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बुधवार, 4 फ़रवरी 2009

मेरी बहन की खुशी.......

अर्धसत्य परिवार के मार्गदर्शकों में से एक श्री मोहम्मद उमर रफ़ाई व मनीषा नारायण दिल खोल कर ठहाके लगाते हुए
जब हम किसी काम को "बस यूं ही" अपनी खुशी के लिये शुरू करते हैं और वह काम बढ़ते-बढ़ते एक महाअभियान का रूप धारण कर ले तब आपको उसमें होने वाली छोटी सी सफलता भी उसी अनुपात में विशालता लिये हुए लगती है। कुछ समय पहले तक शायद मेरी बहन मनीषा नारायण की मुस्कराहट मुझे इतना आह्लादित न करती रही हो लेकिन आज अब मैं इस बात को देख रहा हूं कि मुझे उनकी हर मुस्कान, हर हंसी बहुत बड़ा सुख दे जाती है; ठीक ऐसा ही होता है जब भूमिका या दिव्या जैसे मेरे प्यारे बच्चे किसी बात पर मुझसे चुटकी लेकर बात करते हैं। आदरणीय बाबू जी शास्त्री श्री जे.सी.फिलिप ने जो पुस्तकें भेजी हैं वह एक नया उत्साह लेकर आयी हैं विशेष तौर पर मेरे लिये। अब मैं दीदी को दिल खोल कर हंसते देखता हूं तो लगता है कि जीवन सफ़ल सा होता प्रतीत हो रहा है।

गुरुवार, 22 जनवरी 2009

बाबूजी का वात्सल्य: मनीषा नारायण को आशीष सहित भेजी पुस्तकें

बुद्ध की कहानियां,भारतीय वन्य जीव,पौराणिक कहानियां,परमाणु से नैनो प्रौद्योगिकी तक : बाबू जी ने भेजी पुस्तकें बचपन में ले जाती हैं बाबूजी के हस्तलिखित आशीर्वाद उनकी मानस पुत्री मनीषा नारायण के नाम : शब्दों से जुड़ती स्नेह-रज्जु
आज मेरे जीवन का एक बहुत बड़ा खुशियों भरा दिन है, मेरा मुहिम एक नए आयाम को छू रहा है। हमारे मार्गदर्शक गुरुवर्यसम आदरणीय शास्त्री श्री जे.सी.फिलिप जी ने मनीषा दीदी के लिये कुछ पुस्तकें भेजी हैं अपने हस्तलिखित संदेश के साथ ; जो कि मुझे इस बात का एहसास बड़ी शिद्दत से दिलाने के लिये काफ़ी है कि अब वाकई मेरे प्रयास के रंग में एक और प्रकाश की पट्टी जुड़ गई है और इसी तरह इस मुहिम में एक सप्तरंगी इंद्रधनुष उतर आयेगा, सफ़लता मिलेगी जब सारे बच्चे सम्मान से सिर उठा कर जी सकेंगे, समाज में सहज भाव से स्वीकारे जाएंगे, समान संवैधानिक अधिकार पा सकेंगे.........। मनीषा दीदी को पुत्रीवत स्वीकारने वाले हम सबके बाबूजी के द्वारा मुझसे फोन पर बात कर लेना भर मुझमें नयी ऊर्जा का संचार देता है, उनकी फोन पर दूर से आती वात्सल्य और करुणा में डूबी आवाज कई-कई दिनों से लगातार जागे रहने की मेरी शारीरिक थकान को न जाने कहां गायब कर देती है और मैं फिर जुट जाता हूं अपने यायावरपन में अपने बच्चों का हित तलाशने के लिये। जब मैंने मनीषा दीदी को बताया था कि बाबूजी आपके लिये पुस्तकें भेजने वाले हैं तो खुशी और आंसू का एक अजीब सा भाव उनके चेहरे पर मैंने देखा था और अब यकीन गहरा हो चला है कि हम सब के समेकित प्रयत्नों से एक दिन बस खुशियां ही खुशियां होंगी।
 

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आयुषवेद by डॉ.रूपेश श्रीवास्तव