
जब हम किसी काम को "बस यूं ही" अपनी खुशी के लिये शुरू करते हैं और वह काम बढ़ते-बढ़ते एक महाअभियान का रूप धारण कर ले तब आपको उसमें होने वाली छोटी सी सफलता भी उसी अनुपात में विशालता लिये हुए लगती है। कुछ समय पहले तक शायद मेरी बहन मनीषा नारायण की मुस्कराहट मुझे इतना आह्लादित न करती रही हो लेकिन आज अब मैं इस बात को देख रहा हूं कि मुझे उनकी हर मुस्कान, हर हंसी बहुत बड़ा सुख दे जाती है; ठीक ऐसा ही होता है जब भूमिका या दिव्या जैसे मेरे प्यारे बच्चे किसी बात पर मुझसे चुटकी लेकर बात करते हैं। आदरणीय बाबू जी शास्त्री श्री जे.सी.फिलिप ने जो पुस्तकें भेजी हैं वह एक नया उत्साह लेकर आयी हैं विशेष तौर पर मेरे लिये। अब मैं दीदी को दिल खोल कर हंसते देखता हूं तो लगता है कि जीवन सफ़ल सा होता प्रतीत हो रहा है।
1 टिप्पणी:
मोहम्मद उमर जी के बारे में जान कर खुशी हुई. आप लोग हिम्मत के साथ आगे बढते रहें, जम कर लिखते रहें, बौद्धिक सामग्री पढते रहें, बस आग चल कर और लोग भी इस रास्ते पर मदद के लिये आ जायेंगे.
पुस्तकों का पूरा पुलिंदा रखा है मेरी बगल में जो आने वाले हफ्तों में वहां पहुंच जायेंगे.
सस्नेह -- शास्त्री
एक टिप्पणी भेजें