शनिवार, 21 जून 2008

एक विचार की शुरूआत: श्री दीनबंधु प्रसाद



किताबी शिक्षा अधिक न होने के बाद भी बेहद ऊंची सोच, उच्च आदर्श और स्वच्छ विचारों के धनी हैं श्री दीनबंधु भोलानाथ प्रसाद। बिहार के रोहतास जिले के एक गांव के रहने वाले तीस वर्षीय दीनबंधु जी ने दसवी कक्षा तक पढ़ाई करी है घर की माली हालत ज्यादा अच्छी न होने के कारण ज्यादा पढ़ न सके और नौकरी के लिये मुंबई आना पड़ा, मध्यरेल में प्वाइंट्समैन के पद पर कार्यरत दीनबंधु जी के तीन बेटे हैं। जब मैंने इनसे लैंगिक विकलांगो के विषय में बात करना शुरू करी तो उन्होंने जो विचार दर्शाए वे अत्यंत आशास्पद प्रतीत होते हैं कि भविष्य सुखद होगा। इनका मानना है कि माता-पिता स्वयं ही रूढ़ियों में जकड़े रहते हैं इसीलिये किसी लैंगिक विकलांग बच्चे की पैदाइश पर अकुला जाते हैं जबकि मां ने उतनी ही प्रसव पीड़ा झेली है जितनी कि सामान्य बच्चों के जन्म में होती है फिर क्यों उसका आंचल छोटा पड़ जाता है,क्यों वह मां अपने जने बच्चे को भले ही दुःखी हो कर, रोकर ही सही लैंगिक विकलांगों की टोली को सौंप देती है? दीनबंधु भरपूर आक्रोश में इस बात को कहते हैं कि यदि आप कुतिया कि पिल्ले को उठाने की कोशिश करें तो वह आपको एक पशु होकर भी अपना बच्चा नहीं ले जाने देती और भौंक कर, काट कर अपना विरोध जता देती है लेकिन एक इंसानी माता कैसे सहन कर लेती है कि कोई उसके बच्चे को ले जाए। मांओ की ममता लिंग पर टिकी सड़ी परंपरा के आगे बौनी हो जाती है। चिढ़ होती है उन बुद्धिजीवियों से जो महिला विमर्श पर सिर फोड़े रहते हैं और लैंगिक विकलांग बच्चे की बात आते ही सांप सूंघ जाता है इनकी बुद्धि को। सब को बदलाव की पहल करनी होगी कि हम अपने बच्चों से इतना प्रेम करें कि उन्हें किसी को देने से इन्कार कर सकें और यदि कोई जबरन उस बच्चे को ले जाए तो कानून का सहारा लें। क्या आज तक किसी माता-पिता ने पुलिस में इस बात की रिपोर्ट दर्ज कराई है कि हिजड़ों की टोली उनका बच्चा ले गई? दीनबंधु जी चाहते हैं कि उनका ये संदेश मांओ तक पहुंचे जिन्होंने उन बच्चों को भी नौ माह कोख में पाला होता है वे अपने बच्चों को रोकें इस नर्क में जाने से...........
आज दीनबंधु जी से बात करके लग रहा है कि ये तो विचार का पहला धमाका है जो कि एक चैन रिएक्शन के रूप में शुरू हो जाएगा, आज एक है कल सौ, हजार, लाख और करोड़ होते देर न लगेगी। मैं ईश्वर से प्रार्थना करती हूं कि अगर कुछ करना है तो दीनबंधु जी जैसी सोच रखने वाले कुछ लोग दुनिया में भेज दे ताकि मेरा काम सरल हो जाए।

शोषण का पोषण करते ये गुरूघंटाल

सभ्य समाज के ढांचे में प्रगतिवादी सोच को जब परंपराओं में कमी नजर आती है तो स्वाभाविक है कि नई सोच रूढ़ियों का विरोध करेगी। इस वैचारिक विरोध से ही समाज की कमियां क्रमशः दूर होती जाती हैं। स्वस्थ समज के लिये जो परंपराएं हानिकारक रहती हैं वे समाप्त हो पाती हैं। ऐसी है बुरी परंपराएं थीं - बाल विवाह, सती प्रथा, दहेज प्रथा, पशु बलि, बंधुआ मजदूरी,छुआछूत आदि। जब श्रेष्ठ लोगों ने इन बुरी परंपराओं को समझा कि ये समाज के विकास में बाधक हैं तो इनका पुरजोर विरोध किया लेकिन यकीन मानिये कि एक बहुत बड़ा वर्ग ऐसा भी था जिसने इन परंपराओं को अपनी सभ्यता की पहचान बताते हुए इनके पक्ष में हो कर इन्हें जीवंत रखने के लिये बाहुबल, धर्म और कानून आदि के हथियार उठा लिये। एक बारगी सामने से देखने से लगता है कि ये मात्र रूढ़िवादियों और प्रगतिवादियों के बीच असहमति का परिणाम है परंतु अंदर से पर्तें उघाड़ कर देखने पर ये मात्र निहित स्वार्थों की रक्षा के लिये होती लड़ाई थी।
लैंगिक विकलांगों के समाज में भी ठीक ऐसा ही चल रहा है। जब कोई लैंगिक विकलांग गुरू-शिष्य परंपरा से इस समाज में प्रवेश करता है तब गुरू कहलाने वाले शख्स के मन में सत्यतः ऐसा कोई भाव होता ही नहीं है गुरूजी तो बस सुंदर-कमाउ शिष्यों की कमाई पर नजरें गड़ाए रखते हैं ताकि जल्द से जल्द बैठ कर खाने की जुगाड़ हो सके। समय बीतता जाता है और नए नायक, गुरू और चेले इस परंपरा में जुड़ते जाते हैं लेकिन स्वार्थ पर टिकी शोषण की प्रक्रिया निरंतर सदियों से चलती चली आ रही है। हर गुरू का कर्तव्य होता है कि वह अपने जीवन के अनुभवों तथा जानकारियों के आधार पर अपने शिष्यों को खुद से दो कदम आगे बढ़कर बेहतर जीवन जीने की प्रेरणा दे। यही गुरू-शिष्य परंपरा की सार्थकता है। किन्तु लैंगिक विकलांगों के परंपरागत समाज में गुरू भी भीख ही मांगते थे या देहव्यापार करते व नाच-गाकर बधाई देते और शिष्य भी वही करते रहे। गुरू भी समाज की मुख्यधारा से बाहर बहते रहे और शिष्यों को भी रहस्यमय परंपराओं की आड़ में यही सब कराते रहे। किसी गुरू ने अपने शिष्यों को आजीविका के लिये किसी अन्य कार्य के लिये न तो प्रेरित करा और न ही यह प्रेरणा दी कि बेटा मैं तो न पढ़ सकी कम से कम तुम तो पढ़ सको इसलिये मैं तुम्हारे लिये घर पर ही ट्यूटर लगा देती हूं? किसी गुरू ने समाज द्वारा किये गये बहिष्कार के खिलाफ़ आवाज को इतना बुलंद क्यों नहीं किया कि कानून उस आवाज को सुन सकता? खुद तो जाहिल बने रहे और नए आने वाले बच्चों को भी जाहिल-बेहया बनाए रखा। कुछ जगहों से यदा-कदा आपको सूचनाएं मिलती होंगी कि अमुक शहर या गांव में फलां लैंगिक विकलांग ने अपने धन से स्कूल खोला है लेकिन क्या आज तक किसी ने देखा है कि उस स्कूल में कोई लैंगिक विकलांग बच्चा पढ़ रहा हो अपनी सही पहचान के साथ? अरे हिन्दुओं ने सरस्वती विद्या मंदिर बना लिये मुस्लिमों ने अंजुमन इस्लाम बना डाले अपने अपने समुदाय के बच्चों को पढा़-लिखा कर उनकी पहचान समाज में ऊंची उठाने के लिये लेकिन किसी लैंगिक विकलांग गुरू ने ऐसा हरगिज नहीं करा कि जो पीड़ा मैंने झेली है वो इन बच्चों को न उठाने दूंगी, इन्हें पढा़-लिखा कर इस काबिल बनाऊंगी कि आने वाले समय में ये अपने जायज़ हक़ के लिये सही तरीके से मांग कर सकें। ये स्कूल वगैरह खोलना मात्र प्रसिद्धि पाने के टोटके रहते हैं। अगर सचमुच गुरू पद के उच्च आदर्श को पालने के इच्छुक ये गुरू लोग होते तो समाज में चेतना लाने का प्रयास करते कि अपने बच्चों को किसी हिजड़ो की टोली को मत दो और अगर कोई जबरदस्ती करता है तो कानून का सहारा लेकर अपहरण का मामला दर्ज करवाओ, क्यों कोई गुरू किसी NGO को इस बात के लिये प्रेरित नहीं करता कि मेरे शिष्यों को प्रौढ़ शिक्षाकेंद्र ले जाओ .......... । ये गुरू बने हुए गुरूघंटाल जानते हैं कि अगर उन्होंने ऐसा करा तब तो अनिर्णीत लिंग के आधार पर जीवित इनका थोथा,खोखला और शोषण पर टिका समाज महज दो पीढ़ियों मे ही समाज की मुख्यधारा में विलीन हो कर लुप्त हो जाएगा और फिर इन्हें खाने के लिये मेहनत-मजदूरी या कोई रोजगार करना पड़ेगा जो कि ये गुरूघंटाल लोग नहीं चाहते यही कारण है कि ये लोग शोषण का पोषण कर उसे जीवंत बनाए हुए हैं। मुझे पता है कि मैं जिस बात की शुरुआत कर रही हूं उसका सुखद अंत देखने के लिये जीवित न रहूं लेकिन मेरे भाई जो कि सच्चे अर्थों में गुरूपद के अधिकारी हैं उनकी प्रेरणा से इस नए वैचारिक धरातल पर इन तथ्यों को ला रही हूं।

शनिवार, 14 जून 2008

वंदना बहन ने माना कि मैं किन्नर,यक्ष या गन्धर्व नहीं बल्कि इंसान हूं.......




आज मैंने वंदना बहन जी को दिये साक्षात्कार को उनकी साप्ताहिक पत्रिका "इंडिया न्यूज"(१४ जून-२० जून २००८) के अंक में छपे रूप में देखा और उस आलेख को पढ़ा तो मुझे वाकई यकीन हो चला कि मेरे भाई डा.रूपेश सही कहते हैं कि सभी पत्रकार एक जैसे नहीं होते। इसमें से वंदना बहन ने सिद्ध किया कि जिस तरह एक पत्रकार मेरी भावनाओं को आहत कर सकता है उसी तरह वंदना बहन की तरह के पत्रकार इन दुखों का मरहम भी अपनी लेखनी से लगा सकते हैं; अब पता चल रहा है कि इस काली स्याही के कितने रंग हैं और जहां एक ओर ये मुंह पर छिड़क कर मुंह काला और दाग़दार कर देती है वहीं दूसरी ओर जले हुए जख्म पर लगा देने से शीतलता प्रदान करके घाव को शीघ्र ही भर कर ठीक भी कर देती है। सच तो ये है कि मैं उस लेख को करीब सौ बार पढ़ चुकी हूं लेकिन यकीन कर पाना भी एक सपने जैसा ही लग रहा है कि कहीं ये भी एक सपना न हो जो किसी का धक्का लगने या ’अबे ओए छक्के.......’ की आवाज से टूट जाएगा। वंदना बहन जैसे लोग जो हमें सहज ही इंसान मानते हैं बिना किसी हिचकिचाहट के तो अब खुद पर यकीन हो चला है कि मैं किन्नर या यक्ष, गन्धर्व, नाग या देवी-देवता जैसी कुछ नहीं हूं बल्कि मेरे भाई की तरह सामान्य इंसान हूं। मैं एक बात पुरजोर रखना चाहती हूं कि "थर्ड सेक्स" जैसी अस्तित्त्वहीन बात को लोग ना जाने किस स्वार्थवश सच सिद्ध करने पर तुले हैं। मैंने वंदना बहन को देखा नहीं है पर पूरा भरोसा है कि वे दिल से तो मेरे भाई डा.रूपेश का ही नारी संस्करण हैं। उनसे एक विनती कर रही हूं कि कभी मुंबई आएं तो अवश्य मिलें ताकि उन्हें जोर से सीने से लगा कर प्यार कर सकूं और धन्यवाद की औपचारिकता करने की बजाय उन्हें अपने हाथ से बना खाना खिला सकूं। अब मैं कह सकती हूं कि मेरे लैंगिक विकलांग समाज के इतर मेरी दो बहनें और हैं जिनमें बड़ी हैं श्रीमती मुनव्वर सुल्ताना जो कि उर्दू स्कूल में शिक्षिका हैं और दूसरी वंदना भदौरिया जो कि एक ईमानदार पत्रकार हैं, जिनके ऊपर भाई की बात सही लागू होती है कि " पतनात त्रायते इति पत्रकारः" यानि कि जो पतन से बचाए वह ही पत्रकार है। ईश्वर से प्रार्थना है कि मेरी वंदना बहन इसी तरह से लोगों के कांटो भरे मार्ग को प्रशस्त करती रहें लेकिन उनके हाथ फूलों से भरे रहें.................

मंगलवार, 27 मई 2008

सपने अंकुरित होने लगे हैं

मैं समझ नहीं पा रही हूं कि मेरे दिल दिमाग में जो तेज सी विचारों कि आंधी चल रही है उसे शब्दों में कैसे लिखूं। मैं कल तक अपने आपको अपने अधूरेपन के लिये खुद को कोसती थी कि कब मौत आयेगी और इस नामुराद शरीर से मुक्त हो सकूंगी। लेकिनब मुझे जब से मुझे मेरे भाई मिले हैं मेरी तो दुनिया ही बदल गई है। हिजड़ा होने का लेबल उतर रहा है ,इस बात का एहसास हो रहा है कि हम तो बस एक प्रकार की विकलांगता के शिकार हैं जो कि किसी भी तरह से कमी नहीं है। तीन दिन पहले जब भाई ने मुझसे कहा कि कोई पत्रकार मुझसे बात करना चाहती है तो मैंने साफ़ मना कर दिया था कि मैं किसी पत्रकार से बात नही करना चाहती हूं क्योंकि इससे पहले मेरा अनुभव बहुत गन्दा रहा जिसे मैंने लिखा भी था । भाई ने बहुत समझाया कि सब लोग एक जैसे तो होते नहीं हैं तो फिर सब पत्रकार एक जैसे क्यों समझती हो? लेकिन वंदना बहन ने भी मेरे बारे में जो कहा उससे मैं इमोशनल हो गई बात करते करते और रोने लगी तो भाई ने बीच में आकर बात को सम्हाला। सच तो ये है कि मैं अपना अतीत भूलना चाहती हूं। दूसरि बात कि जब कोई ये कहता है कि मैंने ब्लागिंग करके बड़ा काम कर दिया तो ऐसा लगता है कि वो मुझे एहसास करा रहा है कि मैं सचमुच मे इस लायक नहीं हूं ये ऐसा मानते हैं वरना ऐसा क्यो बोलते ? क्या ब्लागिंग करना या कम्प्युटर सीखना ऐसा काम है जिसे आसमान से टपकने वालेलोग ही कर पाते है और मैने कर दिया तो चमत्कार हो गया। अब मेरे भीतर एक अजीब सी बात आ रही है जिससे मुझे अडचन हो रही है और खुशी भी हो रही है। पहले मै बड़े मजे से लोगो के आगे हाथ फैला कर एक दो रुपया मांग लेती थी लेकिन अब लगता है कि कुछ गलत हो रहा है मैं इस काम के लिये नहीं हूं। ताली बजाते ही सपना शुरु हो जाता है कि मैं एक बड़े मंच पर मालाएं पहना कर सम्मानित करी जा रही हूं। मैंने स्कूल खोला है जिधर सब लोग मेरे जिसे पढ़ रहे हैं कोई भीख नहीं मागने जा रहा और न ही हमे कोई पुलिस वाला सता रहा है। मै आफ़िस मे बैठ कर भाई के साथ प्लान कर रही हूं कि अब आगे क्या करना है लेकिन अगले ही पल लोकल में चढने वाली भीड का धक्का सपना तोड देता है,फिर मुस्कराते हुए भीख मांगना शुरु कर देती हूं, ये सपना खुली आंखो से देखते हुए कि बस जल्दी ही ये परेशानियां खतम हो जाएंगी। मै और भाई मिल कर सबको पढना सिखाएंगे और भाई बीमार लोगो को दवा दे रहे होंगे साथ मे मै नर्स बन कर खड़ी रहूंगी। ऐसे ही न जाने कितने सपने अंकुरित हो रहे हैं न जाने कब फल लगेगे इन पौधों में? जब मेरे सपनो के पौधों में फल लगने लगेगे तब मेरे मम्मी पापा मुझे टीवी पर देख कर गर्व कर सकेंगे शरमाएगे नहीं।

शनिवार, 3 मई 2008

लैंगिक विकलांग व्यक्ति के हाथ के स्पर्श .......

बचपन से ही हमें हमारे लैंगिक भेद के बारे में एहसास कराया जाता है। वस्त्र, व्यवहारादि लैंगिकता के अनुसार चलता रहता है। इस प्रकार मानव ही नहीं लगभग सारा जीव-जगत दो भागों में बंट जाता है - नर और मादा।जैसे-जैसे किताबी और व्यवहारिक जानकारियां बढ़ती गयीं पता चलता गया कि लैंगिक विभाजन की जो गाढ़ी सी लकीर हमें दिखती है उसे अगर बारीकी से देखा जाए तो वह धूमिल होते-होते विलीन हो जाती है। समाज, दर्शन शास्त्र और साइंस मी धारनाओं में उठापटक होने लगती है। मैं एकबार फिर सोचने लगता हूं कि विश्वनिर्माता ईश्वर स्त्रीलिंग है या पुल्लिंग? नपुंसकलिंग है या उभयलिंगी?? मुझे पता है कि मेरी ये बात मूर्खता की पराकाष्ठा का गरिष्ठतम विचार है। जीव-जगत को निहारने और जीवन की उत्पत्ति के बारे में लैमार्क, डार्विन और स्टेनले मिलर अदि को समझने के बाद जाना कि जीवन का प्रारंभ जल में हुआ फिर क्रमशः उभयचर, स्थलचर और नभचर बने। आज मैं जानता हूं जीवों की तमाम प्रजातियों के बारे में जिनमें कि लैंगिक प्रजनन होता है किन्तु उनमें लैंगिकता का विषय गौण है। ये जलचर या उभयचर सरीसृप वंशक्रम की आवश्यकतानुसार नर से मादा और मादा से नर में सहजता से बदल जाते हैं। सबसे निकटतम उदाहरण लें तो केंचुए(earth worm) को लीजिये वह एक उभयलिंगी प्राणी है यानि नर और मादा जननांग दोनो ही सक्रिय रूप में उपस्थित होते हैं।
मानवों के समाज की रचना में लैंगिक विकलांगता या उभयलैंगिकता एक ऐसी स्थिति है जहां समाज की सरल ज्यामितीय रैखिक व्यवस्था के दोनो सिरे मिल कर वृत्ताकार सी होती प्रतीत होने लगती है। हिन्दू धर्म में माइथोलाजिकल आधार में आदिदेव भगवान शिव के साथ देवी पार्वती के समन्वित रूप के होने की कथा है जिसे कहा गया है - अर्धनारीश्वर। क्या हमारे पुरावैज्ञानिकों को इस बात को समझा था और शिव-पार्वती के समन्वित रूप अर्धनारीश्वर में सांकेतिक तौर पर निरूपित करा है।
प्रकृति की डिजायनिंग में कहीं कोई अपूर्णता नहीं है, चुम्बकत्त्व से लेकर अंतर्ग्रहीय बलों व अंतःआण्विक बलों से कुदरत सुसज्ज है। मानवों में यदि कोई शिशु किसी तरह की शारीरिक कमी लेकर जन्मता है तो प्रकृति काफी हद तक उस कमी की क्षतिपूर्ति करती है जैसे कि अंधा व्यक्ति सामान्य जनों की अपेक्षा अधिक श्रवण-सक्रिय होता है, गूंगा आदमी देहभाषा में आगे होकर इशारों से काफी अभिव्यक्तियां दर्शा लेता है, पोलियो ग्रस्त बच्चे के हाथ इतने ताकतवर हो जाते हैं कि कई बार वे हाथों के बल चल लेते हैं, हाथ न होने की दशा में बच्चा पैरों से ही सारे काम करने लगता है.........
यदि कोई इंसान सभी ज्ञानेन्द्रियों से सुसज्जित है किन्तु लैंगिक विकलांग है तो क्या कुदरत इस कमी की क्षतिपूर्ति नहीं करती होगी? हमारे शास्त्रों ने "काम" को हमारे शरीर की महत्तम रचनात्मक ऊर्जा माना गया है। इसी सोच का आधार लेकर बृह्मचर्य की एक पुष्ट धारणा हमारी सभ्यता में मौजूद है। बृह्मचर्य साधित रहता है और कामऊर्जा के अधोगमन से कुछ असामान्य नहीं होता अपितु इसी क्रम में प्रजनन होकर वंश आगे चलता रहता है। कामऊर्जा के ऊर्ध्वगमन और साधन से हमारे देश में अनेक योगियों ने अविश्वनीय चमत्कार दिखाए हैं व पूजनीय बने रहे हैं। किन्तु यदि किसी इंसान को प्रकृति ने ही इस उलझाव से मुक्त कर रखा है तो वह संबंधित प्रज्ञापराध से भी प्रभावित नहीं होगा तो फिर ये कामऊर्जा किस तरफ परावर्तित होती है? यदि हम शरीर रचना शास्त्र को देखें तो सारी बात हार्मोन्स पर चली जाती है जिनसे कि दैहिक गठन व मानसिक स्थिति का नियमन होता है। हमें इस बात को नपुंसकता व षंढत्त्व की धारणा से हट कर सोचना होगा। मैंने व्यक्तिगत अध्ययनों में पाया है कि लैंगिक विकलांग जन "ध्यान",धारणा, कल्पनाशीलता जैसे विषयों का आत्मसात सामान्य लोगों की अपेक्षा शीघ्रता से कर लेते हैं। मैंने तमाम रहस्यदर्शियों की ध्यान की कई विधियों को तुलनात्मक अध्ययन के लिये लैंगिक विकलांग लोगों तथा सामान्य जनों पर आजमाया तो लैंगिक विकलांग जन श्रेष्ठतर पाए गये। जरा विचार करिये कि क्या कभी आपने किसी लैंगिक विकलांग व्यक्ति के हाथ के स्पर्श को ध्यान से महसूस करा है उनमें से एक विशेष प्रकार की ऊर्जा का सतत प्रवाह होता रहता है जिसमें कि अत्यंत उपचारक गुण होता है। ये सम्मोहन तथा रेकी जैसे विषयों में यदि प्रशिक्षित करे जाएं तो सामान्य जनो से बहुत अधिक अच्छे परिणाम दे सकते हैं। आवश्यकता है कि आप भी मेरे कोण पर आकर इन्हें देखें और समझें।

बुधवार, 30 अप्रैल 2008

कूवगम महोत्सव

कूवगम महोत्सव के बारे में आपको बताना चाहूंगा कि यह तमिळनाडु प्रदेश के विल्लूपुरम जिले के उल्लुन्दरपेट तालुका का एक गांव है। यहां की विल्लूपुरम से दूरी लगभग तीस किलोमीटर है जिसके लिये तमाम परिवहन साधन चलते हैं । यहां हर साल चैत्र माह में कूतण्डावर मंदिर में यह महोत्सव बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। तमिळनाडु सरकार भी इस महोत्सव पर खासी तवज्जो देती है क्योंकि वह पहला ऐसा प्रदेश बन गया है जहां की सरकार ने लैंगिक विकलांग लोगों को यानि कि TG के रूप में अधिकारिक तौर पर स्वीकारा है और अब उन्हें इस पहचान पर राशन कार्ड से लेकर ड्राइविंग लाइसेंस तक दिये जाएंगे। इस बार यह महोत्सव २१ अप्रैल से शुरू हुआ, इसकी अवधि पंद्रह दिनों की रहती है। इस उत्सव में वैसे तो हर प्रान्त से लैंगिक विकलांग जन आते हैं लेकिन भाषाई समस्या के चलते मात्र दक्षिण भारतीय ही रुकते हैं। हमारी मुंबई से इस महोत्सव में भाग लेने गयीं लैंगिक विकलांग बहन रम्भा अक्का के अनुसार इसमें अनेक समलैंगिक भी शामिल होते हैं लेकिन उन्हें इस महोत्सव से कोई लेना देना नहीं होता वे बस यहां आस्था में डूबे लैंगिक विकलांग लोगों से मुफ्त में सेक्स का आनंद लेने आते हैं क्योंकि इस दौरान यहां कुछ ऐसा ही माहौल रहता है। अजीब सा माहौल रहता है भक्ति और उत्सव के रंग में रंगे लैंगिक विकलांग अपनी आस्था में मग्न रहते हैं, एड्स अवेयरनेस वाले NGO के कार्यकर्ता अपने काम में यानि कंडोम वितरण में व्यस्त रहते हैं, विदेशी पत्रकार और फोटोग्राफर्स अपने धंधे में लगे रहते हैं। इस महोत्सव के दौरान सौंदर्य प्रतियोगिता से लेकर नाच-गाने तक की प्रतियोगिता होती है, जिसमें कि गुरुओं का निर्णायक मंडल होता है; अनेक राउंड से गुजर कर किसी एक लैंगिक विकलांग को मिस कूवगम चुना जाता है और ये मानदंड उसके अधिकतम स्त्रैण होने पर ही टिके रहते हैं। इस बार सलेम की मन्त्रा को यह खिताब दिया गया है। इस महोत्सव की शुरूआत के विषय में ये लोग महाभारत काल का संदर्भ देते हैं कि जब महाभारत का युद्ध प्रारंभ होने वाला था तो परंपरा के अनुसार विजय की कामनापूर्ति के लिये किसी मानव की बलि देना होता था किन्तु जब इस कार्य के लिये कोई भी आगे न आया तो पांडवों का ही एक राजकुमार जो को अर्जुन का पुत्र था स्वेच्छा से आगे आया जो कि नागराज कौरव्य की पुत्री इरा पैदा हुआ था जिसे कई जगहों पर इरावत भी लिखा गया है लेकिन यहां तमिळनाडु में इस पात्र को अरावान के नाम से जाना जाता है ठीक वैसे ही जैसे कि अलेक्जेन्डर को हम हिन्दुस्तानियों ने सिकंदर कहा हो सकता है कि खुद अलेक्जेन्डर को भी न पता हो कि उसे सिकंदर भी कहा जाता है इसलिये यह बहस का मुद्दा नहीं है कि यह उद्धरण किस ग्रन्थ में है। इस राजकुमार ने एक शर्त रखी कि वह बलि चढ़ने से पहले विवाह करना चाहता है लेकिन ऐसे आदमी से भला कौन विवाह करता जोकि अगले ही दिन बलिवेदी पर जा रहा हो तो ऐसे में हमेशा की तरह भगवान नटवर ही काम आए और मोहिनी नामक सुन्दर कन्या का वेश धर कर उसके साथ ब्याह कर बैठे और अगले ही दिन विधवा हो गये और उस लीला से मुक्त हो गये। इसी राजकुमार अरावान के नाम पर आज भी यहां तमिळ भाषा में इन्हें "हिजड़ा" न कह कर अरावानी कहा जाता है। इस महोत्सव में ये लोग विधिवत राजकुमार अरावान की मूर्ति से दुल्हन की तरह सज-संवर कर विवाह करते हैं,खूब गाना-बजाना होता है और अगले दिन ये लोग अपने मंगलसूत्र उतार कर,सफेद साड़ी पहन कर ,चूड़ियां तोड़ कर शोक करते हुए रोते हैं और इस रुदन को ओप्परी कहा जाता है जिसमें कि खास अंदाज में बातें बोलते हुए लयबद्ध तरीके से सामूहिक रुदन करा जाता है।
इस बार इस महोत्सव में अनुमानतः पांच हजार से अधिक लोग शामिल हुए थे। इस दौरान यहां के क्षेत्रीय लोग भी इस मेले से लाभान्वित होते हैं और बनाव-श्रंगार,खाने-पीने का सामान बेचते हैं, नाच-गाने के लिये वाद्ययंत्र बेचते हैं,सरकार इसे एक तीर्थ स्थल की तरह से महत्त्व देने लगी है। इस पूरे महोत्सव में एक विचित्र बात देखने में जो आती है वो ये कि इसमें सबसे कम लैंगिक विकलांग केरल से आते हैं और सर्वाधिक आन्ध्रप्रदेश से। पिछले दो सालों की तरह से इस बार भी कुछ पढ़े-लिखे लैंगिक विकलांग लोगों ने अपने संवैधानिक अधिकारों पर भाषण भी दिये और अपने आपको EUNUCH(बधिया करा हुआ पुरुष) न मान कर UNIQUE (अद्वितीय) बताया और कहा कि हम तो भगवान अर्धनारीश्वर के मानव रूप को साकार करते हैं यही है हमारी अद्वितीयता।
इन सारी जानकारियों का श्रेय जाता है हमारी रम्भा अक्का और मनीषा दीदी को जोकि पुरानी मान्यताओं को नये नजरिये से देखने का बूता रखती हैं, गुरूशक्तियां उन्हें और बल प्रदान करें कि वे आगे बढ़ कर हम सबके साथ सम्मान से खड़ी हो सकें और अपने लिये रोजी-रोटी का साधन जुटा सकें।

शनिवार, 26 अप्रैल 2008

E for eunuch, T for transgender H is for "hijda" not for HUMAN

Tamil Nadu’s recent addition of a third gender column on ration card applications is one of a series of much needed, progressive reforms that benefit hijras.
DISCRIMINATED AGAINST and forced to live in secluded communities, India’s hijras have always had to fight for basic entitlements. Two weeks ago, however, a major victory was achieved when Tamil Nadu added a third gender to ration cards. Hijras may now enter a ‘T’ (for transgender) in place of a ‘M’ or ‘F’ on ration cards. The move makes Tamil Nadu the first Indian state to officially recognise its hijra citizens.The new rule is cause for great joy. "The government has now recognised us as a third gender. It gives us much needed dignity in society," says Noori, an HIV positive hijra, head of the South India Positive Network in Chennai. While an alphabet on a ration card may seem like a benign technicality, for Tamil Nadu’s estimated one lakh hijras (known locally as aravanis) it is a significant achievement. Ration cards, voting forms and passports have been available for aravanis only after a great deal of struggle. Ignorant administrators would leave the gender category blank, merely entering kuduma thalaivar (head of family) or, more often, ‘male’. "It is a positive development which will encourage more aravanis to openly declare themselves as transgenders," says Jeeva, who heads the Transgenders Rights Association. Jeeva got her card in 2006, where she is referred to as kuduma thalaivar but her associate Shabina Francis is identified as ‘female.’Historically, Tamil Nadu has had a very visible aravani community and, more recently, very vocal aravani activists. An aravani festival is held in the town of Koovagam annually, with a highly competitive "Miss Koovagam" beauty contest. Recently, it has been home to India’s first transgender television star, Rose.Yet, being hijra affects citizenship. Rose says, "It’s only been three or four years that ‘trans people’ have started asking for identity cards. Even now when we go and ask for IDs they don’t have a proper system to scrutinise our applications. Take my case. I wanted to change from a male name to a female one and retain the gender ‘M’ on my passport. If you want to change your gender on your passport, you need to have a sex reassignment surgery and I haven’t done that. For nine months my application was frozen because they didn’t know what to do.""We had initial success when passports with an ‘E’ (for eunuch) began to be issued two or three years ago," says Arvind Narrain of the Alternative Law Forum, Bangalore. This raises a thorny issue. ‘Eunuch’ is used to describe a castrated man, a category most aravanis do not fit into. More to the point, the word is usually used derogatorily, so the official sanction of the category is a backhanded success.Laxmi Narayan Tripathi of Mumbai NGO Astitva says, "They first wrote male on my passport, then I argued and they put ‘E’ for eunuch, but that’s not right because I am not castrated." However, after a long battle Laxmi succeeded. "Now they have put ‘TG’ (third gender) on my passport. In TG, everybody fits! Males, females, gays, bi-sexuals, women with alternative sexualities…" says an enthusiastic Laxmi.RECOGNITION OF a third gender is a human rights issue. "The ration card is proof that you are a citizen," says Reginald Watts of Bangalore NGO Sangama. "That’s one of the things you are asked for when opening a bank account, passport or driver’s license… anything." Recent changes in Tamil Nadu are a result of relentless activism by the aravanis but other states lag far behind. "At a national level the movement still has a long way to go," says Delhi gay rights activist Rahul Singh, "but this is a big step; other states should learn from this.""Kerala, for example, is so violently oppressive that you don’t see transgenders. They have to run and hide, live disguised as men," gripes Rose. "We have a visible population in Maharashtra, Delhi and a few other states but the others have a long way to go." A lot needs to be done before hijras obtain equality. "Transgenders have been part of this culture for centuries. Whenever you pick up a religious book, we are mentioned. But today we are treated as nothing. The government talks of adivasis, tribals, but where are we mentioned?" asks a passionate Laxmi. The repealing of Article 377, often used as an excuse to harass hijras, is an issue which must be addressed, as must the right to education. "The government should follow Article 14 which talks about the right to education regardless of gender. Education gives you the ability to fight discrimination," says Laxmi.Again, Tamil Nadu, and the dmk government in particular, has been considerably enlightened. In 2006, its Department of SocialWelfare passed a landmark order stating that "admission in schools and colleges should not be denied based on sex identity." The department had warned of "suitable disciplinary actions" in case of violations. "District collectors have been instructed to conduct special grievance days for aravanis once in three months," says Asha Bharathi of Thamizhnaadu Aravanigal Association. The Department of Social Welfare recently announced plans to form a welfare board to implement education and health schemes foraravanis — again a first.The rest of India needs to catch up with Tamil Nadu. Even the Constitution only guarantees rights to men and women, leaving out hijras. "After the British were forced out everyone got independence except us. It is necessary that all sexual minority groups come together and fight for their rights," exhorts Laxmi.
 

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आयुषवेद by डॉ.रूपेश श्रीवास्तव