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बुधवार, 2 अप्रैल 2008
मेहरबानों, बेनामी रहकर प्रेम दिखाने से अच्छा है सामने आएं
मैं हमेशा से इस बात पर चकित रहता हूं कि क्या बात है जो लोग न दिखने वाले अस्तित्त्व यानि समाज से भयभीत रहते हैं। जब कल मुझे मनीषा दीदी ने बताया कि उनके लिखने से कई लोगों के नजरिये में बदलाव आ रहा है लेकिन आश्चर्य तो इस बात का है कि जब वे लोग इंटरनेट की आभासी संसार में बेनामी रह कर करुणा और प्रेम दर्शाते हैं तो क्या सचमुच में अभी उनमें इतना प्रेम उपज पाया है लैंगिक विकलांग लोगों के प्रति के वे सभ्य समाज में हमारा स्वागत सच्चे दिल से कर पाएंगे? घोर आश्चर्य इस बात का भी है कि जो करुणावान सज्जन मनीषा दीदी के ऊपर कहानी लिखना चाहते हैं भी न जाने किस कारण से वे भी बेनामी ही हैं,आप सभी लोगों से हाथ जोड़ कर प्रार्थना है कि यदि दिल से जुड़ रहे हैं तो मेहरबानी करके सामने आएं जैसे कि श्री सुनील दीपक जी हैं । धन्यवाद....
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