मंगलवार, 26 मई 2009

नया घर और प्रवेश पर पूजा-पाठ















आप सबके आशीर्वाद की आकांक्षा है इस अवसर.........

मंगलवार, 21 अप्रैल 2009

मेरे दोस्त का बच्चा हिजडा निकला !!

(सारथी पर हाल ही में छपा शास्त्री जी का लेख) लैंगिक विकलांगों पर मैं ने अभी तक जो कुछ लिखा है उन में टिपियाये गये प्रश्नों के उत्तर मैं अगले आलेख में दूँगा. मेरा अनुरोध है कि तब तक पाठकगण एवं विकलांग मित्र सबर के साथ इंतजार करें!

दो दशाब्दी पहले की बात है, बडे भोर को अचानक मेरे एक मित्र का दूरभाष आया कि वह भारी मुसीबत में है अत: मैं तुरंत अस्पताल पहुंचूँ. गिरते पडते वहां पहुंचा तो रोनी सूरत लेकर वह बाहर खडा हुआ था. पूछा तो बताया कि सुबह चार बजे पत्नी का प्रसव हो गया लेकिन बच्चा न नर है न मादा क्योंकि पुरष-स्त्री दोनों लिंग बच्चे के शरीर में  मौजूद है.

मेरे लिये यह पहली जानकारी नहीं थी इस कारण मैं ने उससे कहा कि वह तुरंत ही रेलगाडी से बच्चाजच्चा को लेकर पास के ही एक शहर के सर्जन से मुलाकात करे. उसने ऐसा ही किया. इधर मैं ने सब को खबर दे दी कि बच्चे की कुछ गंभीर समस्या के कारण उसे बडे अस्पताल ले जाना पडा है. उस अस्पताल में जनीतक जांच से पता चला कि वह बच्चा एक लडकी है. सर्जन ने मांबाप को आश्वस्त किया और बच्ची को खिलाने के लिए एक दवा दे दी.

डाक्टर का निर्देश यह था कि दस साल की उमर तक बिना किसी को पता लगे उसका पालनपोषण  करें, दवा देते रहें, और उसके बाद उसकी शल्यक्रिया कर दी जायगी. उस युवा परिवार ने ऐसा ही किया. दवा देते रहे, बच्चे की विकलांगता हरेक से छुपा कर रखी, और  उसे हर तरह से ट्रेनिंग दी कि वह किस तरह से अपनी विकलांगता को छुपा कर रखे. उसे कभी भी हीनभावना से ग्रस्त न होने दिया.

समय आने पर शल्यक्रिया से लिंग को (जो दवा के असर से लगभग सूख सा गया था) हटा दिया गया. तब कहीं मांबाप की जान में जान आई कि अब बच्ची एक लडकी के रूप में चैन की जिंदगी बिता सकती है. वह लडकी असामान्य बुद्धि और हिम्मत की धनी थी एवं आज हिन्दुस्तान के एक कोने में एक उन्नत स्थान पर जी रही है.

आज हिन्दुस्तान में जितने हिजडे हैं, उन में से अधिकतर (1000 में से 990 या अधिक)  इस तरह की जनीतक-गलतियों के मारे हुए हैं. जीन्स के हिसाब से वे या तो पुरुष हैं या स्त्री हैं लेकिन पैदाईश के समय वे जननांगों में विकलांग निकले. समय पर उनको वैज्ञानिक/डाक्टरी मदद न मिल पाई, बल्कि उनके मांबाप ने “लोकलाज” के कारण उनको “फेंक देना” उचित समझा. इस कारण उनको उठा ले जाकर हिजडों ने पाला. वहां वे पल गये, लेकिन पढाई लिखाई न हो पाई, नौकरी पर कोई रखता नहीं है, अत: हिजडों के बीच जो चलन है (पैसा मांगना)  उसी पर चल कर वे जीने की कोशिश कर रहे हैं. इसका सारा दोष सिर्फ उनको देना उनकी दूसरी हत्या है  -- पहली हत्या मांबाप नें उनको त्यागने के द्वारा की, दूसरी हत्या मैं और आप अपनी क्रूर और संवेदनाहीन बोली द्वारा करते हैं.

यदि समाज किसी समूह से उस का हर मौलिक अधिकार (शिक्षादीक्षा, घरबार, नौकरी के अवसर) छीन ले, हर चीज उनके लिये वर्जित कर दे, अनको सीधे रास्ते से न तो राशनकार्ड दे, न पासपोर्ट दे, न डाईविंग लाईसेंस दे, बल्कि उनको भूखा और नंगा छोड दें,  और उसके बाद उन पर दोष लगाये कि वे पैसे के लिये छीनाझपटी करते हैं तो दोष समाज का है न कि लैंगिक विकलांगों का. इस नजरिये से वास्तविकता को देखपहचान कर हमें लैगिक विकलांगों के सशक्तीकरण के लिये कार्य करना चाहिये.

हिजडों को घिन से, नीची नजर से, तुच्छ नजर से देखना आसान है. उनके लिये कुछ करना कठिन है.  यदि अभी भी आप सारा दोष लैंगिक विकलांगों पर थोपना चाहते हैं तो युवा सिद्धार्थ (गौतम बुद्ध) का एक वाक्य याद दिलाना चाहता हूँ कि “किसी से उसका जीवन छीनने वाले व्यक्ति से बडा वह होता जो उसे जीवनदान देता है”.(मूल लेख सारथी चिट्ठे पर शास्त्री जी के द्वारा लिखा गया था. उनकी विशेष व्यक्तिगत अनुमति के कारण इस लेखन परंपरा को  अर्धसत्य पर पुन: प्रकाशित किया जा रहा है.)

बुधवार, 15 अप्रैल 2009

पैसे की खातिर इस बहुत छोटे से अपराध को मजाक की तरह कर डालते हैं

चुनावी माहौल में छुटभैय्ये नेताओं की सरगर्मिया बढ़ गई हैं। हमारे जैसे उपेक्षित लोगों के पास भी चक्कर मारने के लिए ख़ास समय निकला जा रहा है। अब बोगस नामों से वोट तो हम ही डालेंगे न .... कभी मर्द बना कर इस्तेमाल करे जायेंगे कभी औरत बना कर ..... यही तो होता आया है इतने सालों से की भले ही राशन कार्ड न बन पाया हो हमारा लेकिन हम सभी हर चुनाव में वोट जरूर डालते हैं या यूँ कहिये की हमसे डलवाया जाता है और हम तो वैसे भी पैसे की खातिर इस बहुत छोटे से अपराध को मजाक की तरह कर डालते हैं क्योंकि हमें क्या पता की वोट की ताकत क्या होती है ..... हमें भी पढाओ - लिखाओ ताकि हम भी तुम्हे एक अच्छा मुल्क देने में मदद कर सकें और अगर इस बात को समझ कर भी नज़रंदाज़ कर दिया तो ये तुम्हारा दुर्भाग्य होगा की इतनी बड़ी लोकसंख्या को तुम कभी अपना न सकोगे।

एक बार फिर रुला दिया मीनाक्षी को.......

पत्रकारिता ने एक बार फिर रुला दिया मीनाक्षी को और सवालों का अनसुलझापन जैसा था वैसा ही है इतने बड़े आयोजन से सिर्फ़ लाभ हुआ उन बौद्धिकता का ढिंढोरा पीटने वालों को जिन्होंने लैंगिक विकलांगता को मात्र एक "आईटम" बना कर जुगाली करना शुरू करा है। इस पोस्ट में देखिये.....

हिजडों के साथ मेरा अनुभव !!

(सारथी पर हाल ही में छपा शास्त्री जी का लेख) हिजडे एक ऐसा यथार्थ है जिसे हम स्वीकार करना नहीं चाहते. लेकिन मेरा अनुमान है कि सारथी के इस लेखन-परम्परा द्वारा कम से कम कुछ लोग सच्चाई पहचान जायेंगे. पुनीत ओमर  ने अपनी टिप्पणी में कहा है:

बेशक इन्हें भी किसी भी अन्य विकलांग की तरह ही समाज और परिवार का हिस्सा बनाया जा सकता है लेकिन इनसे घ्रणा का प्रमुख कारण है इनका जीविकोपार्जन का तरिका जो की एक परिपाटी के रूप में चला आ रहा है. आज भी जब किसी हिजडे के बारे में कल्पना करें तो हमें हमेशा अजीब सी लाली और झुमके बिंदी से सजे, जोर जोर से ताली बजाते, बसों, ट्रेनों में अश्लील हरकतें करते हुए पैसे वसूलते हुए कुछ लोग ही क्यों स्मरण में आते हैं? इनमे से एक भी कृत्य ऐसा नहीं है जो की उन के विकलांग होने से जुडा हो. फिर भी वो ऐसा करने को मजबूर हैं जो की उन्हें घ्रणा का पात्र बनाता है. आशा है की आने वाली कड़ियों से ज्यादा नहीं तो कमसे कम ५० लोगों की सोच और नजरिया तो बदलेगा ही.

मुझे पूरी उम्मीद है कि ऐसा ही होगा.

मैं लगभग 5 साल की उमर में हिजडों या लैंगिक विकलांगों से परिचित हुआ. ग्वालियर के आसपास किसी मंदिर में इन लोगों का एक समूह था जो नियमित रूप से अपने बंधे बंधाये घरों में जाकर आटा इकट्ठा करता था.

महीने के पहले हफ्ते एक परिचित और बुलंद आवाज सुनाई देती थी जब वह आकर एक श्लोक का उच्चारण करती थी. हाथ में एक तीन से चार इंच मोटी कपडे की धुंआ देती बत्ती होती थी और सर पर एक टोकरी. हमारे सामने का मराठा परिवार (जिनके साथ हमारा अंगन एक हुआ करता था), बडे आदर के साथ एक बडा डब्बा आटा उनको देता था और फिर उस बत्ती के भस्म को आदर के साथ प्राप्त करते थे. एक से अधिक लोग आते थे तो कई बार ये लोग नृत्य करते थे जिस में एक दम भक्ति की भावना प्रगट होती थी.  मेरी मां ने बचपन में ही बता दिया था कि ये न पुरुष हैं न स्त्री, और ये किसी धार्मिक समूह के लोग हैं जहां अपना सारा समय पूजापाठ में लगाते हैं.

स्वाभाविक है कि लैंगिक विकलांगों से मेरा परिचय एक स्वस्थ माहौल में हुआ और उनके प्रति एक स्वस्थ नजरिया मन में घर कर गया. इसके बाद घरों में जाकर पैसा वसूल करने वाले हिजडे बहुत देखे. इतना ही नहीं, हमारे पास जो सरकारी अस्पताल था वहां ये लोग लगभग हर दिन प्रसूति वार्ड का चक्कर लगाते थे. यह भी मैं ने देखा है. वहां की नर्सिंग इंचार्ज मेरी दूर की चाची लगती थी. वे अकसर आकर पापा को बडे दुख के साथ बताती थी कि किस तरह लैंगिक विकलांग पैदा होने पर मांबाप उस बच्चे को छूना तक पसंद नहीं करते और किस तरह बच्चे को अस्पताल में छोड कर भाग जाते थे. फल यह होता कि वे विकलांग-कौम को सूचना दे देते और वे लोग उस बच्चे को ले जाकर पालते पोसते थे.

मैं बडा हुआ तो नोट किया कि ग्वालियर में इन लोगों के कई बडे समूह थे जो पेट पालने के लिये कोई भी धंधा नहीं कर पा रहे थे. कोई भी व्यक्ति इन को नौकरी पर नहीं लगाता था. जब से यह बात समझ में आई तो इन लोगों के साथ एक दम सामान्य व्यवहार करने लगा, और पाया कि इनको सामान्य तरीके से लो तो ये लोग भी उसी तरह से सामान्य व्यवहार करते हैं.

शादी के बाद मैं जिस कालोनी में रहता था वहां ये लोग महीने में एक बार सारे घरों का चक्कर लगाते थे. दस से बीस लोगों का समूह रहता था. मेरे घर आते थे तो मैं और पत्नी इनसे एकदम सामान्य तरीके से मिलते थे और अपनी सामर्थ के अनुसार एक राशि दे देते थे. इन में से कभी भी किसी ने भी हमारे साथ न तो पैसे के लिये मोलभाव किया, न कम पैसे होने पर हमें टोका. वे अच्छी तरह जानते थे कि कौन सहृदय है. जब ये घर आते थे तब लोग अपने बच्चों को छुपा लेते थे, लेकिन मैं ने अपने बच्चों को इन से मिलने से कभी नहीं टोका.

रेलगाडी मैं ने पहली बार कोंकण रेलवे द्वारा यात्रा की तो मुम्बई इलाके में तो ये लोग थोक में रेलगाडी में चढे. मेरा व्यवहार एकदम सामान्य रहा अत: इन में से हरेक का व्यवहार मेरे प्रति भी सामान्य रहा. मेरे प्रति इनका व्यवहार देख कर कई यात्रियों ने इसका कारण जानना चाहा तो मैं ने सब को बताया कि आप सही तो जग सही!!

अंत में मैं अपने एक मित्र के पत्र का उल्लेख करना चाहता हूँ जो इस प्रकार है:

आपको बड़ी सहानुभूति हो रही है इन "इश्वरीय अपंगों" के साथ. लगता है कि आप कभी इनके पल्ले नहीं पड़े. चलो ये बात तो ठीक है. लेकिन ये लोग एक सभ्य नागरिक जैसा व्यवहार क्यों नहीं करते? क्यों ये लोग दस दस रूपये के लिए हमें भी शर्मसार करते हैं? भीख ही मांगनी है तो क्यों ये लोग अन्य भिखारियों की तरह नहीं मांगते?  इस समाज में इन लोगों के अपने अपने "इलाके" हैं. अगर कोई दूसरे इलाके का हिजडा इनके इलाके में घुस जाता है तो क्या आपको पता है क्या होता है? इनमे खुद ही एकता नहीं है, भाईचारा नहीं है.  अगर ये लोग एक होकर आम नागरिकों की तरह सरकार के सामने अपनी मांगें रखें तो क्या ये असंभव है कि सरकार इनकी मांगें ना माने?  इनसे अच्छे तो पुलिस वाले भी है, हफ्ता मांगने वाले बदमाश भी हैं; कम से कम वे लोग आम जनता को तो सरेआम परेशान नहीं करते. भले ही वे गरीब ठेली वालों को भी ना बख्शते हों. लेकिन, ये हिजडे तो सभी को एक ही डंडे से हांकते हैं.

मेरे चार आलेखों में इन सब प्रश्नों का जवाब आ चुका है. उम्मीद है आप विषय को सही कोण से देखेंगे.  अंत में दो वरिष्ठ मित्रों की टिप्पणियां देखे:

(राज भाटिया) शास्त्री जी. यह तो एक शरीरिक कमी है जेसा कि आप ने लिखा है, कै बच्चे अंधे लगडे लुले भी तो पेदा होते है, या फ़िर किसी दुर्घटना मै किसी का लिंघ खो जाये तो? मुझे समझ नही आता हमारे समाज मै क्यो ऎसे बच्चे को त्याग देते है, इस कमी मै उस बच्चे का क्या कसुर, क्यो नही उसे भी अन्य बच्चो की तरह से आम प्यार मिलता, आम डांट नही मिलती, जिस से वो अपने आप को ओरो से अलग ना सम्झे.

यहां युरोप मे भी ऎसे लोग मिलते है, लेकिन इन की कोई अलग पहचान नही होती, इन्हे कोई अलग हक नही मिलते,कोई इन पर दया भाव नही दिखाता, कोई इन्हे आरक्षण नही मिलता, जिस से यह अपने आप को आम लोगो जेसा ही समझते है, हम सब मै मिलते जुलते है.

लगडे लुले या अन्य शरीरिक कमी के लिये तो आराक्षण मिलना चाहिये लेकिन ऎसी बात पर अगर हम चाहते है कि यह भी हमारे समाज मै घुल मिल जाये तो इन की कोई अलग पहचान नही होनी चाहिये, बल्कि यह भी हमारी तरह हर हक के बराबर हिस्से दार हो, चाहे वो शिक्षा हो या नोकरी, आरक्षण देने से इन की अलग पहचान होगी ओर फ़िर इन्हे वोही मुश्किले आयेगी जिस से यह बचना चहाते है, या समाज जिस से इन्हे बचाना चाहता है.

अन्त मै इतना ही कहुगां कि यह हमारे ही बच्चे है कृप्या इन्हे ना त्यागे, इन्हे अन्य बच्चो की तरह से ही पाले, उतना ही गुस्सा, उतना ही प्यार दे जितना अन्य बच्चो को देते है, ओर जिस के यह हक दार है. इन की आंखॊ मे झांक कर देखो… क्या कहती है यह मासुऊम आंखे.

धन्यवाद, यह सवाल कई बार मेरे दिल मै उठता था, ओर अन्दर तक बेचेन करता है क्यो हमारे समाज मै इन्हे अलग समझा जाता है ?

 

(दिनेशराय द्विवेदी) हम अन्य विकलांगों को जिस तरह से अपनाते हैं उसी तरह इन शिशुओं को भी अपना सकते हैं। इस तरह के अनेक लोग परिवारों में पलते हैं और जीवन जीते हैं। उन्हें परिवारों द्वारा अपनाने की आवश्यकता है।

लैंगिक विकलांगो द्वारा जबरन लैंगिक विकलांग बनाना अपवाद हो सकता है। लेकिन मैं ने ऐसे उदाहरण भी देखे हैं कि परिवार के लोगों द्वारा लैंगिक विकलांग को हिजड़ों को सौंप देने के उपरांत हिजड़ों ने बच्चे को पढ़ाया और वह सरकारी अस्पताल में नर्स का काम कर रहा है, पुरुष वेश में ही। यहाँ तक कि एक महिला नर्स के साथ रहता भी है। क्यों नहीं हम इसी तरह इन्हें समाज में स्वीकार कर सकते?

[क्रमश:] (मूल लेख सारथी चिट्ठे पर शास्त्री जी के द्वारा लिखा गया था. उनकी विशेष व्यक्तिगत अनुमति के कारण इस लेखन परंपरा को  अर्धसत्य पर पुन: प्रकाशित किया जा रहा है.)

रविवार, 5 अप्रैल 2009

हिजडों की गुंडागर्दी देखी है क्या?

(सारथी पर हाल ही में छपा शास्त्री जी का लेख)  आज का विषय है कि “आप ने हिजडों की गुंडागर्दी देखी है क्या?” आप में से अधिकतर लोग कहेंगे कि हां घरबाहर इन लोगों को जबर्दस्ती पैसा वसूल करते बहुत देखा है! ठीक है, पर अब इसका एक दूसरा पहलू देखें -- आप ने कभी इन लोगों को बिना इनका अपमान या उपहास किए पैसे दिये हैं क्या? या किसी व्यक्ति को पैसे देते देखा है क्या, बिना उपहास के?  आप में से अधिकतर इस प्रश्न का उत्तर “हां” में नहीं दे पायेंगे.

अब जरा निम्न बातों पर ध्यान दें

  • सामान्य परिवारों में जन्मे इन शिशुओं को जन्मते ही इनका परिवार ऐसे फेंक देता है जैसे उनके हाथ में एक नवजात शिशु नहीं बल्कि जलते अंगारे थमा दिये गये हों.
  • (कारण या लक्ष्य कुछ भी हो लेकिन) आपके घर की इस पैदाईश को हिजडे लोग ले जाकर पालते हैं, खाना देते हैं, बडा करते हैं.
  • हर व्यक्ति को भूख लगती है, कपडे की जरूरत होती है, एक छत की जरूरत होती है, लेकिन आप ने अपने खुद के जन्माये शिशु को इन सब बातों से वंचित कर दिया. कभी आप के मन में यह बात नहीं आई कि आप के बच्चे को गैर लोग पाल रहे हैं, इस कारण चलों कम से कम कुछ पैसा नियमित रूप से उस बच्चे के लिये उसके लालनपालन करने वालों को दे दिया जाये. कहां से आयगा उसका खानाकपडा?
  • बडा होने के बाद उसे नौकरी नहीं मिल पाती क्योंकि उसके लालनपालन करने वाले जो खुद अपढ हैं उसे भी नहीं पढा पाये.
  • पढ जाये तो भी उसे नौकरी नहीं मिलती. कौन किसी हिजडे को नौकरी पर रखता है.
  • आजकल बारात में नाचने के लिये उनकी मांग न के बराबर रह गई है. सामाजिक परिवर्तन के साथ उनके अन्य परंपरागत पेशे, मंदिरों महलों से जुडे काम आदि भी खतम हो गये हैं.
  • पब्लिक में वह पुरुषों के टायलट में जाये तो पुरुषों को आपत्ति है कि साडी पहन कर यहां क्यों आये. स्त्रियों के टायलट में जाये तो उनको आपत्ति है कि तुम औरत नहीं हो.
  • समाज में कहीं भी उनको न तो आदर मिलता है, न संवेदनशीलता दिखाई देती है.

ऐसे समाज में अपने भूखे पेट के लिये ये लोग क्या कर सकते हैं. भीख नहीं मांग सकते क्योंकि कोई हिजडा भीख मांगने बैठ जाये तो मनचले लोग उसका जीना हराम कर दे. कोई नौकरी नहीं देता. सरकार की ओर से कोई मदद नहीं मिलती, न शिक्षादीक्षा की कोई व्यवस्था है.  अत: कुल मिला कर कहा जाये तो अधिकतर हिजडों के सामने जीने का एक ही तरीका है कि वह लोगों से पैसे मांगे. इन के क्रूर मांबाप ने पैदा होते ही इनको “फेंक” कर अपनी कठिनाई से मुक्ति पा ली, लेकिन जीवन के हर दिन व्यंग, आक्षेप, कटूक्तियों द्वारा मानसिक स्तर पर मरने के लिये इनको छोड दिया.

जब एक हिजडा आकर आप से दस रुपया मांगे तो उसे इस पृष्ठभूमि में देखें. तब आप को समझ में आ जायगा कि वे भी मनुष्य हैं. उनके भी दिल है जो शायद आप के दिल से भी अधिक कोमल है. मानुषिक संवेदनशीलता मुझआप से भी अधिक है. जरा एक बार कोशिश करके देखें. जरा एक बार बिना हंसे, बिना परिहास किये, एक दस का नोट भीख के रूप में नहीं बल्कि  उन के जीवनयापन के लिये एक प्रोत्साहन के रूप में दे दें. आप को एक नया संसार दिखाई देगा. [क्रमश:] (मूल लेख सारथी चिट्ठे पर शास्त्री जी के द्वारा लिखा गया था. उनकी विशेष व्यक्तिगत अनुमति के कारण इस लेखन परंपरा को  अर्धसत्य पर पुन: प्रकाशित किया जा रहा है.)

मंगलवार, 31 मार्च 2009

हिजडा योनि में जन्म 002

(सारथी पर हाल ही में छपा शास्त्री जी का लेख) मुझे खुशी है कि यह वैज्ञानिक-सामाजिक लेखन परंपरा को पाठकों के लिये उपयोगी सिद्ध हो रही हैं. नीचे दी गई टिप्पणी इस बात का एक अच्छा उदाहरण है. माना जाता है कि प्रति टिप्पणी पीछे कम से कम दस लोग होते हैं जो वही बात लिखना चाहते थे लेकिन लिख न पाये. सारथी पर यह संख्या प्रति टिप्पणी कम से कम पच्चीस की है जो वही बात कहना चाहते थे लेकिन समयाभाव के कारण लिख न पाये.

(अन्तर सोहिल) आदरणीय,  नमस्कार!! जब से आपको पढना शुरू किया है, आपकी बातों पर(मुझे नही पता क्यों) सहज ही विश्वास हो जाता है। अभी तक मेरी विचारधारा यही थी कि हिजडे पैदाईशी नही होते, ये वो पुरुष होते हैं जो जानबूझ कर अपना लिंग बदल या विकृत कर लेते हैं या रूप बदल लेते हैं । श्री रूपेश जी ने भी जब तब लैंगिक विकलांगों का जिक्र किया, तब भी मैं अपने मानसिकता को सही रास्ते पर नही ला पाया। हालांकि मुझे लैंगिक विकलांगों से ना कोई कुंठा, नफरत और ना ही कोई लगाव है। मैं अर्धसत्य का भी नियमित पाठक हूं । क्योंकि कहीं भी कुछ लिखा जाता है तो मैं उसमें से कुछ (जिन्दगी) सीखने की कोशिश करता रहता हूं।

अब आपने बताया है तो सचमुच विश्वास हो गया है कि यह जन्मजात विकलांगता होती है। मैं आपसे, रूपेश जी से और सभी लैंगिक विकलांगों से अपनी मानसिकता के लिये क्षमाप्रार्थी हूं।

पिछले आलेख हिजडा योनि में जन्म 001 में जैसा मैं ने कहा कि एक मानव भूण में करोडों जीन होते हैं. भूण के विकास के साथ साथ इनकी अरबों प्रतियां बनाई जाती हैं. इस जटिल प्रक्रिया में करोडों बार गलतियां हो जाती हैं लेकिन जीन की गलतियों को सुधारने वाली जैव-रासायनिक प्रक्रियायें उनको सुधार देती हैं. इसके बावजूद करोडों गलतियों में से कई बार एकाध विकृत जीन सुधर नहीं पाता और उसके कारण बच्चे विकलांग पैदा होते हैं. जब यह विकलांगता यौनांगों की होती है तो बाह्य तौर बच्चा न तो पुरुष होता है न स्त्री. इनको हिजडा कहा जाता है. लेकिन चूंकि यह शब्द कई बार इन लोगों को नीचा दिखाने के लिये प्रयुक्त होता है, अत: “लैंगिक विकलांग”  का प्रयोग बेहतर, वैज्ञानिक एवं अधिक मानवीय है. मेरी जानकारी के अनुसार,  चिट्ठाजगत में इस शब्द का सबसे पहला प्रयोग डॉ रूपेश श्रीवास्तव ने अपने चिट्ठे आयुषवेद पर किया था. उनकी प्रेरणा से आरंभ किये गये चिट्ठे अर्धसत्य पर भी आप इसे देख सकते हैं.

  डॉ रूपेश के अथक प्रयास एवं प्रोत्साहन के कारण अर्धसत्य पर कई लैंगिक विकलांग चिट्ठालेखन की कोशिश करते हैं. इस तरह  लैंगिक विकलांगों को एक नवजीवन प्रदान करने के जरिये के रूप में हिन्दी चिट्ठाकारी उभर रहा है. मेरा अनुरोध है कि पाठगण इन लोगों को जरूर प्रोत्साहित करें एवं अर्धसत्य  पर नियमित रूप से टिपिया कर इस शुभ कार्य को अंजाम दें.

टिपियाते समय इस बात को न भूलें कि आनुवांशिकी की समस्या बढ रही है. इस कारण जो लोग सामान्य सामाजिक जीवन से वंचित हो जाते हैं उनके प्रति समाज की काफी बडी जिम्मेदारी है. निम्न दो टिप्पणियां इस बात को बडे सकारात्मक तरीके से प्रस्तुत करती हैं:

(दिनेशराय द्विवेदी) हम अन्य विकलांगों को जिस तरह से अपनाते हैं उसी तरह इन शिशुओं को भी अपना सकते हैं। इस तरह के अनेक लोग परिवारों में पलते हैं और जीवन जीते हैं। उन्हें परिवारों द्वारा अपनाने की आवश्यकता है।

(संजय बेंगाणी) लैंगिक विंकलांगों को विकलांगों को मिलने वाले आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए. और धनार्जन की वर्तमान व्यवस्था खत्म होनी चाहिए.

इस नजरिये के साथ आईये आज कुछ करें. (क्रमश:)

(मूल आलेख सारथी चिट्ठे पर शास्त्री जी के द्वारा लिखा गया था. उनकी विशेष व्यक्तिगत अनुमति के कारण इस लेखन परंपरा को  अर्धसत्य पर पुन: प्रकाशित किया जा रहा है.)

रविवार, 29 मार्च 2009

हिजडा योनि में जन्म 001

(सारथी पर हाल ही में छपा शास्त्री जी का लेख)  मेरे पाठकों में से अधिकतर या तो पुरुष हैं या स्त्री. इन में से अधिकतर को लिंगाधारित विषमता का सामना करना नहीं पढता है. पुरुष को पुरुष होने के कारण या स्त्री को स्त्री होने मात्र के कारण समाज में मजाक का पात्र नहीं बनना पडता है.  लेकिन समाज का एक तबका ऐसा भी है जिसको हर ओर से उपेक्षा, तिरस्कार, निंदा आदि सहन करना पडता  है महज इस कारण कि वे न तो पुरुष हैं न स्त्री.

यह एक जनितक (Genetic) समस्या है जो भारत के उत्तरी प्रदेशों में अधिक दिखती है. जब शुक्राणु का संयोजन होता है उसी क्षण यह तय हो जाता है कि बच्चा नर होगा या मादा. लेकिन इसके बाद काफी जटिल प्रक्रियायों द्वारा उनके लैंगिक अवयवों का निर्माण होता है. न केवल बाह्य अवयव, बल्कि उनसे जुडे आंतरिक अवयवों की भी रचना होती है.

इस जटिल प्रक्रिया को उस भूण के जीन नियंत्रित करते हैं. लेकिन प्रक्रिया अपने आप में इस कदर जटिल है, एवं इतने समय तक चलती रहती है कि उसमें यदा कदा अडचन आ जाती है और अंत में बालक या बालिका के लक्षण स्पष्ट होने के बदले मिलेजुले लक्षणों/अवयवों के साथ जन्म होता है. और इसके साथ जन्म लेती है एक ऐसी विषमता जो आजीवन उस नवजात शिशु को नहीं छोडती.

हिन्दुस्तान के अधिकांश इलाकों में इस तरह के शिशु के (जिस के जननांग स्पष्टतया बालक या बालिका के नहीं होते)  जन्मते ही उसे उसका परिवार त्याग देता है. ऐसे शिशुओं को सामान्यतया हिजडा कहा जाता है, एवं उसकी आगे की विधि यह होती है कि उसे अन्य हिजडे पालें. होता भी ऐसा ही है कि अपवादों को छोड कर  ऐसे शिशुओं को हिजडे लोग ही ले जाकर पालते हैं.

आगे बढने के पहले मैं यह स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि चूंकि एक व्यक्ति लिंगनिर्धारण के समय होने वाले जनितक समस्या के कारण हिजडा बन जाता है, अत: यह एक प्रकार की शारीरिक विकलांगता है. जैसे एक बच्चा अंधा, बहरा, या लंगडा पैदा होता है वैसे ही एक लैंगिक विकलांगता के कारण बच्चा इस तरह पैदा होता है. इस कारण हिजडा कहने के बदले इनको “लैंगिक विकलांग” कहना सही होगा, और मैं इसी नामकरण का उपयोग करता हूँ.  लेकिन इस आलेख में मैं हिजडा और लैंगिक विकलांग दोनों शब्दों का प्रयोग करूंगा. [क्रमश:]

(मूल लेख सारथी चिट्ठे पर शास्त्री जी के द्वारा लिखा गया था. उनकी विशेष व्यक्तिगत अनुमति के कारण इस लेखन परंपरा को  अर्धसत्य पर पुन: प्रकाशित किया जा रहा है.)

बुधवार, 4 मार्च 2009

लैंगिक विकलांग बच्चे अपने परिवारों को वापिस लौटेंगे एक प्रयोग के तहत....

अर्धसत्य परिवार ने अपने निरंतर प्रयासों के चलते तथा अपने बुजुर्ग मार्गदर्शकों के आशीर्वाद के सहारे से एक अभिनव प्रयोग करा है जिसके कारण कुछ समय से ब्लाग पर लिखने का समय नहीं निकाला जा सका। इस प्रयोग के अंतर्गत जो लैंगिक विकलांग बच्चे परिस्थितियों वश बरसों बरस से अपने परिवारों से अलग रह रहे थे उन्हें विश्वास में लेकर उनके परिवार की जानकारी हासिल करके बच्चों के माता-पिता व भाई बहन आदि से संपर्क कर संवाद स्थापित करना और उन्हें समझाने का प्रयास करना। इस प्रयोग के अंतर्गत जो बच्चे दस से पंद्रह सालों से अपने परिवारों से नहीं मिले थे एक प्रयोग के चलते वापस अपने घर लौटे हैं जिनमें कि कीर्ति(केतना), भूमिका, देवी, दिव्या और स्वयं अर्धसत्य परिवार की ज्येष्ठ संचालिका मनीषा नारायण हैं अब देखना है कि क्या होता है कौन स्वीकारा जाता है और कौन वापिस आ जाता है लेकिन हम सब इन बच्चों को इतना साहस दे पाए कि वे जैसे हैं उसी हाल में वापस जा सकें इस शर्त के साथ कि उन्हें यथावत स्वीकारा जाए बिना किसी शर्म या सामाजिक लोकलाज के....। ईश्वर करे के हमें इस मुहिम में कामयाबी मिले। बाबूजी श्री जे.सी.फिलिप कहते हैं कि सामाजिक बदलाव अत्यंत धीमी गति से होते हैं , जिस गति से शुरू हो कम से कम शुरू तो हुआ ये प्रयास; बस आप सबका आशीर्वाद बना रहे।

सोमवार, 23 फ़रवरी 2009

मार्कण्डेय भाई समस्याएं कुछ अलग ही हैं.....

आज मार्कण्डेय भाई का प्रोफ़ाइल देखा तो पता चला कि वे पंखों वाली भड़ास के भी सदस्य हैं तो वहां उनकी लिखी एक पोस्ट पढ़ डाली और उसका एक अंश भी भड़ासियों के लिये डाका मार लायी। भाईसाहब ने लिखा है कि सरकार पर कमेंट करना मूर्खता है तो बस इतना कहने का साहस है कि सरकार कोई एक आदमी नहीं है इसे तो हम आप जैसे लोग बाकायदा लोकतांत्रिक तरीके से वोट देकर बनाते हैं और अगर हम ही जाति-धर्म-भाषा-लिंग-क्षेत्र जैसे मुद्दों के कारण वोट देते हैं तो ये हमारे प्रतिनिधि के चयन में गलती है। यदि आप मौजूदा सरकार की बात कर रहे हैं तो बस इतना ही कहूंगी कि साठ सालों में किस पार्टी ने शासन में आकर समस्याएं सुलझाई हैं? यदि जाति-धर्म-भाषा-लिंग-क्षेत्र के बकवास मुद्दे समाप्त हो गये तो देश समेकित प्रगति करने लगेगा। सुप्रीम कोर्ट ने जो कहा वह "कोडीआइड ला" के अंतर्गत कहा है लेकिन उसका पालन कौन करवाएगा यह तो साठ सालों से समस्या बनी है इसी लड़ाई को तो हमारे जस्टिस आनंद सिंह पिछले पंद्रह सालों से तकलीफ़ें उठाते हुए भी जारी रखे हैं। नागरिकता का कोई प्रमाण पत्र तो मुझ जैसे लैंगिक विकलांग(हिजड़ॊ) के पास भी नहीं है चाहे वह राशन कार्ड हो या पासपोर्ट...............................
देश की मूल समस्याएं कुछ अलग हैं जिनकी तरह कुछ कमीने किस्म के कुटिल राजनेता जनता का ध्यान ही नहीं जाने देते ताकि हम बेकार के मुद्दों में उलझे रहें
भाई मार्कण्डेय ने लिखा है......
हमारी सरकार ........ उसपर तो कमेन्ट करना मुर्खता है । जानते हुए छोटे घाव को कैसे नासूर बनाया जाता है ? यह सीखना हो तो कोई इसे सरकार से सीखे ।सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है की हरेक भारतीय के पास पहचान पत्र होना चाहिए । जिससे की उनकी नागरिकता पहचानी जा सके । सीमावर्ती इलाकों में तो इसे अनिवार्य कर देना चाहिए । कोर्ट ने सरकार से जबाब भी माँगा ......पर वह लगता है सो गई है । यह नासूर इस कंट्री को ही तबाह कर देगा जिस तरह स्पेन का नासूर नेपोलियन को और साउथ का नासूर औरंगजेब को बरबाद कर दिया । समय रहते चेत जाने में ही समझदारी है ।ऐसे लोगो को भी सबक सिखाया जाय जो बिना सोचे समझे बंगालादेशिओं को नौकर बना लेते है । कैम्पों में अबैध बंगालादेशिओं को वे समान उपलब्ध है जो यहाँ के अधिकाँश नागरिकों को भी नही है । रासन कार्ड , नौकरी , शिक्षा का अधिकार देश के नागरिकों को है न की अबैध नागरिकों को ।बन्ग्लादेशिओं को पनाह देने में पश्चिम बंगाल और असाम का बड़ा हाथ है । वह वे पहचान में ही नही आते की कौन देशी है और कौन विदेशी ...... नेता अपनी नेतागिरी से बाज नही आते । एक दिन देश की जनता उनसे सवाल जरुर करेगी । तब उन्हें बचाने के लिए कोई बंगलादेशी नही आयेगा ।

सोमवार, 16 फ़रवरी 2009

मैं कोई बड़ी हस्ती हो गयी हूं जो लोग मेरे साथ ऐसा व्यवहार करने लगे हैं?

क्या मैं कोई बड़ी हस्ती हो गयी हूं जो लोग मेरे साथ ऐसा व्यवहार करने लगे हैं? जब से मैं ब्लागिंग के द्वारा अपनी समस्याएं लिख रही हूं मेरे दिल का बोझ तो उतर रहा है ये सच है। कल जब मैं भायखला स्टेशन पर ट्रेन में मांगने के बाद घर जाने के लिये अपनी बाकी बहनो रम्भा अक्का और सोना अक्का वगैरह का इंतजार कर रही थी तो देखा कि एक कोने में खड़ी एक युवती अपनी पांच साल की बेटी के साथ सुबक-सुबक कर रो रही है और लोग उसके अगल-बगल से गुजर रहे हैं लेकिन कोई नहीं पूछता कि क्या हुआ क्यों रो रही हो....। मुझसे रहा नहीं गया तो मैंने पास जाकर पूछ लिया कि बहन क्या समस्या है क्यों रो रही हो क्या मैं तुम्हारे लिये कुछ कर सकती हूं? इस पर उसने सिर उठा कर मुझे देखा तो अपलक दो मिनट तक देखती ही रह गयी फिर जोर से लिपट कर रोने लगी। दिलासा देने के बाद चुप कराने पर उसने सीधे मेरा नाम लेते हुए बात शुरू करी कि मनीषा दीदी मेरे पति ने दूसरी शादी कर ली है और मुझे घर से निकाल दिया है मेरे पास कुछ नहीं है और वो आदमी कहता है कि बिना तलाक दिये वह दूसरी या ग्यारह तक शादियां कर सकता है इस्लाम में जायज़ है, पीटता है खाना नहीं देता मैं ज्यादा पढ़ी लिखी नहीं हूं दसवी पास हूं मेरा पति डाक्टर है उसका नाम अज़हर है वगैरह वगैरह............। वह लड़की बोलती जा रही थी मैं अवाक सी ये सोच रही थी कि वो मुझे कैसे जानती है? फिर उसने ही बताया कि उसने मुझे इंटरनेट पर भड़ास में देखा था और फिर तब से अर्धसत्य देख रही है और पहचानती है। वो मुझसे ऐसा व्यवहार कर रही थी जैसे कि मैं कोई बहुत बड़ी हस्ती हूं और उसकी समस्या चुटकी बजाते ही हल कर दूंगी।
तब तक मेरी बहनें आ गयी और मैं उस लड़की को बच्ची के साथ मुनव्वर आपा के घर भेज आयी हूं। आप सब बताइये कि इस विषय पर मैं क्या करूं? क्या अर्धसत्य पर उसकी कहानी लिखूं कुछ होगा? न्याय मिलेगा?ब्लाग का इस दिशा में कैसे प्रयोग कर सकती हूं?अभी वह हमारे सम्पर्क में मुनव्वर आपा के साथ ही है।

बुधवार, 4 फ़रवरी 2009

मेरी बहन की खुशी.......

अर्धसत्य परिवार के मार्गदर्शकों में से एक श्री मोहम्मद उमर रफ़ाई व मनीषा नारायण दिल खोल कर ठहाके लगाते हुए
जब हम किसी काम को "बस यूं ही" अपनी खुशी के लिये शुरू करते हैं और वह काम बढ़ते-बढ़ते एक महाअभियान का रूप धारण कर ले तब आपको उसमें होने वाली छोटी सी सफलता भी उसी अनुपात में विशालता लिये हुए लगती है। कुछ समय पहले तक शायद मेरी बहन मनीषा नारायण की मुस्कराहट मुझे इतना आह्लादित न करती रही हो लेकिन आज अब मैं इस बात को देख रहा हूं कि मुझे उनकी हर मुस्कान, हर हंसी बहुत बड़ा सुख दे जाती है; ठीक ऐसा ही होता है जब भूमिका या दिव्या जैसे मेरे प्यारे बच्चे किसी बात पर मुझसे चुटकी लेकर बात करते हैं। आदरणीय बाबू जी शास्त्री श्री जे.सी.फिलिप ने जो पुस्तकें भेजी हैं वह एक नया उत्साह लेकर आयी हैं विशेष तौर पर मेरे लिये। अब मैं दीदी को दिल खोल कर हंसते देखता हूं तो लगता है कि जीवन सफ़ल सा होता प्रतीत हो रहा है।

रविवार, 25 जनवरी 2009

स्वास्थ्य और तालियां बजाना

आज गणतंत्र दिवस मनाया जा रहा है तो रात भर से हमारी बस्ती में लोग गड्ढ़ा खोदना, लोहे का पाइप लगाना उसमें राष्ट्र ध्वज बांधना और फूल-झंडियां-मिठाई ना जाने क्या क्या......। वहीं जब इन इंतजामों में लगे उत्साही युवकों और स्थानीय नेताओं को देखते हुए सुबह हो गयी रोज की तरह से नजदीक ही बड़ी इमारतों में रहने वाले करी तीस-चालीस बुजुर्ग एकत्र होकर हंसने का अभ्यास करने लगे। कहते हैं कि इसके पीछे सांइटिफ़िक कारण रहते हैं कि हंसी चाहे झूठी हो या सच्ची लाभकारी रहती है। आज इन बुजुर्गों ने एक नया अभ्यास शुरू करा और वो था जोर-जोर से विभिन्न लय पर तालियां पीटना......। जब मैंने साहस करके अभ्यास कराने वाले दादाजी से पूछा तो उन्होंने बताया कि बेटा ताली बजाने से हाथ के एक्यूप्रेशर प्वाइंट्स सक्रिय बने रहते हैं और शरीर व मन का स्वास्थ्य उत्तम बना रहता है। मेरी कमाठीपुरा(मुंबई ही नहीं एशिया का सबसे बड़ा रेडलाइट एरिया) में रहकर देह व्यवसाय करने वाली एक बहन ने मुझसे तुरंत पूछा कि मनीषा ! क्या मैं भी तालियां बजाया करूं दवाएं लेने के साथ ही? वो एच.आई.वी. पाजिटिव है, मेरे पास उसकी बात का उत्तर नहीं है । कितनी तालियां बजाएं हम स्वतंत्रता दिवस से गणतंत्र दिवस तक तालियां ही तो पीटते रहते हैं हम सब......... लेकिन मन है कि स्वस्थ होने के लिये तालियां छोड़ना चाहता है। हम कभी तालियां नहीं बजाना चाहते चाहे कोई भी कारण क्यों न हो।

गुरुवार, 22 जनवरी 2009

बाबूजी का वात्सल्य: मनीषा नारायण को आशीष सहित भेजी पुस्तकें

बुद्ध की कहानियां,भारतीय वन्य जीव,पौराणिक कहानियां,परमाणु से नैनो प्रौद्योगिकी तक : बाबू जी ने भेजी पुस्तकें बचपन में ले जाती हैं बाबूजी के हस्तलिखित आशीर्वाद उनकी मानस पुत्री मनीषा नारायण के नाम : शब्दों से जुड़ती स्नेह-रज्जु
आज मेरे जीवन का एक बहुत बड़ा खुशियों भरा दिन है, मेरा मुहिम एक नए आयाम को छू रहा है। हमारे मार्गदर्शक गुरुवर्यसम आदरणीय शास्त्री श्री जे.सी.फिलिप जी ने मनीषा दीदी के लिये कुछ पुस्तकें भेजी हैं अपने हस्तलिखित संदेश के साथ ; जो कि मुझे इस बात का एहसास बड़ी शिद्दत से दिलाने के लिये काफ़ी है कि अब वाकई मेरे प्रयास के रंग में एक और प्रकाश की पट्टी जुड़ गई है और इसी तरह इस मुहिम में एक सप्तरंगी इंद्रधनुष उतर आयेगा, सफ़लता मिलेगी जब सारे बच्चे सम्मान से सिर उठा कर जी सकेंगे, समाज में सहज भाव से स्वीकारे जाएंगे, समान संवैधानिक अधिकार पा सकेंगे.........। मनीषा दीदी को पुत्रीवत स्वीकारने वाले हम सबके बाबूजी के द्वारा मुझसे फोन पर बात कर लेना भर मुझमें नयी ऊर्जा का संचार देता है, उनकी फोन पर दूर से आती वात्सल्य और करुणा में डूबी आवाज कई-कई दिनों से लगातार जागे रहने की मेरी शारीरिक थकान को न जाने कहां गायब कर देती है और मैं फिर जुट जाता हूं अपने यायावरपन में अपने बच्चों का हित तलाशने के लिये। जब मैंने मनीषा दीदी को बताया था कि बाबूजी आपके लिये पुस्तकें भेजने वाले हैं तो खुशी और आंसू का एक अजीब सा भाव उनके चेहरे पर मैंने देखा था और अब यकीन गहरा हो चला है कि हम सब के समेकित प्रयत्नों से एक दिन बस खुशियां ही खुशियां होंगी।

शुक्रवार, 16 जनवरी 2009

बाबूजी रास्ता बताइये..........


आदरणीय बाबू जी शायद सोच रहे होंगे कि मनीषा बहुत व्यस्त हो गयी है तो इन दोनो भाई-बहन ने नववर्ष की शुभेच्छा दी और न ही पोंगल की शुभकामनाएं। सच तो यह है कि हम दोनो आजकल पागल की तरह से सूचना प्राप्ति के अधिकार का प्रयोग कर समाज और देश / राज्य में लैंगिक विकलांगों की स्थिति जानने के लिये लगे थे। जरा आप सब जानिए कि क्या हुआ जब सूचना प्राप्ति कि अधिकार का आवेदन पत्र विधिवत भर कर उस पर १० रु. का रेवेन्यू स्टैम्प लगा कर मैं भाई के साथ नगर परिषद कार्यालय गई तो चूंकि यहां अधिकतर क्लर्क भाईसाहब डा.रूपेश को एक सताने वाले कायदा-पंडित के रूप में पहचानते हैं जिसकी वजह से उनके प्रति एक पूर्वाग्रह बना रखा है सबने कि ज्यादा से ज्यादा चक्कर लगवाएं ऐसा उन सबका प्रयास रहता है। जैसे ही आवेदन पत्र देखा तो चार पांच क्लर्क एकत्र हो गए और पहले आपस में सलाह -मशविरा करा फिर भाईसाहब से बोले कि ये एप्लीकेशन में सवाल पूंछा गया है हम उत्तर नहीं बल्कि सूचनाएं उपलब्ध करा सकते हैं जो कि पत्र-प्रपत्रों या अन्य किसी रूप में रेकार्ड में मौजूद हों इसलिये ये एप्लीकेशन स्वीकारी नहीं जा सकती तो भाई अड़ गए कि इस एप्लीकेशन पर आप जो कारण बता रहे हैं वह लिखते हुए अस्वीकार करने की टीप लिख दीजिए ताकि हम वापस चले जाएं। एक बार फिर हुज्जत शुरू हो गयी.....। होते होते बात यहां तक पहुंच गयी कि एक क्लर्क ने कह दिया कि मैडम मनीषा नारायण पहले तो आप किसी प्रमाण से ये सिद्ध करिये कि आप भारतीय नागरिक हैं तब आपको ये अधिकार बनता है कि आप कोई सवाल हमसे कर सकती हैं ऐसा हो सकता है कि आप बांग्लादेशी घुसपैठिया हों जो कि बिना किसी अधिकार के भारत में रह रहा हो क्यों न पुलिस बुलाया जाए और इस बात को आगे बढ़ाया जाए। अब हम दोनो मुख्याधिकारी जी के पास गये तो उन्होंने सारी बात सुनी हमें चाय पिलायी और अपनी भारी असर्मथता जताते हुए बोले कि मैं एक बात अनआफ़िशियली डा.साहब से कहना चाहता हूं इसे अन्यथा न लें कि ये वही देश है जहां कागजों पर मरे हुए घोषित कर दिये लोग बरसों बरस आफ़िसों के चक्कर लगाते रहते हैं और एक दिन सचमुच मर जाते हैं। उन्होंने हमसे बहुत सम्मान से व्यवहार करा लेकिन ये भी बताया कि यदि आपकी नागरिकता पर सवाल करा गया है तो यह मामला ये क्लर्क लोग बात बढ़ने पर स्थानीय राजनेताओं के पास ले जाते हैं फिर आप तमाम तरह से स्टेट की मशीनरी का दुरुपयोग करके सतायी जाएंगी।
कई बातें स्पष्ट होने के बाद हम दोनो वापस आ गए है लेकिन अब विचार कर रहे हैं कि आगे क्या रणनीति हो साथ ही बाबूजी श्री जे.सी.फिलिप जी और आप सभी जनों से निवेदन है कि यदि कोई विशेष सुझाव हो तो अवश्य बताएं।

शुक्रवार, 9 जनवरी 2009

डा.रूपेश के नए बच्चे करेंगे पुराने सवाल

क्या सारी समस्याएं समाप्त हो गयी हैं? हरगिज नहीं...लेकिन अब वो समस्याएं हमें अब हमारी एकजुटता और प्यार के आगे बौनी नजर आने लगी हैं। कुछ समय पहले तक राशन कार्ड या ड्राइविंग लाइसेन्स जैसी चीजें लगता था कि हमारे अस्तित्व को सिद्ध करने के लिए ये बहुत जरूरी हैं लेकिन अब से डा.रूपेश जैसे भाई का साथ और बाबूजी(श्री जे.सी.फिलिप) का मार्गदर्शन हमें ये बता रहा है कि हम जल्द ही एक स्वीकार्य पहचान के साथ समाज में समान संवैधानिक अधिकारों के साथ खड़े होंगे। डा.रूपेश ने सभी लैंगिक विकलांग बच्चों को पिता की हैसियत से अपना नाम देकर सभी बच्चों के भीतर एक नई आत्मा फूंक दी है, सारे बच्चे अलग-अलग की बोर्ड लेकर दिन में अक्सर मांग कर आने के बाद अभ्यास करते मिलते हैं; जल्द ही सारे सरकारी विभागों में इन बच्चों के द्वारा भेजी गई एप्लीकेशन्स दिखेंगी......। सूचना प्राप्ति के अधिकार का प्रयोग करते हुए सरकार से जाना जाएगा कि हमारे जैसे लैंगिक विकलांगों के लिए क्या सरकार ने कुछ विचार करा है अथवा नहीं? हमारी कानूनी स्थिति के क्या संदर्भ है? हमारी नागरिकता की पुष्टि कैसे करी जाती है? जो लैंगिक विकलांग चुनाव में अपना नामांकन भरते हैं या जो वोट देते हैं वो किस परिचय से ऐसा कर पाते हैं? इत्यादि...इत्यादि...।

बुधवार, 7 जनवरी 2009

नया साल, नई आशा !!

मानव जीवन की विडंबना है कि हर जगह विविधता होते हुए भी समाज कुछ विविधताओं को नकारता है. इसका सबसे अच्छा उदाहरण है उन लोगों के प्रति समाज का नजरिया जिनको स्त्री या पुरुष नहीं कहा जा सकता है.

ये लोग सामान्य  यौन-आधारित अंतरों से मुक्त ईश्वर की सृष्टि हैं, लेकिन इन लोगों को इस नजरिये से कम ही देखा जाता है. उसके बदले इन को भारतीय समाज में अप्राकृतिक लोगों के रूप में देखा जाता है, जबकि जो चीज "प्रकृतिदत्त" है वह है की "प्राकृतिक" और उसे इसी नजरिये से देखा जाना चाहिये.

डॉ रूपेश जैसे लोगों के कारण लोगों की सोच में बदलाव आने लगा है, और उम्मीद है कि सन 2009 लैंगिक विकलांगो के लिये नई आशा लेकर आया है.


अब तक की कहानी

 

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आयुषवेद by डॉ.रूपेश श्रीवास्तव