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शनिवार, 28 अगस्त 2010

सामाजिक बदलाव की हवा चली पाकिस्तान में

पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने लैंगिक विकलांगों को मुफ्त शिक्षा और चिकित्सा की सुविधाएँ प्रदान करने के आदेश दिए हैं। मुख्य न्यायधीश ने लैंगिक विकलांगों से संबंधी एक याचिका पर फैसला सुनाते हुए चारों प्रांतों और इस्लामाबाद प्रशासन को यह आदेश दिए। पुलिस को भी आदेश दिया कि वह लैंगिक विकलांगों का शोषण न करें और उन के खिलाफ झूठे मुकदमे दर्ज न करें। जस्टिस इफ्तिखार ने पुलिस को यह भी आदेश दिया कि यदि लैंगिक विकलांगों के खिलाफ कोई मुकदमा दर्ज किया जाए तो उसकी सूचना सुप्रीम कोर्ट जरूर दी जाए। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि लैंगिक विकलांगों के खिलाफ इस तरह की कोई भी कार्रवाई समाजिक कल्याण विभाग और लैंगिक विकलांगों की संस्था के प्रतिनिधि की मौजूदगी में हो।
ये एक शुभ संकेत है कि हमारे पड़ोसी देश में ऐसा कानूनी प्रक्रिया के द्वारा हो रहा है। जैसा कि बाबू जी शास्त्री जे.सी.फिलिप कहते हैं कि सामाजिक बदलावों की गति बहुत धीमी होती है तो ये भी हो सकता है कि ये इसी बदलाव के तहत हो।

मंगलवार, 25 मई 2010

प्रिय मनोज तुम हिजड़ा नहीं हो,माता-पिता और डॉक्टर से सलाह लो

मुझे अक्सर पत्र आते हैं कि कुछ नौजवान दिशाभ्रम और बदलते हुए सामाजिक परिवेश की सहमति के कारण खुद को हिजड़ा मानने लगते हैं और हमारे समुदाय में शामिल होना चाहते हैं। उन सभी भाईयों को आज बहुत दिनों बाद एक साथ उत्तर दे रही हूँ।
प्रिय भाई
प्यार
एक बात बिल्कुल साफ़ जान लो कि तुम्हें लड़कियों के कपड़े पहन कर बाहर घूमने में अच्छा लगता है तो तुम हिजड़ा हो ऐसा नहीं है। हिजड़ा यानि कि लैंगिक विकलांग होना एक दुर्भाग्य है जिसमें कि स्त्री या पुरुष जननांग का कुदरती तौर पर विकास ही न हुआ हो लेकिन आप तो खुद बता रहे हैं कि आप इक्कीस साल के लड़के हैं यानि कि आप शारीरिक तौर पर सही और स्वस्थ हैं। आप मनोरोग से ग्रस्त हैं आप यदि हार्मोन उपचार लें तो आपके दिमाग में होने वाले ये बदलाव सहज ही रुक जाएंगे और आप स्वस्थ पुरुष का जीवन जी सकेंगे। स्त्रियों के कपड़े पहनने की इच्छा या गुदा मैथुन कराने की इच्छा होना ही केवल आपको हिजड़ा नहीं बना देती, आयुर्वेद में बताये गए नपुंसकता के एक प्रकारो में से ये एक है जो कि आसानी से आप इलाज करा के सही हो सकते हैं। आपको किसी हिजड़े के सहयोग की नहीं बल्कि चिकित्सक की जरूरत है। आप इस बात को दिमाग से बिलकुल निकाल दीजिये कि आप हिजड़े हैं या आप कोई मंजू हैं बस याद रखिये कि आप मनोज हैं। अपने माता-पिता, भाई बहन और दोस्तों से भी इस विषय पर चर्चा करिये। यदि आप सचमुच मुझे बड़ी बहन का दर्ज़ा दे रहे हैं तो बहन की सलाह मानिये। हिजड़ा होने की पीड़ा मैं जानती हूँ कि लैंगिक विकलांगता किस तरह एक अभिशाप जैसा लगती रही है। आपके अच्छे स्वास्थ्य और भविष्य की हम सब कामना करते हैं। आपको लिखे इस पत्र को अर्धसत्य पर प्रकाशित करने जा रही हूं लेकिन आपकी पहचान नहीं प्रकाशित करूंगी न ही आपके फोटो प्रकाशित करूंगी। अपने माता पिता से अवश्य बात करिये ये बात फिर से कह रही हूं। आप चाहें तो हमारे बड़े भाईसाहब जो कि इस पूरे परिवार के कुटुंब-प्रमुख की हैसियत से हैं आप उनसे सम्पर्क करें उनका नाम है डॉ.रूपेश श्रीवास्तव और उनका ई मेल पता है- aayushved@gmail.com
हृदय से प्रेम सहित
आपकी बड़ी बहन
मनीषा नारायण
(पोस्ट में लिखे गये नाम काल्पनिक हैं)

मंगलवार, 26 मई 2009

बुधवार, 15 अप्रैल 2009

पैसे की खातिर इस बहुत छोटे से अपराध को मजाक की तरह कर डालते हैं

चुनावी माहौल में छुटभैय्ये नेताओं की सरगर्मिया बढ़ गई हैं। हमारे जैसे उपेक्षित लोगों के पास भी चक्कर मारने के लिए ख़ास समय निकला जा रहा है। अब बोगस नामों से वोट तो हम ही डालेंगे न .... कभी मर्द बना कर इस्तेमाल करे जायेंगे कभी औरत बना कर ..... यही तो होता आया है इतने सालों से की भले ही राशन कार्ड न बन पाया हो हमारा लेकिन हम सभी हर चुनाव में वोट जरूर डालते हैं या यूँ कहिये की हमसे डलवाया जाता है और हम तो वैसे भी पैसे की खातिर इस बहुत छोटे से अपराध को मजाक की तरह कर डालते हैं क्योंकि हमें क्या पता की वोट की ताकत क्या होती है ..... हमें भी पढाओ - लिखाओ ताकि हम भी तुम्हे एक अच्छा मुल्क देने में मदद कर सकें और अगर इस बात को समझ कर भी नज़रंदाज़ कर दिया तो ये तुम्हारा दुर्भाग्य होगा की इतनी बड़ी लोकसंख्या को तुम कभी अपना न सकोगे।

बुधवार, 4 मार्च 2009

लैंगिक विकलांग बच्चे अपने परिवारों को वापिस लौटेंगे एक प्रयोग के तहत....

अर्धसत्य परिवार ने अपने निरंतर प्रयासों के चलते तथा अपने बुजुर्ग मार्गदर्शकों के आशीर्वाद के सहारे से एक अभिनव प्रयोग करा है जिसके कारण कुछ समय से ब्लाग पर लिखने का समय नहीं निकाला जा सका। इस प्रयोग के अंतर्गत जो लैंगिक विकलांग बच्चे परिस्थितियों वश बरसों बरस से अपने परिवारों से अलग रह रहे थे उन्हें विश्वास में लेकर उनके परिवार की जानकारी हासिल करके बच्चों के माता-पिता व भाई बहन आदि से संपर्क कर संवाद स्थापित करना और उन्हें समझाने का प्रयास करना। इस प्रयोग के अंतर्गत जो बच्चे दस से पंद्रह सालों से अपने परिवारों से नहीं मिले थे एक प्रयोग के चलते वापस अपने घर लौटे हैं जिनमें कि कीर्ति(केतना), भूमिका, देवी, दिव्या और स्वयं अर्धसत्य परिवार की ज्येष्ठ संचालिका मनीषा नारायण हैं अब देखना है कि क्या होता है कौन स्वीकारा जाता है और कौन वापिस आ जाता है लेकिन हम सब इन बच्चों को इतना साहस दे पाए कि वे जैसे हैं उसी हाल में वापस जा सकें इस शर्त के साथ कि उन्हें यथावत स्वीकारा जाए बिना किसी शर्म या सामाजिक लोकलाज के....। ईश्वर करे के हमें इस मुहिम में कामयाबी मिले। बाबूजी श्री जे.सी.फिलिप कहते हैं कि सामाजिक बदलाव अत्यंत धीमी गति से होते हैं , जिस गति से शुरू हो कम से कम शुरू तो हुआ ये प्रयास; बस आप सबका आशीर्वाद बना रहे।

रविवार, 25 जनवरी 2009

स्वास्थ्य और तालियां बजाना

आज गणतंत्र दिवस मनाया जा रहा है तो रात भर से हमारी बस्ती में लोग गड्ढ़ा खोदना, लोहे का पाइप लगाना उसमें राष्ट्र ध्वज बांधना और फूल-झंडियां-मिठाई ना जाने क्या क्या......। वहीं जब इन इंतजामों में लगे उत्साही युवकों और स्थानीय नेताओं को देखते हुए सुबह हो गयी रोज की तरह से नजदीक ही बड़ी इमारतों में रहने वाले करी तीस-चालीस बुजुर्ग एकत्र होकर हंसने का अभ्यास करने लगे। कहते हैं कि इसके पीछे सांइटिफ़िक कारण रहते हैं कि हंसी चाहे झूठी हो या सच्ची लाभकारी रहती है। आज इन बुजुर्गों ने एक नया अभ्यास शुरू करा और वो था जोर-जोर से विभिन्न लय पर तालियां पीटना......। जब मैंने साहस करके अभ्यास कराने वाले दादाजी से पूछा तो उन्होंने बताया कि बेटा ताली बजाने से हाथ के एक्यूप्रेशर प्वाइंट्स सक्रिय बने रहते हैं और शरीर व मन का स्वास्थ्य उत्तम बना रहता है। मेरी कमाठीपुरा(मुंबई ही नहीं एशिया का सबसे बड़ा रेडलाइट एरिया) में रहकर देह व्यवसाय करने वाली एक बहन ने मुझसे तुरंत पूछा कि मनीषा ! क्या मैं भी तालियां बजाया करूं दवाएं लेने के साथ ही? वो एच.आई.वी. पाजिटिव है, मेरे पास उसकी बात का उत्तर नहीं है । कितनी तालियां बजाएं हम स्वतंत्रता दिवस से गणतंत्र दिवस तक तालियां ही तो पीटते रहते हैं हम सब......... लेकिन मन है कि स्वस्थ होने के लिये तालियां छोड़ना चाहता है। हम कभी तालियां नहीं बजाना चाहते चाहे कोई भी कारण क्यों न हो।

गुरुवार, 22 जनवरी 2009

बाबूजी का वात्सल्य: मनीषा नारायण को आशीष सहित भेजी पुस्तकें

बुद्ध की कहानियां,भारतीय वन्य जीव,पौराणिक कहानियां,परमाणु से नैनो प्रौद्योगिकी तक : बाबू जी ने भेजी पुस्तकें बचपन में ले जाती हैं बाबूजी के हस्तलिखित आशीर्वाद उनकी मानस पुत्री मनीषा नारायण के नाम : शब्दों से जुड़ती स्नेह-रज्जु
आज मेरे जीवन का एक बहुत बड़ा खुशियों भरा दिन है, मेरा मुहिम एक नए आयाम को छू रहा है। हमारे मार्गदर्शक गुरुवर्यसम आदरणीय शास्त्री श्री जे.सी.फिलिप जी ने मनीषा दीदी के लिये कुछ पुस्तकें भेजी हैं अपने हस्तलिखित संदेश के साथ ; जो कि मुझे इस बात का एहसास बड़ी शिद्दत से दिलाने के लिये काफ़ी है कि अब वाकई मेरे प्रयास के रंग में एक और प्रकाश की पट्टी जुड़ गई है और इसी तरह इस मुहिम में एक सप्तरंगी इंद्रधनुष उतर आयेगा, सफ़लता मिलेगी जब सारे बच्चे सम्मान से सिर उठा कर जी सकेंगे, समाज में सहज भाव से स्वीकारे जाएंगे, समान संवैधानिक अधिकार पा सकेंगे.........। मनीषा दीदी को पुत्रीवत स्वीकारने वाले हम सबके बाबूजी के द्वारा मुझसे फोन पर बात कर लेना भर मुझमें नयी ऊर्जा का संचार देता है, उनकी फोन पर दूर से आती वात्सल्य और करुणा में डूबी आवाज कई-कई दिनों से लगातार जागे रहने की मेरी शारीरिक थकान को न जाने कहां गायब कर देती है और मैं फिर जुट जाता हूं अपने यायावरपन में अपने बच्चों का हित तलाशने के लिये। जब मैंने मनीषा दीदी को बताया था कि बाबूजी आपके लिये पुस्तकें भेजने वाले हैं तो खुशी और आंसू का एक अजीब सा भाव उनके चेहरे पर मैंने देखा था और अब यकीन गहरा हो चला है कि हम सब के समेकित प्रयत्नों से एक दिन बस खुशियां ही खुशियां होंगी।

शुक्रवार, 9 जनवरी 2009

डा.रूपेश के नए बच्चे करेंगे पुराने सवाल

क्या सारी समस्याएं समाप्त हो गयी हैं? हरगिज नहीं...लेकिन अब वो समस्याएं हमें अब हमारी एकजुटता और प्यार के आगे बौनी नजर आने लगी हैं। कुछ समय पहले तक राशन कार्ड या ड्राइविंग लाइसेन्स जैसी चीजें लगता था कि हमारे अस्तित्व को सिद्ध करने के लिए ये बहुत जरूरी हैं लेकिन अब से डा.रूपेश जैसे भाई का साथ और बाबूजी(श्री जे.सी.फिलिप) का मार्गदर्शन हमें ये बता रहा है कि हम जल्द ही एक स्वीकार्य पहचान के साथ समाज में समान संवैधानिक अधिकारों के साथ खड़े होंगे। डा.रूपेश ने सभी लैंगिक विकलांग बच्चों को पिता की हैसियत से अपना नाम देकर सभी बच्चों के भीतर एक नई आत्मा फूंक दी है, सारे बच्चे अलग-अलग की बोर्ड लेकर दिन में अक्सर मांग कर आने के बाद अभ्यास करते मिलते हैं; जल्द ही सारे सरकारी विभागों में इन बच्चों के द्वारा भेजी गई एप्लीकेशन्स दिखेंगी......। सूचना प्राप्ति के अधिकार का प्रयोग करते हुए सरकार से जाना जाएगा कि हमारे जैसे लैंगिक विकलांगों के लिए क्या सरकार ने कुछ विचार करा है अथवा नहीं? हमारी कानूनी स्थिति के क्या संदर्भ है? हमारी नागरिकता की पुष्टि कैसे करी जाती है? जो लैंगिक विकलांग चुनाव में अपना नामांकन भरते हैं या जो वोट देते हैं वो किस परिचय से ऐसा कर पाते हैं? इत्यादि...इत्यादि...।

मंगलवार, 30 दिसंबर 2008

ज्योतिष शास्त्र ने भी लैंगिक विकलांगों को नकार दिया है

कल मैं ने देखा कि भाई डा.रूपेश कम्प्यूटर पर किसी बच्चे की कुंडली बना कर कुछ देख रहे थे। भला कौन ऐसा है जो भविष्य न जानना चाहता होगा तो मैंने भी उस कुंडली नामक साफ़्टवेयर को समझने का प्रयास करा, जब भाई मरीजो की दवाओं में जुट गये लेकिन मैं तो हतप्रभ रह गयी कि ज्योतिष शास्त्र मेरे जैसे बदनसीबों के लिए है ही नहीं क्योंकि उसमें जातक के जन्म समय, स्थान आदि के विवरण के साथ मात्र लिंग के विवरण में पुरुष/स्त्री ही है। मैंने स्वयं को दो बार इसे आजमाया एक बार पुरुष लिख कर और दूसरी बार स्त्री लिख कर और पाया कि ऐसा करने पर मात्र लिंग का अंतर होने से जातक के फलादेश में अंतर है, भविष्य में अंतर है। अब मैं सोच रहीं हूं कि ये वही ज्योतिष शास्त्र है जिसके बारे में तमाम विद्वान इसकी गहाराई , सत्यता और प्रामाणिकता के लिये बह्स दर बह्स करे जाते हैं लेकिन यह तो मात्र लैंगिक अंतर की गाढ़ी सी लकीर ही देख कर भ्रमित हो जा रहा है। मेरा उन तमाम हिंदी ब्लागरों से अनुरोध है कि इस विषय पर समुचित स्पष्टीकरण प्रस्तुत करने का साहसपूर्ण शोध करें न कि चुप्पी साध जाएं वरना मेरे लिए ज्योतिष शास्त्र और पब्लिक टायलेट में कोई अंतर न रह जाएगा क्योंकि वहां भी हमारे लिये ऐसा ही संकट और भ्रम है।

बुधवार, 17 दिसंबर 2008

हिंदी ब्लागरों में मनीषा नारायण ने कोहराम मचा रखा है

दीदी का लिखना बड़ा ही कड़ा रहा है हमेशा से जैसा कि मैं जानता हूं। इन बातों के पीछे कि वे इतनी प्रेम से भरी होने के बाद भी अक्सर नाराज क्यों हो जाती हैं उसका कारण उनका अतीत रहा है। जो लोग उनसे अपेक्षा करते हैं कि मनीषा! तुमने हिंदी सीख लिया अब ब्लागिंग करती हो तो अपने सारे अतीत को भूल जाओ तत्काल जिससे कि तुम कभी व्यथित रही हो। जिंदगी की रेलगाड़ी में भी सीट पर जगह बनाने के लिये धक्का-मुक्की करनी पड़ती है इन्हें सहज ही कुछ नहीं मिला कभी भी। हिंदी ब्लागरों के तो नाक-भौं सिकुड़ गये जब पता चला कि एक "हिजड़ा" तालियां बजाना छोड़ कर उन शरीफों के संग सायबर जगत में ब्लागिंग करेगा। बहुत तिरस्कार सहना पड़ा इस आभासी दुनिया में भी ,एक ब्लाग है "भड़ास" जो कि काफ़ी कुख्यात है अपनी भाषा के कारण लेकिन वह मंच अश्लील हरगिज नहीं है। उस मंच पर मैं दीदी को ले गया सद्स्यता दी उन्होंने एक उंगली से किसी तरह लिखना शुरू करा। वहां आरोप लगाया तमाम नामचीन ब्लागरों ने खुल कर कि प्रमाण दिया जाए कि मनीषा नारायण का अस्तित्त्व है भी या काल्पनिक हैं फिर हैं तो लैंगिक विकलांग हैं या नहीं.........। एक बार फिर जब वणिक सोच ने भड़ास पर कब्जा जमा लिया तो अचानक वहां से मनीषा दीदी की सदस्यता को समाप्त कर दिया गया। इसे कहते हैं उसे हाशिये से भी बेदखल कर दो जो अब तक हाशिये पर था और ये शर्त रख दो कि बिलकुल भी आवाज न करे अगर गाली दी या नाराजगी व्यक्त करी तो गंदे मान लिये जाओगे और कहा जाएगा कि यही तुम्हारी औकात है वगैरह वगैरह...।
संबंधित पोस्ट्स देखिये
http://bharhaas.blogspot.com/2008/12/blog-post_15.html
http://bharhaas.blogspot.com/2008/12/blog-post_7241.html
http://bharhaas.blogspot.com/2008/12/blog-post_6981.html
http://bharhaas.blogspot.com/2008/12/blog-post_9693.html

अब दोबारा इंतजार है उस घेराबंदी का जब तमाम ब्लागिंग गिरोह एग्रीगेटर्स पर भी हमारे जैसे लोगों को प्रतिबंधित करा दें। हम अभी से मानसिक तौर पर तैयार हैं पर किसी के आगे गिड़गिड़ाएंगे नहीं।

गुरुवार, 4 दिसंबर 2008

ब्लागिंग से बदलाव की शुरूआत हो गयी है

आज मनीषा बहन ने मुझे बातों बातों में बताया कि उन्हें एक भाई ने एक मेल करा था जिसमें उस युवा भाई ने लिखा था कि मैं चाहता हूं कि विवाह के बाद मेरा कोई बच्चा लैंगिक विकलांग पैदा हो और मैं उसे खूब लिखा पढ़ा कर डाक्टर, इन्जीनियर या वकील बनाऊं ताकि समाज के सामने एक उदाहरण रख सकूं कि हमारे ये बच्चे किसी से कम नहीं होते हैं। मेरी आंखों में इस भावना के प्रति आदर से कुछ अन्जाने से आंसू आ गये। याद आये मुझे भाई दीनबन्धु जो कि ऐसी ही सोच रखते हुए किसी लैंगिक विकलांग बच्चे को सहर्ष गोद लेना चाहते हैं। अब लग रहा है कि शिक्षा के मार्ग से ब्लागिंग तक आने से बदलाव हो रहे हैं।

बुधवार, 26 नवंबर 2008

ब्लागरों! आपका कोई लैंगिक विकलांग बच्चा हो तो उसे फेंकना मत मुझे दे देना......

आदरणीय वाचकों, आलोचकों, समीक्षकों, सहयोगियों,अभिभावकों
चूंकि मेरी धर्मपुत्री भूमिका रूपेश ने अपनी पोस्ट में लिखा है कि उसकी पोस्ट पर आयी किसी भी टिप्पणी को प्रकाशित न करा जाए इसलिये उसके विरोध के स्वर को समर्थन देता हुआ मैं भी ये कह रहा हूं कि यदि इन बच्चों को अपनी जगह बनानी है तो समाज की धारणाओं में थोड़ी नोच-खसोट और धक्का-मुक्की तो इन्हें करनी ही पड़ रही है वरना होना तो ये चाहिये कि जिस तरह महिलाओं की पत्रिकाओं को पुरुष चटकारे ले कर पढ़ते हैं और पुरुषों की पत्रिका स्त्रियां छिप कर पढ़ती हैं तो लैंगिक विकलांगता के प्रति इतना कौतूहल रखने वाले समाज को बहुत अच्छा प्रतिसाद देना चाहिये था लेकिन ऐसा हुआ नहीं। यहां ब्लागिंग में भी ढकोसलेबाज,मुखौटेधारी किस्म के लोग हैं जिन पर मुझे ही नहीं हम सबको संदेह है कि ये वही माता,पिता,भाई,बहन,चाचा,मामा,बुआ,फूफा आदि हैं जिन्होंने मेरे बच्चों को अपनी सड़ी सोच के चलते इस हाल में धकेल दिया है। यही लोग जिम्मेदार हैं जो मुंह छिपा रहे हैं अब इन बच्चों के सामने आ जाने से। हो सकता है कि अगर दुर्दैव से इनमें से किसी ब्लागर के घर कोई लैंगिक विकलांग बच्चा पैदा हो जाए तो ये उसे चोरी-छिपे मेरे घर के बाहर फेंक जाएं; इसलिये हे ब्लागरों में तुम्हारे ऐसे बच्चों को गोद में लेकर बोतल से दूध पिलाने, कंधे पर बैठा कर खेलने और उंगली पकड़ा कर चलना सिखाने के लिये तैयार हूं। हमारा स्वर तुम्हारी दुर्गंधित सोच का विरोध करने के लिये अब मुखर हो रहा है। जिन लोगों ने भूमिका रूपेश की पिछली पोस्ट पर हिजड़ा बन जाने की बात पर भी मुस्कराते हुये टिप्पणी करी है मैं उन्हें अपने पोस्ट से संलग्न करके सधन्यवाद प्रकाशित कर रहा हूं।
aapme badhiya likhne ki shakti hai...aur ye shakti har kisi me nahi hoti. ishwar ka shukriya karen ki aapka man ek lekhak ka hai. shubhkamnayen... Dileepraaj Nagpal
maine aapki saari post's dekhi. aapke shabdo mein kuchh to hai..main ho sakta hai koi tippani nahi kar saku par blog lagatar dekhta rahta hu.... संदीप शर्मा Sandeep sharma
अब देखना ये है कि आप भूमिका रूपेश जैसे बच्चों का विश्वास हासिल कर पाते हैं या नहीं वरना ऐसे बच्चे आपको ही वो भाई या बहन और माता-पिता मानते रहेंगे कि जिन्होंने उन्हें सड़को पर फेंक दिया है।

मेरी पोस्ट पर टिप्पणी करने से आप हिजड़े बन सकते हैं


जैसे-जैसे मैं लिखना तीखा करती जा रही हूं देख रही हूं कि लोग बिदक कर भाग रहे हैं। एक बड़ी साधारण सी बात कहना है कि यही पोस्ट अगर किसी लड़की की होती भले ही कितनी भी मूर्खतापूर्ण होती, बकवास होती या लटका-पटका की तुकबंदी जोड़ कर लिखनी वाली कोई कवियत्री होती तो उस पर कम से कम बीस-पच्चीस टिप्पणीकार लार टपकाते आ गये होते लेकिन हम लोगों का लिखा भी पढ़ लेने से लोगों को छूत लग जाती है, शायद लगने लगता है कि कहीं हमें भी "अर्धसत्य" पर टिप्पणी कर देने से या प्रोत्साहित कर देने से लैंगिक विकलांगता का इन्फ़ेक्शन न हो जाए और हम भी हिजड़े बन जाएं। मैं इस पोस्ट के द्वारा हम सबके धर्मपिता व गुरू डा.रूपेश श्रीवास्तव से निवेदन कर रही हूं कि अब वे कम से कम मेरी लिखी किसी भी पोस्ट पर कोई भी टिप्पणी न प्रकाशित करें। मुझे किसी की मक्कारी भरी सहानुभूति नहीं चाहिये। जब से मैंने लोगों के बनावटी मुखौटे नोचने खसोटने शुरू करे हैं हिंदी के छद्म शरीफ़ ब्लागरों में खलबली है, जवाब नहीं देते बनते इस बड़े-बड़े बक्काड़ और लिक्खाड़ लोगों से। हमारे कुनबे को हम खुद ही संवारने का माद्दा रखते हैं। मैं इस सोच से एक और फ़ायर-ब्रांड बहन को जोड़ रही हूं।

सोमवार, 24 नवंबर 2008

डा.रूपेश श्रीवास्तव सबके पिता बने.......

अब धीरे-धीरे नये बच्चे जो स्वयंभू सभ्य समाज और लैंगिक विकलांगों के समुदाय की परंपराओं के बीच थपेड़े खा रहे थे अब वे अर्धसत्य के द्वारा नयी सोच से जुड़ रहे हैं। अब एक फैसला करा है हमने कि एक और परंपरा को तोड़ेंगे और वह भी पुरजोर घोषणा करके। सारे बच्चे अपने नाम के आगे हमारे मार्गदर्शक डा.रूपेश श्रीवास्तव का नाम जोड़ेंगे यह करारा तमाचा है उन बायोलाजिकल माता-पिता की सड़ी हुई सोच के गाल पर जिन्होंने हमें परंपराओं के चलते सड़कों पर धक्के खाने के लिये छोड़ दिया था यानि कि अब हमारे भाईसाहब सबके पिता घोषित कर दिये गये हैं और भाईसाहब को इस बात पर कोई परेशानी नहीं है।

मंगलवार, 18 नवंबर 2008

ज्योत से ज्योत जलाते चलो......





पिछले किसी जन्म के सत्कर्म के फलस्वरूप इस जन्म में मेरे तारणहार मेरे गुरुदेव डा.रूपेश मुझे मिल गये। जो विद्या का प्रकाश उन्होंने मेरे भीतर जगाया है वो फैले उसी में उसकी सार्थकता है। पहले मैंने कम्प्यूटर सीखा, हिन्दी सीखी, ब्लागिंग सीखी और जीवन जीना सीखा। अब मैं खुद सक्षम हो गयी हूं कि किसी नये मित्र को सिखा सकूं। इसी ज्योत से ज्योत जलाने के मिशन में मैंने अपनी बड़ी गुरुबहन(लैंगिक विकलांग समुदाय में) रम्भा अक्का को भी कम्प्यूटर की शुरूआती जानकारियां देना शुरू करा था और अब वे स्वयं लिखने पढ़ने लगी हैं। मेरे पास इस खुशी को बताने के लिये शब्द नहीं है। ईश्वर हमारे इसे मिशन को कामयाब करे इसके लिये आप सबकी शुभेच्छाओं की आवश्यकता है, स्नेह बनाए रखें।

ब्लागर संदीप जी के सवाल का सहज उत्तर

मेरी किसी से सहानुभूति नहीं है। आप भले ही ना पुरुष में गिने जाते हों, ना महिला में, फिर भी नहीं। क्योंकि आपका एक गम तो स्पष्ट दिखाई दे रहा है, पर हिन्दुस्तान के जाने कितने ऐसे लोग हैं, जिनकी गिनती पुरुष अथवा स्त्रियों में तो होती है, परन्तु उनकी जिंदगी, जिंदगी नहीं है। आपका लिंग या योनी नहीं है, पर कई ऐसे लोग हैं, जिनमें किसी का हाथ नहीं होता, किसी का पैर नहीं होता, किसी की आंख नहीं होती, कोई बोल नहीं सकता, तो कोई देख नहीं सकता। मेरी यदि उनसे कोई सहानुभूति नहीं है, तो आपसे भी नहीं है। यह भूमिका मैंने केवल इसलिए लिखी कि आप मुझे यह ना समझें कि मैंने मात्र सहानुभूति के चलते आपको ई-मेल किया। फिर भी मेरा मात्र एक प्रश्न है- कि
सैक्स जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग है। आप द्वारा (आप जैसों) सैक्स नहीं करने पर क्या दिमाग कुंठित नहीं होता। और यदि सैक्स किया जाता है, तो कैसे? अन्यथा ना लें, केवल एक जिज्ञासा है - केवल सैक्स के विषय में ही नहीं। आपका जीवन कैसा है, आपको कब पता चला कि आप बाकी और लोगों से अलग हैं, मैं जानना चाहता हूं।
मेरा मोबाइल नंबर, सब-कुछ मेरे ब्लॉग पर आपको मिल जाएगा-
http://dard-a-dard.blogspot.com/
- संदीप शर्मा

संदीप जी सहानुभूति के दरकार तो अब हमें है ही नहीं कि यदि आप हमें सहानुभूति से देख लेंगे तो हमारी दुनिया बदल जाएगी। सत्यतः आपको किसी भूमिका के लेखन का भी कष्ट नहीं करना चाहिये था क्योंकि आपकी जिज्ञासा भी मात्र कमर के नीचे से ही ज्यादा संबद्ध है। अब मैं अपने भाई डा.रूपेश के संपर्क में आ जाने से मानसिक तौर पर इस तरह के सवालों के लिये मजबूती से तैयार हूं। दुःख है कि आपने अर्धसत्य की पुरानी पोस्ट्स को नहीं पढ़ा और वो भी उस पोस्ट को जो कि तमाम अन्य दिग्गज हिंदी ब्लागरों ने अर्धसत्य से लेकर अपने ब्लाग पर छापी थी। आपकी एक अत्यंत पुष्ट धारणा है कि सैक्स जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग है, कब इंकार है इस बात से लेकिन आपके जीवन का........। ईश्वर रचित हर ज्ञानेन्द्रिय व कर्मेन्द्रिय जीवन का महत्त्वपूर्ण अंग हैं। आप अर्धसत्य की इस पोस्ट को पढ़ें और इसके आस पास की दो-चार अन्य पोस्ट भी.........
http://adhasach.blogspot.com/2008/04/blog-post_06.html
आशा ही नहीं बल्कि पूर्णरूपेण विश्वास है कि आप कि जन्मांधों के विषय में भी अप इतने ही गहरे जिज्ञासु होंगे। अनुराग बनाए रहिये इसी तरह से ताकि आपके सवालों के उत्तर सहजता से दे सकूं।

रविवार, 16 नवंबर 2008

राजनीति में षंढ,शिखंडी,नपुंसक,किन्नर,हिजड़े,छक्के और बृहन्नलाएं

एक बार फिर से शबनम(मौसी) के बाद मध्यप्रदेश की राजनीति में एक "किन्नर" ने शिवपुरी विधानसभा क्षेत्र से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर पर्चा दाखिल करा है । लालीबाई पुकारे जाने वाले किन्नर के समर्थन में अनपढ़ और जाहिल बना कर रखे गये लैंगिक विकलांग बच्चों की एक बड़ी फौज खंडवा, भोपाल, ग्वालियर, कोलारस,सतनवाड़ा,जबलपुर,इंदौर,रीवा,सतना आदि स्थानों से एकत्र करके शिवपुरी पहुंचा दी गई है। बेचारे बच्चे अपना भला-बुरा तो समझते नहीं हैं इसलिये उन्हें उनके गुरू और नायक धर्म व परंपरा आदि के नाम पर जो समझा कर भेज देते हैं वो सब उसी को ब्रह्मवाक्य मान कर कभी बाहर निकलने की खुशी में तो कभी मजबूरी में करने लगते हैं। ये बच्चे लालीबाई को जिताने की कवायद में पैसा भी एकत्र करेंगे।
मेरी ओर से बस इतना कि शबनम(मौसी) ने चुनाव जीत कर लैंगिक विकलांगों के लिये क्या कर सकती थीं और क्या नहीं करा ये तो मैं आपको बताती चलूंगी लेकिन उस क्षेत्र के गुरूघंटालों के मुंह मेंराजनीति का खून लग गया है। जीतने के बाद जब उनसे पूछा जाता है कि आपने अपने समाज के उत्थान के लिये क्या करा तो उत्तर रटा हुआ है कि मैं हिजड़ों की नहीं "जनता" की नेता हूं इसलिये समाज या समुदाय विशेष की संकीर्ण बातें मुझसे मत करिये। राजनीति में हर तरह के लोग यानि षंढ, शिखंडी, नपुंसक,किन्नर, छक्के और बृहन्नलाएं आ जाएंगे पर लैंगिक विकलांगों को इस रेलम-पेल में हाशिये से भी अलग धकेला जा रहा है और कथित बुद्धिजीवी बस सहानुभूति के मालपुए छान कर मलाई चाटेंगे जिससे कि ’बिल गेट्स फाउंडेशन’ से सामाजिक मुद्दों पर शोध के लिये पैसा झटका जा सके। मैं इस बात की प्रबल संभावना जता रही हूं कि लालीबाई जीतेगी। आप क्या कहते हैं जरूर बताइये।

सोमवार, 10 नवंबर 2008

लैंगिक विकलांगों(हिजड़ॊं) से सीधे सवाल करिये




भूमिका ने मुखौटाधारी ब्लागरॊं की छ्द्म सहानुभूति पर जो अपने अंदाज में धिक्कारना शुरू ही करा था कि टिप्पणीकार ही अनाम, बेनाम और गुमनाम होने लगे। यदि आप इतना साहस जुटा पाएं कि हम लैंगिक विकलांगों के बारे में (जिन्हें आप शायद हिजड़ा कहना अधिक पसंद करते हैं) कुछ जानना है तो शालीन भाषा में मुझसे सवाल करें लेकिन पूरे परिचय के साथ जिसमें आपका नाम, फोन नम्बर, पता, ब्लाग का यू आर एल आदि बताएं जिससे कि पता चले कि आप वाकई गम्भीरता से कुछ ऐसा जानना चाहते हैं जो अब तक आपको पता नहीं है तो मैं आपके हर सवाल का इस चिट्ठे पर उत्तर दूंगी ये एक हिजड़े का वादा है आप मर्द और औरतों से। साथ ही एक छोटा सा विचार दे रही हूं कि जरा बिना लिंग या योनि की दुनिया में अपनी जगह की कल्पना करिये। यदि शरीर रचना संबंधी कोई सवाल होगा तो उसका उत्तर आपको हमारे मार्गदर्शक भाई डा.रूपेश श्रीवास्तव सहर्ष देंगे। आपके सवालों का मुझे इंतजार रहेगा, आप अपने सवाल मुझे मेरे ई-पते पर(manisha.hijda@gmail.com) पर भेज दीजिये।

शनिवार, 8 नवंबर 2008

मुखौटेधारी ब्लागरों को धिक्कार है,थू है उन पर....

पिछले कुछ दिनों से अर्धसत्य पर कुछ भी लिख पाना निजी कारणों से संभव नहीं हो पा रहा था। आज जब मामा जी डा.रूपेश श्रीवास्तव के घर गयी तो बच्चों के लिये काम करने वाली एक संस्था CRY के दो लोग बैठ कर उनसे पैसे जुगाड़ने के लिये तरह-तरह से समझा रहे थे और मामाजी हैं कि सुन रहे थे लेकिन जब मामा जी ने हमारे बारे में बात शुरू करी तो महानता का ताज सिर पर रख कर कट लिये। ब्लागिंग में भी ऐसे ही मुखौटेधारियों की कमी नहीं है जो बस एक दूसरे को महान-महान कह कह कर अंहकार की तुष्टि करते रह्ते हैं। जब शास्त्री जी ने सारथी पर हमारे बारे में लिखा तो टिप्पणियां करने लोग दौड़ पड़े कि हम भी उदार हैं, हम भी अर्धसत्य पढ़ते हैं, हम भी लैंगिक विकलांगो के प्रति सहानुभूति और प्रेम रखते हैं। उन मुखौटाधारियों को उस पेज पर धिक्कारने के बाद मैं आज उन लोगों के मुखौटे को अपने पन्ने पर भी धिक्कार रही हूं। हममें ऐसे किसी भी खोखली हड्डियों वाले मुखौटेधारी ब्लागर की सहानुभूति की जरूरत कहां है हम तो अपने मार्गदर्शक डा.रूपेश की दी हुई ताकत से ही नयी शुरूआत करने का साहस जुटा चुके हैं। ऐसे लोग अर्धसत्य न ही देखें तो बेहतर है क्योंकि हम तो शारीरिक लैंगिक विकलांग है,हिजड़े हैं लेकिन ऐसे लोग आत्मा के स्तर पर हिजड़े हैं, थू है थू है थू है ऐसे लोगों पर.........
 

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आयुषवेद by डॉ.रूपेश श्रीवास्तव