रविवार, 6 अप्रैल 2008

एक पत्रकार का सवाल,"मनीषा जी, आपकी सेक्सुअल लाइफ़ कैसी है?"

आज की बात आप सब लोगों से बांटना जरूरी मानती हूं क्योंकि मैं देख रही हूं कि मेरे गुरुदेव, मार्गदर्शक और मेरे बड़े भाई डा.रूपेश श्रीवास्तव ने मुझे जो इंटरनेट के माध्यम से अपनी बातों को दुनिया के सामने रखने का रास्ता दिखाया-सिखाया है वह कारगर ही नहीं बल्कि अत्यंत तीव्र प्रभावी है। लोगों की नजर मुझ पर अब अलग नजरिये से पड़ रही है मैं इस बात को महसूस कर पा रही हूं। ब्लागिंग शुरूआत में मुझे समझ ही नहीं आयी कि भला मैं कुछ भी लिखूं उसे लोग क्यों देखेंगे लेकिन सुखद आश्चर्य तो तब होता है जब देश से बाहर रहने वाले लोगों का ध्यान हमारी बात पर जाता है, सच कहूं तो मुझे हमेशा इंतजार रहता है हमारे इटली में बसे हमदर्द श्री सुनील दीपक जी की करुणा और प्रेम से भरी टिप्पणी का। आज ब्लागिंग के चलते एक समाचार पत्र के जर्नलिस्ट महोदय मेरे इंटरव्यू के लिये आये। हर तरह के अनुभवों के लिये मेरे भाई ने मुझे ताकत दे रखी है कि कहीं मैं किसी बात पर ओवर-रिएक्ट न कर जाऊं। पत्रकार महोदय ने सवालों का सिलसिला शुरू किया और फिर घूम-फिर कर एक जगह वो आ गये जो कि शायद उनके इंटरव्यू का सेन्ट्रल आइडिया रहा होगा। उन्होंने निहायत ही शरीफ़ाना अंदाज जताते हुए मुझसे पूछा, "मनीषा जी, आपकी सेक्सुअल लाइफ़ कैसी है?" मैं तो जैसे जमीन पर आ गिरी कि ये आदमी पत्रकार है या पागल ? जो मुझसे सेक्सुअल लाइफ़ के बारे में सवाल कर रहा है या फिर वाकई उसे कुछ पता नहीं है कि एक लैंगिक विकलांग क्या होता है? कहीं मैं ही तो मूर्ख नहीं हूं? लेकिन अपनी गुरूशक्ति को स्मरण करते हुए मैंने खुद को संयमित किया और उसे बताया कि भला मेरी क्या सेक्सुअल लाइफ़ है अगर होती तो शायद मैं किसी की पत्नी होती या पति होती या होता लेकिन उस शख्स ने फिर अपनी बात दोहराई कि मैंने सुना है कि कुछ लैंगिक विकलांग लोग एनल-सेक्स से अपनी सेक्सुअल रिक्वायरमेंट्स पूरी करते हैं। मेरे लिये अब असहनीय हो चला था इस लिये मैंने नो कमेंट्स कह कर बात समाप्त कर दी। लेकिन इंटरव्यू कब का हो गया और मैंने उससे हाथ जोड़ कर विनती कर दी कि मेहरबानी करके इसे प्रकाशित न करें अपनी रोजी-रोटी के लिये किसी और प्रसिद्धि के प्यासे व्यक्ति का इंटरव्यू छाप दें। उसने मेरी बात को भलमनसाहत से मान लिया पता नहीं क्या सोच कर। अब अपनो से अपनी बात कहना चाहती हूं कि सेक्सुअल लाइफ़ हमारी तो होती ही नहीं है उस आदमी की होती है जिसके शारीरिक संबंध किसी लैंगिक विकलांग के साथ होते होंगे क्योंकि ईश्वर ने मनुष्य के शरीर में अलग-अलग आनंद की अनुभूति के लिये अलग-अलग अंग बनाए हैं लेकिन जब हमारे जैसे लोग एक अंग विशेष से दुर्भाग्यवश वंचित हैं तो हम उस आनंद की अनुभूति कैसे कर सकते हैं? जैसे किसी को जीभ न हो तो उससे कहा जये कि आप कान से स्वाद का अनुभव करके बताइए कि अमुक पदार्थ का क्या स्वाद है? ईश्वर ने जिस प्रकार जीभ के अगले हिस्से पर स्वाद के लिये कुछ छोटे-छोटे दानेनुमा रचनाएं स्वाद के लिये बनाई हैं जिन्हें भाई ने बताया कि आयुर्वेद में स्वाद कलिकाएं कहते हैं ठीक वैसे ही यौन आनंद के लिये स्त्री की योनि और पुरुष के लिंग पर विशेष हिस्सों में इस अनुभूति के लिये स्थान है लेकिन जब हमारे जैसे लैंगिक विकलांग लोग यौनांगों से ही अपाहिज हैं तो फिर हमारे लिये क्या सेक्स और क्या सेक्स का अनुभव? मेरी नजरॊं में जिन लोगों के लिये एनल-सेक्स भी एक उपाय है वो भी लैंगिक विकलांग लोगों के साथ संबंध बनाने का तो वे मनोरोगी हैं और उन्हें इलाज की जरूरत है। भाई बताते हैं कि जब कभी कोई विशेष परिस्थिति रहती है तो मरीज के जिस्म में एक असामान्य तरीके से उसे जीवित रखने के लिये भोजन पहुंचाया जाता है जिसमें लैट्रिन करने के अंग से लिक्विड डाइट दी जाती है जिसे एनस-फ़ीडिंग कहते हैं लेकिन यह तरीका सामान्य नहीं है और मरीज के स्वस्थ होते ही वह मुंह से खाना शुरू कर देता है। मुझे एनल-सेक्स भी ठीक वैसा ही जान पड़ता है। अरे, लिंग या योनि तो बस कार्य का उपकरण हैं आनंद की अनुभूति तो मस्तिष्क में होती है लेकिन जब वह अंग ही हमें ईश्वर ने नहीं दिया तो हम आनंद की अनुभूति कैसे करेंगे ? हां, जो साथ में है वो जरूर उस अनुभूति को प्राप्त कर लेगा। बहुत संभव है कि इस पोस्ट में प्रसंगवश आप लोगों को कदाचित अश्लीलता प्रतीत हो इसके लिये मैं आप सबसे माफ़ चाहती हूं साथ ही यदि आपको ये लगे कि मैं अपने भाई की संगति में कुछ ज्यादा ही विद्वता झाड़ने लगी हूं तो मेरे लिये ये बात प्रसन्नता की होगी कि चलो भाई की संगति का असर अब आप लोगों को भी दिखने लगा।

2 टिप्‍पणियां:

इष्ट देव सांकृत्यायन ने कहा…

कोई अश्लीलता नहीं है. जिस जिज्ञासा का जिक्र आपने किया है, सच पूछिए तो ऎसी जिज्ञासाएं केवल एक पत्रकार की नहीं पूरे समाज की हैं. लोगों में तरह-तरह की भ्रांतियाँ भी हैं. क्योंकि जो बताते हैं वे जानते नहीं और जो जानते हैं उनसे पूछने की बहुतेरे लोगों की हिम्मत नहीं पड़ती. लैंगिक विकलांगों के प्रति समाज में जो हेय भाव है, उसका कारण बहुत हद तक यह अज्ञानता ही है. आपने अच्छा किया की इस पर स्वयं लिखा. इससे कम से कम भ्रांतियाँ तो मिट सकेंगी और ऐसे निर्दोष लोगों के साथ आम जन निर्दयता से पेश नहीं आएँगे.

संजय तिवारी ने कहा…

यह संस्मरण मैं विस्फोट पर दे रहा हूं. लोगों को भी पता चले कि पत्रकार कितना संवेदनशील रह गया है.

 

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