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बुधवार, 4 मार्च 2009

लैंगिक विकलांग बच्चे अपने परिवारों को वापिस लौटेंगे एक प्रयोग के तहत....

अर्धसत्य परिवार ने अपने निरंतर प्रयासों के चलते तथा अपने बुजुर्ग मार्गदर्शकों के आशीर्वाद के सहारे से एक अभिनव प्रयोग करा है जिसके कारण कुछ समय से ब्लाग पर लिखने का समय नहीं निकाला जा सका। इस प्रयोग के अंतर्गत जो लैंगिक विकलांग बच्चे परिस्थितियों वश बरसों बरस से अपने परिवारों से अलग रह रहे थे उन्हें विश्वास में लेकर उनके परिवार की जानकारी हासिल करके बच्चों के माता-पिता व भाई बहन आदि से संपर्क कर संवाद स्थापित करना और उन्हें समझाने का प्रयास करना। इस प्रयोग के अंतर्गत जो बच्चे दस से पंद्रह सालों से अपने परिवारों से नहीं मिले थे एक प्रयोग के चलते वापस अपने घर लौटे हैं जिनमें कि कीर्ति(केतना), भूमिका, देवी, दिव्या और स्वयं अर्धसत्य परिवार की ज्येष्ठ संचालिका मनीषा नारायण हैं अब देखना है कि क्या होता है कौन स्वीकारा जाता है और कौन वापिस आ जाता है लेकिन हम सब इन बच्चों को इतना साहस दे पाए कि वे जैसे हैं उसी हाल में वापस जा सकें इस शर्त के साथ कि उन्हें यथावत स्वीकारा जाए बिना किसी शर्म या सामाजिक लोकलाज के....। ईश्वर करे के हमें इस मुहिम में कामयाबी मिले। बाबूजी श्री जे.सी.फिलिप कहते हैं कि सामाजिक बदलाव अत्यंत धीमी गति से होते हैं , जिस गति से शुरू हो कम से कम शुरू तो हुआ ये प्रयास; बस आप सबका आशीर्वाद बना रहे।

बुधवार, 4 फ़रवरी 2009

मेरी बहन की खुशी.......

अर्धसत्य परिवार के मार्गदर्शकों में से एक श्री मोहम्मद उमर रफ़ाई व मनीषा नारायण दिल खोल कर ठहाके लगाते हुए
जब हम किसी काम को "बस यूं ही" अपनी खुशी के लिये शुरू करते हैं और वह काम बढ़ते-बढ़ते एक महाअभियान का रूप धारण कर ले तब आपको उसमें होने वाली छोटी सी सफलता भी उसी अनुपात में विशालता लिये हुए लगती है। कुछ समय पहले तक शायद मेरी बहन मनीषा नारायण की मुस्कराहट मुझे इतना आह्लादित न करती रही हो लेकिन आज अब मैं इस बात को देख रहा हूं कि मुझे उनकी हर मुस्कान, हर हंसी बहुत बड़ा सुख दे जाती है; ठीक ऐसा ही होता है जब भूमिका या दिव्या जैसे मेरे प्यारे बच्चे किसी बात पर मुझसे चुटकी लेकर बात करते हैं। आदरणीय बाबू जी शास्त्री श्री जे.सी.फिलिप ने जो पुस्तकें भेजी हैं वह एक नया उत्साह लेकर आयी हैं विशेष तौर पर मेरे लिये। अब मैं दीदी को दिल खोल कर हंसते देखता हूं तो लगता है कि जीवन सफ़ल सा होता प्रतीत हो रहा है।

शुक्रवार, 9 जनवरी 2009

डा.रूपेश के नए बच्चे करेंगे पुराने सवाल

क्या सारी समस्याएं समाप्त हो गयी हैं? हरगिज नहीं...लेकिन अब वो समस्याएं हमें अब हमारी एकजुटता और प्यार के आगे बौनी नजर आने लगी हैं। कुछ समय पहले तक राशन कार्ड या ड्राइविंग लाइसेन्स जैसी चीजें लगता था कि हमारे अस्तित्व को सिद्ध करने के लिए ये बहुत जरूरी हैं लेकिन अब से डा.रूपेश जैसे भाई का साथ और बाबूजी(श्री जे.सी.फिलिप) का मार्गदर्शन हमें ये बता रहा है कि हम जल्द ही एक स्वीकार्य पहचान के साथ समाज में समान संवैधानिक अधिकारों के साथ खड़े होंगे। डा.रूपेश ने सभी लैंगिक विकलांग बच्चों को पिता की हैसियत से अपना नाम देकर सभी बच्चों के भीतर एक नई आत्मा फूंक दी है, सारे बच्चे अलग-अलग की बोर्ड लेकर दिन में अक्सर मांग कर आने के बाद अभ्यास करते मिलते हैं; जल्द ही सारे सरकारी विभागों में इन बच्चों के द्वारा भेजी गई एप्लीकेशन्स दिखेंगी......। सूचना प्राप्ति के अधिकार का प्रयोग करते हुए सरकार से जाना जाएगा कि हमारे जैसे लैंगिक विकलांगों के लिए क्या सरकार ने कुछ विचार करा है अथवा नहीं? हमारी कानूनी स्थिति के क्या संदर्भ है? हमारी नागरिकता की पुष्टि कैसे करी जाती है? जो लैंगिक विकलांग चुनाव में अपना नामांकन भरते हैं या जो वोट देते हैं वो किस परिचय से ऐसा कर पाते हैं? इत्यादि...इत्यादि...।

रविवार, 30 नवंबर 2008

बौद्धिक आतंकवाद यानि एड्स नामक अस्तित्त्वहीन बीमारी की अवधारणा



दुनिया भर में फैलाए गये एक अलग किस्म के आतंकवाद को आज जश्न के रूप में मनाया जा रहा है। ये बौद्धिक आतंकवाद उस आतंकवाद से कहीं ज्यादा खतरनाक है जो कि बम और बारूद से फैलाया गया है। कुछ बरस पहले इसे एड्स नामक बीमारी की अवधारणा के रूप में शुरू करा गया था और अब ये पूरे संसार में जड़ें जमा चुका है। इसलिये इसी खुशी को विश्व एड्स दिवस के रूप में मनाया जाता है। जबकि यह बीमारी वैसी ही है कि अंधेरे में भूत रहता है। इस विषय में डा.रूपेश श्रीवास्तव ने तो इस पूरे आतंकवाद से अकेले ही टकराने की ठानी है और यदि कोई भी इस विषय में अधिक जानना चाहे तो उनके लिखे शोधपत्र की प्रति मंगवा कर पढ़ ले। एड्स एक अस्तित्त्वहीन बीमारी है जिसे बड़े ही योजनाबद्ध तरीके से जमाया गया है।

बुधवार, 26 नवंबर 2008

मेरी पोस्ट पर टिप्पणी करने से आप हिजड़े बन सकते हैं


जैसे-जैसे मैं लिखना तीखा करती जा रही हूं देख रही हूं कि लोग बिदक कर भाग रहे हैं। एक बड़ी साधारण सी बात कहना है कि यही पोस्ट अगर किसी लड़की की होती भले ही कितनी भी मूर्खतापूर्ण होती, बकवास होती या लटका-पटका की तुकबंदी जोड़ कर लिखनी वाली कोई कवियत्री होती तो उस पर कम से कम बीस-पच्चीस टिप्पणीकार लार टपकाते आ गये होते लेकिन हम लोगों का लिखा भी पढ़ लेने से लोगों को छूत लग जाती है, शायद लगने लगता है कि कहीं हमें भी "अर्धसत्य" पर टिप्पणी कर देने से या प्रोत्साहित कर देने से लैंगिक विकलांगता का इन्फ़ेक्शन न हो जाए और हम भी हिजड़े बन जाएं। मैं इस पोस्ट के द्वारा हम सबके धर्मपिता व गुरू डा.रूपेश श्रीवास्तव से निवेदन कर रही हूं कि अब वे कम से कम मेरी लिखी किसी भी पोस्ट पर कोई भी टिप्पणी न प्रकाशित करें। मुझे किसी की मक्कारी भरी सहानुभूति नहीं चाहिये। जब से मैंने लोगों के बनावटी मुखौटे नोचने खसोटने शुरू करे हैं हिंदी के छद्म शरीफ़ ब्लागरों में खलबली है, जवाब नहीं देते बनते इस बड़े-बड़े बक्काड़ और लिक्खाड़ लोगों से। हमारे कुनबे को हम खुद ही संवारने का माद्दा रखते हैं। मैं इस सोच से एक और फ़ायर-ब्रांड बहन को जोड़ रही हूं।

सोमवार, 24 नवंबर 2008

डा.रूपेश श्रीवास्तव सबके पिता बने.......

अब धीरे-धीरे नये बच्चे जो स्वयंभू सभ्य समाज और लैंगिक विकलांगों के समुदाय की परंपराओं के बीच थपेड़े खा रहे थे अब वे अर्धसत्य के द्वारा नयी सोच से जुड़ रहे हैं। अब एक फैसला करा है हमने कि एक और परंपरा को तोड़ेंगे और वह भी पुरजोर घोषणा करके। सारे बच्चे अपने नाम के आगे हमारे मार्गदर्शक डा.रूपेश श्रीवास्तव का नाम जोड़ेंगे यह करारा तमाचा है उन बायोलाजिकल माता-पिता की सड़ी हुई सोच के गाल पर जिन्होंने हमें परंपराओं के चलते सड़कों पर धक्के खाने के लिये छोड़ दिया था यानि कि अब हमारे भाईसाहब सबके पिता घोषित कर दिये गये हैं और भाईसाहब को इस बात पर कोई परेशानी नहीं है।

शनिवार, 8 नवंबर 2008

मुखौटेधारी ब्लागरों को धिक्कार है,थू है उन पर....

पिछले कुछ दिनों से अर्धसत्य पर कुछ भी लिख पाना निजी कारणों से संभव नहीं हो पा रहा था। आज जब मामा जी डा.रूपेश श्रीवास्तव के घर गयी तो बच्चों के लिये काम करने वाली एक संस्था CRY के दो लोग बैठ कर उनसे पैसे जुगाड़ने के लिये तरह-तरह से समझा रहे थे और मामाजी हैं कि सुन रहे थे लेकिन जब मामा जी ने हमारे बारे में बात शुरू करी तो महानता का ताज सिर पर रख कर कट लिये। ब्लागिंग में भी ऐसे ही मुखौटेधारियों की कमी नहीं है जो बस एक दूसरे को महान-महान कह कह कर अंहकार की तुष्टि करते रह्ते हैं। जब शास्त्री जी ने सारथी पर हमारे बारे में लिखा तो टिप्पणियां करने लोग दौड़ पड़े कि हम भी उदार हैं, हम भी अर्धसत्य पढ़ते हैं, हम भी लैंगिक विकलांगो के प्रति सहानुभूति और प्रेम रखते हैं। उन मुखौटाधारियों को उस पेज पर धिक्कारने के बाद मैं आज उन लोगों के मुखौटे को अपने पन्ने पर भी धिक्कार रही हूं। हममें ऐसे किसी भी खोखली हड्डियों वाले मुखौटेधारी ब्लागर की सहानुभूति की जरूरत कहां है हम तो अपने मार्गदर्शक डा.रूपेश की दी हुई ताकत से ही नयी शुरूआत करने का साहस जुटा चुके हैं। ऐसे लोग अर्धसत्य न ही देखें तो बेहतर है क्योंकि हम तो शारीरिक लैंगिक विकलांग है,हिजड़े हैं लेकिन ऐसे लोग आत्मा के स्तर पर हिजड़े हैं, थू है थू है थू है ऐसे लोगों पर.........

शनिवार, 6 सितंबर 2008

क्या मैं आपका लिंग काट दूं?????


मैंने अपने मामाजी(डा.रूपेश श्रीवास्तव) के पास कुछ समाचार पत्रों की कटिंग्स और कुछ वीडियो क्लिपिंग्स देखी जिनके केंद्र में एक ही समाचार पर जोर था कि कुछ अपराधी किस्म के लोग अच्छे-भले पुरुषों का लिंग काट कर हिजड़ा बना कर अपनी टोली में शामिल कर लेते हैं।
अब मेरी बात को गौर से समझिये कि नुकसान पहुंचाने वाले से बदला लेना एक सहज सी इंसानी फितरत है, क्या आज तक आपने कोई समाचार देखा या पढ़ा कि किन्ही हिजड़ों ने जिस पुरुष का लिंग काटा था उसने बदला लेने की नियत से उन हिजड़ों में शामिल होकर उन हिजड़ों की हत्या कर दी हो या मारा-पीटा तक हो। क्यों????? क्या आपका लिंग मैं काट दूं तो आप मुझे जीवित छोड़ेंगे? आपका परिवार मुझे छोड़ देगा? क्या कानून मुझे माफ़ कर देगा? यदि मैं किसी द्स-बारह साल के लड़के का लिंग काट देती हूं तो क्या लिंग कटते ही उसकी याददाश्त भी गुम हो जाती है कि वह अपने माता-पिता के प्यार को भूल जाता है और उनके पास नहीं जाता बल्कि जिसने उसका लिंग काटा है उन्हीं लोगों के साथ उनके समुदाय में बड़े प्रेम से रहने लगता है और जिंदगी भर रहता है? अगर हिजड़े इतने बड़े सर्जन होते हैं जैसा कि उपन्यासकार जान इरविंग के १९९४ में प्रकाशित उपन्यास में उन्होंने लिखा है तो क्यों नहीं हिजड़े पुरुषों का लिंग काटने का झंझट करते हैं बल्कि लड़कियों की योनि की सिलाई कर दें बस मूत्रमार्ग भर छो़ड़ दें तो अधिक अच्छा विकल्प होगा, आपका क्या विचार है इस सुझाव पर? मैं ऐसे हजारों सवाल खड़े कर सकती हूं क्योंकि मैं इस बात के सत्य को जानती हूं और अब मेरी ज़हालत डा.रूपेश श्रीवास्तव द्वारा दी जा रही शिक्षा के प्रकाश से समाप्त हो रही है। सच ये भी है कि लैंगिक लक्षणों की अस्पष्टता को आधार बना कर एक समाज खुद को हजारों पीढ़ियों से जिंदा रखे है और कुछ क्रूर किस्म के खूंख्वार सफेदपोश लोग हमारे जैसे अभागे लैंगिक विकलांगों को "थर्ड सेक्स" की मान्यता दिलाने की वकालत कर रहे हैं ताकि उनकी हैवानियत भरी कुंठित यौन वरीयताएं (sexual preferences) कानूनी जामा पहना कर एक तरफ सुरक्षित रख दी जाएं। हमारे जैसे अभागे बच्चों को पहले तो पहले तो अपनी गलीज़ यौन कुंठा के लिये ऐसे लोग इस्तेमाल करते रहे और अब हमें बनाया जा रहा है "एड्स लाबी" के प्रचार का सामान। कोई तो इसे रोको..............

सोमवार, 1 सितंबर 2008

लैंगिक विकलांग व्यक्ति में कुछ अतिमानवीय अथवा दैवीय शक्ति होती है?


क्या आपको भी ऐसा लगता है कि लैंगिक विकलांग व्यक्ति में कुछ अतिमानवीय अथवा दैवीय शक्ति होती है? मुझे अक्सर जो अनुभव होते हैं वह सामान्य तो किसी कोने से नहीं होते लेकिन इन बातों को मैने अब समझ लिया है कि परिवर्तन की लहर में जैसे जैसे जोर आयेगा लोगों का व्यवहार बदलेगा लेकिन मुझे अजीब लगता है जब अत्यंत उच्च शिक्षित लोग भी मेरे जैसे अधूरे इंसान को देख कर ऐसे श्रद्धापूर्वक व्यवहार करने लगते हैं बच्चों के सिर पर हाथ रखने का आग्रह करने लगते हैं जैसे मैं कोई दिव्य शक्ति से संपन्न हूं। मैं रजनीश भाई और अपने गुरुदेव(मामाजी) डा.रूपेश श्रीवास्तव से आज यह पूछ रही हूं कि क्या उन्हें मुझमें कुछ दिव्यता दिखती है? क्या मैं साधारण इंसानों की तरह नहीं हूं? जिन्हें रजनीश भाई से आशीर्वाद लेना चाहिये वो मुझसे आशीर्वाद लेना चाहते हैं क्या विचित्र लोग हैं?

गुरुवार, 21 अगस्त 2008

निर्बल के बलराम और रक्षा का वचन

आज मुझे मेरे सारे भड़ासी भाईयों और यशवंत दादा के साथ रजनीश की बहुत याद आयी है वैसे तो ये सब मेरे दिल में हैं....

मेरे डाक्टर मामा ने दिया रक्षा का वचन राखी के त्योहार पर....

अब तक मैं सही तरीके से ब्लागिंग करना सीख ही नहीं पायी थी ये मेरी लापरवाही थी लेकिन अब सब कर सकती हूं।

रविवार, 6 अप्रैल 2008

एक पत्रकार का सवाल,"मनीषा जी, आपकी सेक्सुअल लाइफ़ कैसी है?"

आज की बात आप सब लोगों से बांटना जरूरी मानती हूं क्योंकि मैं देख रही हूं कि मेरे गुरुदेव, मार्गदर्शक और मेरे बड़े भाई डा.रूपेश श्रीवास्तव ने मुझे जो इंटरनेट के माध्यम से अपनी बातों को दुनिया के सामने रखने का रास्ता दिखाया-सिखाया है वह कारगर ही नहीं बल्कि अत्यंत तीव्र प्रभावी है। लोगों की नजर मुझ पर अब अलग नजरिये से पड़ रही है मैं इस बात को महसूस कर पा रही हूं। ब्लागिंग शुरूआत में मुझे समझ ही नहीं आयी कि भला मैं कुछ भी लिखूं उसे लोग क्यों देखेंगे लेकिन सुखद आश्चर्य तो तब होता है जब देश से बाहर रहने वाले लोगों का ध्यान हमारी बात पर जाता है, सच कहूं तो मुझे हमेशा इंतजार रहता है हमारे इटली में बसे हमदर्द श्री सुनील दीपक जी की करुणा और प्रेम से भरी टिप्पणी का। आज ब्लागिंग के चलते एक समाचार पत्र के जर्नलिस्ट महोदय मेरे इंटरव्यू के लिये आये। हर तरह के अनुभवों के लिये मेरे भाई ने मुझे ताकत दे रखी है कि कहीं मैं किसी बात पर ओवर-रिएक्ट न कर जाऊं। पत्रकार महोदय ने सवालों का सिलसिला शुरू किया और फिर घूम-फिर कर एक जगह वो आ गये जो कि शायद उनके इंटरव्यू का सेन्ट्रल आइडिया रहा होगा। उन्होंने निहायत ही शरीफ़ाना अंदाज जताते हुए मुझसे पूछा, "मनीषा जी, आपकी सेक्सुअल लाइफ़ कैसी है?" मैं तो जैसे जमीन पर आ गिरी कि ये आदमी पत्रकार है या पागल ? जो मुझसे सेक्सुअल लाइफ़ के बारे में सवाल कर रहा है या फिर वाकई उसे कुछ पता नहीं है कि एक लैंगिक विकलांग क्या होता है? कहीं मैं ही तो मूर्ख नहीं हूं? लेकिन अपनी गुरूशक्ति को स्मरण करते हुए मैंने खुद को संयमित किया और उसे बताया कि भला मेरी क्या सेक्सुअल लाइफ़ है अगर होती तो शायद मैं किसी की पत्नी होती या पति होती या होता लेकिन उस शख्स ने फिर अपनी बात दोहराई कि मैंने सुना है कि कुछ लैंगिक विकलांग लोग एनल-सेक्स से अपनी सेक्सुअल रिक्वायरमेंट्स पूरी करते हैं। मेरे लिये अब असहनीय हो चला था इस लिये मैंने नो कमेंट्स कह कर बात समाप्त कर दी। लेकिन इंटरव्यू कब का हो गया और मैंने उससे हाथ जोड़ कर विनती कर दी कि मेहरबानी करके इसे प्रकाशित न करें अपनी रोजी-रोटी के लिये किसी और प्रसिद्धि के प्यासे व्यक्ति का इंटरव्यू छाप दें। उसने मेरी बात को भलमनसाहत से मान लिया पता नहीं क्या सोच कर। अब अपनो से अपनी बात कहना चाहती हूं कि सेक्सुअल लाइफ़ हमारी तो होती ही नहीं है उस आदमी की होती है जिसके शारीरिक संबंध किसी लैंगिक विकलांग के साथ होते होंगे क्योंकि ईश्वर ने मनुष्य के शरीर में अलग-अलग आनंद की अनुभूति के लिये अलग-अलग अंग बनाए हैं लेकिन जब हमारे जैसे लोग एक अंग विशेष से दुर्भाग्यवश वंचित हैं तो हम उस आनंद की अनुभूति कैसे कर सकते हैं? जैसे किसी को जीभ न हो तो उससे कहा जये कि आप कान से स्वाद का अनुभव करके बताइए कि अमुक पदार्थ का क्या स्वाद है? ईश्वर ने जिस प्रकार जीभ के अगले हिस्से पर स्वाद के लिये कुछ छोटे-छोटे दानेनुमा रचनाएं स्वाद के लिये बनाई हैं जिन्हें भाई ने बताया कि आयुर्वेद में स्वाद कलिकाएं कहते हैं ठीक वैसे ही यौन आनंद के लिये स्त्री की योनि और पुरुष के लिंग पर विशेष हिस्सों में इस अनुभूति के लिये स्थान है लेकिन जब हमारे जैसे लैंगिक विकलांग लोग यौनांगों से ही अपाहिज हैं तो फिर हमारे लिये क्या सेक्स और क्या सेक्स का अनुभव? मेरी नजरॊं में जिन लोगों के लिये एनल-सेक्स भी एक उपाय है वो भी लैंगिक विकलांग लोगों के साथ संबंध बनाने का तो वे मनोरोगी हैं और उन्हें इलाज की जरूरत है। भाई बताते हैं कि जब कभी कोई विशेष परिस्थिति रहती है तो मरीज के जिस्म में एक असामान्य तरीके से उसे जीवित रखने के लिये भोजन पहुंचाया जाता है जिसमें लैट्रिन करने के अंग से लिक्विड डाइट दी जाती है जिसे एनस-फ़ीडिंग कहते हैं लेकिन यह तरीका सामान्य नहीं है और मरीज के स्वस्थ होते ही वह मुंह से खाना शुरू कर देता है। मुझे एनल-सेक्स भी ठीक वैसा ही जान पड़ता है। अरे, लिंग या योनि तो बस कार्य का उपकरण हैं आनंद की अनुभूति तो मस्तिष्क में होती है लेकिन जब वह अंग ही हमें ईश्वर ने नहीं दिया तो हम आनंद की अनुभूति कैसे करेंगे ? हां, जो साथ में है वो जरूर उस अनुभूति को प्राप्त कर लेगा। बहुत संभव है कि इस पोस्ट में प्रसंगवश आप लोगों को कदाचित अश्लीलता प्रतीत हो इसके लिये मैं आप सबसे माफ़ चाहती हूं साथ ही यदि आपको ये लगे कि मैं अपने भाई की संगति में कुछ ज्यादा ही विद्वता झाड़ने लगी हूं तो मेरे लिये ये बात प्रसन्नता की होगी कि चलो भाई की संगति का असर अब आप लोगों को भी दिखने लगा।

गुरुवार, 20 मार्च 2008

ध्रतराष्ट्र बने संपादक , दुःशासन हुई पत्रकारिता और सभा में नंगी करी गयी तुम सबकी लैंगिक विकलांग बहनें

गुस्सा और दुःख इतना ज्यादा है कि लग रहा है खूब जोर से चिल्लाऊं । जब तक भड़ास से नहीं जुड़ी थी यकीन मानिए कि शर्म क्या होती है पता ही नहीं था लेकिन डा.रूपेश श्रीवास्तव ने मुझे अपनी बहन बना कर मेरी जिन्दगी में इतना ज्यादा बदलाव ला दिया है कि जब मेरे और मेरी ही जैसी दूसरी लैंगिक विकलांग बहनों के सारे कपड़े उतरवा कर परेड करवाई गई तो एक पल को लगा कि लोकल ट्रेन से कट कर जान दे दूं लेकिन अगले ही पल मेरी आंखों के सामने मेरे डा.भाई का चेहरा आ गया जो हमेशा मुझे हिम्मत दिलाते रहते हैं कि दीदी एक दिन ऐसा जरूर आएगा कि ये लोग जो आपको इंसान नही समझते अपने करे पर शर्मिंदा होंगे ; फिर एक-एक करके मेरे सामने मेरे भाई पंडित हरे प्रकाश,यशवंत दादा,मनीष भाई,चंद्रभूषण भाई सामने आने लगे और मैं फिर पूरी ताकत से अन्याय का सामना करने के लिये खड़ी हो गयी हूं । मुंबई से प्रकाशित होने वाले मराठी दैनिक वार्ताहर और उर्दू दैनिक इन्कलाब ने एक खबर छापी जिसकी हैडिंग उन्होंने महज सनसनी फैलाने के लिये ऐसी रखी कि लोग उस खबर को चटखारे लेकर पढ़ें ,जरा आप सब खबर के हैडिंग पर ध्यान दीजिये "हिजड़े द्वारा लोकल ट्रेन के लेडीज़ कम्पार्टमेंट में महिला से बलात्कार की कोशिश" । बस फिर क्या था बड़ी-बड़ी वारदातें हो जाने के बाद भी कुम्भकर्ण की तरह से सोने वाली मुंबई पुलिस का लैंगिक विकलांग लोगों पर कहर टूट पड़ा । हम सफर करें तो ट्रेन के किस डिब्बे में अगर पुरुषों के साथ जाएं तो सुअर किस्म के लोग जिस्म रगड़ने का बहाना देखते हैं ,कुत्सित यौन मानसिकता के नीच पुरुष भीड़ का बहाना कर के सीने और नितंबों पर हाथ लगाते हैं ,हमारे हाथॊं को पकड़्ते हैं पर हमें तो शर्म नहीं आनी चाहिए और न ही हमें गुस्सा आना चाहिये इन कमीनों की हरकत पर क्योंकि शर्म तो नारी का गहना होती है और हम तो न नारी हैं न नर । महिलाओं के डिब्बे में जाओ तो कुछ सुरक्षित महसूस होता था लेकिन इस सभ्य समाज के मुख्यधारा की पत्रकारिता के इस हथियार ने हमें यहां से उखाड़ कर बेदखल कर दिया है । ध्यान दीजिये कि अगर कोई अपराधी किस्म का इंसान बुर्का पहन कर ऐसी नीच हरकत करता तो क्या ये पत्रकार और संपादक महोदय ये हैडिंग बनाते कि एक मुसलमान महिला ने दूसरी महिला के साथ बलात्कार करने की कोशिश करी ,नहीं ,ऐसा तो वे हरगिज़ नही करते क्योंकि इस बात से सनसनी नहीं फैल पाती लेकिन एक हिजड़े के बारे में ऐसा लिखा तो सबका ध्यान जाएगा । अरे कोई तो इन गधे की औलादों को समझाए कि अगर हिजड़ा है तो बलात्कार क्या पैर के अंगूठे से करेगा ,वो तो महज एक अपराधी था जो हिजड़े का वेश बना कर आया था । संपादक की नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि वो ये देखे कि ऐसी खबर का क्या परिणाम होगा । अब मुझे समझ में आ रहा है कि देश में जातीय दंगों को फैलाने में मीडिया का क्या रोल रहता है ,अगर किसी ने मौलाना का वेश बना कर किसी को गोली मार दी तो ये पहले मरने वाले को देखेंगे कि क्या वो हिंदू था और फिर खबर बनाएंगे कि मुसलमान ने हिंदू की हत्या कर दी फिर भले पूरे देश में जातीय दंगों की आग भड़क कर सब स्वाहा हो जाए । हिजड़े को निशाना बना कर खबर छाप दी और चालू हो गया पुलिस का धंधा ,सब को नंगा करके परेड कराई गई ताकि देखा जा सके किसके जननांग कितने विकसित हैं या क्या है हिजड़े की कमर के नीचे और टांगो के बीच में ? इन कमीने पत्रकारों को अगर इतनी ही चिंता है तो क्यों नहीं अपनी ताकत इस्तेमाल करके जेंडर आईडेंटीफ़िकेशन का कानून बनाने के लिये सरकार पर दबाव बनाते ? कम से कम हमें भी तो ये पता चल जाएगा कि हम किस डिब्बे में यात्रा करें । किसी पत्रकार ने रेलवे पुलिस से यह नहीं पूछा कि जब हर महिला डिब्बे में एक रेलवे पुलिस का सुरक्षाकर्मी तैनात रहता है तो जब वो अपराधी बलात्कार की कोशिश कर रहा था तो क्या वो पुलिस वाला तमाशा देख रहा था या अपनी अम्मा के साथ सोने गया था , क्या यात्रियों की सुरक्षा की रेलवे की कोई जिम्मेदारी नहीं है ? मैने नीच पुलिस वालों के हाथॊं को अपने जिस्म पर रेंगते हुए महसूस किया ,ये सुअर किसी गंदी दिमागी बीमारी के मरीज जान पड़े मुझे सारे के सारे । क्या मेरी इस अस्तित्व की लड़ाई में मेरे भड़ासी भाई-बहनें साथ हैं ये सवाल आप सब से है ,नाराज मत होइएगा कि ये क्या होली के रंग में तेज़ाब मिला रही है लेकिन बात ही ऐसी है । मेरे भाई डा.रूपेश अभी आधी रात को भी मेरे साथ हैं कि कहीं शर्मिन्दगी से मैं कुछ गलत निर्णय न ले लूं इस लिये जबरदस्ती मुझे पकड़ कर अपने घर ले आए हैं । होली मनाइए लेकिन अपनी इस बदकिस्मत बहन के बारे में भी सोचियेगा ।

शुक्रवार, 14 मार्च 2008

हिंजड़ा होने की मानसिक व्यथा की अभिव्यक्ति पर प्रश्नचिह्न

आदरणीय सुनील दीपक जी के कमेंट्स को देखकर लगने लगा है कि मैं देश की मानवों द्वारा बनाई सीमाओं से पार निकल आई हूं और अब मानवता की सीमा के भीतर मेरे दर्द को देखने वाले लोग आगे आ रहे हैं । मेरे गुरुदेव और मार्गदर्शक पूज्यनीय डा.रूपेश श्रीवास्तव जी की ये पंक्तियां आपको अजीब लगीं "अंधा,बहरा या मनोरोगी तो नहीं था मैं" , दरअसल जिस सच की यह अभिव्यक्ति है वह काव्यात्मक होने या तुकान्त होने के कारण आपको कविता प्रतीत हुई लेकिन यही सत्य है कि मैंने एक लैंगिक विकलांग होकर भी इन सबसे खुद को अधिक सक्षम किन्तु अधिक शोषित पाया है हमें जीवन यापन के लिये भीख मांगनी पड़ती है ,गंदा काम करना पड़ता है क्योंकि लोग हमें नौकरी देने में हिचकिचाते हैं जबकि विकलांगों का तो नौकरियों में आरक्षित कोटा है ,हां मनोरोगी बच्चों के ऊपर यह बात लागू नहीं होती दुर्भाग्य से ;हम कुछ लोग मिल कर डा.साहब के मार्गदर्शन में भविष्य में ऐसे बच्चों के लिये बड़ा सा घर बनाने की योजना रखते हैं जिसमें हम सब मिल कर मां होने का एहसास कर पाएंगे और बच्चों को भी कुछ बेहतर दे सकेंगे । किन्तु यदि आपकी कोमल भावनाओं को इन पंक्तियों से ठेस पहुंची है तो मैं हम सब की तरफ से क्षमाप्रार्थी हूं । ऐसे ही प्रेम और अनुराग बनाए रखिए इससे हमें बल मिलता है और साथ ही आपका सहृदय मार्गदर्शन भी अपेक्षित है ।Sunil Deepak ने कहा…
कविता सुंदर है और हिंजड़ा होने की मानसिक व्यथा को अच्छी तरह व्यक्त करती है. लेकिन इन पंक्तियों को देख कर थोड़ा अजीब लगाः "अंधा,बहरा या मनोरोगी तो नहीं था मैं"अंधा हो या बहरा या मनोरोगी या कुष्ठरोगी या लैंगिक विकलाँग, सभी को समाज हाशिये से बाहर करता है, सभि का शोषण करता है, सभी के साथ अन्याय होता है. हमारे आसपास खड़ी यह दीवारें मिल कर ही टूट सकती हैं, अगर हम लोग आपस में ही एक दूसरे को नीचा ऊँचा देखेंगे तो बँटे रहेंगे, कमज़ोर रहेगें, और दीवारें न तोड़ पायेंगे.सुनील
March 14, 2008 1:35 PM
आपकी टिप्पणी और मेरे उत्तर को एक पोस्ट के रूप में डाल रही हूं विश्वास है कि आप अन्यथा न लेंगे ।
नमस्ते

मुझ पर कहानी लिखना चाहते हैं ,दिल से शुक्रिया...

आदर के योग्य हैं आप जो हम जैसे तिरस्कार व बहिष्कार करे गये लोगों के बारे में कुछ भला सोचते हैं । आपने कहा है कि आप मेरे ऊपर कहानी लिखना चाहते हैं तो मेरे लिये यह बुरा मानने की नहीं बल्कि अपने भाग्य को सराहने की बात है । लेकिन घूम फिर कर दुर्दैव है कि वहीं ले आता है , आपको मेरा मोबाइल नंबर चाहिये । आपसे एक बात निवेदन करना चाहती हूं कि जैसा कि मैंने अपने पिछले पोस्ट्स में लिखा है कि दुनिया बस स्त्री-पुरूष में विभाजित है इसमें हमारा स्थान तो है ही नहीं ,हम तो बस एक बोझ की तरह हैं । आप जानते हैं कि मोबाइल के लिये फोटो आई.डी. अनिवार्य होता है और उसके लिये मैं पैनकार्ड , ड्राइविंग लायसेन्स या पासपोर्ट जैसी चीज कहां से लेकर आऊं ? हमें तो सरकार को राशन कार्ड देने में भी हिचकिचाती है यानि सरकार मानती है कि हमें भोजन तक की आवश्यकता नहीं है । इसलिये आपसे प्रार्थना है कि अगर कोई विशेष बात न हो कि मोबाइल नंबर अत्यावश्यक हो तो आप मेरे गुरूदेव , मार्गदर्शक , भाई और पिता समान डा.रूपेश श्रीवास्तव का नंबर ले लीजिये (09224496555) उनके मोबाइल से जैसा आप चाहेंगे तो मुझे संदेश भी मिल जाएगा और यदि आप चाहें तो बात कर सकते हैं पर समय निर्धारित करने के बाद ही । बातें कुछ ज्यादा ही भारी हो गयी हैं इस लिये जरा सा मज़ाक करने की इजाजत दीजिये ; अगर आप में साहस है तो एक (लैंगिक विकलांग) हिजड़े के लिये हिजड़ा आईडेन्टिटी बता कर मोबाइल खरीद कर गिफ़्ट कर दीजिये । मेरी इस बात का तनिक भी बुरा मत मानियेगा क्योंकि यही वह जगह है जहां मैं अनदेखे मित्रों से सचमुच मजाक करके हंस लेती हूं वरना तो जिन्दगी में इतना अधूरापन है कि बताने को शब्द ही नहीं हैं । एक बार फिर से मेरी ओर ध्यान देने के लिये आपका और उस अनदेखे ईश्वर का धन्यवाद । मुझे आपके उत्तर की प्रतीक्षा रहेगी ........
नमस्ते
 

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आयुषवेद by डॉ.रूपेश श्रीवास्तव