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मंगलवार, 25 मई 2010

प्रिय मनोज तुम हिजड़ा नहीं हो,माता-पिता और डॉक्टर से सलाह लो

मुझे अक्सर पत्र आते हैं कि कुछ नौजवान दिशाभ्रम और बदलते हुए सामाजिक परिवेश की सहमति के कारण खुद को हिजड़ा मानने लगते हैं और हमारे समुदाय में शामिल होना चाहते हैं। उन सभी भाईयों को आज बहुत दिनों बाद एक साथ उत्तर दे रही हूँ।
प्रिय भाई
प्यार
एक बात बिल्कुल साफ़ जान लो कि तुम्हें लड़कियों के कपड़े पहन कर बाहर घूमने में अच्छा लगता है तो तुम हिजड़ा हो ऐसा नहीं है। हिजड़ा यानि कि लैंगिक विकलांग होना एक दुर्भाग्य है जिसमें कि स्त्री या पुरुष जननांग का कुदरती तौर पर विकास ही न हुआ हो लेकिन आप तो खुद बता रहे हैं कि आप इक्कीस साल के लड़के हैं यानि कि आप शारीरिक तौर पर सही और स्वस्थ हैं। आप मनोरोग से ग्रस्त हैं आप यदि हार्मोन उपचार लें तो आपके दिमाग में होने वाले ये बदलाव सहज ही रुक जाएंगे और आप स्वस्थ पुरुष का जीवन जी सकेंगे। स्त्रियों के कपड़े पहनने की इच्छा या गुदा मैथुन कराने की इच्छा होना ही केवल आपको हिजड़ा नहीं बना देती, आयुर्वेद में बताये गए नपुंसकता के एक प्रकारो में से ये एक है जो कि आसानी से आप इलाज करा के सही हो सकते हैं। आपको किसी हिजड़े के सहयोग की नहीं बल्कि चिकित्सक की जरूरत है। आप इस बात को दिमाग से बिलकुल निकाल दीजिये कि आप हिजड़े हैं या आप कोई मंजू हैं बस याद रखिये कि आप मनोज हैं। अपने माता-पिता, भाई बहन और दोस्तों से भी इस विषय पर चर्चा करिये। यदि आप सचमुच मुझे बड़ी बहन का दर्ज़ा दे रहे हैं तो बहन की सलाह मानिये। हिजड़ा होने की पीड़ा मैं जानती हूँ कि लैंगिक विकलांगता किस तरह एक अभिशाप जैसा लगती रही है। आपके अच्छे स्वास्थ्य और भविष्य की हम सब कामना करते हैं। आपको लिखे इस पत्र को अर्धसत्य पर प्रकाशित करने जा रही हूं लेकिन आपकी पहचान नहीं प्रकाशित करूंगी न ही आपके फोटो प्रकाशित करूंगी। अपने माता पिता से अवश्य बात करिये ये बात फिर से कह रही हूं। आप चाहें तो हमारे बड़े भाईसाहब जो कि इस पूरे परिवार के कुटुंब-प्रमुख की हैसियत से हैं आप उनसे सम्पर्क करें उनका नाम है डॉ.रूपेश श्रीवास्तव और उनका ई मेल पता है- aayushved@gmail.com
हृदय से प्रेम सहित
आपकी बड़ी बहन
मनीषा नारायण
(पोस्ट में लिखे गये नाम काल्पनिक हैं)

शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2010

दुनिया बनाने वाले भगवान,अल्लाह,GOD का लिंग-निर्धारण हो गया


ईश्वर की गलती हूं मैं और मेरे जैसे लोग
भड़ास परिवार से जुड़े सभी पुराने लोग जानते हैं कि मैं एक लैंगिक विकलांग(हिजड़ा) हूं लेकिन मेरी इस कमी को मेरे इस परिवार ने कभी मेरे परिचय में आड़े न आने दिया। भड़ास परिवार से दिया गया प्रेम और हमारे बड़े भाई अवतार स्वरूप डा.रूपेश श्रीवास्तव जी ने हमें हमारी परंपरागत पहचान से हट कर जो नई पहचान दी है उसके लिये यदि हम अपनी चमड़ी के जूते भी बना कर उन्हें पहना दें तो कम है। हमारे रिश्ते में इस औपचारिक बकवास की गुंजाइश नहीं है। बात ये है कि मेरे दिमाग में हमेशा से यह सवाल रहा कि दुनिया बनाने वाली शक्ति भी क्या लैंगिकता की मोहताज होगी? या फिर वह एकोSहं बहुस्यामि के विचार के अमीबा या हाइड्रा की तरह बढ़ा होगा? वह क्या है पुल्लिंग? स्त्रीलिंग?? या फिर उभयलिंगी केंचुए की तरह??? या फिर मेरी तरह नपुंसक षंढ??????? भाईसाहब से करे गए मेरे हजारों सवालों में से बस यही अनुत्तरित रहा है क्योंकि भाई मानते हैं कि ईश्वर के विषय में चर्चा करने की क्षमता उनमें नहीं है जब वो मिल कर स्वयं अपने बारे में बताएगा तब उसकी बात करेंगे। लेकिन मुझे लग रहा है कि मुझे मेरे सवाल का उत्तर सेमेटिक रेलिजन्स में मिल गया है। मुस्लिमों की मजहबी पुस्तक कुरान और ईसाइयों की धर्मपुस्तक बाइबिल में बताया गया है कि अल्लाह या परमेश्वर ने आदम यानि एडम(प्रथम मनुष्य) को अपने ही रूप में बनाया(फ़रिश्तों से आदेश देकर बनवाया) और स्पष्ट है कि आदम तो पुरुष हैं और उनकी एक पसली से प्रथम स्त्री हव्वा का निर्माण करा। कहा गया है अल्लाह या परमेश्वर प्रकाश(नूर) है। अब सवाल ये खड़ा हो गया है कि क्या ये एक रहस्य है या बहुत बड़ा झूठ कि एक तरफ़ उसे अपने जैसा यानि पुरुष लिखा है और दूसरी तरफ प्रकाश। यदि दुनिया बनाने वाला प्रकाश है तो उसे आदम को सूरज, जुगनू , ट्यूबलाइट या बल्ब की तरह का बनाना चाहिए था यदि हाड़मांस(लिंगधारी) बनाया तो ये नहीं बताना था कि in his own form........ अपनी ही सूरत में........। यदि आदम को लिंग है तो शतप्रतिशत ईश्वर को भी होना चाहिए अन्यथा ये बातें मात्र कल्पना हैं और वो भी पुरुषों की जिन्होंने सभ्यता के विकास क्रम में नर और मादा मानव की पसलियों में अंतर देख कर ये कहानी रच ली और खुद को ईश्वर की सूरत में जता दिया। ये विशुद्ध तर्क है मेहरबानी करके कोई इसे कुतर्क कह कर मुझे शान्त कराने का आग्रह न करे। यदि समुचित उत्तर है तो अवश्य शंका का निराकरण करे। यानि कि हमारे जैसे लोग उस परमात्मा की गलती हैं क्योंकि हमारे जैसे लोगों का तो कहीं जिक्र ही नहीं है कि उसने मुखन्नस(हिजड़े) भी बनाए हैं कभी। क्या सचमुच परमात्मा गलतियां करता है??????????

बुधवार, 20 जनवरी 2010

कुछ महीने न लिख कर क्या देख सकी वो बताना है

पिछले कुछ महीनों से सक्रिय लेखन बंद कर के एक प्रयोग करके देख रही थी। इस प्रयोग में मैने ब्लागिंग के बाद में मैंने जो नजरिया पाया था उस नई नजर से दुनिया को देख कर समझने की कोशिश कर रही थी कि शायद कुछ बदलाव आया होगा लेकिन कुछ बदला ही नहीं है बस ये है कि कुछ लोग मुझे पहचानने लगे हैं, इस नयी पहचान के चलते जो सामाजिक कद हासिल हुआ है उसमे पत्रकार बंधुओं को लगने लगा है कि मैं भी घटनाओं पर अपनी राय दूं। अभी जब कुछ समय पहले समलैंगिकता वाले मामले में कानूनी उठापटक चल रही थी तो कई लोगों ने मेरी राय जानना चाहा कि मैं इस बारे में क्या विचार करती हूं। मैंने एक बात देखी कि हर जगह पूंजी का जोर है पैसे की ताकत से सारे काम सिद्ध हो रहे हैं। हमारी न्याय व्यवस्था और न्याय प्रणाली के साथ साथ ही मैंने न्याय का पालन कराने वाली संस्थाओं को भी नये नजरिये से देखने का प्रयास करा लेकिन कुछ भी बदलाव नहीं है। बाबू जी डा. जे.सी.फिलिप सही कहते हैं कि हमारा मसला तो सामाजिक मसला है और सामाजिक बदलावों की गति बहुत धीमी होती है इसलिये फिलहाल कुछ अपेक्षा करना भी व्यर्थ है। लैंगिक विकलांगता के मुद्दे को दरकिनार करके धनी और कुटिल लोगों ने खुद ही एक लैंगिक अल्पसंख्यक वर्ग रच डाला जिसे उन्होंने "LGBT समूह" नाम दे डाला और गुदा मैथुन से लेकर मुख मैथुन तक को अपनी निजी काम-वरीयताओं में गिना कर कानूनी नौटंकी करके भारतीय सभ्यता के मुंह पर कालिख पोत दी पर हमारे माननीय न्यायाधीश तर्कों के आगे घुटने टेके रहे। आश्चर्य होता है जब न्यायाधीश अपने निजी विवेक का जरा भी प्रयोग नहीं करते। आजकल मेरा रुझान ’विधि के शासन’(Rule of law) की तरफ है जिसे एक आम नागरिक होने की हैसियत से जानने का प्रयत्न कर रही हूं। काफ़ी दिनों बाद लिख रही हूं तो विचारों का तारतम्य आसानी से नहीं बन पा रहा है। मुझे पता है कि जो भड़ास इतने दिनों से दम साध कर रोके हुए थी अब उबल-उबल कर बाहर आएगी। इस बीच मैं अपने बड़े भाई और गुरुदेव डा.श्री रूपेश श्रीवास्तव जी के सम्पर्क में रही, लंतरानी समूह की संचालिका और भड़ास की संरक्षिका मेरी बड़ी बहन मुनव्वर(सुल्ताना)आपा के जुड़ाव में भी लगातार हूं इसलिये कुछ अविस्मरणीय पल तस्वीरों के रूप में कैद हो सके जो आप सबके साथ बांटना है।

बुधवार, 4 मार्च 2009

लैंगिक विकलांग बच्चे अपने परिवारों को वापिस लौटेंगे एक प्रयोग के तहत....

अर्धसत्य परिवार ने अपने निरंतर प्रयासों के चलते तथा अपने बुजुर्ग मार्गदर्शकों के आशीर्वाद के सहारे से एक अभिनव प्रयोग करा है जिसके कारण कुछ समय से ब्लाग पर लिखने का समय नहीं निकाला जा सका। इस प्रयोग के अंतर्गत जो लैंगिक विकलांग बच्चे परिस्थितियों वश बरसों बरस से अपने परिवारों से अलग रह रहे थे उन्हें विश्वास में लेकर उनके परिवार की जानकारी हासिल करके बच्चों के माता-पिता व भाई बहन आदि से संपर्क कर संवाद स्थापित करना और उन्हें समझाने का प्रयास करना। इस प्रयोग के अंतर्गत जो बच्चे दस से पंद्रह सालों से अपने परिवारों से नहीं मिले थे एक प्रयोग के चलते वापस अपने घर लौटे हैं जिनमें कि कीर्ति(केतना), भूमिका, देवी, दिव्या और स्वयं अर्धसत्य परिवार की ज्येष्ठ संचालिका मनीषा नारायण हैं अब देखना है कि क्या होता है कौन स्वीकारा जाता है और कौन वापिस आ जाता है लेकिन हम सब इन बच्चों को इतना साहस दे पाए कि वे जैसे हैं उसी हाल में वापस जा सकें इस शर्त के साथ कि उन्हें यथावत स्वीकारा जाए बिना किसी शर्म या सामाजिक लोकलाज के....। ईश्वर करे के हमें इस मुहिम में कामयाबी मिले। बाबूजी श्री जे.सी.फिलिप कहते हैं कि सामाजिक बदलाव अत्यंत धीमी गति से होते हैं , जिस गति से शुरू हो कम से कम शुरू तो हुआ ये प्रयास; बस आप सबका आशीर्वाद बना रहे।

सोमवार, 16 फ़रवरी 2009

मैं कोई बड़ी हस्ती हो गयी हूं जो लोग मेरे साथ ऐसा व्यवहार करने लगे हैं?

क्या मैं कोई बड़ी हस्ती हो गयी हूं जो लोग मेरे साथ ऐसा व्यवहार करने लगे हैं? जब से मैं ब्लागिंग के द्वारा अपनी समस्याएं लिख रही हूं मेरे दिल का बोझ तो उतर रहा है ये सच है। कल जब मैं भायखला स्टेशन पर ट्रेन में मांगने के बाद घर जाने के लिये अपनी बाकी बहनो रम्भा अक्का और सोना अक्का वगैरह का इंतजार कर रही थी तो देखा कि एक कोने में खड़ी एक युवती अपनी पांच साल की बेटी के साथ सुबक-सुबक कर रो रही है और लोग उसके अगल-बगल से गुजर रहे हैं लेकिन कोई नहीं पूछता कि क्या हुआ क्यों रो रही हो....। मुझसे रहा नहीं गया तो मैंने पास जाकर पूछ लिया कि बहन क्या समस्या है क्यों रो रही हो क्या मैं तुम्हारे लिये कुछ कर सकती हूं? इस पर उसने सिर उठा कर मुझे देखा तो अपलक दो मिनट तक देखती ही रह गयी फिर जोर से लिपट कर रोने लगी। दिलासा देने के बाद चुप कराने पर उसने सीधे मेरा नाम लेते हुए बात शुरू करी कि मनीषा दीदी मेरे पति ने दूसरी शादी कर ली है और मुझे घर से निकाल दिया है मेरे पास कुछ नहीं है और वो आदमी कहता है कि बिना तलाक दिये वह दूसरी या ग्यारह तक शादियां कर सकता है इस्लाम में जायज़ है, पीटता है खाना नहीं देता मैं ज्यादा पढ़ी लिखी नहीं हूं दसवी पास हूं मेरा पति डाक्टर है उसका नाम अज़हर है वगैरह वगैरह............। वह लड़की बोलती जा रही थी मैं अवाक सी ये सोच रही थी कि वो मुझे कैसे जानती है? फिर उसने ही बताया कि उसने मुझे इंटरनेट पर भड़ास में देखा था और फिर तब से अर्धसत्य देख रही है और पहचानती है। वो मुझसे ऐसा व्यवहार कर रही थी जैसे कि मैं कोई बहुत बड़ी हस्ती हूं और उसकी समस्या चुटकी बजाते ही हल कर दूंगी।
तब तक मेरी बहनें आ गयी और मैं उस लड़की को बच्ची के साथ मुनव्वर आपा के घर भेज आयी हूं। आप सब बताइये कि इस विषय पर मैं क्या करूं? क्या अर्धसत्य पर उसकी कहानी लिखूं कुछ होगा? न्याय मिलेगा?ब्लाग का इस दिशा में कैसे प्रयोग कर सकती हूं?अभी वह हमारे सम्पर्क में मुनव्वर आपा के साथ ही है।

बुधवार, 4 फ़रवरी 2009

मेरी बहन की खुशी.......

अर्धसत्य परिवार के मार्गदर्शकों में से एक श्री मोहम्मद उमर रफ़ाई व मनीषा नारायण दिल खोल कर ठहाके लगाते हुए
जब हम किसी काम को "बस यूं ही" अपनी खुशी के लिये शुरू करते हैं और वह काम बढ़ते-बढ़ते एक महाअभियान का रूप धारण कर ले तब आपको उसमें होने वाली छोटी सी सफलता भी उसी अनुपात में विशालता लिये हुए लगती है। कुछ समय पहले तक शायद मेरी बहन मनीषा नारायण की मुस्कराहट मुझे इतना आह्लादित न करती रही हो लेकिन आज अब मैं इस बात को देख रहा हूं कि मुझे उनकी हर मुस्कान, हर हंसी बहुत बड़ा सुख दे जाती है; ठीक ऐसा ही होता है जब भूमिका या दिव्या जैसे मेरे प्यारे बच्चे किसी बात पर मुझसे चुटकी लेकर बात करते हैं। आदरणीय बाबू जी शास्त्री श्री जे.सी.फिलिप ने जो पुस्तकें भेजी हैं वह एक नया उत्साह लेकर आयी हैं विशेष तौर पर मेरे लिये। अब मैं दीदी को दिल खोल कर हंसते देखता हूं तो लगता है कि जीवन सफ़ल सा होता प्रतीत हो रहा है।

गुरुवार, 22 जनवरी 2009

बाबूजी का वात्सल्य: मनीषा नारायण को आशीष सहित भेजी पुस्तकें

बुद्ध की कहानियां,भारतीय वन्य जीव,पौराणिक कहानियां,परमाणु से नैनो प्रौद्योगिकी तक : बाबू जी ने भेजी पुस्तकें बचपन में ले जाती हैं बाबूजी के हस्तलिखित आशीर्वाद उनकी मानस पुत्री मनीषा नारायण के नाम : शब्दों से जुड़ती स्नेह-रज्जु
आज मेरे जीवन का एक बहुत बड़ा खुशियों भरा दिन है, मेरा मुहिम एक नए आयाम को छू रहा है। हमारे मार्गदर्शक गुरुवर्यसम आदरणीय शास्त्री श्री जे.सी.फिलिप जी ने मनीषा दीदी के लिये कुछ पुस्तकें भेजी हैं अपने हस्तलिखित संदेश के साथ ; जो कि मुझे इस बात का एहसास बड़ी शिद्दत से दिलाने के लिये काफ़ी है कि अब वाकई मेरे प्रयास के रंग में एक और प्रकाश की पट्टी जुड़ गई है और इसी तरह इस मुहिम में एक सप्तरंगी इंद्रधनुष उतर आयेगा, सफ़लता मिलेगी जब सारे बच्चे सम्मान से सिर उठा कर जी सकेंगे, समाज में सहज भाव से स्वीकारे जाएंगे, समान संवैधानिक अधिकार पा सकेंगे.........। मनीषा दीदी को पुत्रीवत स्वीकारने वाले हम सबके बाबूजी के द्वारा मुझसे फोन पर बात कर लेना भर मुझमें नयी ऊर्जा का संचार देता है, उनकी फोन पर दूर से आती वात्सल्य और करुणा में डूबी आवाज कई-कई दिनों से लगातार जागे रहने की मेरी शारीरिक थकान को न जाने कहां गायब कर देती है और मैं फिर जुट जाता हूं अपने यायावरपन में अपने बच्चों का हित तलाशने के लिये। जब मैंने मनीषा दीदी को बताया था कि बाबूजी आपके लिये पुस्तकें भेजने वाले हैं तो खुशी और आंसू का एक अजीब सा भाव उनके चेहरे पर मैंने देखा था और अब यकीन गहरा हो चला है कि हम सब के समेकित प्रयत्नों से एक दिन बस खुशियां ही खुशियां होंगी।

शुक्रवार, 16 जनवरी 2009

बाबूजी रास्ता बताइये..........


आदरणीय बाबू जी शायद सोच रहे होंगे कि मनीषा बहुत व्यस्त हो गयी है तो इन दोनो भाई-बहन ने नववर्ष की शुभेच्छा दी और न ही पोंगल की शुभकामनाएं। सच तो यह है कि हम दोनो आजकल पागल की तरह से सूचना प्राप्ति के अधिकार का प्रयोग कर समाज और देश / राज्य में लैंगिक विकलांगों की स्थिति जानने के लिये लगे थे। जरा आप सब जानिए कि क्या हुआ जब सूचना प्राप्ति कि अधिकार का आवेदन पत्र विधिवत भर कर उस पर १० रु. का रेवेन्यू स्टैम्प लगा कर मैं भाई के साथ नगर परिषद कार्यालय गई तो चूंकि यहां अधिकतर क्लर्क भाईसाहब डा.रूपेश को एक सताने वाले कायदा-पंडित के रूप में पहचानते हैं जिसकी वजह से उनके प्रति एक पूर्वाग्रह बना रखा है सबने कि ज्यादा से ज्यादा चक्कर लगवाएं ऐसा उन सबका प्रयास रहता है। जैसे ही आवेदन पत्र देखा तो चार पांच क्लर्क एकत्र हो गए और पहले आपस में सलाह -मशविरा करा फिर भाईसाहब से बोले कि ये एप्लीकेशन में सवाल पूंछा गया है हम उत्तर नहीं बल्कि सूचनाएं उपलब्ध करा सकते हैं जो कि पत्र-प्रपत्रों या अन्य किसी रूप में रेकार्ड में मौजूद हों इसलिये ये एप्लीकेशन स्वीकारी नहीं जा सकती तो भाई अड़ गए कि इस एप्लीकेशन पर आप जो कारण बता रहे हैं वह लिखते हुए अस्वीकार करने की टीप लिख दीजिए ताकि हम वापस चले जाएं। एक बार फिर हुज्जत शुरू हो गयी.....। होते होते बात यहां तक पहुंच गयी कि एक क्लर्क ने कह दिया कि मैडम मनीषा नारायण पहले तो आप किसी प्रमाण से ये सिद्ध करिये कि आप भारतीय नागरिक हैं तब आपको ये अधिकार बनता है कि आप कोई सवाल हमसे कर सकती हैं ऐसा हो सकता है कि आप बांग्लादेशी घुसपैठिया हों जो कि बिना किसी अधिकार के भारत में रह रहा हो क्यों न पुलिस बुलाया जाए और इस बात को आगे बढ़ाया जाए। अब हम दोनो मुख्याधिकारी जी के पास गये तो उन्होंने सारी बात सुनी हमें चाय पिलायी और अपनी भारी असर्मथता जताते हुए बोले कि मैं एक बात अनआफ़िशियली डा.साहब से कहना चाहता हूं इसे अन्यथा न लें कि ये वही देश है जहां कागजों पर मरे हुए घोषित कर दिये लोग बरसों बरस आफ़िसों के चक्कर लगाते रहते हैं और एक दिन सचमुच मर जाते हैं। उन्होंने हमसे बहुत सम्मान से व्यवहार करा लेकिन ये भी बताया कि यदि आपकी नागरिकता पर सवाल करा गया है तो यह मामला ये क्लर्क लोग बात बढ़ने पर स्थानीय राजनेताओं के पास ले जाते हैं फिर आप तमाम तरह से स्टेट की मशीनरी का दुरुपयोग करके सतायी जाएंगी।
कई बातें स्पष्ट होने के बाद हम दोनो वापस आ गए है लेकिन अब विचार कर रहे हैं कि आगे क्या रणनीति हो साथ ही बाबूजी श्री जे.सी.फिलिप जी और आप सभी जनों से निवेदन है कि यदि कोई विशेष सुझाव हो तो अवश्य बताएं।

शुक्रवार, 9 जनवरी 2009

डा.रूपेश के नए बच्चे करेंगे पुराने सवाल

क्या सारी समस्याएं समाप्त हो गयी हैं? हरगिज नहीं...लेकिन अब वो समस्याएं हमें अब हमारी एकजुटता और प्यार के आगे बौनी नजर आने लगी हैं। कुछ समय पहले तक राशन कार्ड या ड्राइविंग लाइसेन्स जैसी चीजें लगता था कि हमारे अस्तित्व को सिद्ध करने के लिए ये बहुत जरूरी हैं लेकिन अब से डा.रूपेश जैसे भाई का साथ और बाबूजी(श्री जे.सी.फिलिप) का मार्गदर्शन हमें ये बता रहा है कि हम जल्द ही एक स्वीकार्य पहचान के साथ समाज में समान संवैधानिक अधिकारों के साथ खड़े होंगे। डा.रूपेश ने सभी लैंगिक विकलांग बच्चों को पिता की हैसियत से अपना नाम देकर सभी बच्चों के भीतर एक नई आत्मा फूंक दी है, सारे बच्चे अलग-अलग की बोर्ड लेकर दिन में अक्सर मांग कर आने के बाद अभ्यास करते मिलते हैं; जल्द ही सारे सरकारी विभागों में इन बच्चों के द्वारा भेजी गई एप्लीकेशन्स दिखेंगी......। सूचना प्राप्ति के अधिकार का प्रयोग करते हुए सरकार से जाना जाएगा कि हमारे जैसे लैंगिक विकलांगों के लिए क्या सरकार ने कुछ विचार करा है अथवा नहीं? हमारी कानूनी स्थिति के क्या संदर्भ है? हमारी नागरिकता की पुष्टि कैसे करी जाती है? जो लैंगिक विकलांग चुनाव में अपना नामांकन भरते हैं या जो वोट देते हैं वो किस परिचय से ऐसा कर पाते हैं? इत्यादि...इत्यादि...।

शुक्रवार, 19 दिसंबर 2008

हिंदी ब्लागिंग ने दिया हिजड़ा होने का दंड/भड़ास से लैंगिक विकलांग मनीषा नारायण सहित तीन की सदस्यता समाप्त

वैसे भी मैंने जीवन में इतने दुःख तकलीफ़ और तिरस्कार को भोग लिया है कि अब तो यदि कुछ भी ऐसा हो तो कोई आश्चर्य नहीं होता लेकिन अब भी कहीं मन में कुछ मानवीय कमजोरियां शेष हैं जिनके कारण मैं कुछ स्थायी धारणाएं बना लेती हूं किसी भी व्यक्ति के बारे में, मुझे याद आते है वो दिन जब लगभग साल भर पहले मुझे भाई डा.रूपेश श्रीवास्तव अपने घर लेकर आये थे किस तरह हाथ पकड़ कर कंम्प्यूटर पर जबरदस्ती बैठाया था मैं डर रही थी कि कहीं कुछ खराब न हो जाए। हिंदी कम आती थी बस कामचलाऊ या फिर हिंदी में दी जाने वाली गन्दी गन्दी गालियां। भाई ने टाइप करना सिखाया तो अजीब लगा कि अंग्रेजी के की-बोर्ड से हिंदी और तेलुगू व तमिल कैसे टाइप हो रहा है। एक उंगली से टाइप करी पोस्ट शायद भड़ास पर अभी भी अगर माडरेटर भाई ने हटा न दी हों तो पड़ी होगी, एक कुछ लाइन की पोस्ट टाइप करने में ही हाथ दर्द करने लगा था। लिखना सीखा, हिंदी सीखी लेकिन मौका परस्ती न सीख पायी। एक पत्रकार और ब्लागर मनीषा पाण्डेय के नाम से समानता होने के कारण भड़ास पर बड़ा विवाद हुआ जिसमें कि तमाम हिंदी के ब्लागर उस लड़की की वकालत और भड़ास की लानत-मलानत करने आगे आ गये। मैंने सब के सहयोग से अपना वजूद सिद्ध कर पाया। मैं लिखती रही, "अर्धसत्य" (http://adhasach.blogspot.com) बनाया भाई साहब ने सहयोग करा। कुछ दिन पहले की बात है कि जब भड़ास के मंच पर एक सज्जन(?) ने डा.रूपेश श्रीवास्तव पर एक पोस्ट के रूप में निजी शाब्दिक प्रहार करा कि वे आदर्शवाद की अफ़ीम के नशे में हैं वगैरह...वगैरह। मैंने, भाईसाहब, मुनव्वर सुल्ताना(इन्हे तो भड़ास माता कह कर नवाजा जाता था) ने इसके विरोध में अपनी शैली में लिखा। अचानक इसका परिणाम जो हुआ वह अनपेक्षित था कि भड़ास पर से मेरी, मुनव्वर सुल्ताना और मोहम्मद उमर रफ़ाई की सदस्यता को बिना किसी संवाद या सूचना अथवा आरोप के बड़ी खामोशी से समाप्त कर दिया गया। इससे एक बात सीखने को मिली कि लोकतांत्रिक बातें कुछ अलग और व्यवहार में अलग होती हैं। माडरेटर जो चाहे कर सकता है इसमें लोकतंत्र कहां से आ गया, उनका जब तक मन करा उन्होंने वर्चुअली हमारा अस्तित्त्व जीवित रखा जब चाहा समाप्त कर दिया। मुझे अगर हिजड़ा होने की सजा दी गयी है तो मुनव्वर सुल्ताना और मोहम्मद उमर रफ़ाई को क्या मुस्लिम होने की सजा दी गयी है? यदि इस संबंध में भड़ास के ’एकमात्र माडरेटर’ कुछ भी कहते हैं तो वो मात्र बौद्धिकता जिमनास्टिक होगी क्योंकि बुद्धिमान लोगों के पास अपनी हर बात के लिये स्पष्टीकरण रेडीमेड रखा होता है बिलकुल ’एंटीसिपेटरी’..... वैसे तो चुप्पी साध लेना सबसे बड़ा उत्तर होता है बुद्धिमानों की तरफ से । आज मैं एक बात स्पष्ट रूप से कह रही हूं कि सच तो ये है कि न तो मुनव्वर सुल्ताना का वर्चुअली कोई अस्तित्त्व है और न ही मोहम्मद उमर रफ़ाई के साथ ही मनीषा नारायण का बल्कि ये सब तो फिजिकली अस्तित्त्व में हैं और वर्चुअली अस्तित्त्वहीन और न ही इनकी कोई सोच है अतः इन्हें किसी मंच से हटा देना इनकी हत्या तो नहीं है। मुझे और मेरे भाई को अभी बहुत कुछ सीखना बाकी है शायद हो सकता है कि आने वाले समय में हम सब भी बुद्धिमान हो सकें और हिंदी ब्लागिंग के अनुकूल दिमाग और दिल रख सकें।
आदतन ही सही लिखूंगी जरूर
जय जय भड़ास

बुधवार, 17 दिसंबर 2008

हिंदी ब्लागरों में मनीषा नारायण ने कोहराम मचा रखा है

दीदी का लिखना बड़ा ही कड़ा रहा है हमेशा से जैसा कि मैं जानता हूं। इन बातों के पीछे कि वे इतनी प्रेम से भरी होने के बाद भी अक्सर नाराज क्यों हो जाती हैं उसका कारण उनका अतीत रहा है। जो लोग उनसे अपेक्षा करते हैं कि मनीषा! तुमने हिंदी सीख लिया अब ब्लागिंग करती हो तो अपने सारे अतीत को भूल जाओ तत्काल जिससे कि तुम कभी व्यथित रही हो। जिंदगी की रेलगाड़ी में भी सीट पर जगह बनाने के लिये धक्का-मुक्की करनी पड़ती है इन्हें सहज ही कुछ नहीं मिला कभी भी। हिंदी ब्लागरों के तो नाक-भौं सिकुड़ गये जब पता चला कि एक "हिजड़ा" तालियां बजाना छोड़ कर उन शरीफों के संग सायबर जगत में ब्लागिंग करेगा। बहुत तिरस्कार सहना पड़ा इस आभासी दुनिया में भी ,एक ब्लाग है "भड़ास" जो कि काफ़ी कुख्यात है अपनी भाषा के कारण लेकिन वह मंच अश्लील हरगिज नहीं है। उस मंच पर मैं दीदी को ले गया सद्स्यता दी उन्होंने एक उंगली से किसी तरह लिखना शुरू करा। वहां आरोप लगाया तमाम नामचीन ब्लागरों ने खुल कर कि प्रमाण दिया जाए कि मनीषा नारायण का अस्तित्त्व है भी या काल्पनिक हैं फिर हैं तो लैंगिक विकलांग हैं या नहीं.........। एक बार फिर जब वणिक सोच ने भड़ास पर कब्जा जमा लिया तो अचानक वहां से मनीषा दीदी की सदस्यता को समाप्त कर दिया गया। इसे कहते हैं उसे हाशिये से भी बेदखल कर दो जो अब तक हाशिये पर था और ये शर्त रख दो कि बिलकुल भी आवाज न करे अगर गाली दी या नाराजगी व्यक्त करी तो गंदे मान लिये जाओगे और कहा जाएगा कि यही तुम्हारी औकात है वगैरह वगैरह...।
संबंधित पोस्ट्स देखिये
http://bharhaas.blogspot.com/2008/12/blog-post_15.html
http://bharhaas.blogspot.com/2008/12/blog-post_7241.html
http://bharhaas.blogspot.com/2008/12/blog-post_6981.html
http://bharhaas.blogspot.com/2008/12/blog-post_9693.html

अब दोबारा इंतजार है उस घेराबंदी का जब तमाम ब्लागिंग गिरोह एग्रीगेटर्स पर भी हमारे जैसे लोगों को प्रतिबंधित करा दें। हम अभी से मानसिक तौर पर तैयार हैं पर किसी के आगे गिड़गिड़ाएंगे नहीं।

मंगलवार, 18 नवंबर 2008

ज्योत से ज्योत जलाते चलो......





पिछले किसी जन्म के सत्कर्म के फलस्वरूप इस जन्म में मेरे तारणहार मेरे गुरुदेव डा.रूपेश मुझे मिल गये। जो विद्या का प्रकाश उन्होंने मेरे भीतर जगाया है वो फैले उसी में उसकी सार्थकता है। पहले मैंने कम्प्यूटर सीखा, हिन्दी सीखी, ब्लागिंग सीखी और जीवन जीना सीखा। अब मैं खुद सक्षम हो गयी हूं कि किसी नये मित्र को सिखा सकूं। इसी ज्योत से ज्योत जलाने के मिशन में मैंने अपनी बड़ी गुरुबहन(लैंगिक विकलांग समुदाय में) रम्भा अक्का को भी कम्प्यूटर की शुरूआती जानकारियां देना शुरू करा था और अब वे स्वयं लिखने पढ़ने लगी हैं। मेरे पास इस खुशी को बताने के लिये शब्द नहीं है। ईश्वर हमारे इसे मिशन को कामयाब करे इसके लिये आप सबकी शुभेच्छाओं की आवश्यकता है, स्नेह बनाए रखें।

ब्लागर संदीप जी के सवाल का सहज उत्तर

मेरी किसी से सहानुभूति नहीं है। आप भले ही ना पुरुष में गिने जाते हों, ना महिला में, फिर भी नहीं। क्योंकि आपका एक गम तो स्पष्ट दिखाई दे रहा है, पर हिन्दुस्तान के जाने कितने ऐसे लोग हैं, जिनकी गिनती पुरुष अथवा स्त्रियों में तो होती है, परन्तु उनकी जिंदगी, जिंदगी नहीं है। आपका लिंग या योनी नहीं है, पर कई ऐसे लोग हैं, जिनमें किसी का हाथ नहीं होता, किसी का पैर नहीं होता, किसी की आंख नहीं होती, कोई बोल नहीं सकता, तो कोई देख नहीं सकता। मेरी यदि उनसे कोई सहानुभूति नहीं है, तो आपसे भी नहीं है। यह भूमिका मैंने केवल इसलिए लिखी कि आप मुझे यह ना समझें कि मैंने मात्र सहानुभूति के चलते आपको ई-मेल किया। फिर भी मेरा मात्र एक प्रश्न है- कि
सैक्स जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग है। आप द्वारा (आप जैसों) सैक्स नहीं करने पर क्या दिमाग कुंठित नहीं होता। और यदि सैक्स किया जाता है, तो कैसे? अन्यथा ना लें, केवल एक जिज्ञासा है - केवल सैक्स के विषय में ही नहीं। आपका जीवन कैसा है, आपको कब पता चला कि आप बाकी और लोगों से अलग हैं, मैं जानना चाहता हूं।
मेरा मोबाइल नंबर, सब-कुछ मेरे ब्लॉग पर आपको मिल जाएगा-
http://dard-a-dard.blogspot.com/
- संदीप शर्मा

संदीप जी सहानुभूति के दरकार तो अब हमें है ही नहीं कि यदि आप हमें सहानुभूति से देख लेंगे तो हमारी दुनिया बदल जाएगी। सत्यतः आपको किसी भूमिका के लेखन का भी कष्ट नहीं करना चाहिये था क्योंकि आपकी जिज्ञासा भी मात्र कमर के नीचे से ही ज्यादा संबद्ध है। अब मैं अपने भाई डा.रूपेश के संपर्क में आ जाने से मानसिक तौर पर इस तरह के सवालों के लिये मजबूती से तैयार हूं। दुःख है कि आपने अर्धसत्य की पुरानी पोस्ट्स को नहीं पढ़ा और वो भी उस पोस्ट को जो कि तमाम अन्य दिग्गज हिंदी ब्लागरों ने अर्धसत्य से लेकर अपने ब्लाग पर छापी थी। आपकी एक अत्यंत पुष्ट धारणा है कि सैक्स जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग है, कब इंकार है इस बात से लेकिन आपके जीवन का........। ईश्वर रचित हर ज्ञानेन्द्रिय व कर्मेन्द्रिय जीवन का महत्त्वपूर्ण अंग हैं। आप अर्धसत्य की इस पोस्ट को पढ़ें और इसके आस पास की दो-चार अन्य पोस्ट भी.........
http://adhasach.blogspot.com/2008/04/blog-post_06.html
आशा ही नहीं बल्कि पूर्णरूपेण विश्वास है कि आप कि जन्मांधों के विषय में भी अप इतने ही गहरे जिज्ञासु होंगे। अनुराग बनाए रहिये इसी तरह से ताकि आपके सवालों के उत्तर सहजता से दे सकूं।

रविवार, 24 अगस्त 2008

रफ़्तार डॉट काम के ब्लाग रिव्यू में अर्धसत्य : पूजा बहन को धन्यवाद

सार्थक चीख
समाज में तिरछी नजरों से देखे जाने वाले एक वर्ग के व्यक्ति ने ब्लॉगजगत में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई है। ब्लॉग 'लैंगिक विकलांग' द्वारा बनाया गया है। ब्लॉगर अपने अनुभवों पर यहां बात करती हैं। आधासच डॉट ब्लॉगस्पॉट नाम से बनाया गया यह ब्लॉग समाज में होते परिवर्तन को रेखांकित करता है। परिवर्तन, जो वक्त के साथ आता ही है। ब्लॉग का टाइटल कहता हैः हम अधूरे इंसान अगर सच भी बोलें तो लोग कहते हैं उसे अर्धसत्य। ब्लॉग इसी साल बनाया गया है और आमतौर पर नियमित अपडेट होता है।
यह रिव्यू पूजा बहन ने लिख कर यह जाहिर करा है कि लोग अर्धसत्य की तरफ ध्यान दे रहे हैं, मैं अपनी उस उपस्थिति को आज के समाज में दर्ज करा पा रही हूं जिसे लगभग तीस साल पहले नकार दिया गया था और मेरे माता-पिता को मेरा जन्म प्रमाणपत्र यह कह कर नहीं दिया गया था कि न तो यह लड़का है न ही लड़की तो सर्टिफ़िकेट पर क्या लिखें? मेरे माता पिता ने मुझे बड़ी ही उहापोह में लड़का(क्योंकि लड़का नहीं था) मान कर पाला लेकिन ग्रेजुएशन तक आते-आते तो मुझे हर कदम पर चुभो-चुभो कर यह एहसास दिलाया गया कि मैं मानवों की सामजिक मुख्यधारा में स्वीकार्य नहीं हूं। तब मुझे सहारा दिया मेरी लैंगिक विकलांग गुरू "शीला अम्मा" ने जो खुद भी अपने समय में य तिरस्कार की पीड़ा भुगत चुकी होंगी। अब मैं अपने प्रेरणास्रोत व मार्गदर्शक से मिल चुकी हूं जो कि सही अर्थों में गुरुदेव कहलाने के अधिकारी हैं, जिन्होंने मुझे अच्छी हिंदी सिखाई, कम्प्यूटर सिखाया, ब्लागिंग सिखाया और यह बताया कि मैं ईश्वर की गलती नहीं बल्कि उनकी सर्वश्रेष्ठ रचना हूं जिसमे कि स्त्री और पुरुष दोनो के गुण हैं और अवगुण किसी के भी नहीं; जीवन को नया अर्थ मिल गया है। अब भगवान से प्रार्थना है कि मेरे भाई डा.रूपेश श्रीवास्तव का कद इतना बड़ा हो जाए कि हर लैंगिक विकलांग को इनका साया नसीब हो सके। एक बात और लिखना है कि अब तक जो शब्द मेरे जैसे लोगों के लिये प्रयोग करे जाते थे उनसे भाईसाहब असहमत थे जैसे कि हिजड़ा या किन्नर, तो उन्होंने एक सर्वथा नए सार्थक शब्द की रचना करी "लैंगिक विकलांग",जोकि अब प्रयोग में आने लगा है और आशा है कि आने वाले समय में हिंदी के शब्दकोश भी इस शब्द को स्वीकार लेंगे।

गुरुवार, 21 अगस्त 2008

निर्बल के बलराम और रक्षा का वचन

आज मुझे मेरे सारे भड़ासी भाईयों और यशवंत दादा के साथ रजनीश की बहुत याद आयी है वैसे तो ये सब मेरे दिल में हैं....

मेरे डाक्टर मामा ने दिया रक्षा का वचन राखी के त्योहार पर....

अब तक मैं सही तरीके से ब्लागिंग करना सीख ही नहीं पायी थी ये मेरी लापरवाही थी लेकिन अब सब कर सकती हूं।

 

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आयुषवेद by डॉ.रूपेश श्रीवास्तव