हिजड़ा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
हिजड़ा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, 12 अक्टूबर 2010

किन्नर,किन्नर,किन्नर....अरे हम किन्नर नहीं लैंगिक विकलाँग हैं जिन्हें तुम हिजड़ा कहते हो

प्रेम, आदर, सहानुभूति जैसे भावों के चलते ही सही पर हमें किन्नर कह कर संबोधित करा जाता है जो कि किसी भी तरह से हमारी स्थिति की व्याख्या नहीं करता। न ही यह शब्द हमें न्याय दिला पाता है कि हम समाज में बराबरी का दर्जा पा सकें। मुझे प्रेम करने वाली मेरी बहन डॉ.दिव्या श्रीवास्तव ने भी जो अपने ब्लॉग ZEAL पर हालिया पोस्ट लिखी है उसमें हमें किन्नर ही लिखा है।
किन्नर शब्द और लोगों के बारे में विस्तार से जानने के लिये इस लिंक पर पधारें
किन्नर नहीं हैं हमलोग

मंगलवार, 25 मई 2010

प्रिय मनोज तुम हिजड़ा नहीं हो,माता-पिता और डॉक्टर से सलाह लो

मुझे अक्सर पत्र आते हैं कि कुछ नौजवान दिशाभ्रम और बदलते हुए सामाजिक परिवेश की सहमति के कारण खुद को हिजड़ा मानने लगते हैं और हमारे समुदाय में शामिल होना चाहते हैं। उन सभी भाईयों को आज बहुत दिनों बाद एक साथ उत्तर दे रही हूँ।
प्रिय भाई
प्यार
एक बात बिल्कुल साफ़ जान लो कि तुम्हें लड़कियों के कपड़े पहन कर बाहर घूमने में अच्छा लगता है तो तुम हिजड़ा हो ऐसा नहीं है। हिजड़ा यानि कि लैंगिक विकलांग होना एक दुर्भाग्य है जिसमें कि स्त्री या पुरुष जननांग का कुदरती तौर पर विकास ही न हुआ हो लेकिन आप तो खुद बता रहे हैं कि आप इक्कीस साल के लड़के हैं यानि कि आप शारीरिक तौर पर सही और स्वस्थ हैं। आप मनोरोग से ग्रस्त हैं आप यदि हार्मोन उपचार लें तो आपके दिमाग में होने वाले ये बदलाव सहज ही रुक जाएंगे और आप स्वस्थ पुरुष का जीवन जी सकेंगे। स्त्रियों के कपड़े पहनने की इच्छा या गुदा मैथुन कराने की इच्छा होना ही केवल आपको हिजड़ा नहीं बना देती, आयुर्वेद में बताये गए नपुंसकता के एक प्रकारो में से ये एक है जो कि आसानी से आप इलाज करा के सही हो सकते हैं। आपको किसी हिजड़े के सहयोग की नहीं बल्कि चिकित्सक की जरूरत है। आप इस बात को दिमाग से बिलकुल निकाल दीजिये कि आप हिजड़े हैं या आप कोई मंजू हैं बस याद रखिये कि आप मनोज हैं। अपने माता-पिता, भाई बहन और दोस्तों से भी इस विषय पर चर्चा करिये। यदि आप सचमुच मुझे बड़ी बहन का दर्ज़ा दे रहे हैं तो बहन की सलाह मानिये। हिजड़ा होने की पीड़ा मैं जानती हूँ कि लैंगिक विकलांगता किस तरह एक अभिशाप जैसा लगती रही है। आपके अच्छे स्वास्थ्य और भविष्य की हम सब कामना करते हैं। आपको लिखे इस पत्र को अर्धसत्य पर प्रकाशित करने जा रही हूं लेकिन आपकी पहचान नहीं प्रकाशित करूंगी न ही आपके फोटो प्रकाशित करूंगी। अपने माता पिता से अवश्य बात करिये ये बात फिर से कह रही हूं। आप चाहें तो हमारे बड़े भाईसाहब जो कि इस पूरे परिवार के कुटुंब-प्रमुख की हैसियत से हैं आप उनसे सम्पर्क करें उनका नाम है डॉ.रूपेश श्रीवास्तव और उनका ई मेल पता है- aayushved@gmail.com
हृदय से प्रेम सहित
आपकी बड़ी बहन
मनीषा नारायण
(पोस्ट में लिखे गये नाम काल्पनिक हैं)

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010

लैंगिक विकलांगों को सेक्स का खिलौना बनाने के बौद्धिक प्रयास





हमारे देश में समलैंगिकता को ज से उच्च न्यायालय ने अपराधबोध से मुक्त क्या कराया(भले ही उच्चतम न्यायालय में अभी भी इसके विरुद्ध अपील करी गयी है) उनकी चांदी हो गयी जो कि लैंगिक विकलांगो को सेक्स के खिलौने मानते हैं। मुंबई में लैंगिक विकलांगों के हितों के नाम पर काम करने वाले हम जैसे ही एक बंदे लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी ने काफ़ी नाम कमाया है। अस्तित्त्व नाम से एक गैर सरकारी संगठन भी चला रखा है। विदेश यात्राओं से लेकर टीवी कार्यक्रमों में दिखना इनका शगल है। जिस तरह हर समुदाय में होता है कि उनके ही स्वयंभू नेता उन्हीं का दोहन और शोषण करते हैं हमारे समुदाय में भी हो रहा है। शबनम मौसी नाम सब जानते हैं उन्होंने लैंगिक विकलांगता को राजनैतिक ताकत हासिल करने के लिये इस्तेमाल करा और लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी प्रसिद्धि और पैसा कमाने के लिये इस्तेमाल कर रहे हैं।
अभी हाल ही में मुंबई में एक सौन्दर्य प्रतियोगिता का आयोजन करा गया जिसमें कि तमाम जगहों से लैंगिक विकलांगों को बुलाया गया और लाखों रुपये का खर्च कार्यक्रम के आयोजन में दर्शाया गया। जीनत अमान और सेलिना जेटली जैसे भ्रष्टबुद्धि फिल्म अभिनेत्रियो का भी इस कार्यक्रम में सहयोग रहा। इन लोगों ने बड़े बड़े व्याख्यान दे डाले कैमरे के सामने कि जैसे ये कोई क्रान्तिकारी पहल कर चुके हों।
इन सभी से सवाल कि क्या समाज की मुख्यधारा से लैंगि विकलांगों को जोड़ने का एक यही रास्ता है? सौन्दर्य स्पर्धाओं के बाद ये कहाँ खो जाते हैं सेलिना जेटली की तरह माडलिंग या फिल्मों में आकर सम्मानपूर्वक जीवन क्यों नहीं जी पाते? क्यों नहीं लैंगिक विकलांग बच्चों के लिये आजतक लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी या शबनम मौसी ने स्कूल की मांग करी या खुद ही खोल दिया? क्यों नहीं ये आगे आकर CRY जैसी संस्थाओं का सहयोग लेकर बच्चों को पढ़ाती लिखाती हैं? क्यों नहीं इन आयोजकों ने मुंबई में ट्रेन में भीख मांगने या कमाठीपुरा में सेक्स के भूखे दरिंदों की भूख मिटा कर अपने पेट की भूख मिटा कर दर्दनाक जीवन जीने वाले मासूम लैंगिक विकलांगों को इस आयोजन की सूचना तक दी?(ये कहेंगे कि हमने तो अखबारों में सूचना दी थी तो जरा ये कुटिल बताएं कि कितने हिजड़े अखबार पढ़्ने के लायक बनाए आजतक इन लोगों ने???)
आखिरी सवाल कि इन आयोजकों ने कैसे निर्धारित करा कि सारे प्रतिभागी लैंगिक विकलां(हिजड़े) ही हैं, क्या कोई डॉक्टरी सर्टिफ़िकेट था? यदि नहीं तो लाली पाउडर लगा कर तो शाहरुख खान से लेकर आमिर खान तक सभी भाग ले सकते थे। कोई उत्तर नहीं है किसी के पास ......... इस दिशा में कोई प्रया करा जाएगा कि लैंगिक विकलांगता के चिकित्सकीय पैमाने निर्धारित हों और इस आधार पर उन्हें शिक्षा से लेकर नौकरियों में वरीयता दी जाए, आरक्षण दिया जाए। ऐसे तो अंधे भी सुंदर होते हैं तो क्या उनके अंधेपन को लेकर उन्हें अलग सा जीव मान लिया जाए और उनकी सौन्दर्य स्पर्धाएं कराई जाएं? क्यों ये विचार इन मासूमों के दिमाग में ठूँसा जा रहा है कि ये सौन्दर्य प्रतियोगिता में ही अपना टैलेंट दिखा सकते हैं ? कभी इनकी कुश्ती या दौड़ की प्रतियोगिता रखकर देखा जाए, बस इतना बताना है कि हम जैसे मनुष्य जैसे दिखने वाले प्राणी सचमुच मनुष्य ही हैं तुम्हारे ही पेट से पैदा हुए, हमें एलियन या दूसरे ग्रह से आया न समझो।

शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2010

दुनिया बनाने वाले भगवान,अल्लाह,GOD का लिंग-निर्धारण हो गया


ईश्वर की गलती हूं मैं और मेरे जैसे लोग
भड़ास परिवार से जुड़े सभी पुराने लोग जानते हैं कि मैं एक लैंगिक विकलांग(हिजड़ा) हूं लेकिन मेरी इस कमी को मेरे इस परिवार ने कभी मेरे परिचय में आड़े न आने दिया। भड़ास परिवार से दिया गया प्रेम और हमारे बड़े भाई अवतार स्वरूप डा.रूपेश श्रीवास्तव जी ने हमें हमारी परंपरागत पहचान से हट कर जो नई पहचान दी है उसके लिये यदि हम अपनी चमड़ी के जूते भी बना कर उन्हें पहना दें तो कम है। हमारे रिश्ते में इस औपचारिक बकवास की गुंजाइश नहीं है। बात ये है कि मेरे दिमाग में हमेशा से यह सवाल रहा कि दुनिया बनाने वाली शक्ति भी क्या लैंगिकता की मोहताज होगी? या फिर वह एकोSहं बहुस्यामि के विचार के अमीबा या हाइड्रा की तरह बढ़ा होगा? वह क्या है पुल्लिंग? स्त्रीलिंग?? या फिर उभयलिंगी केंचुए की तरह??? या फिर मेरी तरह नपुंसक षंढ??????? भाईसाहब से करे गए मेरे हजारों सवालों में से बस यही अनुत्तरित रहा है क्योंकि भाई मानते हैं कि ईश्वर के विषय में चर्चा करने की क्षमता उनमें नहीं है जब वो मिल कर स्वयं अपने बारे में बताएगा तब उसकी बात करेंगे। लेकिन मुझे लग रहा है कि मुझे मेरे सवाल का उत्तर सेमेटिक रेलिजन्स में मिल गया है। मुस्लिमों की मजहबी पुस्तक कुरान और ईसाइयों की धर्मपुस्तक बाइबिल में बताया गया है कि अल्लाह या परमेश्वर ने आदम यानि एडम(प्रथम मनुष्य) को अपने ही रूप में बनाया(फ़रिश्तों से आदेश देकर बनवाया) और स्पष्ट है कि आदम तो पुरुष हैं और उनकी एक पसली से प्रथम स्त्री हव्वा का निर्माण करा। कहा गया है अल्लाह या परमेश्वर प्रकाश(नूर) है। अब सवाल ये खड़ा हो गया है कि क्या ये एक रहस्य है या बहुत बड़ा झूठ कि एक तरफ़ उसे अपने जैसा यानि पुरुष लिखा है और दूसरी तरफ प्रकाश। यदि दुनिया बनाने वाला प्रकाश है तो उसे आदम को सूरज, जुगनू , ट्यूबलाइट या बल्ब की तरह का बनाना चाहिए था यदि हाड़मांस(लिंगधारी) बनाया तो ये नहीं बताना था कि in his own form........ अपनी ही सूरत में........। यदि आदम को लिंग है तो शतप्रतिशत ईश्वर को भी होना चाहिए अन्यथा ये बातें मात्र कल्पना हैं और वो भी पुरुषों की जिन्होंने सभ्यता के विकास क्रम में नर और मादा मानव की पसलियों में अंतर देख कर ये कहानी रच ली और खुद को ईश्वर की सूरत में जता दिया। ये विशुद्ध तर्क है मेहरबानी करके कोई इसे कुतर्क कह कर मुझे शान्त कराने का आग्रह न करे। यदि समुचित उत्तर है तो अवश्य शंका का निराकरण करे। यानि कि हमारे जैसे लोग उस परमात्मा की गलती हैं क्योंकि हमारे जैसे लोगों का तो कहीं जिक्र ही नहीं है कि उसने मुखन्नस(हिजड़े) भी बनाए हैं कभी। क्या सचमुच परमात्मा गलतियां करता है??????????

बुधवार, 17 दिसंबर 2008

हिंदी ब्लागरों में मनीषा नारायण ने कोहराम मचा रखा है

दीदी का लिखना बड़ा ही कड़ा रहा है हमेशा से जैसा कि मैं जानता हूं। इन बातों के पीछे कि वे इतनी प्रेम से भरी होने के बाद भी अक्सर नाराज क्यों हो जाती हैं उसका कारण उनका अतीत रहा है। जो लोग उनसे अपेक्षा करते हैं कि मनीषा! तुमने हिंदी सीख लिया अब ब्लागिंग करती हो तो अपने सारे अतीत को भूल जाओ तत्काल जिससे कि तुम कभी व्यथित रही हो। जिंदगी की रेलगाड़ी में भी सीट पर जगह बनाने के लिये धक्का-मुक्की करनी पड़ती है इन्हें सहज ही कुछ नहीं मिला कभी भी। हिंदी ब्लागरों के तो नाक-भौं सिकुड़ गये जब पता चला कि एक "हिजड़ा" तालियां बजाना छोड़ कर उन शरीफों के संग सायबर जगत में ब्लागिंग करेगा। बहुत तिरस्कार सहना पड़ा इस आभासी दुनिया में भी ,एक ब्लाग है "भड़ास" जो कि काफ़ी कुख्यात है अपनी भाषा के कारण लेकिन वह मंच अश्लील हरगिज नहीं है। उस मंच पर मैं दीदी को ले गया सद्स्यता दी उन्होंने एक उंगली से किसी तरह लिखना शुरू करा। वहां आरोप लगाया तमाम नामचीन ब्लागरों ने खुल कर कि प्रमाण दिया जाए कि मनीषा नारायण का अस्तित्त्व है भी या काल्पनिक हैं फिर हैं तो लैंगिक विकलांग हैं या नहीं.........। एक बार फिर जब वणिक सोच ने भड़ास पर कब्जा जमा लिया तो अचानक वहां से मनीषा दीदी की सदस्यता को समाप्त कर दिया गया। इसे कहते हैं उसे हाशिये से भी बेदखल कर दो जो अब तक हाशिये पर था और ये शर्त रख दो कि बिलकुल भी आवाज न करे अगर गाली दी या नाराजगी व्यक्त करी तो गंदे मान लिये जाओगे और कहा जाएगा कि यही तुम्हारी औकात है वगैरह वगैरह...।
संबंधित पोस्ट्स देखिये
http://bharhaas.blogspot.com/2008/12/blog-post_15.html
http://bharhaas.blogspot.com/2008/12/blog-post_7241.html
http://bharhaas.blogspot.com/2008/12/blog-post_6981.html
http://bharhaas.blogspot.com/2008/12/blog-post_9693.html

अब दोबारा इंतजार है उस घेराबंदी का जब तमाम ब्लागिंग गिरोह एग्रीगेटर्स पर भी हमारे जैसे लोगों को प्रतिबंधित करा दें। हम अभी से मानसिक तौर पर तैयार हैं पर किसी के आगे गिड़गिड़ाएंगे नहीं।

गुरुवार, 4 दिसंबर 2008

ब्लागिंग से बदलाव की शुरूआत हो गयी है

आज मनीषा बहन ने मुझे बातों बातों में बताया कि उन्हें एक भाई ने एक मेल करा था जिसमें उस युवा भाई ने लिखा था कि मैं चाहता हूं कि विवाह के बाद मेरा कोई बच्चा लैंगिक विकलांग पैदा हो और मैं उसे खूब लिखा पढ़ा कर डाक्टर, इन्जीनियर या वकील बनाऊं ताकि समाज के सामने एक उदाहरण रख सकूं कि हमारे ये बच्चे किसी से कम नहीं होते हैं। मेरी आंखों में इस भावना के प्रति आदर से कुछ अन्जाने से आंसू आ गये। याद आये मुझे भाई दीनबन्धु जो कि ऐसी ही सोच रखते हुए किसी लैंगिक विकलांग बच्चे को सहर्ष गोद लेना चाहते हैं। अब लग रहा है कि शिक्षा के मार्ग से ब्लागिंग तक आने से बदलाव हो रहे हैं।

बुधवार, 26 नवंबर 2008

ब्लागरों! आपका कोई लैंगिक विकलांग बच्चा हो तो उसे फेंकना मत मुझे दे देना......

आदरणीय वाचकों, आलोचकों, समीक्षकों, सहयोगियों,अभिभावकों
चूंकि मेरी धर्मपुत्री भूमिका रूपेश ने अपनी पोस्ट में लिखा है कि उसकी पोस्ट पर आयी किसी भी टिप्पणी को प्रकाशित न करा जाए इसलिये उसके विरोध के स्वर को समर्थन देता हुआ मैं भी ये कह रहा हूं कि यदि इन बच्चों को अपनी जगह बनानी है तो समाज की धारणाओं में थोड़ी नोच-खसोट और धक्का-मुक्की तो इन्हें करनी ही पड़ रही है वरना होना तो ये चाहिये कि जिस तरह महिलाओं की पत्रिकाओं को पुरुष चटकारे ले कर पढ़ते हैं और पुरुषों की पत्रिका स्त्रियां छिप कर पढ़ती हैं तो लैंगिक विकलांगता के प्रति इतना कौतूहल रखने वाले समाज को बहुत अच्छा प्रतिसाद देना चाहिये था लेकिन ऐसा हुआ नहीं। यहां ब्लागिंग में भी ढकोसलेबाज,मुखौटेधारी किस्म के लोग हैं जिन पर मुझे ही नहीं हम सबको संदेह है कि ये वही माता,पिता,भाई,बहन,चाचा,मामा,बुआ,फूफा आदि हैं जिन्होंने मेरे बच्चों को अपनी सड़ी सोच के चलते इस हाल में धकेल दिया है। यही लोग जिम्मेदार हैं जो मुंह छिपा रहे हैं अब इन बच्चों के सामने आ जाने से। हो सकता है कि अगर दुर्दैव से इनमें से किसी ब्लागर के घर कोई लैंगिक विकलांग बच्चा पैदा हो जाए तो ये उसे चोरी-छिपे मेरे घर के बाहर फेंक जाएं; इसलिये हे ब्लागरों में तुम्हारे ऐसे बच्चों को गोद में लेकर बोतल से दूध पिलाने, कंधे पर बैठा कर खेलने और उंगली पकड़ा कर चलना सिखाने के लिये तैयार हूं। हमारा स्वर तुम्हारी दुर्गंधित सोच का विरोध करने के लिये अब मुखर हो रहा है। जिन लोगों ने भूमिका रूपेश की पिछली पोस्ट पर हिजड़ा बन जाने की बात पर भी मुस्कराते हुये टिप्पणी करी है मैं उन्हें अपने पोस्ट से संलग्न करके सधन्यवाद प्रकाशित कर रहा हूं।
aapme badhiya likhne ki shakti hai...aur ye shakti har kisi me nahi hoti. ishwar ka shukriya karen ki aapka man ek lekhak ka hai. shubhkamnayen... Dileepraaj Nagpal
maine aapki saari post's dekhi. aapke shabdo mein kuchh to hai..main ho sakta hai koi tippani nahi kar saku par blog lagatar dekhta rahta hu.... संदीप शर्मा Sandeep sharma
अब देखना ये है कि आप भूमिका रूपेश जैसे बच्चों का विश्वास हासिल कर पाते हैं या नहीं वरना ऐसे बच्चे आपको ही वो भाई या बहन और माता-पिता मानते रहेंगे कि जिन्होंने उन्हें सड़को पर फेंक दिया है।

मेरी पोस्ट पर टिप्पणी करने से आप हिजड़े बन सकते हैं


जैसे-जैसे मैं लिखना तीखा करती जा रही हूं देख रही हूं कि लोग बिदक कर भाग रहे हैं। एक बड़ी साधारण सी बात कहना है कि यही पोस्ट अगर किसी लड़की की होती भले ही कितनी भी मूर्खतापूर्ण होती, बकवास होती या लटका-पटका की तुकबंदी जोड़ कर लिखनी वाली कोई कवियत्री होती तो उस पर कम से कम बीस-पच्चीस टिप्पणीकार लार टपकाते आ गये होते लेकिन हम लोगों का लिखा भी पढ़ लेने से लोगों को छूत लग जाती है, शायद लगने लगता है कि कहीं हमें भी "अर्धसत्य" पर टिप्पणी कर देने से या प्रोत्साहित कर देने से लैंगिक विकलांगता का इन्फ़ेक्शन न हो जाए और हम भी हिजड़े बन जाएं। मैं इस पोस्ट के द्वारा हम सबके धर्मपिता व गुरू डा.रूपेश श्रीवास्तव से निवेदन कर रही हूं कि अब वे कम से कम मेरी लिखी किसी भी पोस्ट पर कोई भी टिप्पणी न प्रकाशित करें। मुझे किसी की मक्कारी भरी सहानुभूति नहीं चाहिये। जब से मैंने लोगों के बनावटी मुखौटे नोचने खसोटने शुरू करे हैं हिंदी के छद्म शरीफ़ ब्लागरों में खलबली है, जवाब नहीं देते बनते इस बड़े-बड़े बक्काड़ और लिक्खाड़ लोगों से। हमारे कुनबे को हम खुद ही संवारने का माद्दा रखते हैं। मैं इस सोच से एक और फ़ायर-ब्रांड बहन को जोड़ रही हूं।

सोमवार, 24 नवंबर 2008

डा.रूपेश श्रीवास्तव सबके पिता बने.......

अब धीरे-धीरे नये बच्चे जो स्वयंभू सभ्य समाज और लैंगिक विकलांगों के समुदाय की परंपराओं के बीच थपेड़े खा रहे थे अब वे अर्धसत्य के द्वारा नयी सोच से जुड़ रहे हैं। अब एक फैसला करा है हमने कि एक और परंपरा को तोड़ेंगे और वह भी पुरजोर घोषणा करके। सारे बच्चे अपने नाम के आगे हमारे मार्गदर्शक डा.रूपेश श्रीवास्तव का नाम जोड़ेंगे यह करारा तमाचा है उन बायोलाजिकल माता-पिता की सड़ी हुई सोच के गाल पर जिन्होंने हमें परंपराओं के चलते सड़कों पर धक्के खाने के लिये छोड़ दिया था यानि कि अब हमारे भाईसाहब सबके पिता घोषित कर दिये गये हैं और भाईसाहब को इस बात पर कोई परेशानी नहीं है।

सोमवार, 10 नवंबर 2008

लैंगिक विकलांगों(हिजड़ॊं) से सीधे सवाल करिये




भूमिका ने मुखौटाधारी ब्लागरॊं की छ्द्म सहानुभूति पर जो अपने अंदाज में धिक्कारना शुरू ही करा था कि टिप्पणीकार ही अनाम, बेनाम और गुमनाम होने लगे। यदि आप इतना साहस जुटा पाएं कि हम लैंगिक विकलांगों के बारे में (जिन्हें आप शायद हिजड़ा कहना अधिक पसंद करते हैं) कुछ जानना है तो शालीन भाषा में मुझसे सवाल करें लेकिन पूरे परिचय के साथ जिसमें आपका नाम, फोन नम्बर, पता, ब्लाग का यू आर एल आदि बताएं जिससे कि पता चले कि आप वाकई गम्भीरता से कुछ ऐसा जानना चाहते हैं जो अब तक आपको पता नहीं है तो मैं आपके हर सवाल का इस चिट्ठे पर उत्तर दूंगी ये एक हिजड़े का वादा है आप मर्द और औरतों से। साथ ही एक छोटा सा विचार दे रही हूं कि जरा बिना लिंग या योनि की दुनिया में अपनी जगह की कल्पना करिये। यदि शरीर रचना संबंधी कोई सवाल होगा तो उसका उत्तर आपको हमारे मार्गदर्शक भाई डा.रूपेश श्रीवास्तव सहर्ष देंगे। आपके सवालों का मुझे इंतजार रहेगा, आप अपने सवाल मुझे मेरे ई-पते पर(manisha.hijda@gmail.com) पर भेज दीजिये।

शनिवार, 8 नवंबर 2008

मुखौटेधारी ब्लागरों को धिक्कार है,थू है उन पर....

पिछले कुछ दिनों से अर्धसत्य पर कुछ भी लिख पाना निजी कारणों से संभव नहीं हो पा रहा था। आज जब मामा जी डा.रूपेश श्रीवास्तव के घर गयी तो बच्चों के लिये काम करने वाली एक संस्था CRY के दो लोग बैठ कर उनसे पैसे जुगाड़ने के लिये तरह-तरह से समझा रहे थे और मामाजी हैं कि सुन रहे थे लेकिन जब मामा जी ने हमारे बारे में बात शुरू करी तो महानता का ताज सिर पर रख कर कट लिये। ब्लागिंग में भी ऐसे ही मुखौटेधारियों की कमी नहीं है जो बस एक दूसरे को महान-महान कह कह कर अंहकार की तुष्टि करते रह्ते हैं। जब शास्त्री जी ने सारथी पर हमारे बारे में लिखा तो टिप्पणियां करने लोग दौड़ पड़े कि हम भी उदार हैं, हम भी अर्धसत्य पढ़ते हैं, हम भी लैंगिक विकलांगो के प्रति सहानुभूति और प्रेम रखते हैं। उन मुखौटाधारियों को उस पेज पर धिक्कारने के बाद मैं आज उन लोगों के मुखौटे को अपने पन्ने पर भी धिक्कार रही हूं। हममें ऐसे किसी भी खोखली हड्डियों वाले मुखौटेधारी ब्लागर की सहानुभूति की जरूरत कहां है हम तो अपने मार्गदर्शक डा.रूपेश की दी हुई ताकत से ही नयी शुरूआत करने का साहस जुटा चुके हैं। ऐसे लोग अर्धसत्य न ही देखें तो बेहतर है क्योंकि हम तो शारीरिक लैंगिक विकलांग है,हिजड़े हैं लेकिन ऐसे लोग आत्मा के स्तर पर हिजड़े हैं, थू है थू है थू है ऐसे लोगों पर.........

शनिवार, 6 सितंबर 2008

क्या मैं आपका लिंग काट दूं?????


मैंने अपने मामाजी(डा.रूपेश श्रीवास्तव) के पास कुछ समाचार पत्रों की कटिंग्स और कुछ वीडियो क्लिपिंग्स देखी जिनके केंद्र में एक ही समाचार पर जोर था कि कुछ अपराधी किस्म के लोग अच्छे-भले पुरुषों का लिंग काट कर हिजड़ा बना कर अपनी टोली में शामिल कर लेते हैं।
अब मेरी बात को गौर से समझिये कि नुकसान पहुंचाने वाले से बदला लेना एक सहज सी इंसानी फितरत है, क्या आज तक आपने कोई समाचार देखा या पढ़ा कि किन्ही हिजड़ों ने जिस पुरुष का लिंग काटा था उसने बदला लेने की नियत से उन हिजड़ों में शामिल होकर उन हिजड़ों की हत्या कर दी हो या मारा-पीटा तक हो। क्यों????? क्या आपका लिंग मैं काट दूं तो आप मुझे जीवित छोड़ेंगे? आपका परिवार मुझे छोड़ देगा? क्या कानून मुझे माफ़ कर देगा? यदि मैं किसी द्स-बारह साल के लड़के का लिंग काट देती हूं तो क्या लिंग कटते ही उसकी याददाश्त भी गुम हो जाती है कि वह अपने माता-पिता के प्यार को भूल जाता है और उनके पास नहीं जाता बल्कि जिसने उसका लिंग काटा है उन्हीं लोगों के साथ उनके समुदाय में बड़े प्रेम से रहने लगता है और जिंदगी भर रहता है? अगर हिजड़े इतने बड़े सर्जन होते हैं जैसा कि उपन्यासकार जान इरविंग के १९९४ में प्रकाशित उपन्यास में उन्होंने लिखा है तो क्यों नहीं हिजड़े पुरुषों का लिंग काटने का झंझट करते हैं बल्कि लड़कियों की योनि की सिलाई कर दें बस मूत्रमार्ग भर छो़ड़ दें तो अधिक अच्छा विकल्प होगा, आपका क्या विचार है इस सुझाव पर? मैं ऐसे हजारों सवाल खड़े कर सकती हूं क्योंकि मैं इस बात के सत्य को जानती हूं और अब मेरी ज़हालत डा.रूपेश श्रीवास्तव द्वारा दी जा रही शिक्षा के प्रकाश से समाप्त हो रही है। सच ये भी है कि लैंगिक लक्षणों की अस्पष्टता को आधार बना कर एक समाज खुद को हजारों पीढ़ियों से जिंदा रखे है और कुछ क्रूर किस्म के खूंख्वार सफेदपोश लोग हमारे जैसे अभागे लैंगिक विकलांगों को "थर्ड सेक्स" की मान्यता दिलाने की वकालत कर रहे हैं ताकि उनकी हैवानियत भरी कुंठित यौन वरीयताएं (sexual preferences) कानूनी जामा पहना कर एक तरफ सुरक्षित रख दी जाएं। हमारे जैसे अभागे बच्चों को पहले तो पहले तो अपनी गलीज़ यौन कुंठा के लिये ऐसे लोग इस्तेमाल करते रहे और अब हमें बनाया जा रहा है "एड्स लाबी" के प्रचार का सामान। कोई तो इसे रोको..............

बुधवार, 3 सितंबर 2008

एक मैं और एक तू.....





एक विचार जो कि भीतर तक झिंझोड़ता रहता है कि सुंदरता क्या होती है और वो भी स्त्रैण सुंदरता। मैं जो दो चित्र प्रेषित कर रही हूं उन्हें जरा गौर से देखिये आपको अंतर स्पष्ट समझ में आ जाएगा कि एक व्यक्तित्त्व लाचारी, गरीबी, मजबूरी, जबरन मुस्कराने के प्रयास से भरा है और वहीं दूसरी ओर है अमीरी, आनंद, मुक्त हास्य, कुंठामुक्त। क्यों????? बस आधार है खूबसूरती , जबकि दोनो ही लैंगिक विकलांग हैं। एक गुमनाम है और दूसरा नामचीन "लक्ष्मी" जिन्हें आप सलमान खान के कार्यक्रम दस का दम से लेकर डिस्कवरी व नेशनल ज्योग्राफ़िक चैनल तक के कार्यक्रमों में देख चुके हैं। यह सब देख कर लगता है कि नाखूनों से अपने ऊपर की त्वचा और मांसपेशियों को खुरच-खुरच कर उधेड़ दूं ताकि मन इस असुंदरता की कुंठा से मुक्त हो जाए।

गुरुवार, 21 अगस्त 2008

मेरे डाक्टर मामा ने दिया रक्षा का वचन राखी के त्योहार पर....

अब तक मैं सही तरीके से ब्लागिंग करना सीख ही नहीं पायी थी ये मेरी लापरवाही थी लेकिन अब सब कर सकती हूं।

बुधवार, 9 जुलाई 2008

सेक्स वेबसाइट का अर्धसत्य को प्रस्ताव.......



आज एक बार फिर से शिद्दत से एहसास हुआ था कि मैं बाकी सामान्य लोगों से अलग हूं क्योंकि मेरे बड़े भाई साहब डा.रूपेश श्रीवास्तव ने जिस तरह मुझे बताया कि उन्हें क्या और किससे प्रस्ताव आया... हमेशा की तरह से हम भाई-बहन मिले तो मैंने देखा कि भाई कुछ उदास से महसूस हो रहे हैं लेकिन अपनी उदासी को मुझसे छिपाने की नाकामयाब कोशिश कर रहे हैं। जब मैंने बहुत पूंछा तो उन्होंने बताया कि उन्हें किसी सेक्स वेबसाइट चलाने वाले ने फोन किया था कि क्या आप अर्धसत्य को उस वेबसाइट से जोड़ना चाहेंगे? हम लोग गे-लेस्बियन सेक्शन के साथ में एक नया सेक्शन हिजड़ों के लिये शुरू करने जा रहे हैं. हमारी व्यापारिक नीति व शर्तें ये...ये और वो ...वो हैं। यह जान कर थोड़ा सा पल भर को तो मुझे भी दुःख हुआ पर ये सोच कर कि इंटरनेट पर तो इस विषय की भरमार है तो वो बस एक व्यवसायी था जिसने हमें भी अपने जैसा समझा होगा और अपनी नीति बता दी, इस पर सहजता से उसे मना कर देना चाहिये बस लेकिन हम दोनो तो क्षुब्ध हो गये। शायद अभी हम दोनो को इन कटुताओं को झेलने के लिये और अधिक मजबूत होना पड़ेगा। हम लोगों ने इस विषय को चाय की चुस्की में ग़र्क करके जो कष्ट हुआ उसे निगल लिया और फिर चल पड़े हैं अपने रास्ते पर.......... ये सोच कर कि इस तरह के लोगों के अलावा ऐसे भी लोग तो हैं जो मुझे प्रेम करते हैं ,सम्मान देते हैं,आदर से दीदी कह कर पुकारते हैं। भाई ने खुद मुझे संबल दिया है किन्तु शायद मुझे भरमाने के लिये चिंतित दिखाते हैं खुद को कि वे भी साधारण इंसान हैं।

बुधवार, 30 अप्रैल 2008

कूवगम महोत्सव

कूवगम महोत्सव के बारे में आपको बताना चाहूंगा कि यह तमिळनाडु प्रदेश के विल्लूपुरम जिले के उल्लुन्दरपेट तालुका का एक गांव है। यहां की विल्लूपुरम से दूरी लगभग तीस किलोमीटर है जिसके लिये तमाम परिवहन साधन चलते हैं । यहां हर साल चैत्र माह में कूतण्डावर मंदिर में यह महोत्सव बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। तमिळनाडु सरकार भी इस महोत्सव पर खासी तवज्जो देती है क्योंकि वह पहला ऐसा प्रदेश बन गया है जहां की सरकार ने लैंगिक विकलांग लोगों को यानि कि TG के रूप में अधिकारिक तौर पर स्वीकारा है और अब उन्हें इस पहचान पर राशन कार्ड से लेकर ड्राइविंग लाइसेंस तक दिये जाएंगे। इस बार यह महोत्सव २१ अप्रैल से शुरू हुआ, इसकी अवधि पंद्रह दिनों की रहती है। इस उत्सव में वैसे तो हर प्रान्त से लैंगिक विकलांग जन आते हैं लेकिन भाषाई समस्या के चलते मात्र दक्षिण भारतीय ही रुकते हैं। हमारी मुंबई से इस महोत्सव में भाग लेने गयीं लैंगिक विकलांग बहन रम्भा अक्का के अनुसार इसमें अनेक समलैंगिक भी शामिल होते हैं लेकिन उन्हें इस महोत्सव से कोई लेना देना नहीं होता वे बस यहां आस्था में डूबे लैंगिक विकलांग लोगों से मुफ्त में सेक्स का आनंद लेने आते हैं क्योंकि इस दौरान यहां कुछ ऐसा ही माहौल रहता है। अजीब सा माहौल रहता है भक्ति और उत्सव के रंग में रंगे लैंगिक विकलांग अपनी आस्था में मग्न रहते हैं, एड्स अवेयरनेस वाले NGO के कार्यकर्ता अपने काम में यानि कंडोम वितरण में व्यस्त रहते हैं, विदेशी पत्रकार और फोटोग्राफर्स अपने धंधे में लगे रहते हैं। इस महोत्सव के दौरान सौंदर्य प्रतियोगिता से लेकर नाच-गाने तक की प्रतियोगिता होती है, जिसमें कि गुरुओं का निर्णायक मंडल होता है; अनेक राउंड से गुजर कर किसी एक लैंगिक विकलांग को मिस कूवगम चुना जाता है और ये मानदंड उसके अधिकतम स्त्रैण होने पर ही टिके रहते हैं। इस बार सलेम की मन्त्रा को यह खिताब दिया गया है। इस महोत्सव की शुरूआत के विषय में ये लोग महाभारत काल का संदर्भ देते हैं कि जब महाभारत का युद्ध प्रारंभ होने वाला था तो परंपरा के अनुसार विजय की कामनापूर्ति के लिये किसी मानव की बलि देना होता था किन्तु जब इस कार्य के लिये कोई भी आगे न आया तो पांडवों का ही एक राजकुमार जो को अर्जुन का पुत्र था स्वेच्छा से आगे आया जो कि नागराज कौरव्य की पुत्री इरा पैदा हुआ था जिसे कई जगहों पर इरावत भी लिखा गया है लेकिन यहां तमिळनाडु में इस पात्र को अरावान के नाम से जाना जाता है ठीक वैसे ही जैसे कि अलेक्जेन्डर को हम हिन्दुस्तानियों ने सिकंदर कहा हो सकता है कि खुद अलेक्जेन्डर को भी न पता हो कि उसे सिकंदर भी कहा जाता है इसलिये यह बहस का मुद्दा नहीं है कि यह उद्धरण किस ग्रन्थ में है। इस राजकुमार ने एक शर्त रखी कि वह बलि चढ़ने से पहले विवाह करना चाहता है लेकिन ऐसे आदमी से भला कौन विवाह करता जोकि अगले ही दिन बलिवेदी पर जा रहा हो तो ऐसे में हमेशा की तरह भगवान नटवर ही काम आए और मोहिनी नामक सुन्दर कन्या का वेश धर कर उसके साथ ब्याह कर बैठे और अगले ही दिन विधवा हो गये और उस लीला से मुक्त हो गये। इसी राजकुमार अरावान के नाम पर आज भी यहां तमिळ भाषा में इन्हें "हिजड़ा" न कह कर अरावानी कहा जाता है। इस महोत्सव में ये लोग विधिवत राजकुमार अरावान की मूर्ति से दुल्हन की तरह सज-संवर कर विवाह करते हैं,खूब गाना-बजाना होता है और अगले दिन ये लोग अपने मंगलसूत्र उतार कर,सफेद साड़ी पहन कर ,चूड़ियां तोड़ कर शोक करते हुए रोते हैं और इस रुदन को ओप्परी कहा जाता है जिसमें कि खास अंदाज में बातें बोलते हुए लयबद्ध तरीके से सामूहिक रुदन करा जाता है।
इस बार इस महोत्सव में अनुमानतः पांच हजार से अधिक लोग शामिल हुए थे। इस दौरान यहां के क्षेत्रीय लोग भी इस मेले से लाभान्वित होते हैं और बनाव-श्रंगार,खाने-पीने का सामान बेचते हैं, नाच-गाने के लिये वाद्ययंत्र बेचते हैं,सरकार इसे एक तीर्थ स्थल की तरह से महत्त्व देने लगी है। इस पूरे महोत्सव में एक विचित्र बात देखने में जो आती है वो ये कि इसमें सबसे कम लैंगिक विकलांग केरल से आते हैं और सर्वाधिक आन्ध्रप्रदेश से। पिछले दो सालों की तरह से इस बार भी कुछ पढ़े-लिखे लैंगिक विकलांग लोगों ने अपने संवैधानिक अधिकारों पर भाषण भी दिये और अपने आपको EUNUCH(बधिया करा हुआ पुरुष) न मान कर UNIQUE (अद्वितीय) बताया और कहा कि हम तो भगवान अर्धनारीश्वर के मानव रूप को साकार करते हैं यही है हमारी अद्वितीयता।
इन सारी जानकारियों का श्रेय जाता है हमारी रम्भा अक्का और मनीषा दीदी को जोकि पुरानी मान्यताओं को नये नजरिये से देखने का बूता रखती हैं, गुरूशक्तियां उन्हें और बल प्रदान करें कि वे आगे बढ़ कर हम सबके साथ सम्मान से खड़ी हो सकें और अपने लिये रोजी-रोटी का साधन जुटा सकें।

गुरुवार, 20 मार्च 2008

ध्रतराष्ट्र बने संपादक , दुःशासन हुई पत्रकारिता और सभा में नंगी करी गयी तुम सबकी लैंगिक विकलांग बहनें

गुस्सा और दुःख इतना ज्यादा है कि लग रहा है खूब जोर से चिल्लाऊं । जब तक भड़ास से नहीं जुड़ी थी यकीन मानिए कि शर्म क्या होती है पता ही नहीं था लेकिन डा.रूपेश श्रीवास्तव ने मुझे अपनी बहन बना कर मेरी जिन्दगी में इतना ज्यादा बदलाव ला दिया है कि जब मेरे और मेरी ही जैसी दूसरी लैंगिक विकलांग बहनों के सारे कपड़े उतरवा कर परेड करवाई गई तो एक पल को लगा कि लोकल ट्रेन से कट कर जान दे दूं लेकिन अगले ही पल मेरी आंखों के सामने मेरे डा.भाई का चेहरा आ गया जो हमेशा मुझे हिम्मत दिलाते रहते हैं कि दीदी एक दिन ऐसा जरूर आएगा कि ये लोग जो आपको इंसान नही समझते अपने करे पर शर्मिंदा होंगे ; फिर एक-एक करके मेरे सामने मेरे भाई पंडित हरे प्रकाश,यशवंत दादा,मनीष भाई,चंद्रभूषण भाई सामने आने लगे और मैं फिर पूरी ताकत से अन्याय का सामना करने के लिये खड़ी हो गयी हूं । मुंबई से प्रकाशित होने वाले मराठी दैनिक वार्ताहर और उर्दू दैनिक इन्कलाब ने एक खबर छापी जिसकी हैडिंग उन्होंने महज सनसनी फैलाने के लिये ऐसी रखी कि लोग उस खबर को चटखारे लेकर पढ़ें ,जरा आप सब खबर के हैडिंग पर ध्यान दीजिये "हिजड़े द्वारा लोकल ट्रेन के लेडीज़ कम्पार्टमेंट में महिला से बलात्कार की कोशिश" । बस फिर क्या था बड़ी-बड़ी वारदातें हो जाने के बाद भी कुम्भकर्ण की तरह से सोने वाली मुंबई पुलिस का लैंगिक विकलांग लोगों पर कहर टूट पड़ा । हम सफर करें तो ट्रेन के किस डिब्बे में अगर पुरुषों के साथ जाएं तो सुअर किस्म के लोग जिस्म रगड़ने का बहाना देखते हैं ,कुत्सित यौन मानसिकता के नीच पुरुष भीड़ का बहाना कर के सीने और नितंबों पर हाथ लगाते हैं ,हमारे हाथॊं को पकड़्ते हैं पर हमें तो शर्म नहीं आनी चाहिए और न ही हमें गुस्सा आना चाहिये इन कमीनों की हरकत पर क्योंकि शर्म तो नारी का गहना होती है और हम तो न नारी हैं न नर । महिलाओं के डिब्बे में जाओ तो कुछ सुरक्षित महसूस होता था लेकिन इस सभ्य समाज के मुख्यधारा की पत्रकारिता के इस हथियार ने हमें यहां से उखाड़ कर बेदखल कर दिया है । ध्यान दीजिये कि अगर कोई अपराधी किस्म का इंसान बुर्का पहन कर ऐसी नीच हरकत करता तो क्या ये पत्रकार और संपादक महोदय ये हैडिंग बनाते कि एक मुसलमान महिला ने दूसरी महिला के साथ बलात्कार करने की कोशिश करी ,नहीं ,ऐसा तो वे हरगिज़ नही करते क्योंकि इस बात से सनसनी नहीं फैल पाती लेकिन एक हिजड़े के बारे में ऐसा लिखा तो सबका ध्यान जाएगा । अरे कोई तो इन गधे की औलादों को समझाए कि अगर हिजड़ा है तो बलात्कार क्या पैर के अंगूठे से करेगा ,वो तो महज एक अपराधी था जो हिजड़े का वेश बना कर आया था । संपादक की नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि वो ये देखे कि ऐसी खबर का क्या परिणाम होगा । अब मुझे समझ में आ रहा है कि देश में जातीय दंगों को फैलाने में मीडिया का क्या रोल रहता है ,अगर किसी ने मौलाना का वेश बना कर किसी को गोली मार दी तो ये पहले मरने वाले को देखेंगे कि क्या वो हिंदू था और फिर खबर बनाएंगे कि मुसलमान ने हिंदू की हत्या कर दी फिर भले पूरे देश में जातीय दंगों की आग भड़क कर सब स्वाहा हो जाए । हिजड़े को निशाना बना कर खबर छाप दी और चालू हो गया पुलिस का धंधा ,सब को नंगा करके परेड कराई गई ताकि देखा जा सके किसके जननांग कितने विकसित हैं या क्या है हिजड़े की कमर के नीचे और टांगो के बीच में ? इन कमीने पत्रकारों को अगर इतनी ही चिंता है तो क्यों नहीं अपनी ताकत इस्तेमाल करके जेंडर आईडेंटीफ़िकेशन का कानून बनाने के लिये सरकार पर दबाव बनाते ? कम से कम हमें भी तो ये पता चल जाएगा कि हम किस डिब्बे में यात्रा करें । किसी पत्रकार ने रेलवे पुलिस से यह नहीं पूछा कि जब हर महिला डिब्बे में एक रेलवे पुलिस का सुरक्षाकर्मी तैनात रहता है तो जब वो अपराधी बलात्कार की कोशिश कर रहा था तो क्या वो पुलिस वाला तमाशा देख रहा था या अपनी अम्मा के साथ सोने गया था , क्या यात्रियों की सुरक्षा की रेलवे की कोई जिम्मेदारी नहीं है ? मैने नीच पुलिस वालों के हाथॊं को अपने जिस्म पर रेंगते हुए महसूस किया ,ये सुअर किसी गंदी दिमागी बीमारी के मरीज जान पड़े मुझे सारे के सारे । क्या मेरी इस अस्तित्व की लड़ाई में मेरे भड़ासी भाई-बहनें साथ हैं ये सवाल आप सब से है ,नाराज मत होइएगा कि ये क्या होली के रंग में तेज़ाब मिला रही है लेकिन बात ही ऐसी है । मेरे भाई डा.रूपेश अभी आधी रात को भी मेरे साथ हैं कि कहीं शर्मिन्दगी से मैं कुछ गलत निर्णय न ले लूं इस लिये जबरदस्ती मुझे पकड़ कर अपने घर ले आए हैं । होली मनाइए लेकिन अपनी इस बदकिस्मत बहन के बारे में भी सोचियेगा ।

शुक्रवार, 14 मार्च 2008

मुझ पर कहानी लिखना चाहते हैं ,दिल से शुक्रिया...

आदर के योग्य हैं आप जो हम जैसे तिरस्कार व बहिष्कार करे गये लोगों के बारे में कुछ भला सोचते हैं । आपने कहा है कि आप मेरे ऊपर कहानी लिखना चाहते हैं तो मेरे लिये यह बुरा मानने की नहीं बल्कि अपने भाग्य को सराहने की बात है । लेकिन घूम फिर कर दुर्दैव है कि वहीं ले आता है , आपको मेरा मोबाइल नंबर चाहिये । आपसे एक बात निवेदन करना चाहती हूं कि जैसा कि मैंने अपने पिछले पोस्ट्स में लिखा है कि दुनिया बस स्त्री-पुरूष में विभाजित है इसमें हमारा स्थान तो है ही नहीं ,हम तो बस एक बोझ की तरह हैं । आप जानते हैं कि मोबाइल के लिये फोटो आई.डी. अनिवार्य होता है और उसके लिये मैं पैनकार्ड , ड्राइविंग लायसेन्स या पासपोर्ट जैसी चीज कहां से लेकर आऊं ? हमें तो सरकार को राशन कार्ड देने में भी हिचकिचाती है यानि सरकार मानती है कि हमें भोजन तक की आवश्यकता नहीं है । इसलिये आपसे प्रार्थना है कि अगर कोई विशेष बात न हो कि मोबाइल नंबर अत्यावश्यक हो तो आप मेरे गुरूदेव , मार्गदर्शक , भाई और पिता समान डा.रूपेश श्रीवास्तव का नंबर ले लीजिये (09224496555) उनके मोबाइल से जैसा आप चाहेंगे तो मुझे संदेश भी मिल जाएगा और यदि आप चाहें तो बात कर सकते हैं पर समय निर्धारित करने के बाद ही । बातें कुछ ज्यादा ही भारी हो गयी हैं इस लिये जरा सा मज़ाक करने की इजाजत दीजिये ; अगर आप में साहस है तो एक (लैंगिक विकलांग) हिजड़े के लिये हिजड़ा आईडेन्टिटी बता कर मोबाइल खरीद कर गिफ़्ट कर दीजिये । मेरी इस बात का तनिक भी बुरा मत मानियेगा क्योंकि यही वह जगह है जहां मैं अनदेखे मित्रों से सचमुच मजाक करके हंस लेती हूं वरना तो जिन्दगी में इतना अधूरापन है कि बताने को शब्द ही नहीं हैं । एक बार फिर से मेरी ओर ध्यान देने के लिये आपका और उस अनदेखे ईश्वर का धन्यवाद । मुझे आपके उत्तर की प्रतीक्षा रहेगी ........
नमस्ते

शनिवार, 1 मार्च 2008

क्योंकि मैं हिजड़ा हूं..........


ए अम्मा,ओ बापू,दीदी और भैया
आपका ही मुन्ना या बबली था
पशु नहीं जन्मा था परिवार में
आपके ही दिल का चुभता सा टुकड़ा हूं
क्योंकि मैं हिजड़ा हूं..........
कोख की धरती पर आपने ही रोपा था
शुक्र और रज से उपजे इस बिरवे को
नौ माह जीवन सत्व चूसा तुमसे माई
फलता भी पर कटी गर्भनाल,जड़ से उखड़ा हूं
क्योंकि मैं हिजड़ा हूं..........
लज्जा का विषय क्यों हूं अम्मा मेरी?
अंधा,बहरा या मनोरोगी तो नहीं था मैं
सारे स्वीकार हैं परिवार समाज में सहज
मैं ही बस ममतामय गोद से बिछुड़ा हूं
क्योंकि मैं हिजड़ा हूं..........
सबके लिए मानव अधिकार हैं दुनिया में
जाति,धर्म,भाषा,क्षेत्र के पंख लिए आप
उड़ते हैं सब कानून के आसमान पर
फिर मैं ही क्यों पंखहीन बेड़ी में जकड़ा हूं
क्योंकि मैं हिजड़ा हूं..........
प्यार है दुलार है सुखी सब संसार है
चाचा,मामा,मौसा जैसे ढेरों रिश्ते हैं
ममता,स्नेह,अनुराग और आसक्ति पर
मैं जैसे एक थोपा हुआ झगड़ा हूं
क्योंकि मैं हिजड़ा हूं..........
दूध से नहाए सब उजले चरित्रवान
साफ स्वच्छ ,निर्लिप्त हर कलंक से
हर सांस पाप कर कर भी सुधरे हैं
ठुकराया दुरदुराया बस मैं ही बिगड़ा हूं
क्योंकि मैं हिजड़ा हूं..........
स्टीफ़न हाकिंग पर गर्व है सबको
चल बोल नहीं सकता,साइंटिस्ट है और मैं?
सभ्य समाज के राजसी वस्त्रों पर
इन्साननुमा दिखने वाला एक चिथड़ा हूं
क्योंकि मैं हिजड़ा हूं..........
लोग मिले समाज बना पीढियां बढ़ चलीं
मैं घाट का पत्थर ठहरा प्रवाहहीन पददलित
बस्तियां बस गईं जनसंख्या विस्फोट हुआ
आप सब आबाद हैं बस मैं ही एक उजड़ा हूं
क्योंकि मैं हिजड़ा हूं..........
अर्धनारीश्वर भी भगवान का रूप मान्य है
हाथी बंदर बैल सब देवतुल्य पूज्य हैं
पेड़ पौधे पत्थर नदी नाले कीड़े तक भी ;
मैं तो मानव होकर भी सबसे पिछड़ा हूं
क्योंकि मैं हिजड़ा हूं..........
 

© 2009 Fresh Template. Powered by भड़ास.

आयुषवेद by डॉ.रूपेश श्रीवास्तव