मेरी किसी से सहानुभूति नहीं है। आप भले ही ना पुरुष में गिने जाते हों, ना महिला में, फिर भी नहीं। क्योंकि आपका एक गम तो स्पष्ट दिखाई दे रहा है, पर हिन्दुस्तान के जाने कितने ऐसे लोग हैं, जिनकी गिनती पुरुष अथवा स्त्रियों में तो होती है, परन्तु उनकी जिंदगी, जिंदगी नहीं है। आपका लिंग या योनी नहीं है, पर कई ऐसे लोग हैं, जिनमें किसी का हाथ नहीं होता, किसी का पैर नहीं होता, किसी की आंख नहीं होती, कोई बोल नहीं सकता, तो कोई देख नहीं सकता। मेरी यदि उनसे कोई सहानुभूति नहीं है, तो आपसे भी नहीं है। यह भूमिका मैंने केवल इसलिए लिखी कि आप मुझे यह ना समझें कि मैंने मात्र सहानुभूति के चलते आपको ई-मेल किया। फिर भी मेरा मात्र एक प्रश्न है- कि
सैक्स जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग है। आप द्वारा (आप जैसों) सैक्स नहीं करने पर क्या दिमाग कुंठित नहीं होता। और यदि सैक्स किया जाता है, तो कैसे? अन्यथा ना लें, केवल एक जिज्ञासा है - केवल सैक्स के विषय में ही नहीं। आपका जीवन कैसा है, आपको कब पता चला कि आप बाकी और लोगों से अलग हैं, मैं जानना चाहता हूं।
मेरा मोबाइल नंबर, सब-कुछ मेरे ब्लॉग पर आपको मिल जाएगा-
http://dard-a-dard.blogspot.com/
- संदीप शर्मा
संदीप जी सहानुभूति के दरकार तो अब हमें है ही नहीं कि यदि आप हमें सहानुभूति से देख लेंगे तो हमारी दुनिया बदल जाएगी। सत्यतः आपको किसी भूमिका के लेखन का भी कष्ट नहीं करना चाहिये था क्योंकि आपकी जिज्ञासा भी मात्र कमर के नीचे से ही ज्यादा संबद्ध है। अब मैं अपने भाई डा.रूपेश के संपर्क में आ जाने से मानसिक तौर पर इस तरह के सवालों के लिये मजबूती से तैयार हूं। दुःख है कि आपने अर्धसत्य की पुरानी पोस्ट्स को नहीं पढ़ा और वो भी उस पोस्ट को जो कि तमाम अन्य दिग्गज हिंदी ब्लागरों ने अर्धसत्य से लेकर अपने ब्लाग पर छापी थी। आपकी एक अत्यंत पुष्ट धारणा है कि सैक्स जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग है, कब इंकार है इस बात से लेकिन आपके जीवन का........। ईश्वर रचित हर ज्ञानेन्द्रिय व कर्मेन्द्रिय जीवन का महत्त्वपूर्ण अंग हैं। आप अर्धसत्य की इस पोस्ट को पढ़ें और इसके आस पास की दो-चार अन्य पोस्ट भी.........
http://adhasach.blogspot.com/2008/04/blog-post_06.html
आशा ही नहीं बल्कि पूर्णरूपेण विश्वास है कि आप कि जन्मांधों के विषय में भी अप इतने ही गहरे जिज्ञासु होंगे। अनुराग बनाए रहिये इसी तरह से ताकि आपके सवालों के उत्तर सहजता से दे सकूं।
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मंगलवार, 18 नवंबर 2008
ब्लागर संदीप जी के सवाल का सहज उत्तर
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सोमवार, 10 नवंबर 2008
लैंगिक विकलांगों(हिजड़ॊं) से सीधे सवाल करिये
भूमिका ने मुखौटाधारी ब्लागरॊं की छ्द्म सहानुभूति पर जो अपने अंदाज में धिक्कारना शुरू ही करा था कि टिप्पणीकार ही अनाम, बेनाम और गुमनाम होने लगे। यदि आप इतना साहस जुटा पाएं कि हम लैंगिक विकलांगों के बारे में (जिन्हें आप शायद हिजड़ा कहना अधिक पसंद करते हैं) कुछ जानना है तो शालीन भाषा में मुझसे सवाल करें लेकिन पूरे परिचय के साथ जिसमें आपका नाम, फोन नम्बर, पता, ब्लाग का यू आर एल आदि बताएं जिससे कि पता चले कि आप वाकई गम्भीरता से कुछ ऐसा जानना चाहते हैं जो अब तक आपको पता नहीं है तो मैं आपके हर सवाल का इस चिट्ठे पर उत्तर दूंगी ये एक हिजड़े का वादा है आप मर्द और औरतों से। साथ ही एक छोटा सा विचार दे रही हूं कि जरा बिना लिंग या योनि की दुनिया में अपनी जगह की कल्पना करिये। यदि शरीर रचना संबंधी कोई सवाल होगा तो उसका उत्तर आपको हमारे मार्गदर्शक भाई डा.रूपेश श्रीवास्तव सहर्ष देंगे। आपके सवालों का मुझे इंतजार रहेगा, आप अपने सवाल मुझे मेरे ई-पते पर(manisha.hijda@gmail.com) पर भेज दीजिये।
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