा है। मै आफ़िस मे बैठ कर भाई के साथ प्लान कर रही हूं कि अब आगे क्या करना है लेकिन अगले ही पल लोकल में चढने वाली भीड का धक्का सपना तोड देता है,फिर मुस्कराते हुए भीख मांगना शुरु कर देती हूं, ये सपना खुली आंखो से देखते हुए कि बस जल्दी ही ये परेशानियां खतम हो जाएंगी। मै और भाई मिल कर सबको पढना सिखाएंगे और भाई बीमार लोगो को दवा दे रहे होंगे साथ मे मै नर्स बन कर खड़ी रहूंगी। ऐसे ही न जाने कितने सपने अंकुरित हो रहे हैं न जाने कब फल लगेगे इन पौधों में? जब मेरे सपनो के पौधों में फल लगने लगेगे तब मेरे मम्मी पापा मुझे टीवी पर देख कर गर्व कर सकेंगे शरमाएगे नहीं।

शनिवार, 3 मई 2008

लैंगिक विकलांग व्यक्ति के हाथ के स्पर्श .......

बचपन से ही हमें हमारे लैंगिक भेद के बारे में एहसास कराया जाता है। वस्त्र, व्यवहारादि लैंगिकता के अनुसार चलता रहता है। इस प्रकार मानव ही नहीं लगभग सारा जीव-जगत दो भागों में बंट जाता है - नर और मादा।जैसे-जैसे किताबी और व्यवहारिक जानकारियां बढ़ती गयीं पता चलता गया कि लैंगिक विभाजन की जो गाढ़ी सी लकीर हमें दिखती है उसे अगर बारीकी से देखा जाए तो वह धूमिल होते-होते विलीन हो जाती है। समाज, दर्शन शास्त्र और साइंस मी धारनाओं में उठापटक होने लगती है। मैं एकबार फिर सोचने लगता हूं कि विश्वनिर्माता ईश्वर स्त्रीलिंग है या पुल्लिंग? नपुंसकलिंग है या उभयलिंगी?? मुझे पता है कि मेरी ये बात मूर्खता की पराकाष्ठा का गरिष्ठतम विचार है। जीव-जगत को निहारने और जीवन की उत्पत्ति के बारे में लैमार्क, डार्विन और स्टेनले मिलर अदि को समझने के बाद जाना कि जीवन का प्रारंभ जल में हुआ फिर क्रमशः उभयचर, स्थलचर और नभचर बने। आज मैं जानता हूं जीवों की तमाम प्रजातियों के बारे में जिनमें कि लैंगिक प्रजनन होता है किन्तु उनमें लैंगिकता का विषय गौण है। ये जलचर या उभयचर सरीसृप वंशक्रम की आवश्यकतानुसार नर से मादा और मादा से नर में सहजता से बदल जाते हैं। सबसे निकटतम उदाहरण लें तो केंचुए(earth worm) को लीजिये वह एक उभयलिंगी प्राणी है यानि नर और मादा जननांग दोनो ही सक्रिय रूप में उपस्थित होते हैं।
मानवों के समाज की रचना में लैंगिक विकलांगता या उभयलैंगिकता एक ऐसी स्थिति है जहां समाज की सरल ज्यामितीय रैखिक व्यवस्था के दोनो सिरे मिल कर वृत्ताकार सी होती प्रतीत होने लगती है। हिन्दू धर्म में माइथोलाजिकल आधार में आदिदेव भगवान शिव के साथ देवी पार्वती के समन्वित रूप के होने की कथा है जिसे कहा गया है - अर्धनारीश्वर। क्या हमारे पुरावैज्ञानिकों को इस बात को समझा था और शिव-पार्वती के समन्वित रूप अर्धनारीश्वर में सांकेतिक तौर पर निरूपित करा है।
प्रकृति की डिजायनिंग में कहीं कोई अपूर्णता नहीं है, चुम्बकत्त्व से लेकर अंतर्ग्रहीय बलों व अंतःआण्विक बलों से कुदरत सुसज्ज है। मानवों में यदि कोई शिशु किसी तरह की शारीरिक कमी लेकर जन्मता है तो प्रकृति काफी हद तक उस कमी की क्षतिपूर्ति करती है जैसे कि अंधा व्यक्ति सामान्य जनों की अपेक्षा अधिक श्रवण-सक्रिय होता है, गूंगा आदमी देहभाषा में आगे होकर इशारों से काफी अभिव्यक्तियां दर्शा लेता है, पोलियो ग्रस्त बच्चे के हाथ इतने ताकतवर हो जाते हैं कि कई बार वे हाथों के बल चल लेते हैं, हाथ न होने की दशा में बच्चा पैरों से ही सारे काम करने लगता है.........
यदि कोई इंसान सभी ज्ञानेन्द्रियों से सुसज्जित है किन्तु लैंगिक विकलांग है तो क्या कुदरत इस कमी की क्षतिपूर्ति नहीं करती होगी? हमारे शास्त्रों ने "काम" को हमारे शरीर की महत्तम रचनात्मक ऊर्जा माना गया है। इसी सोच का आधार लेकर बृह्मचर्य की एक पुष्ट धारणा हमारी सभ्यता में मौजूद है। बृह्मचर्य साधित रहता है और कामऊर्जा के अधोगमन से कुछ असामान्य नहीं होता अपितु इसी क्रम में प्रजनन होकर वंश आगे चलता रहता है। कामऊर्जा के ऊर्ध्वगमन और साधन से हमारे देश में अनेक योगियों ने अविश्वनीय चमत्कार दिखाए हैं व पूजनीय बने रहे हैं। किन्तु यदि किसी इंसान को प्रकृति ने ही इस उलझाव से मुक्त कर रखा है तो वह संबंधित प्रज्ञापराध से भी प्रभावित नहीं होगा तो फिर ये कामऊर्जा किस तरफ परावर्तित होती है? यदि हम शरीर रचना शास्त्र को देखें तो सारी बात हार्मोन्स पर चली जाती है जिनसे कि दैहिक गठन व मानसिक स्थिति का नियमन होता है। हमें इस बात को नपुंसकता व षंढत्त्व की धारणा से हट कर सोचना होगा। मैंने व्यक्तिगत अध्ययनों में पाया है कि लैंगिक विकलांग जन "ध्यान",धारणा, कल्पनाशीलता जैसे विषयों का आत्मसात सामान्य लोगों की अपेक्षा शीघ्रता से कर लेते हैं। मैंने तमाम रहस्यदर्शियों की ध्यान की कई विधियों को तुलनात्मक अध्ययन के लिये लैंगिक विकलांग लोगों तथा सामान्य जनों पर आजमाया तो लैंगिक विकलांग जन श्रेष्ठतर पाए गये। जरा विचार करिये कि क्या कभी आपने किसी लैंगिक विकलांग व्यक्ति के हाथ के स्पर्श को ध्यान से महसूस करा है उनमें से एक विशेष प्रकार की ऊर्जा का सतत प्रवाह होता रहता है जिसमें कि अत्यंत उपचारक गुण होता है। ये सम्मोहन तथा रेकी जैसे विषयों में यदि प्रशिक्षित करे जाएं तो सामान्य जनो से बहुत अधिक अच्छे परिणाम दे सकते हैं। आवश्यकता है कि आप भी मेरे कोण पर आकर इन्हें देखें और समझें।

बुधवार, 30 अप्रैल 2008

कूवगम महोत्सव

कूवगम महोत्सव के बारे में आपको बताना चाहूंगा कि यह तमिळनाडु प्रदेश के विल्लूपुरम जिले के उल्लुन्दरपेट तालुका का एक गांव है। यहां की विल्लूपुरम से दूरी लगभग तीस किलोमीटर है जिसके लिये तमाम परिवहन साधन चलते हैं । यहां हर साल चैत्र माह में कूतण्डावर मंदिर में यह महोत्सव बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। तमिळनाडु सरकार भी इस महोत्सव पर खासी तवज्जो देती है क्योंकि वह पहला ऐसा प्रदेश बन गया है जहां की सरकार ने लैंगिक विकलांग लोगों को यानि कि TG के रूप में अधिकारिक तौर पर स्वीकारा है और अब उन्हें इस पहचान पर राशन कार्ड से लेकर ड्राइविंग लाइसेंस तक दिये जाएंगे। इस बार यह महोत्सव २१ अप्रैल से शुरू हुआ, इसकी अवधि पंद्रह दिनों की रहती है। इस उत्सव में वैसे तो हर प्रान्त से लैंगिक विकलांग जन आते हैं लेकिन भाषाई समस्या के चलते मात्र दक्षिण भारतीय ही रुकते हैं। हमारी मुंबई से इस महोत्सव में भाग लेने गयीं लैंगिक विकलांग बहन रम्भा अक्का के अनुसार इसमें अनेक समलैंगिक भी शामिल होते हैं लेकिन उन्हें इस महोत्सव से कोई लेना देना नहीं होता वे बस यहां आस्था में डूबे लैंगिक विकलांग लोगों से मुफ्त में सेक्स का आनंद लेने आते हैं क्योंकि इस दौरान यहां कुछ ऐसा ही माहौल रहता है। अजीब सा माहौल रहता है भक्ति और उत्सव के रंग में रंगे लैंगिक विकलांग अपनी आस्था में मग्न रहते हैं, एड्स अवेयरनेस वाले NGO के कार्यकर्ता अपने काम में यानि कंडोम वितरण में व्यस्त रहते हैं, विदेशी पत्रकार और फोटोग्राफर्स अपने धंधे में लगे रहते हैं। इस महोत्सव के दौरान सौंदर्य प्रतियोगिता से लेकर नाच-गाने तक की प्रतियोगिता होती है, जिसमें कि गुरुओं का निर्णायक मंडल होता है; अनेक राउंड से गुजर कर किसी एक लैंगिक विकलांग को मिस कूवगम चुना जाता है और ये मानदंड उसके अधिकतम स्त्रैण होने पर ही टिके रहते हैं। इस बार सलेम की मन्त्रा को यह खिताब दिया गया है। इस महोत्सव की शुरूआत के विषय में ये लोग महाभारत काल का संदर्भ देते हैं कि जब महाभारत का युद्ध प्रारंभ होने वाला था तो परंपरा के अनुसार विजय की कामनापूर्ति के लिये किसी मानव की बलि देना होता था किन्तु जब इस कार्य के लिये कोई भी आगे न आया तो पांडवों का ही एक राजकुमार जो को अर्जुन का पुत्र था स्वेच्छा से आगे आया जो कि नागराज कौरव्य की पुत्री इरा पैदा हुआ था जिसे कई जगहों पर इरावत भी लिखा गया है लेकिन यहां तमिळनाडु में इस पात्र को अरावान के नाम से जाना जाता है ठीक वैसे ही जैसे कि अलेक्जेन्डर को हम हिन्दुस्तानियों ने सिकंदर कहा हो सकता है कि खुद अलेक्जेन्डर को भी न पता हो कि उसे सिकंदर भी कहा जाता है इसलिये यह बहस का मुद्दा नहीं है कि यह उद्धरण किस ग्रन्थ में है। इस राजकुमार ने एक शर्त रखी कि वह बलि चढ़ने से पहले विवाह करना चाहता है लेकिन ऐसे आदमी से भला कौन विवाह करता जोकि अगले ही दिन बलिवेदी पर जा रहा हो तो ऐसे में हमेशा की तरह भगवान नटवर ही काम आए और मोहिनी नामक सुन्दर कन्या का वेश धर कर उसके साथ ब्याह कर बैठे और अगले ही दिन विधवा हो गये और उस लीला से मुक्त हो गये। इसी राजकुमार अरावान के नाम पर आज भी यहां तमिळ भाषा में इन्हें "हिजड़ा" न कह कर अरावानी कहा जाता है। इस महोत्सव में ये लोग विधिवत राजकुमार अरावान की मूर्ति से दुल्हन की तरह सज-संवर कर विवाह करते हैं,खूब गाना-बजाना होता है और अगले दिन ये लोग अपने मंगलसूत्र उतार कर,सफेद साड़ी पहन कर ,चूड़ियां तोड़ कर शोक करते हुए रोते हैं और इस रुदन को ओप्परी कहा जाता है जिसमें कि खास अंदाज में बातें बोलते हुए लयबद्ध तरीके से सामूहिक रुदन करा जाता है।
इस बार इस महोत्सव में अनुमानतः पांच हजार से अधिक लोग शामिल हुए थे। इस दौरान यहां के क्षेत्रीय लोग भी इस मेले से लाभान्वित होते हैं और बनाव-श्रंगार,खाने-पीने का सामान बेचते हैं, नाच-गाने के लिये वाद्ययंत्र बेचते हैं,सरकार इसे एक तीर्थ स्थल की तरह से महत्त्व देने लगी है। इस पूरे महोत्सव में एक विचित्र बात देखने में जो आती है वो ये कि इसमें सबसे कम लैंगिक विकलांग केरल से आते हैं और सर्वाधिक आन्ध्रप्रदेश से। पिछले दो सालों की तरह से इस बार भी कुछ पढ़े-लिखे लैंगिक विकलांग लोगों ने अपने संवैधानिक अधिकारों पर भाषण भी दिये और अपने आपको EUNUCH(बधिया करा हुआ पुरुष) न मान कर UNIQUE (अद्वितीय) बताया और कहा कि हम तो भगवान अर्धनारीश्वर के मानव रूप को साकार करते हैं यही है हमारी अद्वितीयता।
इन सारी जानकारियों का श्रेय जाता है हमारी रम्भा अक्का और मनीषा दीदी को जोकि पुरानी मान्यताओं को नये नजरिये से देखने का बूता रखती हैं, गुरूशक्तियां उन्हें और बल प्रदान करें कि वे आगे बढ़ कर हम सबके साथ सम्मान से खड़ी हो सकें और अपने लिये रोजी-रोटी का साधन जुटा सकें।

शनिवार, 26 अप्रैल 2008

E for eunuch, T for transgender H is for "hijda" not for HUMAN

Tamil Nadu’s recent addition of a third gender column on ration card applications is one of a series of much needed, progressive reforms that benefit hijras.
DISCRIMINATED AGAINST and forced to live in secluded communities, India’s hijras have always had to fight for basic entitlements. Two weeks ago, however, a major victory was achieved when Tamil Nadu added a third gender to ration cards. Hijras may now enter a ‘T’ (for transgender) in place of a ‘M’ or ‘F’ on ration cards. The move makes Tamil Nadu the first Indian state to officially recognise its hijra citizens.The new rule is cause for great joy. "The government has now recognised us as a third gender. It gives us much needed dignity in society," says Noori, an HIV positive hijra, head of the South India Positive Network in Chennai. While an alphabet on a ration card may seem like a benign technicality, for Tamil Nadu’s estimated one lakh hijras (known locally as aravanis) it is a significant achievement. Ration cards, voting forms and passports have been available for aravanis only after a great deal of struggle. Ignorant administrators would leave the gender category blank, merely entering kuduma thalaivar (head of family) or, more often, ‘male’. "It is a positive development which will encourage more aravanis to openly declare themselves as transgenders," says Jeeva, who heads the Transgenders Rights Association. Jeeva got her card in 2006, where she is referred to as kuduma thalaivar but her associate Shabina Francis is identified as ‘female.’Historically, Tamil Nadu has had a very visible aravani community and, more recently, very vocal aravani activists. An aravani festival is held in the town of Koovagam annually, with a highly competitive "Miss Koovagam" beauty contest. Recently, it has been home to India’s first transgender television star, Rose.Yet, being hijra affects citizenship. Rose says, "It’s only been three or four years that ‘trans people’ have started asking for identity cards. Even now when we go and ask for IDs they don’t have a proper system to scrutinise our applications. Take my case. I wanted to change from a male name to a female one and retain the gender ‘M’ on my passport. If you want to change your gender on your passport, you need to have a sex reassignment surgery and I haven’t done that. For nine months my application was frozen because they didn’t know what to do.""We had initial success when passports with an ‘E’ (for eunuch) began to be issued two or three years ago," says Arvind Narrain of the Alternative Law Forum, Bangalore. This raises a thorny issue. ‘Eunuch’ is used to describe a castrated man, a category most aravanis do not fit into. More to the point, the word is usually used derogatorily, so the official sanction of the category is a backhanded success.Laxmi Narayan Tripathi of Mumbai NGO Astitva says, "They first wrote male on my passport, then I argued and they put ‘E’ for eunuch, but that’s not right because I am not castrated." However, after a long battle Laxmi succeeded. "Now they have put ‘TG’ (third gender) on my passport. In TG, everybody fits! Males, females, gays, bi-sexuals, women with alternative sexualities…" says an enthusiastic Laxmi.RECOGNITION OF a third gender is a human rights issue. "The ration card is proof that you are a citizen," says Reginald Watts of Bangalore NGO Sangama. "That’s one of the things you are asked for when opening a bank account, passport or driver’s license… anything." Recent changes in Tamil Nadu are a result of relentless activism by the aravanis but other states lag far behind. "At a national level the movement still has a long way to go," says Delhi gay rights activist Rahul Singh, "but this is a big step; other states should learn from this.""Kerala, for example, is so violently oppressive that you don’t see transgenders. They have to run and hide, live disguised as men," gripes Rose. "We have a visible population in Maharashtra, Delhi and a few other states but the others have a long way to go." A lot needs to be done before hijras obtain equality. "Transgenders have been part of this culture for centuries. Whenever you pick up a religious book, we are mentioned. But today we are treated as nothing. The government talks of adivasis, tribals, but where are we mentioned?" asks a passionate Laxmi. The repealing of Article 377, often used as an excuse to harass hijras, is an issue which must be addressed, as must the right to education. "The government should follow Article 14 which talks about the right to education regardless of gender. Education gives you the ability to fight discrimination," says Laxmi.Again, Tamil Nadu, and the dmk government in particular, has been considerably enlightened. In 2006, its Department of SocialWelfare passed a landmark order stating that "admission in schools and colleges should not be denied based on sex identity." The department had warned of "suitable disciplinary actions" in case of violations. "District collectors have been instructed to conduct special grievance days for aravanis once in three months," says Asha Bharathi of Thamizhnaadu Aravanigal Association. The Department of Social Welfare recently announced plans to form a welfare board to implement education and health schemes foraravanis — again a first.The rest of India needs to catch up with Tamil Nadu. Even the Constitution only guarantees rights to men and women, leaving out hijras. "After the British were forced out everyone got independence except us. It is necessary that all sexual minority groups come together and fight for their rights," exhorts Laxmi.

शनिवार, 19 अप्रैल 2008

कुदरत मानव जाति को को नष्ट कर रही है.......

आज एक चैनल पर एक कार्यक्रम में "गे" और "लेस्बियन" लोगों पर बात चल रही थी, कुछ लोगों का इंटरव्यू भी था। उसे देखने पर दिल और दिमाग के साथ मेरे पूरे अस्तित्त्व में भूकंप सा आ गया। नवयुवकों ने स्त्रियों की तरह से लाली-पाउडर लगा रखा था और बड़े ही भावुक अंदाज में दलील दे रहे थे कि हमारे साथ ईश्वर ने नाइंसाफी कर दी है हम लोग मन और आत्मा से तो औरत हैं लेकिन मर्दाने जिस्म में कैद हैं वगैरह..वगैरह....। इसी तरह से लड़कियों ने भी पुरुषों की तरह से बाल छोटे कटवा रखे थे और वे भी कुछ इसी अंदाज में ईश्वर की नाइंसाफी का बखान कर रही थीं और स्टूडियो में आमंत्रित जनता भी उनसे सहानुभूति जता रही थी। मैंने जीवन में पहली बार ईश्वर को धन्यवाद करा था मेरे बड़े भाई डा.रूपेश श्रीवास्तव से मिलने पर और दूसरी बार अब दिया कि हे भगवान आपने मुझे आंगिक(लैंगिक) विकलांगता दी जो मेरे ही न जाने किन किन पूर्वजन्मों के कर्मों का फल है लेकिन कम से कम बुद्धि तो संतुलित दी है वरना अगर इन लोगों जैसी बुद्धि होती तो ज्यादा कष्ट होता। गुरुशक्ति का स्मरण कर स्थिरचित्त होकर बैठने पर सोच को एक नया आयाम मिला है कि ये लोग दिमागी मरीज हैं और मैं इनसे सर्वथा भिन्न हूं। "गे" और "लेस्बियन" लोगों के प्रति सहानुभूति रखने वाले लोग भी इसे ईश्वरीय अन्याय ही मानते हैं जैसा भगवान ने इन्हे बनाया है वैसे वे हैं भला इनका क्या दोष...। सत्य है इनका दोष नही है बल्कि दोष है समाज का जो इन्हें मनोरोगी न मान कर सामान्य मान लेता है और उचित उपचार की प्रेरणा नहीं देकर जस का तस स्वीकार लेता है। एक इंसान जिसे ईश्वर ने पुरुषांग से सजा कर पुरुष बना कर भेजा किन्तु जब वह किशोरावस्था में प्रवेश करता है और उसका परिचय हारमोन्स के परिवर्तनों से उपजी यौनभावना से होता है, उस दौरान यदि वह किसी मनोयौनरोगी किस्म के व्यक्ति के सम्पर्क में आ जाता है। जिससे उसे पहली बार यौन भावना की अभिव्यक्ति और उसके उद्दीपनकर्म से होता है तो उसे वही सब नैसर्गिक और सहज लगता है। जैसा कि आयुर्वेद में बताया गया है कि व्यक्ति के आहार-विहार-विचार से उसके अंतःस्रावी ग्रन्थियों यानि कि पूरे एंडोक्राइन सिस्टम पर प्रभाव पड़ता है और वे उसी के अनुरूप हो कर क्रियाशील हो जाती हैं, समय के साथ ही ये भीतर ही भीतर इस बात का अनुकूलन भी हो जाता है। इसलिये शरीर के हार्डवेयर को कुदरत द्वारा निर्धारित जो साफ़्टवेयर्स चलाते हैं उनमें से लैंगिक आयाम से संबद्ध साफ़्टवेयर करप्ट हो जाता है और मर्द खुद को औरत और औरत खुद को मर्द समझने लगते हैं। इस बात पर जरा गहराई से विचार करिये कि यदि कोई बच्चा ’स्टारफिश’ जैसी जिंदगी जीना चाहे तो आप उसे क्या समझेंगे? ’स्टारफिश’ का पाचन संस्थान (digestive system) कुदरत ने ऐसा डिजाइन करा है कि वह जिस अंग से भोजन ग्रहण करती है उसी अंग से पाचन हो जाने के बाद अपशिष्ट मल का उत्सर्जन भी उसी अंग से कर देती है यानि कि मुंह और गुदा का काम एक ही अंग करता है। जबकि मानव देह में पाचन संस्थान की उक्त प्रक्रिया मुंह द्वारा भोजन ग्रहण करने के बाद गुदा द्वारा मल त्याग करने पर पूर्ण होती है। किंतु मानव अगर ऐसा करे कि पाचन के बाद उल्टी करके निकालने का प्रयास करे और इस प्रयास को तर्क से उचित ठहराए तो आप उसे क्या कहेंगे? मेरी नजरों में तो वह विक्षिप्त ही होगा। यौनकर्म में कुदरत ने आनंद की एक विशेष अनुभूति को इसलिये छिपा रखा है कि मानव उसी अनुभूति के लिये संभोग करे और प्रजनन होता रहे व वंशक्रम चलता रहे और प्राणियों की ये प्रजाति लुप्त होने से बची रहे। किन्तु विकास के क्रम में ये संतुलन मानवों द्वारा गड़बड़ा दिया गया और बुद्धि का प्रयोग निसर्ग से हट कर करना शुरू कर दिया। आज के दौर में मानव ने यौनकर्म को दो सर्वथा दो भिन्न हिस्सों में बांट दिया - प्रजनन और यौनानंद। आनंद की प्राप्ति के लिये कुदरती तरीके से भिन्न उपाय सभ्यता के विकास के साथ खोजे जाने लगे। धीरे-धीरे प्रजनन देह से हटकर प्रयोगशालाओं की परखनलियों (test tubes) में सिमटता जा रहा है और शरीर मात्र आनंद का उपकरण बनता जा रहा है।
मुझे ऐसा आभास हो रहा है कि कदाचित कुदरत ही अपना संतुलन बनाए रखने के लिये ऐसा कर रही है कि एक एक दिन मनुष्यों की बेतहाशा बढ़ती जनसंख्या के विकराल प्रश्न का एकमात्र उत्तर स्वयं ही सामने आ जाएगा और वह उत्तर है - "समलैंगिकता"। इसी समलैंगिकता के चलते कुछ समय में ही मानवजाति की जनसंख्या स्वयं ही सिकुड़ने लगेगी और अगर यही हाल रहा तो एक दिन धरती से मानव लुप्त हो जाएंगे, खत्म हो जाएगा आदम का वंश..........

रविवार, 6 अप्रैल 2008

एक पत्रकार का सवाल,"मनीषा जी, आपकी सेक्सुअल लाइफ़ कैसी है?"

आज की बात आप सब लोगों से बांटना जरूरी मानती हूं क्योंकि मैं देख रही हूं कि मेरे गुरुदेव, मार्गदर्शक और मेरे बड़े भाई डा.रूपेश श्रीवास्तव ने मुझे जो इंटरनेट के माध्यम से अपनी बातों को दुनिया के सामने रखने का रास्ता दिखाया-सिखाया है वह कारगर ही नहीं बल्कि अत्यंत तीव्र प्रभावी है। लोगों की नजर मुझ पर अब अलग नजरिये से पड़ रही है मैं इस बात को महसूस कर पा रही हूं। ब्लागिंग शुरूआत में मुझे समझ ही नहीं आयी कि भला मैं कुछ भी लिखूं उसे लोग क्यों देखेंगे लेकिन सुखद आश्चर्य तो तब होता है जब देश से बाहर रहने वाले लोगों का ध्यान हमारी बात पर जाता है, सच कहूं तो मुझे हमेशा इंतजार रहता है हमारे इटली में बसे हमदर्द श्री सुनील दीपक जी की करुणा और प्रेम से भरी टिप्पणी का। आज ब्लागिंग के चलते एक समाचार पत्र के जर्नलिस्ट महोदय मेरे इंटरव्यू के लिये आये। हर तरह के अनुभवों के लिये मेरे भाई ने मुझे ताकत दे रखी है कि कहीं मैं किसी बात पर ओवर-रिएक्ट न कर जाऊं। पत्रकार महोदय ने सवालों का सिलसिला शुरू किया और फिर घूम-फिर कर एक जगह वो आ गये जो कि शायद उनके इंटरव्यू का सेन्ट्रल आइडिया रहा होगा। उन्होंने निहायत ही शरीफ़ाना अंदाज जताते हुए मुझसे पूछा, "मनीषा जी, आपकी सेक्सुअल लाइफ़ कैसी है?" मैं तो जैसे जमीन पर आ गिरी कि ये आदमी पत्रकार है या पागल ? जो मुझसे सेक्सुअल लाइफ़ के बारे में सवाल कर रहा है या फिर वाकई उसे कुछ पता नहीं है कि एक लैंगिक विकलांग क्या होता है? कहीं मैं ही तो मूर्ख नहीं हूं? लेकिन अपनी गुरूशक्ति को स्मरण करते हुए मैंने खुद को संयमित किया और उसे बताया कि भला मेरी क्या सेक्सुअल लाइफ़ है अगर होती तो शायद मैं किसी की पत्नी होती या पति होती या होता लेकिन उस शख्स ने फिर अपनी बात दोहराई कि मैंने सुना है कि कुछ लैंगिक विकलांग लोग एनल-सेक्स से अपनी सेक्सुअल रिक्वायरमेंट्स पूरी करते हैं। मेरे लिये अब असहनीय हो चला था इस लिये मैंने नो कमेंट्स कह कर बात समाप्त कर दी। लेकिन इंटरव्यू कब का हो गया और मैंने उससे हाथ जोड़ कर विनती कर दी कि मेहरबानी करके इसे प्रकाशित न करें अपनी रोजी-रोटी के लिये किसी और प्रसिद्धि के प्यासे व्यक्ति का इंटरव्यू छाप दें। उसने मेरी बात को भलमनसाहत से मान लिया पता नहीं क्या सोच कर। अब अपनो से अपनी बात कहना चाहती हूं कि सेक्सुअल लाइफ़ हमारी तो होती ही नहीं है उस आदमी की होती है जिसके शारीरिक संबंध किसी लैंगिक विकलांग के साथ होते होंगे क्योंकि ईश्वर ने मनुष्य के शरीर में अलग-अलग आनंद की अनुभूति के लिये अलग-अलग अंग बनाए हैं लेकिन जब हमारे जैसे लोग एक अंग विशेष से दुर्भाग्यवश वंचित हैं तो हम उस आनंद की अनुभूति कैसे कर सकते हैं? जैसे किसी को जीभ न हो तो उससे कहा जये कि आप कान से स्वाद का अनुभव करके बताइए कि अमुक पदार्थ का क्या स्वाद है? ईश्वर ने जिस प्रकार जीभ के अगले हिस्से पर स्वाद के लिये कुछ छोटे-छोटे दानेनुमा रचनाएं स्वाद के लिये बनाई हैं जिन्हें भाई ने बताया कि आयुर्वेद में स्वाद कलिकाएं कहते हैं ठीक वैसे ही यौन आनंद के लिये स्त्री की योनि और पुरुष के लिंग पर विशेष हिस्सों में इस अनुभूति के लिये स्थान है लेकिन जब हमारे जैसे लैंगिक विकलांग लोग यौनांगों से ही अपाहिज हैं तो फिर हमारे लिये क्या सेक्स और क्या सेक्स का अनुभव? मेरी नजरॊं में जिन लोगों के लिये एनल-सेक्स भी एक उपाय है वो भी लैंगिक विकलांग लोगों के साथ संबंध बनाने का तो वे मनोरोगी हैं और उन्हें इलाज की जरूरत है। भाई बताते हैं कि जब कभी कोई विशेष परिस्थिति रहती है तो मरीज के जिस्म में एक असामान्य तरीके से उसे जीवित रखने के लिये भोजन पहुंचाया जाता है जिसमें लैट्रिन करने के अंग से लिक्विड डाइट दी जाती है जिसे एनस-फ़ीडिंग कहते हैं लेकिन यह तरीका सामान्य नहीं है और मरीज के स्वस्थ होते ही वह मुंह से खाना शुरू कर देता है। मुझे एनल-सेक्स भी ठीक वैसा ही जान पड़ता है। अरे, लिंग या योनि तो बस कार्य का उपकरण हैं आनंद की अनुभूति तो मस्तिष्क में होती है लेकिन जब वह अंग ही हमें ईश्वर ने नहीं दिया तो हम आनंद की अनुभूति कैसे करेंगे ? हां, जो साथ में है वो जरूर उस अनुभूति को प्राप्त कर लेगा। बहुत संभव है कि इस पोस्ट में प्रसंगवश आप लोगों को कदाचित अश्लीलता प्रतीत हो इसके लिये मैं आप सबसे माफ़ चाहती हूं साथ ही यदि आपको ये लगे कि मैं अपने भाई की संगति में कुछ ज्यादा ही विद्वता झाड़ने लगी हूं तो मेरे लिये ये बात प्रसन्नता की होगी कि चलो भाई की संगति का असर अब आप लोगों को भी दिखने लगा।

बुधवार, 2 अप्रैल 2008

मेहरबानों, बेनामी रहकर प्रेम दिखाने से अच्छा है सामने आएं

मैं हमेशा से इस बात पर चकित रहता हूं कि क्या बात है जो लोग न दिखने वाले अस्तित्त्व यानि समाज से भयभीत रहते हैं। जब कल मुझे मनीषा दीदी ने बताया कि उनके लिखने से कई लोगों के नजरिये में बदलाव आ रहा है लेकिन आश्चर्य तो इस बात का है कि जब वे लोग इंटरनेट की आभासी संसार में बेनामी रह कर करुणा और प्रेम दर्शाते हैं तो क्या सचमुच में अभी उनमें इतना प्रेम उपज पाया है लैंगिक विकलांग लोगों के प्रति के वे सभ्य समाज में हमारा स्वागत सच्चे दिल से कर पाएंगे? घोर आश्चर्य इस बात का भी है कि जो करुणावान सज्जन मनीषा दीदी के ऊपर कहानी लिखना चाहते हैं भी न जाने किस कारण से वे भी बेनामी ही हैं,आप सभी लोगों से हाथ जोड़ कर प्रार्थना है कि यदि दिल से जुड़ रहे हैं तो मेहरबानी करके सामने आएं जैसे कि श्री सुनील दीपक जी हैं । धन्यवाद....

गुरुवार, 20 मार्च 2008

ध्रतराष्ट्र बने संपादक , दुःशासन हुई पत्रकारिता और सभा में नंगी करी गयी तुम सबकी लैंगिक विकलांग बहनें

गुस्सा और दुःख इतना ज्यादा है कि लग रहा है खूब जोर से चिल्लाऊं । जब तक भड़ास से नहीं जुड़ी थी यकीन मानिए कि शर्म क्या होती है पता ही नहीं था लेकिन डा.रूपेश श्रीवास्तव ने मुझे अपनी बहन बना कर मेरी जिन्दगी में इतना ज्यादा बदलाव ला दिया है कि जब मेरे और मेरी ही जैसी दूसरी लैंगिक विकलांग बहनों के सारे कपड़े उतरवा कर परेड करवाई गई तो एक पल को लगा कि लोकल ट्रेन से कट कर जान दे दूं लेकिन अगले ही पल मेरी आंखों के सामने मेरे डा.भाई का चेहरा आ गया जो हमेशा मुझे हिम्मत दिलाते रहते हैं कि दीदी एक दिन ऐसा जरूर आएगा कि ये लोग जो आपको इंसान नही समझते अपने करे पर शर्मिंदा होंगे ; फिर एक-एक करके मेरे सामने मेरे भाई पंडित हरे प्रकाश,यशवंत दादा,मनीष भाई,चंद्रभूषण भाई सामने आने लगे और मैं फिर पूरी ताकत से अन्याय का सामना करने के लिये खड़ी हो गयी हूं । मुंबई से प्रकाशित होने वाले मराठी दैनिक वार्ताहर और उर्दू दैनिक इन्कलाब ने एक खबर छापी जिसकी हैडिंग उन्होंने महज सनसनी फैलाने के लिये ऐसी रखी कि लोग उस खबर को चटखारे लेकर पढ़ें ,जरा आप सब खबर के हैडिंग पर ध्यान दीजिये "हिजड़े द्वारा लोकल ट्रेन के लेडीज़ कम्पार्टमेंट में महिला से बलात्कार की कोशिश" । बस फिर क्या था बड़ी-बड़ी वारदातें हो जाने के बाद भी कुम्भकर्ण की तरह से सोने वाली मुंबई पुलिस का लैंगिक विकलांग लोगों पर कहर टूट पड़ा । हम सफर करें तो ट्रेन के किस डिब्बे में अगर पुरुषों के साथ जाएं तो सुअर किस्म के लोग जिस्म रगड़ने का बहाना देखते हैं ,कुत्सित यौन मानसिकता के नीच पुरुष भीड़ का बहाना कर के सीने और नितंबों पर हाथ लगाते हैं ,हमारे हाथॊं को पकड़्ते हैं पर हमें तो शर्म नहीं आनी चाहिए और न ही हमें गुस्सा आना चाहिये इन कमीनों की हरकत पर क्योंकि शर्म तो नारी का गहना होती है और हम तो न नारी हैं न नर । महिलाओं के डिब्बे में जाओ तो कुछ सुरक्षित महसूस होता था लेकिन इस सभ्य समाज के मुख्यधारा की पत्रकारिता के इस हथियार ने हमें यहां से उखाड़ कर बेदखल कर दिया है । ध्यान दीजिये कि अगर कोई अपराधी किस्म का इंसान बुर्का पहन कर ऐसी नीच हरकत करता तो क्या ये पत्रकार और संपादक महोदय ये हैडिंग बनाते कि एक मुसलमान महिला ने दूसरी महिला के साथ बलात्कार करने की कोशिश करी ,नहीं ,ऐसा तो वे हरगिज़ नही करते क्योंकि इस बात से सनसनी नहीं फैल पाती लेकिन एक हिजड़े के बारे में ऐसा लिखा तो सबका ध्यान जाएगा । अरे कोई तो इन गधे की औलादों को समझाए कि अगर हिजड़ा है तो बलात्कार क्या पैर के अंगूठे से करेगा ,वो तो महज एक अपराधी था जो हिजड़े का वेश बना कर आया था । संपादक की नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि वो ये देखे कि ऐसी खबर का क्या परिणाम होगा । अब मुझे समझ में आ रहा है कि देश में जातीय दंगों को फैलाने में मीडिया का क्या रोल रहता है ,अगर किसी ने मौलाना का वेश बना कर किसी को गोली मार दी तो ये पहले मरने वाले को देखेंगे कि क्या वो हिंदू था और फिर खबर बनाएंगे कि मुसलमान ने हिंदू की हत्या कर दी फिर भले पूरे देश में जातीय दंगों की आग भड़क कर सब स्वाहा हो जाए । हिजड़े को निशाना बना कर खबर छाप दी और चालू हो गया पुलिस का धंधा ,सब को नंगा करके परेड कराई गई ताकि देखा जा सके किसके जननांग कितने विकसित हैं या क्या है हिजड़े की कमर के नीचे और टांगो के बीच में ? इन कमीने पत्रकारों को अगर इतनी ही चिंता है तो क्यों नहीं अपनी ताकत इस्तेमाल करके जेंडर आईडेंटीफ़िकेशन का कानून बनाने के लिये सरकार पर दबाव बनाते ? कम से कम हमें भी तो ये पता चल जाएगा कि हम किस डिब्बे में यात्रा करें । किसी पत्रकार ने रेलवे पुलिस से यह नहीं पूछा कि जब हर महिला डिब्बे में एक रेलवे पुलिस का सुरक्षाकर्मी तैनात रहता है तो जब वो अपराधी बलात्कार की कोशिश कर रहा था तो क्या वो पुलिस वाला तमाशा देख रहा था या अपनी अम्मा के साथ सोने गया था , क्या यात्रियों की सुरक्षा की रेलवे की कोई जिम्मेदारी नहीं है ? मैने नीच पुलिस वालों के हाथॊं को अपने जिस्म पर रेंगते हुए महसूस किया ,ये सुअर किसी गंदी दिमागी बीमारी के मरीज जान पड़े मुझे सारे के सारे । क्या मेरी इस अस्तित्व की लड़ाई में मेरे भड़ासी भाई-बहनें साथ हैं ये सवाल आप सब से है ,नाराज मत होइएगा कि ये क्या होली के रंग में तेज़ाब मिला रही है लेकिन बात ही ऐसी है । मेरे भाई डा.रूपेश अभी आधी रात को भी मेरे साथ हैं कि कहीं शर्मिन्दगी से मैं कुछ गलत निर्णय न ले लूं इस लिये जबरदस्ती मुझे पकड़ कर अपने घर ले आए हैं । होली मनाइए लेकिन अपनी इस बदकिस्मत बहन के बारे में भी सोचियेगा ।

शुक्रवार, 14 मार्च 2008

हिंजड़ा होने की मानसिक व्यथा की अभिव्यक्ति पर प्रश्नचिह्न

आदरणीय सुनील दीपक जी के कमेंट्स को देखकर लगने लगा है कि मैं देश की मानवों द्वारा बनाई सीमाओं से पार निकल आई हूं और अब मानवता की सीमा के भीतर मेरे दर्द को देखने वाले लोग आगे आ रहे हैं । मेरे गुरुदेव और मार्गदर्शक पूज्यनीय डा.रूपेश श्रीवास्तव जी की ये पंक्तियां आपको अजीब लगीं "अंधा,बहरा या मनोरोगी तो नहीं था मैं" , दरअसल जिस सच की यह अभिव्यक्ति है वह काव्यात्मक होने या तुकान्त होने के कारण आपको कविता प्रतीत हुई लेकिन यही सत्य है कि मैंने एक लैंगिक विकलांग होकर भी इन सबसे खुद को अधिक सक्षम किन्तु अधिक शोषित पाया है हमें जीवन यापन के लिये भीख मांगनी पड़ती है ,गंदा काम करना पड़ता है क्योंकि लोग हमें नौकरी देने में हिचकिचाते हैं जबकि विकलांगों का तो नौकरियों में आरक्षित कोटा है ,हां मनोरोगी बच्चों के ऊपर यह बात लागू नहीं होती दुर्भाग्य से ;हम कुछ लोग मिल कर डा.साहब के मार्गदर्शन में भविष्य में ऐसे बच्चों के लिये बड़ा सा घर बनाने की योजना रखते हैं जिसमें हम सब मिल कर मां होने का एहसास कर पाएंगे और बच्चों को भी कुछ बेहतर दे सकेंगे । किन्तु यदि आपकी कोमल भावनाओं को इन पंक्तियों से ठेस पहुंची है तो मैं हम सब की तरफ से क्षमाप्रार्थी हूं । ऐसे ही प्रेम और अनुराग बनाए रखिए इससे हमें बल मिलता है और साथ ही आपका सहृदय मार्गदर्शन भी अपेक्षित है ।Sunil Deepak ने कहा…
कविता सुंदर है और हिंजड़ा होने की मानसिक व्यथा को अच्छी तरह व्यक्त करती है. लेकिन इन पंक्तियों को देख कर थोड़ा अजीब लगाः "अंधा,बहरा या मनोरोगी तो नहीं था मैं"अंधा हो या बहरा या मनोरोगी या कुष्ठरोगी या लैंगिक विकलाँग, सभी को समाज हाशिये से बाहर करता है, सभि का शोषण करता है, सभी के साथ अन्याय होता है. हमारे आसपास खड़ी यह दीवारें मिल कर ही टूट सकती हैं, अगर हम लोग आपस में ही एक दूसरे को नीचा ऊँचा देखेंगे तो बँटे रहेंगे, कमज़ोर रहेगें, और दीवारें न तोड़ पायेंगे.सुनील
March 14, 2008 1:35 PM
आपकी टिप्पणी और मेरे उत्तर को एक पोस्ट के रूप में डाल रही हूं विश्वास है कि आप अन्यथा न लेंगे ।
नमस्ते

मुझ पर कहानी लिखना चाहते हैं ,दिल से शुक्रिया...

आदर के योग्य हैं आप जो हम जैसे तिरस्कार व बहिष्कार करे गये लोगों के बारे में कुछ भला सोचते हैं । आपने कहा है कि आप मेरे ऊपर कहानी लिखना चाहते हैं तो मेरे लिये यह बुरा मानने की नहीं बल्कि अपने भाग्य को सराहने की बात है । लेकिन घूम फिर कर दुर्दैव है कि वहीं ले आता है , आपको मेरा मोबाइल नंबर चाहिये । आपसे एक बात निवेदन करना चाहती हूं कि जैसा कि मैंने अपने पिछले पोस्ट्स में लिखा है कि दुनिया बस स्त्री-पुरूष में विभाजित है इसमें हमारा स्थान तो है ही नहीं ,हम तो बस एक बोझ की तरह हैं । आप जानते हैं कि मोबाइल के लिये फोटो आई.डी. अनिवार्य होता है और उसके लिये मैं पैनकार्ड , ड्राइविंग लायसेन्स या पासपोर्ट जैसी चीज कहां से लेकर आऊं ? हमें तो सरकार को राशन कार्ड देने में भी हिचकिचाती है यानि सरकार मानती है कि हमें भोजन तक की आवश्यकता नहीं है । इसलिये आपसे प्रार्थना है कि अगर कोई विशेष बात न हो कि मोबाइल नंबर अत्यावश्यक हो तो आप मेरे गुरूदेव , मार्गदर्शक , भाई और पिता समान डा.रूपेश श्रीवास्तव का नंबर ले लीजिये (09224496555) उनके मोबाइल से जैसा आप चाहेंगे तो मुझे संदेश भी मिल जाएगा और यदि आप चाहें तो बात कर सकते हैं पर समय निर्धारित करने के बाद ही । बातें कुछ ज्यादा ही भारी हो गयी हैं इस लिये जरा सा मज़ाक करने की इजाजत दीजिये ; अगर आप में साहस है तो एक (लैंगिक विकलांग) हिजड़े के लिये हिजड़ा आईडेन्टिटी बता कर मोबाइल खरीद कर गिफ़्ट कर दीजिये । मेरी इस बात का तनिक भी बुरा मत मानियेगा क्योंकि यही वह जगह है जहां मैं अनदेखे मित्रों से सचमुच मजाक करके हंस लेती हूं वरना तो जिन्दगी में इतना अधूरापन है कि बताने को शब्द ही नहीं हैं । एक बार फिर से मेरी ओर ध्यान देने के लिये आपका और उस अनदेखे ईश्वर का धन्यवाद । मुझे आपके उत्तर की प्रतीक्षा रहेगी ........
नमस्ते

सोमवार, 10 मार्च 2008

मैं कोई बड़ा ग्राहक हूं

आज पहली बार किसी ऐसे मुद्दे पर लिखने की कोशिश करती हूं कि जो शायद मेरे जैसे लैंगिक विकलांग लोगो से संबंधित नहीं है । कल मैं रेड लाइट एरिया में वीकली रिपोर्ट क्लेक्ट करने गयी थी । हमारे डा. भाई के बार बार बोलने पर उनका दिया हुआ खादी का कुर्ता पैजामा पहन कर गयी । मुझे साड़ी पहनने की आदत है तो कुछ और पहनना अजीब लगता है । उधर जाने पर एक घटना हुई जो आप बड़ी-बड़ी बाते बताने वालों के लिये दिलचस्प न हो क्योंकि मैं दुनिया देश और समाज की बड़ी बातों के बारे में सोच ही नहीं पायी कभी भी । मेरे उधर पहुंचने पर एक छोटा बच्चा जो मुझे नहीं पहचानता था लेकिन सुन्दर सा भगवान बालगोपाल की तरह सा ,तो मैंने उसे गोद में उठा लिया और प्यार किया एक टाफ़ी भी दी खाने को तो अगले ही पल वह बच्चा मेरी गोद से कूद कर मां के पास भागा यह चिल्लाता हुआ कि मम्मी कोई बड़ा ग्राहक आया है । ये बात शाय्द पहले भी सुनी होगी पर ध्यान ही नहीं गया था लेकिन आज खादी के कुर्ते ने जहां मुझे यह बात सुनने के लिये कान दिये तो दूसरी ओर उस बच्चे को मेरे बारे में ऐसी सोच कि मैं कोई बड़ा ग्राहक हूं जो उसके लिये टाफ़ी भी लाया हूं । यह बच्चा कल बड़ा होकर परिवार,समाज और देश को क्या देगा आप बड़े मुद्दों पर बात करने वाले लोग सोचिये ,मैंने तो वो कपड़े ही समुन्दर की खाड़ी में फेंक दिये लेकिन उसकी सोच कैसे बदलूं उन कपड़ों के लिये.......................
नमस्ते ,जय भड़ास

गुरुवार, 6 मार्च 2008

लैंगिक विकलांग लोगों को काम दिया लेकिन.....

अभी आप लोग सब खूब अच्छे मूड में रह कर कोई होली का बात कर रहा है और कोई पुराने दोस्त लोगों कि पर हम लोग की तो समस्याएं ही खत्म नहीं होती हैं । NGO चलाने वाले लोग खूब दिखावा करते हैं कि उन्होंने हमारे जैसे लैंगिक विकलांग लोगों को काम दिया लेकिन इस आड़ में वो लोग फ़ारेन फ़ंड्स और डोनेशन की मलाई छानते हैं । हम लोग महीना हर तक रेडलाइट एरिया में जा-जाकर कंडोम बांटते हैं ,ब्लड सैंपल कलेक्ट करने में हैल्प करते हैं और महीने के आखिर में ढ़ाई-तीन हजार रुपए पकड़ा देते हैं ये कह कर कि ये पगार नहीं बल्कि मानधन है । सब शोषण करते हैं तो ये भी कर रहे हैं ये मौका क्यों छोड़ेंगे लेकिन एक बात कि अगर वेश्याएं,भिखारी,हिजड़े समाप्त हो जाएं तो ये सारे NGO चलाने वाले भीख मांगने लगेंगे । मैं चंद्रभूषण भाई और यशवंत सर को थैंक्स कहना चाहती हूं जिन्होंने डा.रूपेश भाई से बात करके हमारी तकलीफ़ को समझा ।
नमस्ते

शनिवार, 1 मार्च 2008

क्योंकि मैं हिजड़ा हूं..........


ए अम्मा,ओ बापू,दीदी और भैया
आपका ही मुन्ना या बबली था
पशु नहीं जन्मा था परिवार में
आपके ही दिल का चुभता सा टुकड़ा हूं
क्योंकि मैं हिजड़ा हूं..........
कोख की धरती पर आपने ही रोपा था
शुक्र और रज से उपजे इस बिरवे को
नौ माह जीवन सत्व चूसा तुमसे माई
फलता भी पर कटी गर्भनाल,जड़ से उखड़ा हूं
क्योंकि मैं हिजड़ा हूं..........
लज्जा का विषय क्यों हूं अम्मा मेरी?
अंधा,बहरा या मनोरोगी तो नहीं था मैं
सारे स्वीकार हैं परिवार समाज में सहज
मैं ही बस ममतामय गोद से बिछुड़ा हूं
क्योंकि मैं हिजड़ा हूं..........
सबके लिए मानव अधिकार हैं दुनिया में
जाति,धर्म,भाषा,क्षेत्र के पंख लिए आप
उड़ते हैं सब कानून के आसमान पर
फिर मैं ही क्यों पंखहीन बेड़ी में जकड़ा हूं
क्योंकि मैं हिजड़ा हूं..........
प्यार है दुलार है सुखी सब संसार है
चाचा,मामा,मौसा जैसे ढेरों रिश्ते हैं
ममता,स्नेह,अनुराग और आसक्ति पर
मैं जैसे एक थोपा हुआ झगड़ा हूं
क्योंकि मैं हिजड़ा हूं..........
दूध से नहाए सब उजले चरित्रवान
साफ स्वच्छ ,निर्लिप्त हर कलंक से
हर सांस पाप कर कर भी सुधरे हैं
ठुकराया दुरदुराया बस मैं ही बिगड़ा हूं
क्योंकि मैं हिजड़ा हूं..........
स्टीफ़न हाकिंग पर गर्व है सबको
चल बोल नहीं सकता,साइंटिस्ट है और मैं?
सभ्य समाज के राजसी वस्त्रों पर
इन्साननुमा दिखने वाला एक चिथड़ा हूं
क्योंकि मैं हिजड़ा हूं..........
लोग मिले समाज बना पीढियां बढ़ चलीं
मैं घाट का पत्थर ठहरा प्रवाहहीन पददलित
बस्तियां बस गईं जनसंख्या विस्फोट हुआ
आप सब आबाद हैं बस मैं ही एक उजड़ा हूं
क्योंकि मैं हिजड़ा हूं..........
अर्धनारीश्वर भी भगवान का रूप मान्य है
हाथी बंदर बैल सब देवतुल्य पूज्य हैं
पेड़ पौधे पत्थर नदी नाले कीड़े तक भी ;
मैं तो मानव होकर भी सबसे पिछड़ा हूं
क्योंकि मैं हिजड़ा हूं..........

गुरुवार, 28 फ़रवरी 2008

न डरें..................

अभी इंडिया टीवी पर रजत शर्मा जी को देखा मुस्कराते हुए एक रिपोर्ट को बता रहे थे । रिपोर्ट थी दिल्ली में पकड़ा गया किन्नर बनाने का कारखाना ,यह मुद्दा इतना गम्भीर है लेकिन शर्मा जी हैं कि मुस्कराहट बिखेरे चले जा रहे हैं और लालसिंह नामक व्यक्ति से पूछ रहे हैं कि क्या होता है वगैरह-वगैरह.... । यह मुद्दा ठीक वैसा है जैसे कि लोग स्वेच्छा से अंग कटवा कर भिक्षा मांगने के पेशे में उतर जाते हैं । जब लोगों ने देख लिया कि इस तरह से भी कमाई हो सकती है तो क्या फर्क पड़ता है चलो इधर भी हाथ आजमा लेते हैं और अपराधियों ने इस क्षेत्र को भी नहीं छोड़ा पर इसका यह मतलब तो नहीं कि हम सभी लैंगिक विकलांग लोगों से डरने लगें कि कहीं दोस्ती बना कर अपने जैसा न बना लें । अरे जब एड्स रोगियों से मित्रता करने से वो आप को रोगी बनाना नही चाहते तो भला प्राकृतिक रूप से जन्में लैंगिक विकलांग ऐसा क्यों चाहेंगे दरअसल यह तो मात्र पैसे के लालच में अंधे हुए अपराधी किस्म के लोगों का काम रहता है और आप सब समझ सकते हैं कि अपराध की प्रकृति किसी भी जाति धर्म ,क्षेत्र,भाषा या लिंग से हो सकती है यह एक असहज सी मनोरुग्ण स्थिति है । इसलिए मनीषा दीदियों से न डरें..................

रविवार, 24 फ़रवरी 2008

कुछ लोग

आज दो दिन पहले आप लोग के ब्लोग पर मैंने अपने भाई डा.रूपेश के कहने पर मेम्बर बन कर एक पोस्ट लिखा था । इस पोस्ट को लेकर कुछ लोग को प्राब्लम होने लगा कि ये मनीषा कौन है ? मेरी हिन्दी तो ऐसी है कि जितना भीख मांगते समय आशीर्वाद देने या फिर गालियां देने को काम आती है पर डा.भाई ने बताया कि अपना ब्लोग बनाना और उस पर लिखने के लिये अच्छा भाषा जानना चाहिए । मेरी भाषा मलयालम है और मैं मराठी ,इंग्लिश,तेलुगु,तमिळ बोल लेती हुं । आप लोग का लिखा हुआ मेरे को ज्यादा समझ में नहीं आता आर्थिक ,अस्तित्व,मसिजीवी या शुचितावादी का क्या अर्थ होता है ? हमारी प्राब्लम तो जिंदगी को आसान तरीके से जीना है जैसे राशन कार्ड,ड्राइविंग लाइसेंस,मोबाइल के लिए सिम कार्ड के वास्ते फोटो लगा हुआ आइडेंटिटी प्रूफ़ जैसे कि पैन कार्ड वगैरह अभी आप लोग बताओ किधर से लाएं ये सब ? उंगलियां दरद करने लगती हैं टाइप करने में लेकिन ऐसा लगता था कि इंटरनेट पर ब्लोग पर लिखने से प्राब्लम साल्व होगा पर इस खुशी में हम सब लोग ये भूल गए कि इधर भी तो वो ही लोग हैं जो ट्रेन में,सरकारी आफिसों में मिलते हैं । अभी हिन्दी टाइप करना आता है तो इन्हीं उंगलियों से इतना गंदा गंदा गाली भी टाइप कर सकती हूं कि मेरे और मेरे भाई के बारे में बकवास करने वाले लोग को वापिस मां के पेट में घुस कर मुंह छुपाना पड़ जायेगा लेकिन मुझे इतना तो अकल मेरे भाई ने दिया कि ऐसा लोग के मुंह नहीं लगना चाहिये ,हम लोग तो शरीर से हिजड़े हैं पर ये तो आत्मा से हिजड़े हैं इस वास्ते मैं इन आत्मा से हिजड़े लोग को गाली भी देकर इनका भाव नहीं बढ़ाना चाहती हूं अगर भड़ास पर मेरे होने से आप लोग को दिक्कत है तो भड़ास पर मैं पोस्ट भेजना बंद कर देती हुं ताकि लोगों को मेरे होने से अड़चन न हो क्योंकि हमे तो मुंबई में सार्वजनिक टायलेट तक में इसी प्राब्लम का सामना करना पड़ता है कि जेन्ट्स टायलेट में जाओ तो आदमी लोग झांक कर देखना चाहते कि हमारे नीचे के अंग कैसे हैं और लेडीज टायलेट में जाओ तो औरतें झगड़ा करती हैं । बस यही हमारी दिक्कते हैं जो हमें जिंदगी ठीक से नहीं जीने देतीं और हम अलग से हैं । अभी उंगलियां अकड़्ने लगी हैं मैं इतना लिख भी नहीं पाती पर आप लोग के दुख ने ताकत दिया लिखने का । अभी जब तक आप लोग नहीं बोलेंगे मैं भड़ास पर नहीं लिखूंगी ।
नमस्ते

शनिवार, 23 फ़रवरी 2008

गंदा काम

अभी ब्लाग तो बना लिय है पर टाइप करने का ज्यादा प्रैक्टिस नही है तो दो लाइन में ही उंगलियां दरद करने लगती हैं । जो हाथ बरसों से तालियां बजाते हैं ,बस झूठे आशिर्वाद देते और भीख मांगते रहे उन्हें नया काम करने में तकलीफ तो होयेगी न ? मैं केरल की रहने वाली हूं ग्रेजुएट हूं इधर मुंबई आना पड़ा क्योंकि उधर तो रिस्तेदार हैं जान पहचान के लोग हैं तो बहोत दुख होता था । इधर आई तो गुरू ने सहारा दिया है रोटी खाने को मिल जाती है पर पढ़ी लिखी हूं तो मन में लगता था कि कुछ नया करने का है तो एक दिन कम्प्यूटर इस्टीट्यूट चली गयी अपनी दो बहनों सोना और भूमिका के साथ कि हमें भी कम्प्यूटर सीखना है तो उसने बिना कुछ सुने ही मना कर दिया कि आप लोग के कारण उसका इस्टीट्यूट बंद हो जायेगा लोग अपने लडके लडकियों को हटा लेंगे कि इधर हिजड़ा लोग को सिखाया जाता है । जितना दुख जिन्दगी में अपने हिजड़े होने का नहीं हुआ था उससे ज्यादा दुख हुआ लोगों का ऐसा व्यवहार देख कर । फिर एक दिन डॉक्टर भाई से मुलाकात हुई वो हम लोग को रात में ट्रेन में मिल जाते थे और हम लोग उधर परेल से गंदा काम करके रात को लास्ट गाड़ी से आते थे । वो खुद आकर हमसे बात करते तो शुरू में हमें लगा कि कोई फोकट वाला होगा जो बस अच्छी बातों में निपटाना चाहता है । ऐसा सोच कर हमको बहोत पाप लगा होगा कि हम उनका बारे में ऐसा सोचा थे क्या करें अभी तक ऐसे ही लोग मिले थे तो लगता था कि ऐसा इंसान हो ही नहीं सकता है । पर होता है उसने हमको रक्षाबंधन से एक दिन पहले पूछा कि दीदी आपको भाई है मैने बोला नहीं ,जबाब नहीं दिया । क्या जबाब देती भाई है पर मिलना नही चाहता । दूसरे दिन वो खुद राखी लेकर आये और वो रिश्ता जिन्दगी भर के लिये के लिये जुड़ गया । अभी उंगलियां अकड़ने लगी हैं कुछ लिखना है बाद में लिखूंगी । नमस्ते

शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2008

थैंक्यू

इंटरनेट पर लिखना तो मजेदार है अब लोगों को हमारी बात हम इस तरीके से समजा सकेंगे । थैंक्यू रूपेश भाई

शुरुआत

आज पहली बार इंटरनेट पर कुछ लिखूंगी ।

आशीर्वाद

सबसे पहले अपने दुनिया में सबसे प्यारे दोस्त डॉक्टर रूपेश श्रीवास्तव को खूब सारा प्यार और आशीर्वाद जिन्होंने हमें यह रास्ता बताया ,रात रात भर जाग कर हमें हिन्दी टाइप करना सिखाया और कम्प्यूटर सिखाया । ThanQ brother

अब तक की कहानी

 

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आयुषवेद by डॉ.रूपेश श्रीवास्तव