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मंगलवार, 11 नवंबर 2008

भिन्न होना अपराध नहीं है!

लैंगिक विकलांग या हिजडे हर समाज में होते हैं. कम से कम 3 से 4 हजार पुराने एतिहासिक पुस्तकों में इनका वर्णन आता है, जिसमें सबसे महत्वपूर्ण है प्राचीन ईजिप्ट के पुस्तकों में.

मनुष्य समाज में हमेशा पुरुष एवं स्त्रियों की अधिकता रही है. शायद द्स लाख में एक होगा जो लैंगिक विकलांग पैदा होता है. लेकिन जिस तरह से कोई भी नवजात शिशु अपनी इच्छा से शारीरिक या मानसिक विकलांगता लेकर नहीं पैदा होता है उसी प्रकार कोई भी लैंगिक विकलांग अपनी मर्जी से यह विकलांगता लेकर नहीं पैदा होता है.

इस कारण हिजडों को असामान्य, अपराधी, या विचित्र समझने के बदले उनको भी मानव समझना जरूरी है. बाकी अगले पोस्ट में…

बुधवार, 2 अप्रैल 2008

मेहरबानों, बेनामी रहकर प्रेम दिखाने से अच्छा है सामने आएं

मैं हमेशा से इस बात पर चकित रहता हूं कि क्या बात है जो लोग न दिखने वाले अस्तित्त्व यानि समाज से भयभीत रहते हैं। जब कल मुझे मनीषा दीदी ने बताया कि उनके लिखने से कई लोगों के नजरिये में बदलाव आ रहा है लेकिन आश्चर्य तो इस बात का है कि जब वे लोग इंटरनेट की आभासी संसार में बेनामी रह कर करुणा और प्रेम दर्शाते हैं तो क्या सचमुच में अभी उनमें इतना प्रेम उपज पाया है लैंगिक विकलांग लोगों के प्रति के वे सभ्य समाज में हमारा स्वागत सच्चे दिल से कर पाएंगे? घोर आश्चर्य इस बात का भी है कि जो करुणावान सज्जन मनीषा दीदी के ऊपर कहानी लिखना चाहते हैं भी न जाने किस कारण से वे भी बेनामी ही हैं,आप सभी लोगों से हाथ जोड़ कर प्रार्थना है कि यदि दिल से जुड़ रहे हैं तो मेहरबानी करके सामने आएं जैसे कि श्री सुनील दीपक जी हैं । धन्यवाद....
 

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आयुषवेद by डॉ.रूपेश श्रीवास्तव