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शनिवार, 14 जून 2008

वंदना बहन ने माना कि मैं किन्नर,यक्ष या गन्धर्व नहीं बल्कि इंसान हूं.......




आज मैंने वंदना बहन जी को दिये साक्षात्कार को उनकी साप्ताहिक पत्रिका "इंडिया न्यूज"(१४ जून-२० जून २००८) के अंक में छपे रूप में देखा और उस आलेख को पढ़ा तो मुझे वाकई यकीन हो चला कि मेरे भाई डा.रूपेश सही कहते हैं कि सभी पत्रकार एक जैसे नहीं होते। इसमें से वंदना बहन ने सिद्ध किया कि जिस तरह एक पत्रकार मेरी भावनाओं को आहत कर सकता है उसी तरह वंदना बहन की तरह के पत्रकार इन दुखों का मरहम भी अपनी लेखनी से लगा सकते हैं; अब पता चल रहा है कि इस काली स्याही के कितने रंग हैं और जहां एक ओर ये मुंह पर छिड़क कर मुंह काला और दाग़दार कर देती है वहीं दूसरी ओर जले हुए जख्म पर लगा देने से शीतलता प्रदान करके घाव को शीघ्र ही भर कर ठीक भी कर देती है। सच तो ये है कि मैं उस लेख को करीब सौ बार पढ़ चुकी हूं लेकिन यकीन कर पाना भी एक सपने जैसा ही लग रहा है कि कहीं ये भी एक सपना न हो जो किसी का धक्का लगने या ’अबे ओए छक्के.......’ की आवाज से टूट जाएगा। वंदना बहन जैसे लोग जो हमें सहज ही इंसान मानते हैं बिना किसी हिचकिचाहट के तो अब खुद पर यकीन हो चला है कि मैं किन्नर या यक्ष, गन्धर्व, नाग या देवी-देवता जैसी कुछ नहीं हूं बल्कि मेरे भाई की तरह सामान्य इंसान हूं। मैं एक बात पुरजोर रखना चाहती हूं कि "थर्ड सेक्स" जैसी अस्तित्त्वहीन बात को लोग ना जाने किस स्वार्थवश सच सिद्ध करने पर तुले हैं। मैंने वंदना बहन को देखा नहीं है पर पूरा भरोसा है कि वे दिल से तो मेरे भाई डा.रूपेश का ही नारी संस्करण हैं। उनसे एक विनती कर रही हूं कि कभी मुंबई आएं तो अवश्य मिलें ताकि उन्हें जोर से सीने से लगा कर प्यार कर सकूं और धन्यवाद की औपचारिकता करने की बजाय उन्हें अपने हाथ से बना खाना खिला सकूं। अब मैं कह सकती हूं कि मेरे लैंगिक विकलांग समाज के इतर मेरी दो बहनें और हैं जिनमें बड़ी हैं श्रीमती मुनव्वर सुल्ताना जो कि उर्दू स्कूल में शिक्षिका हैं और दूसरी वंदना भदौरिया जो कि एक ईमानदार पत्रकार हैं, जिनके ऊपर भाई की बात सही लागू होती है कि " पतनात त्रायते इति पत्रकारः" यानि कि जो पतन से बचाए वह ही पत्रकार है। ईश्वर से प्रार्थना है कि मेरी वंदना बहन इसी तरह से लोगों के कांटो भरे मार्ग को प्रशस्त करती रहें लेकिन उनके हाथ फूलों से भरे रहें.................

मंगलवार, 27 मई 2008

सपने अंकुरित होने लगे हैं

मैं समझ नहीं पा रही हूं कि मेरे दिल दिमाग में जो तेज सी विचारों कि आंधी चल रही है उसे शब्दों में कैसे लिखूं। मैं कल तक अपने आपको अपने अधूरेपन के लिये खुद को कोसती थी कि कब मौत आयेगी और इस नामुराद शरीर से मुक्त हो सकूंगी। लेकिनब मुझे जब से मुझे मेरे भाई मिले हैं मेरी तो दुनिया ही बदल गई है। हिजड़ा होने का लेबल उतर रहा है ,इस बात का एहसास हो रहा है कि हम तो बस एक प्रकार की विकलांगता के शिकार हैं जो कि किसी भी तरह से कमी नहीं है। तीन दिन पहले जब भाई ने मुझसे कहा कि कोई पत्रकार मुझसे बात करना चाहती है तो मैंने साफ़ मना कर दिया था कि मैं किसी पत्रकार से बात नही करना चाहती हूं क्योंकि इससे पहले मेरा अनुभव बहुत गन्दा रहा जिसे मैंने लिखा भी था । भाई ने बहुत समझाया कि सब लोग एक जैसे तो होते नहीं हैं तो फिर सब पत्रकार एक जैसे क्यों समझती हो? लेकिन वंदना बहन ने भी मेरे बारे में जो कहा उससे मैं इमोशनल हो गई बात करते करते और रोने लगी तो भाई ने बीच में आकर बात को सम्हाला। सच तो ये है कि मैं अपना अतीत भूलना चाहती हूं। दूसरि बात कि जब कोई ये कहता है कि मैंने ब्लागिंग करके बड़ा काम कर दिया तो ऐसा लगता है कि वो मुझे एहसास करा रहा है कि मैं सचमुच मे इस लायक नहीं हूं ये ऐसा मानते हैं वरना ऐसा क्यो बोलते ? क्या ब्लागिंग करना या कम्प्युटर सीखना ऐसा काम है जिसे आसमान से टपकने वालेलोग ही कर पाते है और मैने कर दिया तो चमत्कार हो गया। अब मेरे भीतर एक अजीब सी बात आ रही है जिससे मुझे अडचन हो रही है और खुशी भी हो रही है। पहले मै बड़े मजे से लोगो के आगे हाथ फैला कर एक दो रुपया मांग लेती थी लेकिन अब लगता है कि कुछ गलत हो रहा है मैं इस काम के लिये नहीं हूं। ताली बजाते ही सपना शुरु हो जाता है कि मैं एक बड़े मंच पर मालाएं पहना कर सम्मानित करी जा रही हूं। मैंने स्कूल खोला है जिधर सब लोग मेरे जिसे पढ़ रहे हैं कोई भीख नहीं मागने जा रहा और न ही हमे कोई पुलिस वाला सता रहा है। मै आफ़िस मे बैठ कर भाई के साथ प्लान कर रही हूं कि अब आगे क्या करना है लेकिन अगले ही पल लोकल में चढने वाली भीड का धक्का सपना तोड देता है,फिर मुस्कराते हुए भीख मांगना शुरु कर देती हूं, ये सपना खुली आंखो से देखते हुए कि बस जल्दी ही ये परेशानियां खतम हो जाएंगी। मै और भाई मिल कर सबको पढना सिखाएंगे और भाई बीमार लोगो को दवा दे रहे होंगे साथ मे मै नर्स बन कर खड़ी रहूंगी। ऐसे ही न जाने कितने सपने अंकुरित हो रहे हैं न जाने कब फल लगेगे इन पौधों में? जब मेरे सपनो के पौधों में फल लगने लगेगे तब मेरे मम्मी पापा मुझे टीवी पर देख कर गर्व कर सकेंगे शरमाएगे नहीं।

गुरुवार, 20 मार्च 2008

ध्रतराष्ट्र बने संपादक , दुःशासन हुई पत्रकारिता और सभा में नंगी करी गयी तुम सबकी लैंगिक विकलांग बहनें

गुस्सा और दुःख इतना ज्यादा है कि लग रहा है खूब जोर से चिल्लाऊं । जब तक भड़ास से नहीं जुड़ी थी यकीन मानिए कि शर्म क्या होती है पता ही नहीं था लेकिन डा.रूपेश श्रीवास्तव ने मुझे अपनी बहन बना कर मेरी जिन्दगी में इतना ज्यादा बदलाव ला दिया है कि जब मेरे और मेरी ही जैसी दूसरी लैंगिक विकलांग बहनों के सारे कपड़े उतरवा कर परेड करवाई गई तो एक पल को लगा कि लोकल ट्रेन से कट कर जान दे दूं लेकिन अगले ही पल मेरी आंखों के सामने मेरे डा.भाई का चेहरा आ गया जो हमेशा मुझे हिम्मत दिलाते रहते हैं कि दीदी एक दिन ऐसा जरूर आएगा कि ये लोग जो आपको इंसान नही समझते अपने करे पर शर्मिंदा होंगे ; फिर एक-एक करके मेरे सामने मेरे भाई पंडित हरे प्रकाश,यशवंत दादा,मनीष भाई,चंद्रभूषण भाई सामने आने लगे और मैं फिर पूरी ताकत से अन्याय का सामना करने के लिये खड़ी हो गयी हूं । मुंबई से प्रकाशित होने वाले मराठी दैनिक वार्ताहर और उर्दू दैनिक इन्कलाब ने एक खबर छापी जिसकी हैडिंग उन्होंने महज सनसनी फैलाने के लिये ऐसी रखी कि लोग उस खबर को चटखारे लेकर पढ़ें ,जरा आप सब खबर के हैडिंग पर ध्यान दीजिये "हिजड़े द्वारा लोकल ट्रेन के लेडीज़ कम्पार्टमेंट में महिला से बलात्कार की कोशिश" । बस फिर क्या था बड़ी-बड़ी वारदातें हो जाने के बाद भी कुम्भकर्ण की तरह से सोने वाली मुंबई पुलिस का लैंगिक विकलांग लोगों पर कहर टूट पड़ा । हम सफर करें तो ट्रेन के किस डिब्बे में अगर पुरुषों के साथ जाएं तो सुअर किस्म के लोग जिस्म रगड़ने का बहाना देखते हैं ,कुत्सित यौन मानसिकता के नीच पुरुष भीड़ का बहाना कर के सीने और नितंबों पर हाथ लगाते हैं ,हमारे हाथॊं को पकड़्ते हैं पर हमें तो शर्म नहीं आनी चाहिए और न ही हमें गुस्सा आना चाहिये इन कमीनों की हरकत पर क्योंकि शर्म तो नारी का गहना होती है और हम तो न नारी हैं न नर । महिलाओं के डिब्बे में जाओ तो कुछ सुरक्षित महसूस होता था लेकिन इस सभ्य समाज के मुख्यधारा की पत्रकारिता के इस हथियार ने हमें यहां से उखाड़ कर बेदखल कर दिया है । ध्यान दीजिये कि अगर कोई अपराधी किस्म का इंसान बुर्का पहन कर ऐसी नीच हरकत करता तो क्या ये पत्रकार और संपादक महोदय ये हैडिंग बनाते कि एक मुसलमान महिला ने दूसरी महिला के साथ बलात्कार करने की कोशिश करी ,नहीं ,ऐसा तो वे हरगिज़ नही करते क्योंकि इस बात से सनसनी नहीं फैल पाती लेकिन एक हिजड़े के बारे में ऐसा लिखा तो सबका ध्यान जाएगा । अरे कोई तो इन गधे की औलादों को समझाए कि अगर हिजड़ा है तो बलात्कार क्या पैर के अंगूठे से करेगा ,वो तो महज एक अपराधी था जो हिजड़े का वेश बना कर आया था । संपादक की नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि वो ये देखे कि ऐसी खबर का क्या परिणाम होगा । अब मुझे समझ में आ रहा है कि देश में जातीय दंगों को फैलाने में मीडिया का क्या रोल रहता है ,अगर किसी ने मौलाना का वेश बना कर किसी को गोली मार दी तो ये पहले मरने वाले को देखेंगे कि क्या वो हिंदू था और फिर खबर बनाएंगे कि मुसलमान ने हिंदू की हत्या कर दी फिर भले पूरे देश में जातीय दंगों की आग भड़क कर सब स्वाहा हो जाए । हिजड़े को निशाना बना कर खबर छाप दी और चालू हो गया पुलिस का धंधा ,सब को नंगा करके परेड कराई गई ताकि देखा जा सके किसके जननांग कितने विकसित हैं या क्या है हिजड़े की कमर के नीचे और टांगो के बीच में ? इन कमीने पत्रकारों को अगर इतनी ही चिंता है तो क्यों नहीं अपनी ताकत इस्तेमाल करके जेंडर आईडेंटीफ़िकेशन का कानून बनाने के लिये सरकार पर दबाव बनाते ? कम से कम हमें भी तो ये पता चल जाएगा कि हम किस डिब्बे में यात्रा करें । किसी पत्रकार ने रेलवे पुलिस से यह नहीं पूछा कि जब हर महिला डिब्बे में एक रेलवे पुलिस का सुरक्षाकर्मी तैनात रहता है तो जब वो अपराधी बलात्कार की कोशिश कर रहा था तो क्या वो पुलिस वाला तमाशा देख रहा था या अपनी अम्मा के साथ सोने गया था , क्या यात्रियों की सुरक्षा की रेलवे की कोई जिम्मेदारी नहीं है ? मैने नीच पुलिस वालों के हाथॊं को अपने जिस्म पर रेंगते हुए महसूस किया ,ये सुअर किसी गंदी दिमागी बीमारी के मरीज जान पड़े मुझे सारे के सारे । क्या मेरी इस अस्तित्व की लड़ाई में मेरे भड़ासी भाई-बहनें साथ हैं ये सवाल आप सब से है ,नाराज मत होइएगा कि ये क्या होली के रंग में तेज़ाब मिला रही है लेकिन बात ही ऐसी है । मेरे भाई डा.रूपेश अभी आधी रात को भी मेरे साथ हैं कि कहीं शर्मिन्दगी से मैं कुछ गलत निर्णय न ले लूं इस लिये जबरदस्ती मुझे पकड़ कर अपने घर ले आए हैं । होली मनाइए लेकिन अपनी इस बदकिस्मत बहन के बारे में भी सोचियेगा ।
 

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आयुषवेद by डॉ.रूपेश श्रीवास्तव