बुधवार, २० जनवरी २०१०

कुछ महीने न लिख कर क्या देख सकी वो बताना है

पिछले कुछ महीनों से सक्रिय लेखन बंद कर के एक प्रयोग करके देख रही थी। इस प्रयोग में मैने ब्लागिंग के बाद में मैंने जो नजरिया पाया था उस नई नजर से दुनिया को देख कर समझने की कोशिश कर रही थी कि शायद कुछ बदलाव आया होगा लेकिन कुछ बदला ही नहीं है बस ये है कि कुछ लोग मुझे पहचानने लगे हैं, इस नयी पहचान के चलते जो सामाजिक कद हासिल हुआ है उसमे पत्रकार बंधुओं को लगने लगा है कि मैं भी घटनाओं पर अपनी राय दूं। अभी जब कुछ समय पहले समलैंगिकता वाले मामले में कानूनी उठापटक चल रही थी तो कई लोगों ने मेरी राय जानना चाहा कि मैं इस बारे में क्या विचार करती हूं। मैंने एक बात देखी कि हर जगह पूंजी का जोर है पैसे की ताकत से सारे काम सिद्ध हो रहे हैं। हमारी न्याय व्यवस्था और न्याय प्रणाली के साथ साथ ही मैंने न्याय का पालन कराने वाली संस्थाओं को भी नये नजरिये से देखने का प्रयास करा लेकिन कुछ भी बदलाव नहीं है। बाबू जी डा. जे.सी.फिलिप सही कहते हैं कि हमारा मसला तो सामाजिक मसला है और सामाजिक बदलावों की गति बहुत धीमी होती है इसलिये फिलहाल कुछ अपेक्षा करना भी व्यर्थ है। लैंगिक विकलांगता के मुद्दे को दरकिनार करके धनी और कुटिल लोगों ने खुद ही एक लैंगिक अल्पसंख्यक वर्ग रच डाला जिसे उन्होंने "LGBT समूह" नाम दे डाला और गुदा मैथुन से लेकर मुख मैथुन तक को अपनी निजी काम-वरीयताओं में गिना कर कानूनी नौटंकी करके भारतीय सभ्यता के मुंह पर कालिख पोत दी पर हमारे माननीय न्यायाधीश तर्कों के आगे घुटने टेके रहे। आश्चर्य होता है जब न्यायाधीश अपने निजी विवेक का जरा भी प्रयोग नहीं करते। आजकल मेरा रुझान ’विधि के शासन’(Rule of law) की तरफ है जिसे एक आम नागरिक होने की हैसियत से जानने का प्रयत्न कर रही हूं। काफ़ी दिनों बाद लिख रही हूं तो विचारों का तारतम्य आसानी से नहीं बन पा रहा है। मुझे पता है कि जो भड़ास इतने दिनों से दम साध कर रोके हुए थी अब उबल-उबल कर बाहर आएगी। इस बीच मैं अपने बड़े भाई और गुरुदेव डा.श्री रूपेश श्रीवास्तव जी के सम्पर्क में रही, लंतरानी समूह की संचालिका और भड़ास की संरक्षिका मेरी बड़ी बहन मुनव्वर(सुल्ताना)आपा के जुड़ाव में भी लगातार हूं इसलिये कुछ अविस्मरणीय पल तस्वीरों के रूप में कैद हो सके जो आप सबके साथ बांटना है।

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मंगलवार, २६ मई २००९

नया घर और प्रवेश पर पूजा-पाठ















आप सबके आशीर्वाद की आकांक्षा है इस अवसर.........

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मंगलवार, २१ अप्रैल २००९

मेरे दोस्त का बच्चा हिजडा निकला !!

(सारथी पर हाल ही में छपा शास्त्री जी का लेख) लैंगिक विकलांगों पर मैं ने अभी तक जो कुछ लिखा है उन में टिपियाये गये प्रश्नों के उत्तर मैं अगले आलेख में दूँगा. मेरा अनुरोध है कि तब तक पाठकगण एवं विकलांग मित्र सबर के साथ इंतजार करें!

दो दशाब्दी पहले की बात है, बडे भोर को अचानक मेरे एक मित्र का दूरभाष आया कि वह भारी मुसीबत में है अत: मैं तुरंत अस्पताल पहुंचूँ. गिरते पडते वहां पहुंचा तो रोनी सूरत लेकर वह बाहर खडा हुआ था. पूछा तो बताया कि सुबह चार बजे पत्नी का प्रसव हो गया लेकिन बच्चा न नर है न मादा क्योंकि पुरष-स्त्री दोनों लिंग बच्चे के शरीर में  मौजूद है.

मेरे लिये यह पहली जानकारी नहीं थी इस कारण मैं ने उससे कहा कि वह तुरंत ही रेलगाडी से बच्चाजच्चा को लेकर पास के ही एक शहर के सर्जन से मुलाकात करे. उसने ऐसा ही किया. इधर मैं ने सब को खबर दे दी कि बच्चे की कुछ गंभीर समस्या के कारण उसे बडे अस्पताल ले जाना पडा है. उस अस्पताल में जनीतक जांच से पता चला कि वह बच्चा एक लडकी है. सर्जन ने मांबाप को आश्वस्त किया और बच्ची को खिलाने के लिए एक दवा दे दी.

डाक्टर का निर्देश यह था कि दस साल की उमर तक बिना किसी को पता लगे उसका पालनपोषण  करें, दवा देते रहें, और उसके बाद उसकी शल्यक्रिया कर दी जायगी. उस युवा परिवार ने ऐसा ही किया. दवा देते रहे, बच्चे की विकलांगता हरेक से छुपा कर रखी, और  उसे हर तरह से ट्रेनिंग दी कि वह किस तरह से अपनी विकलांगता को छुपा कर रखे. उसे कभी भी हीनभावना से ग्रस्त न होने दिया.

समय आने पर शल्यक्रिया से लिंग को (जो दवा के असर से लगभग सूख सा गया था) हटा दिया गया. तब कहीं मांबाप की जान में जान आई कि अब बच्ची एक लडकी के रूप में चैन की जिंदगी बिता सकती है. वह लडकी असामान्य बुद्धि और हिम्मत की धनी थी एवं आज हिन्दुस्तान के एक कोने में एक उन्नत स्थान पर जी रही है.

आज हिन्दुस्तान में जितने हिजडे हैं, उन में से अधिकतर (1000 में से 990 या अधिक)  इस तरह की जनीतक-गलतियों के मारे हुए हैं. जीन्स के हिसाब से वे या तो पुरुष हैं या स्त्री हैं लेकिन पैदाईश के समय वे जननांगों में विकलांग निकले. समय पर उनको वैज्ञानिक/डाक्टरी मदद न मिल पाई, बल्कि उनके मांबाप ने “लोकलाज” के कारण उनको “फेंक देना” उचित समझा. इस कारण उनको उठा ले जाकर हिजडों ने पाला. वहां वे पल गये, लेकिन पढाई लिखाई न हो पाई, नौकरी पर कोई रखता नहीं है, अत: हिजडों के बीच जो चलन है (पैसा मांगना)  उसी पर चल कर वे जीने की कोशिश कर रहे हैं. इसका सारा दोष सिर्फ उनको देना उनकी दूसरी हत्या है  -- पहली हत्या मांबाप नें उनको त्यागने के द्वारा की, दूसरी हत्या मैं और आप अपनी क्रूर और संवेदनाहीन बोली द्वारा करते हैं.

यदि समाज किसी समूह से उस का हर मौलिक अधिकार (शिक्षादीक्षा, घरबार, नौकरी के अवसर) छीन ले, हर चीज उनके लिये वर्जित कर दे, अनको सीधे रास्ते से न तो राशनकार्ड दे, न पासपोर्ट दे, न डाईविंग लाईसेंस दे, बल्कि उनको भूखा और नंगा छोड दें,  और उसके बाद उन पर दोष लगाये कि वे पैसे के लिये छीनाझपटी करते हैं तो दोष समाज का है न कि लैंगिक विकलांगों का. इस नजरिये से वास्तविकता को देखपहचान कर हमें लैगिक विकलांगों के सशक्तीकरण के लिये कार्य करना चाहिये.

हिजडों को घिन से, नीची नजर से, तुच्छ नजर से देखना आसान है. उनके लिये कुछ करना कठिन है.  यदि अभी भी आप सारा दोष लैंगिक विकलांगों पर थोपना चाहते हैं तो युवा सिद्धार्थ (गौतम बुद्ध) का एक वाक्य याद दिलाना चाहता हूँ कि “किसी से उसका जीवन छीनने वाले व्यक्ति से बडा वह होता जो उसे जीवनदान देता है”.(मूल लेख सारथी चिट्ठे पर शास्त्री जी के द्वारा लिखा गया था. उनकी विशेष व्यक्तिगत अनुमति के कारण इस लेखन परंपरा को  अर्धसत्य पर पुन: प्रकाशित किया जा रहा है.)

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बुधवार, १५ अप्रैल २००९

पैसे की खातिर इस बहुत छोटे से अपराध को मजाक की तरह कर डालते हैं

चुनावी माहौल में छुटभैय्ये नेताओं की सरगर्मिया बढ़ गई हैं। हमारे जैसे उपेक्षित लोगों के पास भी चक्कर मारने के लिए ख़ास समय निकला जा रहा है। अब बोगस नामों से वोट तो हम ही डालेंगे न .... कभी मर्द बना कर इस्तेमाल करे जायेंगे कभी औरत बना कर ..... यही तो होता आया है इतने सालों से की भले ही राशन कार्ड न बन पाया हो हमारा लेकिन हम सभी हर चुनाव में वोट जरूर डालते हैं या यूँ कहिये की हमसे डलवाया जाता है और हम तो वैसे भी पैसे की खातिर इस बहुत छोटे से अपराध को मजाक की तरह कर डालते हैं क्योंकि हमें क्या पता की वोट की ताकत क्या होती है ..... हमें भी पढाओ - लिखाओ ताकि हम भी तुम्हे एक अच्छा मुल्क देने में मदद कर सकें और अगर इस बात को समझ कर भी नज़रंदाज़ कर दिया तो ये तुम्हारा दुर्भाग्य होगा की इतनी बड़ी लोकसंख्या को तुम कभी अपना न सकोगे।

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एक बार फिर रुला दिया मीनाक्षी को.......

पत्रकारिता ने एक बार फिर रुला दिया मीनाक्षी को और सवालों का अनसुलझापन जैसा था वैसा ही है इतने बड़े आयोजन से सिर्फ़ लाभ हुआ उन बौद्धिकता का ढिंढोरा पीटने वालों को जिन्होंने लैंगिक विकलांगता को मात्र एक "आईटम" बना कर जुगाली करना शुरू करा है। इस पोस्ट में देखिये.....

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हिजडों के साथ मेरा अनुभव !!

(सारथी पर हाल ही में छपा शास्त्री जी का लेख) हिजडे एक ऐसा यथार्थ है जिसे हम स्वीकार करना नहीं चाहते. लेकिन मेरा अनुमान है कि सारथी के इस लेखन-परम्परा द्वारा कम से कम कुछ लोग सच्चाई पहचान जायेंगे. पुनीत ओमर  ने अपनी टिप्पणी में कहा है:

बेशक इन्हें भी किसी भी अन्य विकलांग की तरह ही समाज और परिवार का हिस्सा बनाया जा सकता है लेकिन इनसे घ्रणा का प्रमुख कारण है इनका जीविकोपार्जन का तरिका जो की एक परिपाटी के रूप में चला आ रहा है. आज भी जब किसी हिजडे के बारे में कल्पना करें तो हमें हमेशा अजीब सी लाली और झुमके बिंदी से सजे, जोर जोर से ताली बजाते, बसों, ट्रेनों में अश्लील हरकतें करते हुए पैसे वसूलते हुए कुछ लोग ही क्यों स्मरण में आते हैं? इनमे से एक भी कृत्य ऐसा नहीं है जो की उन के विकलांग होने से जुडा हो. फिर भी वो ऐसा करने को मजबूर हैं जो की उन्हें घ्रणा का पात्र बनाता है. आशा है की आने वाली कड़ियों से ज्यादा नहीं तो कमसे कम ५० लोगों की सोच और नजरिया तो बदलेगा ही.

मुझे पूरी उम्मीद है कि ऐसा ही होगा.

मैं लगभग 5 साल की उमर में हिजडों या लैंगिक विकलांगों से परिचित हुआ. ग्वालियर के आसपास किसी मंदिर में इन लोगों का एक समूह था जो नियमित रूप से अपने बंधे बंधाये घरों में जाकर आटा इकट्ठा करता था.

महीने के पहले हफ्ते एक परिचित और बुलंद आवाज सुनाई देती थी जब वह आकर एक श्लोक का उच्चारण करती थी. हाथ में एक तीन से चार इंच मोटी कपडे की धुंआ देती बत्ती होती थी और सर पर एक टोकरी. हमारे सामने का मराठा परिवार (जिनके साथ हमारा अंगन एक हुआ करता था), बडे आदर के साथ एक बडा डब्बा आटा उनको देता था और फिर उस बत्ती के भस्म को आदर के साथ प्राप्त करते थे. एक से अधिक लोग आते थे तो कई बार ये लोग नृत्य करते थे जिस में एक दम भक्ति की भावना प्रगट होती थी.  मेरी मां ने बचपन में ही बता दिया था कि ये न पुरुष हैं न स्त्री, और ये किसी धार्मिक समूह के लोग हैं जहां अपना सारा समय पूजापाठ में लगाते हैं.

स्वाभाविक है कि लैंगिक विकलांगों से मेरा परिचय एक स्वस्थ माहौल में हुआ और उनके प्रति एक स्वस्थ नजरिया मन में घर कर गया. इसके बाद घरों में जाकर पैसा वसूल करने वाले हिजडे बहुत देखे. इतना ही नहीं, हमारे पास जो सरकारी अस्पताल था वहां ये लोग लगभग हर दिन प्रसूति वार्ड का चक्कर लगाते थे. यह भी मैं ने देखा है. वहां की नर्सिंग इंचार्ज मेरी दूर की चाची लगती थी. वे अकसर आकर पापा को बडे दुख के साथ बताती थी कि किस तरह लैंगिक विकलांग पैदा होने पर मांबाप उस बच्चे को छूना तक पसंद नहीं करते और किस तरह बच्चे को अस्पताल में छोड कर भाग जाते थे. फल यह होता कि वे विकलांग-कौम को सूचना दे देते और वे लोग उस बच्चे को ले जाकर पालते पोसते थे.

मैं बडा हुआ तो नोट किया कि ग्वालियर में इन लोगों के कई बडे समूह थे जो पेट पालने के लिये कोई भी धंधा नहीं कर पा रहे थे. कोई भी व्यक्ति इन को नौकरी पर नहीं लगाता था. जब से यह बात समझ में आई तो इन लोगों के साथ एक दम सामान्य व्यवहार करने लगा, और पाया कि इनको सामान्य तरीके से लो तो ये लोग भी उसी तरह से सामान्य व्यवहार करते हैं.

शादी के बाद मैं जिस कालोनी में रहता था वहां ये लोग महीने में एक बार सारे घरों का चक्कर लगाते थे. दस से बीस लोगों का समूह रहता था. मेरे घर आते थे तो मैं और पत्नी इनसे एकदम सामान्य तरीके से मिलते थे और अपनी सामर्थ के अनुसार एक राशि दे देते थे. इन में से कभी भी किसी ने भी हमारे साथ न तो पैसे के लिये मोलभाव किया, न कम पैसे होने पर हमें टोका. वे अच्छी तरह जानते थे कि कौन सहृदय है. जब ये घर आते थे तब लोग अपने बच्चों को छुपा लेते थे, लेकिन मैं ने अपने बच्चों को इन से मिलने से कभी नहीं टोका.

रेलगाडी मैं ने पहली बार कोंकण रेलवे द्वारा यात्रा की तो मुम्बई इलाके में तो ये लोग थोक में रेलगाडी में चढे. मेरा व्यवहार एकदम सामान्य रहा अत: इन में से हरेक का व्यवहार मेरे प्रति भी सामान्य रहा. मेरे प्रति इनका व्यवहार देख कर कई यात्रियों ने इसका कारण जानना चाहा तो मैं ने सब को बताया कि आप सही तो जग सही!!

अंत में मैं अपने एक मित्र के पत्र का उल्लेख करना चाहता हूँ जो इस प्रकार है:

आपको बड़ी सहानुभूति हो रही है इन "इश्वरीय अपंगों" के साथ. लगता है कि आप कभी इनके पल्ले नहीं पड़े. चलो ये बात तो ठीक है. लेकिन ये लोग एक सभ्य नागरिक जैसा व्यवहार क्यों नहीं करते? क्यों ये लोग दस दस रूपये के लिए हमें भी शर्मसार करते हैं? भीख ही मांगनी है तो क्यों ये लोग अन्य भिखारियों की तरह नहीं मांगते?  इस समाज में इन लोगों के अपने अपने "इलाके" हैं. अगर कोई दूसरे इलाके का हिजडा इनके इलाके में घुस जाता है तो क्या आपको पता है क्या होता है? इनमे खुद ही एकता नहीं है, भाईचारा नहीं है.  अगर ये लोग एक होकर आम नागरिकों की तरह सरकार के सामने अपनी मांगें रखें तो क्या ये असंभव है कि सरकार इनकी मांगें ना माने?  इनसे अच्छे तो पुलिस वाले भी है, हफ्ता मांगने वाले बदमाश भी हैं; कम से कम वे लोग आम जनता को तो सरेआम परेशान नहीं करते. भले ही वे गरीब ठेली वालों को भी ना बख्शते हों. लेकिन, ये हिजडे तो सभी को एक ही डंडे से हांकते हैं.

मेरे चार आलेखों में इन सब प्रश्नों का जवाब आ चुका है. उम्मीद है आप विषय को सही कोण से देखेंगे.  अंत में दो वरिष्ठ मित्रों की टिप्पणियां देखे:

(राज भाटिया) शास्त्री जी. यह तो एक शरीरिक कमी है जेसा कि आप ने लिखा है, कै बच्चे अंधे लगडे लुले भी तो पेदा होते है, या फ़िर किसी दुर्घटना मै किसी का लिंघ खो जाये तो? मुझे समझ नही आता हमारे समाज मै क्यो ऎसे बच्चे को त्याग देते है, इस कमी मै उस बच्चे का क्या कसुर, क्यो नही उसे भी अन्य बच्चो की तरह से आम प्यार मिलता, आम डांट नही मिलती, जिस से वो अपने आप को ओरो से अलग ना सम्झे.

यहां युरोप मे भी ऎसे लोग मिलते है, लेकिन इन की कोई अलग पहचान नही होती, इन्हे कोई अलग हक नही मिलते,कोई इन पर दया भाव नही दिखाता, कोई इन्हे आरक्षण नही मिलता, जिस से यह अपने आप को आम लोगो जेसा ही समझते है, हम सब मै मिलते जुलते है.

लगडे लुले या अन्य शरीरिक कमी के लिये तो आराक्षण मिलना चाहिये लेकिन ऎसी बात पर अगर हम चाहते है कि यह भी हमारे समाज मै घुल मिल जाये तो इन की कोई अलग पहचान नही होनी चाहिये, बल्कि यह भी हमारी तरह हर हक के बराबर हिस्से दार हो, चाहे वो शिक्षा हो या नोकरी, आरक्षण देने से इन की अलग पहचान होगी ओर फ़िर इन्हे वोही मुश्किले आयेगी जिस से यह बचना चहाते है, या समाज जिस से इन्हे बचाना चाहता है.

अन्त मै इतना ही कहुगां कि यह हमारे ही बच्चे है कृप्या इन्हे ना त्यागे, इन्हे अन्य बच्चो की तरह से ही पाले, उतना ही गुस्सा, उतना ही प्यार दे जितना अन्य बच्चो को देते है, ओर जिस के यह हक दार है. इन की आंखॊ मे झांक कर देखो… क्या कहती है यह मासुऊम आंखे.

धन्यवाद, यह सवाल कई बार मेरे दिल मै उठता था, ओर अन्दर तक बेचेन करता है क्यो हमारे समाज मै इन्हे अलग समझा जाता है ?

 

(दिनेशराय द्विवेदी) हम अन्य विकलांगों को जिस तरह से अपनाते हैं उसी तरह इन शिशुओं को भी अपना सकते हैं। इस तरह के अनेक लोग परिवारों में पलते हैं और जीवन जीते हैं। उन्हें परिवारों द्वारा अपनाने की आवश्यकता है।

लैंगिक विकलांगो द्वारा जबरन लैंगिक विकलांग बनाना अपवाद हो सकता है। लेकिन मैं ने ऐसे उदाहरण भी देखे हैं कि परिवार के लोगों द्वारा लैंगिक विकलांग को हिजड़ों को सौंप देने के उपरांत हिजड़ों ने बच्चे को पढ़ाया और वह सरकारी अस्पताल में नर्स का काम कर रहा है, पुरुष वेश में ही। यहाँ तक कि एक महिला नर्स के साथ रहता भी है। क्यों नहीं हम इसी तरह इन्हें समाज में स्वीकार कर सकते?

[क्रमश:] (मूल लेख सारथी चिट्ठे पर शास्त्री जी के द्वारा लिखा गया था. उनकी विशेष व्यक्तिगत अनुमति के कारण इस लेखन परंपरा को  अर्धसत्य पर पुन: प्रकाशित किया जा रहा है.)

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रविवार, ५ अप्रैल २००९

हिजडों की गुंडागर्दी देखी है क्या?

(सारथी पर हाल ही में छपा शास्त्री जी का लेख)  आज का विषय है कि “आप ने हिजडों की गुंडागर्दी देखी है क्या?” आप में से अधिकतर लोग कहेंगे कि हां घरबाहर इन लोगों को जबर्दस्ती पैसा वसूल करते बहुत देखा है! ठीक है, पर अब इसका एक दूसरा पहलू देखें -- आप ने कभी इन लोगों को बिना इनका अपमान या उपहास किए पैसे दिये हैं क्या? या किसी व्यक्ति को पैसे देते देखा है क्या, बिना उपहास के?  आप में से अधिकतर इस प्रश्न का उत्तर “हां” में नहीं दे पायेंगे.

अब जरा निम्न बातों पर ध्यान दें

  • सामान्य परिवारों में जन्मे इन शिशुओं को जन्मते ही इनका परिवार ऐसे फेंक देता है जैसे उनके हाथ में एक नवजात शिशु नहीं बल्कि जलते अंगारे थमा दिये गये हों.
  • (कारण या लक्ष्य कुछ भी हो लेकिन) आपके घर की इस पैदाईश को हिजडे लोग ले जाकर पालते हैं, खाना देते हैं, बडा करते हैं.
  • हर व्यक्ति को भूख लगती है, कपडे की जरूरत होती है, एक छत की जरूरत होती है, लेकिन आप ने अपने खुद के जन्माये शिशु को इन सब बातों से वंचित कर दिया. कभी आप के मन में यह बात नहीं आई कि आप के बच्चे को गैर लोग पाल रहे हैं, इस कारण चलों कम से कम कुछ पैसा नियमित रूप से उस बच्चे के लिये उसके लालनपालन करने वालों को दे दिया जाये. कहां से आयगा उसका खानाकपडा?
  • बडा होने के बाद उसे नौकरी नहीं मिल पाती क्योंकि उसके लालनपालन करने वाले जो खुद अपढ हैं उसे भी नहीं पढा पाये.
  • पढ जाये तो भी उसे नौकरी नहीं मिलती. कौन किसी हिजडे को नौकरी पर रखता है.
  • आजकल बारात में नाचने के लिये उनकी मांग न के बराबर रह गई है. सामाजिक परिवर्तन के साथ उनके अन्य परंपरागत पेशे, मंदिरों महलों से जुडे काम आदि भी खतम हो गये हैं.
  • पब्लिक में वह पुरुषों के टायलट में जाये तो पुरुषों को आपत्ति है कि साडी पहन कर यहां क्यों आये. स्त्रियों के टायलट में जाये तो उनको आपत्ति है कि तुम औरत नहीं हो.
  • समाज में कहीं भी उनको न तो आदर मिलता है, न संवेदनशीलता दिखाई देती है.

ऐसे समाज में अपने भूखे पेट के लिये ये लोग क्या कर सकते हैं. भीख नहीं मांग सकते क्योंकि कोई हिजडा भीख मांगने बैठ जाये तो मनचले लोग उसका जीना हराम कर दे. कोई नौकरी नहीं देता. सरकार की ओर से कोई मदद नहीं मिलती, न शिक्षादीक्षा की कोई व्यवस्था है.  अत: कुल मिला कर कहा जाये तो अधिकतर हिजडों के सामने जीने का एक ही तरीका है कि वह लोगों से पैसे मांगे. इन के क्रूर मांबाप ने पैदा होते ही इनको “फेंक” कर अपनी कठिनाई से मुक्ति पा ली, लेकिन जीवन के हर दिन व्यंग, आक्षेप, कटूक्तियों द्वारा मानसिक स्तर पर मरने के लिये इनको छोड दिया.

जब एक हिजडा आकर आप से दस रुपया मांगे तो उसे इस पृष्ठभूमि में देखें. तब आप को समझ में आ जायगा कि वे भी मनुष्य हैं. उनके भी दिल है जो शायद आप के दिल से भी अधिक कोमल है. मानुषिक संवेदनशीलता मुझआप से भी अधिक है. जरा एक बार कोशिश करके देखें. जरा एक बार बिना हंसे, बिना परिहास किये, एक दस का नोट भीख के रूप में नहीं बल्कि  उन के जीवनयापन के लिये एक प्रोत्साहन के रूप में दे दें. आप को एक नया संसार दिखाई देगा. [क्रमश:] (मूल लेख सारथी चिट्ठे पर शास्त्री जी के द्वारा लिखा गया था. उनकी विशेष व्यक्तिगत अनुमति के कारण इस लेखन परंपरा को  अर्धसत्य पर पुन: प्रकाशित किया जा रहा है.)

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