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रविवार, 25 जनवरी 2009
स्वास्थ्य और तालियां बजाना
आज गणतंत्र दिवस मनाया जा रहा है तो रात भर से हमारी बस्ती में लोग गड्ढ़ा खोदना, लोहे का पाइप लगाना उसमें राष्ट्र ध्वज बांधना और फूल-झंडियां-मिठाई ना जाने क्या क्या......। वहीं जब इन इंतजामों में लगे उत्साही युवकों और स्थानीय नेताओं को देखते हुए सुबह हो गयी रोज की तरह से नजदीक ही बड़ी इमारतों में रहने वाले करी तीस-चालीस बुजुर्ग एकत्र होकर हंसने का अभ्यास करने लगे। कहते हैं कि इसके पीछे सांइटिफ़िक कारण रहते हैं कि हंसी चाहे झूठी हो या सच्ची लाभकारी रहती है। आज इन बुजुर्गों ने एक नया अभ्यास शुरू करा और वो था जोर-जोर से विभिन्न लय पर तालियां पीटना......। जब मैंने साहस करके अभ्यास कराने वाले दादाजी से पूछा तो उन्होंने बताया कि बेटा ताली बजाने से हाथ के एक्यूप्रेशर प्वाइंट्स सक्रिय बने रहते हैं और शरीर व मन का स्वास्थ्य उत्तम बना रहता है। मेरी कमाठीपुरा(मुंबई ही नहीं एशिया का सबसे बड़ा रेडलाइट एरिया) में रहकर देह व्यवसाय करने वाली एक बहन ने मुझसे तुरंत पूछा कि मनीषा ! क्या मैं भी तालियां बजाया करूं दवाएं लेने के साथ ही? वो एच.आई.वी. पाजिटिव है, मेरे पास उसकी बात का उत्तर नहीं है । कितनी तालियां बजाएं हम स्वतंत्रता दिवस से गणतंत्र दिवस तक तालियां ही तो पीटते रहते हैं हम सब......... लेकिन मन है कि स्वस्थ होने के लिये तालियां छोड़ना चाहता है। हम कभी तालियां नहीं बजाना चाहते चाहे कोई भी कारण क्यों न हो।
मंगलवार, 27 मई 2008
सपने अंकुरित होने लगे हैं
मैं समझ नहीं पा रही हूं कि मेरे दिल दिमाग में जो तेज सी विचारों कि आंधी चल रही है उसे शब्दों में कैसे लिखूं। मैं कल तक अपने आपको अपने अधूरेपन के लिये खुद को कोसती थी कि कब मौत आयेगी और इस नामुराद शरीर से मुक्त हो सकूंगी। लेकिनब मुझे जब से मुझे मेरे भाई मिले हैं मेरी तो दुनिया ही बदल गई है। हिजड़ा होने का लेबल उतर रहा है ,इस बात का एहसास हो रहा है कि हम तो बस एक प्रकार की विकलांगता के शिकार हैं जो कि किसी भी तरह से कमी नहीं है। तीन दिन पहले जब भाई ने मुझसे कहा कि कोई पत्रकार मुझसे बात करना चाहती है तो मैंने साफ़ मना कर दिया था कि मैं किसी पत्रकार से बात नही करना चाहती हूं क्योंकि इससे पहले मेरा अनुभव बहुत गन्दा रहा जिसे मैंने लिखा भी था । भाई ने बहुत समझाया कि सब लोग एक जैसे तो होते नहीं हैं तो फिर सब पत्रकार एक जैसे क्यों समझती हो? लेकिन वंदना बहन ने भी मेरे बारे में जो कहा उससे मैं इमोशनल हो गई बात करते करते और रोने लगी तो भाई ने बीच में आकर बात को सम्हाला। सच तो ये है कि मैं अपना अतीत भूलना चाहती हूं। दूसरि बात कि जब कोई ये कहता है कि मैंने ब्लागिंग करके बड़ा काम कर दिया तो ऐसा लगता है कि वो मुझे एहसास करा रहा है कि मैं सचमुच मे इस लायक नहीं हूं ये ऐसा मानते हैं वरना ऐसा क्यो बोलते ? क्या ब्लागिंग करना या कम्प्युटर सीखना ऐसा काम है जिसे आसमान से टपकने वालेलोग ही कर पाते है और मैने कर दिया तो चमत्कार हो गया। अब मेरे भीतर एक अजीब सी बात आ रही है जिससे मुझे अडचन हो रही है और खुशी भी हो रही है। पहले मै बड़े मजे से लोगो के आगे हाथ फैला कर एक दो रुपया मांग लेती थी लेकिन अब लगता है कि कुछ गलत हो रहा है मैं इस काम के लिये नहीं हूं। ताली बजाते ही सपना शुरु हो जाता है कि मैं एक बड़े मंच पर मालाएं पहना कर सम्मानित करी जा रही हूं। मैंने स्कूल खोला है जिधर सब लोग मेरे जिसे पढ़ रहे हैं कोई भीख नहीं मागने जा रहा और न ही हमे कोई पुलिस वाला सता रहा है। मै आफ़िस मे बैठ कर भाई के साथ प्लान कर रही हूं कि अब आगे क्या करना है लेकिन अगले ही पल लोकल में चढने वाली भीड का धक्का सपना तोड देता है,फिर मुस्कराते हुए भीख मांगना शुरु कर देती हूं, ये सपना खुली आंखो से देखते हुए कि बस जल्दी ही ये परेशानियां खतम हो जाएंगी। मै और भाई मिल कर सबको पढना सिखाएंगे और भाई बीमार लोगो को दवा दे रहे होंगे साथ मे मै नर्स बन कर खड़ी रहूंगी। ऐसे ही न जाने कितने सपने अंकुरित हो रहे हैं न जाने कब फल लगेगे इन पौधों में? जब मेरे सपनो के पौधों में फल लगने लगेगे तब मेरे मम्मी पापा मुझे टीवी पर देख कर गर्व कर सकेंगे शरमाएगे नहीं।
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