मंगलवार, 12 अक्टूबर 2010

किन्नर,किन्नर,किन्नर....अरे हम किन्नर नहीं लैंगिक विकलाँग हैं जिन्हें तुम हिजड़ा कहते हो

प्रेम, आदर, सहानुभूति जैसे भावों के चलते ही सही पर हमें किन्नर कह कर संबोधित करा जाता है जो कि किसी भी तरह से हमारी स्थिति की व्याख्या नहीं करता। न ही यह शब्द हमें न्याय दिला पाता है कि हम समाज में बराबरी का दर्जा पा सकें। मुझे प्रेम करने वाली मेरी बहन डॉ.दिव्या श्रीवास्तव ने भी जो अपने ब्लॉग ZEAL पर हालिया पोस्ट लिखी है उसमें हमें किन्नर ही लिखा है।
किन्नर शब्द और लोगों के बारे में विस्तार से जानने के लिये इस लिंक पर पधारें
किन्नर नहीं हैं हमलोग

शनिवार, 28 अगस्त 2010

सामाजिक बदलाव की हवा चली पाकिस्तान में

पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने लैंगिक विकलांगों को मुफ्त शिक्षा और चिकित्सा की सुविधाएँ प्रदान करने के आदेश दिए हैं। मुख्य न्यायधीश ने लैंगिक विकलांगों से संबंधी एक याचिका पर फैसला सुनाते हुए चारों प्रांतों और इस्लामाबाद प्रशासन को यह आदेश दिए। पुलिस को भी आदेश दिया कि वह लैंगिक विकलांगों का शोषण न करें और उन के खिलाफ झूठे मुकदमे दर्ज न करें। जस्टिस इफ्तिखार ने पुलिस को यह भी आदेश दिया कि यदि लैंगिक विकलांगों के खिलाफ कोई मुकदमा दर्ज किया जाए तो उसकी सूचना सुप्रीम कोर्ट जरूर दी जाए। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि लैंगिक विकलांगों के खिलाफ इस तरह की कोई भी कार्रवाई समाजिक कल्याण विभाग और लैंगिक विकलांगों की संस्था के प्रतिनिधि की मौजूदगी में हो।
ये एक शुभ संकेत है कि हमारे पड़ोसी देश में ऐसा कानूनी प्रक्रिया के द्वारा हो रहा है। जैसा कि बाबू जी शास्त्री जे.सी.फिलिप कहते हैं कि सामाजिक बदलावों की गति बहुत धीमी होती है तो ये भी हो सकता है कि ये इसी बदलाव के तहत हो।

मंगलवार, 25 मई 2010

प्रिय मनोज तुम हिजड़ा नहीं हो,माता-पिता और डॉक्टर से सलाह लो

मुझे अक्सर पत्र आते हैं कि कुछ नौजवान दिशाभ्रम और बदलते हुए सामाजिक परिवेश की सहमति के कारण खुद को हिजड़ा मानने लगते हैं और हमारे समुदाय में शामिल होना चाहते हैं। उन सभी भाईयों को आज बहुत दिनों बाद एक साथ उत्तर दे रही हूँ।
प्रिय भाई
प्यार
एक बात बिल्कुल साफ़ जान लो कि तुम्हें लड़कियों के कपड़े पहन कर बाहर घूमने में अच्छा लगता है तो तुम हिजड़ा हो ऐसा नहीं है। हिजड़ा यानि कि लैंगिक विकलांग होना एक दुर्भाग्य है जिसमें कि स्त्री या पुरुष जननांग का कुदरती तौर पर विकास ही न हुआ हो लेकिन आप तो खुद बता रहे हैं कि आप इक्कीस साल के लड़के हैं यानि कि आप शारीरिक तौर पर सही और स्वस्थ हैं। आप मनोरोग से ग्रस्त हैं आप यदि हार्मोन उपचार लें तो आपके दिमाग में होने वाले ये बदलाव सहज ही रुक जाएंगे और आप स्वस्थ पुरुष का जीवन जी सकेंगे। स्त्रियों के कपड़े पहनने की इच्छा या गुदा मैथुन कराने की इच्छा होना ही केवल आपको हिजड़ा नहीं बना देती, आयुर्वेद में बताये गए नपुंसकता के एक प्रकारो में से ये एक है जो कि आसानी से आप इलाज करा के सही हो सकते हैं। आपको किसी हिजड़े के सहयोग की नहीं बल्कि चिकित्सक की जरूरत है। आप इस बात को दिमाग से बिलकुल निकाल दीजिये कि आप हिजड़े हैं या आप कोई मंजू हैं बस याद रखिये कि आप मनोज हैं। अपने माता-पिता, भाई बहन और दोस्तों से भी इस विषय पर चर्चा करिये। यदि आप सचमुच मुझे बड़ी बहन का दर्ज़ा दे रहे हैं तो बहन की सलाह मानिये। हिजड़ा होने की पीड़ा मैं जानती हूँ कि लैंगिक विकलांगता किस तरह एक अभिशाप जैसा लगती रही है। आपके अच्छे स्वास्थ्य और भविष्य की हम सब कामना करते हैं। आपको लिखे इस पत्र को अर्धसत्य पर प्रकाशित करने जा रही हूं लेकिन आपकी पहचान नहीं प्रकाशित करूंगी न ही आपके फोटो प्रकाशित करूंगी। अपने माता पिता से अवश्य बात करिये ये बात फिर से कह रही हूं। आप चाहें तो हमारे बड़े भाईसाहब जो कि इस पूरे परिवार के कुटुंब-प्रमुख की हैसियत से हैं आप उनसे सम्पर्क करें उनका नाम है डॉ.रूपेश श्रीवास्तव और उनका ई मेल पता है- aayushved@gmail.com
हृदय से प्रेम सहित
आपकी बड़ी बहन
मनीषा नारायण
(पोस्ट में लिखे गये नाम काल्पनिक हैं)

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010

लैंगिक विकलांगों को सेक्स का खिलौना बनाने के बौद्धिक प्रयास





हमारे देश में समलैंगिकता को ज से उच्च न्यायालय ने अपराधबोध से मुक्त क्या कराया(भले ही उच्चतम न्यायालय में अभी भी इसके विरुद्ध अपील करी गयी है) उनकी चांदी हो गयी जो कि लैंगिक विकलांगो को सेक्स के खिलौने मानते हैं। मुंबई में लैंगिक विकलांगों के हितों के नाम पर काम करने वाले हम जैसे ही एक बंदे लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी ने काफ़ी नाम कमाया है। अस्तित्त्व नाम से एक गैर सरकारी संगठन भी चला रखा है। विदेश यात्राओं से लेकर टीवी कार्यक्रमों में दिखना इनका शगल है। जिस तरह हर समुदाय में होता है कि उनके ही स्वयंभू नेता उन्हीं का दोहन और शोषण करते हैं हमारे समुदाय में भी हो रहा है। शबनम मौसी नाम सब जानते हैं उन्होंने लैंगिक विकलांगता को राजनैतिक ताकत हासिल करने के लिये इस्तेमाल करा और लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी प्रसिद्धि और पैसा कमाने के लिये इस्तेमाल कर रहे हैं।
अभी हाल ही में मुंबई में एक सौन्दर्य प्रतियोगिता का आयोजन करा गया जिसमें कि तमाम जगहों से लैंगिक विकलांगों को बुलाया गया और लाखों रुपये का खर्च कार्यक्रम के आयोजन में दर्शाया गया। जीनत अमान और सेलिना जेटली जैसे भ्रष्टबुद्धि फिल्म अभिनेत्रियो का भी इस कार्यक्रम में सहयोग रहा। इन लोगों ने बड़े बड़े व्याख्यान दे डाले कैमरे के सामने कि जैसे ये कोई क्रान्तिकारी पहल कर चुके हों।
इन सभी से सवाल कि क्या समाज की मुख्यधारा से लैंगि विकलांगों को जोड़ने का एक यही रास्ता है? सौन्दर्य स्पर्धाओं के बाद ये कहाँ खो जाते हैं सेलिना जेटली की तरह माडलिंग या फिल्मों में आकर सम्मानपूर्वक जीवन क्यों नहीं जी पाते? क्यों नहीं लैंगिक विकलांग बच्चों के लिये आजतक लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी या शबनम मौसी ने स्कूल की मांग करी या खुद ही खोल दिया? क्यों नहीं ये आगे आकर CRY जैसी संस्थाओं का सहयोग लेकर बच्चों को पढ़ाती लिखाती हैं? क्यों नहीं इन आयोजकों ने मुंबई में ट्रेन में भीख मांगने या कमाठीपुरा में सेक्स के भूखे दरिंदों की भूख मिटा कर अपने पेट की भूख मिटा कर दर्दनाक जीवन जीने वाले मासूम लैंगिक विकलांगों को इस आयोजन की सूचना तक दी?(ये कहेंगे कि हमने तो अखबारों में सूचना दी थी तो जरा ये कुटिल बताएं कि कितने हिजड़े अखबार पढ़्ने के लायक बनाए आजतक इन लोगों ने???)
आखिरी सवाल कि इन आयोजकों ने कैसे निर्धारित करा कि सारे प्रतिभागी लैंगिक विकलां(हिजड़े) ही हैं, क्या कोई डॉक्टरी सर्टिफ़िकेट था? यदि नहीं तो लाली पाउडर लगा कर तो शाहरुख खान से लेकर आमिर खान तक सभी भाग ले सकते थे। कोई उत्तर नहीं है किसी के पास ......... इस दिशा में कोई प्रया करा जाएगा कि लैंगिक विकलांगता के चिकित्सकीय पैमाने निर्धारित हों और इस आधार पर उन्हें शिक्षा से लेकर नौकरियों में वरीयता दी जाए, आरक्षण दिया जाए। ऐसे तो अंधे भी सुंदर होते हैं तो क्या उनके अंधेपन को लेकर उन्हें अलग सा जीव मान लिया जाए और उनकी सौन्दर्य स्पर्धाएं कराई जाएं? क्यों ये विचार इन मासूमों के दिमाग में ठूँसा जा रहा है कि ये सौन्दर्य प्रतियोगिता में ही अपना टैलेंट दिखा सकते हैं ? कभी इनकी कुश्ती या दौड़ की प्रतियोगिता रखकर देखा जाए, बस इतना बताना है कि हम जैसे मनुष्य जैसे दिखने वाले प्राणी सचमुच मनुष्य ही हैं तुम्हारे ही पेट से पैदा हुए, हमें एलियन या दूसरे ग्रह से आया न समझो।

सोमवार, 22 फ़रवरी 2010

जिस बात से भय लग रहा था



जिस बात से भय लग रहा था कि कहीं हम जैसे लैंगिक विकलांगों के समाज में स्वीकारे जाने पर हमारी पहचान न विकृत हो जाए। आजकल जिस तरह से लैंगिक विकलांगता को एक तीसरा लिंग जताया जा रहा है ये सबसे खतरनाक साजिश है कुछ कुटिल दिमागों की जो कि अपनी विकृत और बीमार मानसिकता को इस तरह से सामने लाकर भोले बन रहे हैं। मुंबई में होने वाली इस तरह की सौंदर्य प्रतियोगिताएं क्या भला कर पा रही हैं ये सवाल कोई नहीं उठाने का साहस करता। स्त्री एवं पुरुष समलैंगिक संबंधों को अपनी सैक्स प्रायोरिटी(काम वरीयता) बता कर रुग्ण कामुकता के लोग अपने लिये समाज में सहानुभूति पैदा कर रहे हैं और साथ में एक जो धूर्तता कर रहे हैं वह है हम जैसे लैंगिक विकलांगों को कुछ पैसों का लालच दिखा कर अपने कार्यक्रमों में शामिल करना। मैं इस तरह के आयोजनों का पूरी ताकत से विरोध करती हूँ, थू है उन आयोजकों पर जो कि अपने लाभ के लिये बेचारे कम पढ़े-लिखे और अपना भला बुरा न समझ पाने वाले लैंगिक विकलांग बच्चों को इस्तेमाल कर रहे हैं। ये प्रतियोगिताएं मात्र वैसी ही हैं जैसे कि अंधों या लंगड़ों के लिये अलग से सौन्दर्य प्रतियोगिता कराई जाए। मूल मुद्दा शिक्षित करके समाज की मुख्यधारा से जोड़ना है ताकि देहव्यवसाय(गुदामैथुन के द्वारा) या मजबूरी में नाच गाकर पेट पालने की पीड़ा को समाप्त करा जा सके।

शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2010

दुनिया बनाने वाले भगवान,अल्लाह,GOD का लिंग-निर्धारण हो गया


ईश्वर की गलती हूं मैं और मेरे जैसे लोग
भड़ास परिवार से जुड़े सभी पुराने लोग जानते हैं कि मैं एक लैंगिक विकलांग(हिजड़ा) हूं लेकिन मेरी इस कमी को मेरे इस परिवार ने कभी मेरे परिचय में आड़े न आने दिया। भड़ास परिवार से दिया गया प्रेम और हमारे बड़े भाई अवतार स्वरूप डा.रूपेश श्रीवास्तव जी ने हमें हमारी परंपरागत पहचान से हट कर जो नई पहचान दी है उसके लिये यदि हम अपनी चमड़ी के जूते भी बना कर उन्हें पहना दें तो कम है। हमारे रिश्ते में इस औपचारिक बकवास की गुंजाइश नहीं है। बात ये है कि मेरे दिमाग में हमेशा से यह सवाल रहा कि दुनिया बनाने वाली शक्ति भी क्या लैंगिकता की मोहताज होगी? या फिर वह एकोSहं बहुस्यामि के विचार के अमीबा या हाइड्रा की तरह बढ़ा होगा? वह क्या है पुल्लिंग? स्त्रीलिंग?? या फिर उभयलिंगी केंचुए की तरह??? या फिर मेरी तरह नपुंसक षंढ??????? भाईसाहब से करे गए मेरे हजारों सवालों में से बस यही अनुत्तरित रहा है क्योंकि भाई मानते हैं कि ईश्वर के विषय में चर्चा करने की क्षमता उनमें नहीं है जब वो मिल कर स्वयं अपने बारे में बताएगा तब उसकी बात करेंगे। लेकिन मुझे लग रहा है कि मुझे मेरे सवाल का उत्तर सेमेटिक रेलिजन्स में मिल गया है। मुस्लिमों की मजहबी पुस्तक कुरान और ईसाइयों की धर्मपुस्तक बाइबिल में बताया गया है कि अल्लाह या परमेश्वर ने आदम यानि एडम(प्रथम मनुष्य) को अपने ही रूप में बनाया(फ़रिश्तों से आदेश देकर बनवाया) और स्पष्ट है कि आदम तो पुरुष हैं और उनकी एक पसली से प्रथम स्त्री हव्वा का निर्माण करा। कहा गया है अल्लाह या परमेश्वर प्रकाश(नूर) है। अब सवाल ये खड़ा हो गया है कि क्या ये एक रहस्य है या बहुत बड़ा झूठ कि एक तरफ़ उसे अपने जैसा यानि पुरुष लिखा है और दूसरी तरफ प्रकाश। यदि दुनिया बनाने वाला प्रकाश है तो उसे आदम को सूरज, जुगनू , ट्यूबलाइट या बल्ब की तरह का बनाना चाहिए था यदि हाड़मांस(लिंगधारी) बनाया तो ये नहीं बताना था कि in his own form........ अपनी ही सूरत में........। यदि आदम को लिंग है तो शतप्रतिशत ईश्वर को भी होना चाहिए अन्यथा ये बातें मात्र कल्पना हैं और वो भी पुरुषों की जिन्होंने सभ्यता के विकास क्रम में नर और मादा मानव की पसलियों में अंतर देख कर ये कहानी रच ली और खुद को ईश्वर की सूरत में जता दिया। ये विशुद्ध तर्क है मेहरबानी करके कोई इसे कुतर्क कह कर मुझे शान्त कराने का आग्रह न करे। यदि समुचित उत्तर है तो अवश्य शंका का निराकरण करे। यानि कि हमारे जैसे लोग उस परमात्मा की गलती हैं क्योंकि हमारे जैसे लोगों का तो कहीं जिक्र ही नहीं है कि उसने मुखन्नस(हिजड़े) भी बनाए हैं कभी। क्या सचमुच परमात्मा गलतियां करता है??????????

बुधवार, 20 जनवरी 2010

कुछ महीने न लिख कर क्या देख सकी वो बताना है

पिछले कुछ महीनों से सक्रिय लेखन बंद कर के एक प्रयोग करके देख रही थी। इस प्रयोग में मैने ब्लागिंग के बाद में मैंने जो नजरिया पाया था उस नई नजर से दुनिया को देख कर समझने की कोशिश कर रही थी कि शायद कुछ बदलाव आया होगा लेकिन कुछ बदला ही नहीं है बस ये है कि कुछ लोग मुझे पहचानने लगे हैं, इस नयी पहचान के चलते जो सामाजिक कद हासिल हुआ है उसमे पत्रकार बंधुओं को लगने लगा है कि मैं भी घटनाओं पर अपनी राय दूं। अभी जब कुछ समय पहले समलैंगिकता वाले मामले में कानूनी उठापटक चल रही थी तो कई लोगों ने मेरी राय जानना चाहा कि मैं इस बारे में क्या विचार करती हूं। मैंने एक बात देखी कि हर जगह पूंजी का जोर है पैसे की ताकत से सारे काम सिद्ध हो रहे हैं। हमारी न्याय व्यवस्था और न्याय प्रणाली के साथ साथ ही मैंने न्याय का पालन कराने वाली संस्थाओं को भी नये नजरिये से देखने का प्रयास करा लेकिन कुछ भी बदलाव नहीं है। बाबू जी डा. जे.सी.फिलिप सही कहते हैं कि हमारा मसला तो सामाजिक मसला है और सामाजिक बदलावों की गति बहुत धीमी होती है इसलिये फिलहाल कुछ अपेक्षा करना भी व्यर्थ है। लैंगिक विकलांगता के मुद्दे को दरकिनार करके धनी और कुटिल लोगों ने खुद ही एक लैंगिक अल्पसंख्यक वर्ग रच डाला जिसे उन्होंने "LGBT समूह" नाम दे डाला और गुदा मैथुन से लेकर मुख मैथुन तक को अपनी निजी काम-वरीयताओं में गिना कर कानूनी नौटंकी करके भारतीय सभ्यता के मुंह पर कालिख पोत दी पर हमारे माननीय न्यायाधीश तर्कों के आगे घुटने टेके रहे। आश्चर्य होता है जब न्यायाधीश अपने निजी विवेक का जरा भी प्रयोग नहीं करते। आजकल मेरा रुझान ’विधि के शासन’(Rule of law) की तरफ है जिसे एक आम नागरिक होने की हैसियत से जानने का प्रयत्न कर रही हूं। काफ़ी दिनों बाद लिख रही हूं तो विचारों का तारतम्य आसानी से नहीं बन पा रहा है। मुझे पता है कि जो भड़ास इतने दिनों से दम साध कर रोके हुए थी अब उबल-उबल कर बाहर आएगी। इस बीच मैं अपने बड़े भाई और गुरुदेव डा.श्री रूपेश श्रीवास्तव जी के सम्पर्क में रही, लंतरानी समूह की संचालिका और भड़ास की संरक्षिका मेरी बड़ी बहन मुनव्वर(सुल्ताना)आपा के जुड़ाव में भी लगातार हूं इसलिये कुछ अविस्मरणीय पल तस्वीरों के रूप में कैद हो सके जो आप सबके साथ बांटना है।

मंगलवार, 26 मई 2009

मंगलवार, 21 अप्रैल 2009

मेरे दोस्त का बच्चा हिजडा निकला !!

(सारथी पर हाल ही में छपा शास्त्री जी का लेख) लैंगिक विकलांगों पर मैं ने अभी तक जो कुछ लिखा है उन में टिपियाये गये प्रश्नों के उत्तर मैं अगले आलेख में दूँगा. मेरा अनुरोध है कि तब तक पाठकगण एवं विकलांग मित्र सबर के साथ इंतजार करें!

दो दशाब्दी पहले की बात है, बडे भोर को अचानक मेरे एक मित्र का दूरभाष आया कि वह भारी मुसीबत में है अत: मैं तुरंत अस्पताल पहुंचूँ. गिरते पडते वहां पहुंचा तो रोनी सूरत लेकर वह बाहर खडा हुआ था. पूछा तो बताया कि सुबह चार बजे पत्नी का प्रसव हो गया लेकिन बच्चा न नर है न मादा क्योंकि पुरष-स्त्री दोनों लिंग बच्चे के शरीर में  मौजूद है.

मेरे लिये यह पहली जानकारी नहीं थी इस कारण मैं ने उससे कहा कि वह तुरंत ही रेलगाडी से बच्चाजच्चा को लेकर पास के ही एक शहर के सर्जन से मुलाकात करे. उसने ऐसा ही किया. इधर मैं ने सब को खबर दे दी कि बच्चे की कुछ गंभीर समस्या के कारण उसे बडे अस्पताल ले जाना पडा है. उस अस्पताल में जनीतक जांच से पता चला कि वह बच्चा एक लडकी है. सर्जन ने मांबाप को आश्वस्त किया और बच्ची को खिलाने के लिए एक दवा दे दी.

डाक्टर का निर्देश यह था कि दस साल की उमर तक बिना किसी को पता लगे उसका पालनपोषण  करें, दवा देते रहें, और उसके बाद उसकी शल्यक्रिया कर दी जायगी. उस युवा परिवार ने ऐसा ही किया. दवा देते रहे, बच्चे की विकलांगता हरेक से छुपा कर रखी, और  उसे हर तरह से ट्रेनिंग दी कि वह किस तरह से अपनी विकलांगता को छुपा कर रखे. उसे कभी भी हीनभावना से ग्रस्त न होने दिया.

समय आने पर शल्यक्रिया से लिंग को (जो दवा के असर से लगभग सूख सा गया था) हटा दिया गया. तब कहीं मांबाप की जान में जान आई कि अब बच्ची एक लडकी के रूप में चैन की जिंदगी बिता सकती है. वह लडकी असामान्य बुद्धि और हिम्मत की धनी थी एवं आज हिन्दुस्तान के एक कोने में एक उन्नत स्थान पर जी रही है.

आज हिन्दुस्तान में जितने हिजडे हैं, उन में से अधिकतर (1000 में से 990 या अधिक)  इस तरह की जनीतक-गलतियों के मारे हुए हैं. जीन्स के हिसाब से वे या तो पुरुष हैं या स्त्री हैं लेकिन पैदाईश के समय वे जननांगों में विकलांग निकले. समय पर उनको वैज्ञानिक/डाक्टरी मदद न मिल पाई, बल्कि उनके मांबाप ने “लोकलाज” के कारण उनको “फेंक देना” उचित समझा. इस कारण उनको उठा ले जाकर हिजडों ने पाला. वहां वे पल गये, लेकिन पढाई लिखाई न हो पाई, नौकरी पर कोई रखता नहीं है, अत: हिजडों के बीच जो चलन है (पैसा मांगना)  उसी पर चल कर वे जीने की कोशिश कर रहे हैं. इसका सारा दोष सिर्फ उनको देना उनकी दूसरी हत्या है  -- पहली हत्या मांबाप नें उनको त्यागने के द्वारा की, दूसरी हत्या मैं और आप अपनी क्रूर और संवेदनाहीन बोली द्वारा करते हैं.

यदि समाज किसी समूह से उस का हर मौलिक अधिकार (शिक्षादीक्षा, घरबार, नौकरी के अवसर) छीन ले, हर चीज उनके लिये वर्जित कर दे, अनको सीधे रास्ते से न तो राशनकार्ड दे, न पासपोर्ट दे, न डाईविंग लाईसेंस दे, बल्कि उनको भूखा और नंगा छोड दें,  और उसके बाद उन पर दोष लगाये कि वे पैसे के लिये छीनाझपटी करते हैं तो दोष समाज का है न कि लैंगिक विकलांगों का. इस नजरिये से वास्तविकता को देखपहचान कर हमें लैगिक विकलांगों के सशक्तीकरण के लिये कार्य करना चाहिये.

हिजडों को घिन से, नीची नजर से, तुच्छ नजर से देखना आसान है. उनके लिये कुछ करना कठिन है.  यदि अभी भी आप सारा दोष लैंगिक विकलांगों पर थोपना चाहते हैं तो युवा सिद्धार्थ (गौतम बुद्ध) का एक वाक्य याद दिलाना चाहता हूँ कि “किसी से उसका जीवन छीनने वाले व्यक्ति से बडा वह होता जो उसे जीवनदान देता है”.(मूल लेख सारथी चिट्ठे पर शास्त्री जी के द्वारा लिखा गया था. उनकी विशेष व्यक्तिगत अनुमति के कारण इस लेखन परंपरा को  अर्धसत्य पर पुन: प्रकाशित किया जा रहा है.)

बुधवार, 15 अप्रैल 2009

पैसे की खातिर इस बहुत छोटे से अपराध को मजाक की तरह कर डालते हैं

चुनावी माहौल में छुटभैय्ये नेताओं की सरगर्मिया बढ़ गई हैं। हमारे जैसे उपेक्षित लोगों के पास भी चक्कर मारने के लिए ख़ास समय निकला जा रहा है। अब बोगस नामों से वोट तो हम ही डालेंगे न .... कभी मर्द बना कर इस्तेमाल करे जायेंगे कभी औरत बना कर ..... यही तो होता आया है इतने सालों से की भले ही राशन कार्ड न बन पाया हो हमारा लेकिन हम सभी हर चुनाव में वोट जरूर डालते हैं या यूँ कहिये की हमसे डलवाया जाता है और हम तो वैसे भी पैसे की खातिर इस बहुत छोटे से अपराध को मजाक की तरह कर डालते हैं क्योंकि हमें क्या पता की वोट की ताकत क्या होती है ..... हमें भी पढाओ - लिखाओ ताकि हम भी तुम्हे एक अच्छा मुल्क देने में मदद कर सकें और अगर इस बात को समझ कर भी नज़रंदाज़ कर दिया तो ये तुम्हारा दुर्भाग्य होगा की इतनी बड़ी लोकसंख्या को तुम कभी अपना न सकोगे।

एक बार फिर रुला दिया मीनाक्षी को.......

पत्रकारिता ने एक बार फिर रुला दिया मीनाक्षी को और सवालों का अनसुलझापन जैसा था वैसा ही है इतने बड़े आयोजन से सिर्फ़ लाभ हुआ उन बौद्धिकता का ढिंढोरा पीटने वालों को जिन्होंने लैंगिक विकलांगता को मात्र एक "आईटम" बना कर जुगाली करना शुरू करा है। इस पोस्ट में देखिये.....

हिजडों के साथ मेरा अनुभव !!

(सारथी पर हाल ही में छपा शास्त्री जी का लेख) हिजडे एक ऐसा यथार्थ है जिसे हम स्वीकार करना नहीं चाहते. लेकिन मेरा अनुमान है कि सारथी के इस लेखन-परम्परा द्वारा कम से कम कुछ लोग सच्चाई पहचान जायेंगे. पुनीत ओमर  ने अपनी टिप्पणी में कहा है:

बेशक इन्हें भी किसी भी अन्य विकलांग की तरह ही समाज और परिवार का हिस्सा बनाया जा सकता है लेकिन इनसे घ्रणा का प्रमुख कारण है इनका जीविकोपार्जन का तरिका जो की एक परिपाटी के रूप में चला आ रहा है. आज भी जब किसी हिजडे के बारे में कल्पना करें तो हमें हमेशा अजीब सी लाली और झुमके बिंदी से सजे, जोर जोर से ताली बजाते, बसों, ट्रेनों में अश्लील हरकतें करते हुए पैसे वसूलते हुए कुछ लोग ही क्यों स्मरण में आते हैं? इनमे से एक भी कृत्य ऐसा नहीं है जो की उन के विकलांग होने से जुडा हो. फिर भी वो ऐसा करने को मजबूर हैं जो की उन्हें घ्रणा का पात्र बनाता है. आशा है की आने वाली कड़ियों से ज्यादा नहीं तो कमसे कम ५० लोगों की सोच और नजरिया तो बदलेगा ही.

मुझे पूरी उम्मीद है कि ऐसा ही होगा.

मैं लगभग 5 साल की उमर में हिजडों या लैंगिक विकलांगों से परिचित हुआ. ग्वालियर के आसपास किसी मंदिर में इन लोगों का एक समूह था जो नियमित रूप से अपने बंधे बंधाये घरों में जाकर आटा इकट्ठा करता था.

महीने के पहले हफ्ते एक परिचित और बुलंद आवाज सुनाई देती थी जब वह आकर एक श्लोक का उच्चारण करती थी. हाथ में एक तीन से चार इंच मोटी कपडे की धुंआ देती बत्ती होती थी और सर पर एक टोकरी. हमारे सामने का मराठा परिवार (जिनके साथ हमारा अंगन एक हुआ करता था), बडे आदर के साथ एक बडा डब्बा आटा उनको देता था और फिर उस बत्ती के भस्म को आदर के साथ प्राप्त करते थे. एक से अधिक लोग आते थे तो कई बार ये लोग नृत्य करते थे जिस में एक दम भक्ति की भावना प्रगट होती थी.  मेरी मां ने बचपन में ही बता दिया था कि ये न पुरुष हैं न स्त्री, और ये किसी धार्मिक समूह के लोग हैं जहां अपना सारा समय पूजापाठ में लगाते हैं.

स्वाभाविक है कि लैंगिक विकलांगों से मेरा परिचय एक स्वस्थ माहौल में हुआ और उनके प्रति एक स्वस्थ नजरिया मन में घर कर गया. इसके बाद घरों में जाकर पैसा वसूल करने वाले हिजडे बहुत देखे. इतना ही नहीं, हमारे पास जो सरकारी अस्पताल था वहां ये लोग लगभग हर दिन प्रसूति वार्ड का चक्कर लगाते थे. यह भी मैं ने देखा है. वहां की नर्सिंग इंचार्ज मेरी दूर की चाची लगती थी. वे अकसर आकर पापा को बडे दुख के साथ बताती थी कि किस तरह लैंगिक विकलांग पैदा होने पर मांबाप उस बच्चे को छूना तक पसंद नहीं करते और किस तरह बच्चे को अस्पताल में छोड कर भाग जाते थे. फल यह होता कि वे विकलांग-कौम को सूचना दे देते और वे लोग उस बच्चे को ले जाकर पालते पोसते थे.

मैं बडा हुआ तो नोट किया कि ग्वालियर में इन लोगों के कई बडे समूह थे जो पेट पालने के लिये कोई भी धंधा नहीं कर पा रहे थे. कोई भी व्यक्ति इन को नौकरी पर नहीं लगाता था. जब से यह बात समझ में आई तो इन लोगों के साथ एक दम सामान्य व्यवहार करने लगा, और पाया कि इनको सामान्य तरीके से लो तो ये लोग भी उसी तरह से सामान्य व्यवहार करते हैं.

शादी के बाद मैं जिस कालोनी में रहता था वहां ये लोग महीने में एक बार सारे घरों का चक्कर लगाते थे. दस से बीस लोगों का समूह रहता था. मेरे घर आते थे तो मैं और पत्नी इनसे एकदम सामान्य तरीके से मिलते थे और अपनी सामर्थ के अनुसार एक राशि दे देते थे. इन में से कभी भी किसी ने भी हमारे साथ न तो पैसे के लिये मोलभाव किया, न कम पैसे होने पर हमें टोका. वे अच्छी तरह जानते थे कि कौन सहृदय है. जब ये घर आते थे तब लोग अपने बच्चों को छुपा लेते थे, लेकिन मैं ने अपने बच्चों को इन से मिलने से कभी नहीं टोका.

रेलगाडी मैं ने पहली बार कोंकण रेलवे द्वारा यात्रा की तो मुम्बई इलाके में तो ये लोग थोक में रेलगाडी में चढे. मेरा व्यवहार एकदम सामान्य रहा अत: इन में से हरेक का व्यवहार मेरे प्रति भी सामान्य रहा. मेरे प्रति इनका व्यवहार देख कर कई यात्रियों ने इसका कारण जानना चाहा तो मैं ने सब को बताया कि आप सही तो जग सही!!

अंत में मैं अपने एक मित्र के पत्र का उल्लेख करना चाहता हूँ जो इस प्रकार है:

आपको बड़ी सहानुभूति हो रही है इन "इश्वरीय अपंगों" के साथ. लगता है कि आप कभी इनके पल्ले नहीं पड़े. चलो ये बात तो ठीक है. लेकिन ये लोग एक सभ्य नागरिक जैसा व्यवहार क्यों नहीं करते? क्यों ये लोग दस दस रूपये के लिए हमें भी शर्मसार करते हैं? भीख ही मांगनी है तो क्यों ये लोग अन्य भिखारियों की तरह नहीं मांगते?  इस समाज में इन लोगों के अपने अपने "इलाके" हैं. अगर कोई दूसरे इलाके का हिजडा इनके इलाके में घुस जाता है तो क्या आपको पता है क्या होता है? इनमे खुद ही एकता नहीं है, भाईचारा नहीं है.  अगर ये लोग एक होकर आम नागरिकों की तरह सरकार के सामने अपनी मांगें रखें तो क्या ये असंभव है कि सरकार इनकी मांगें ना माने?  इनसे अच्छे तो पुलिस वाले भी है, हफ्ता मांगने वाले बदमाश भी हैं; कम से कम वे लोग आम जनता को तो सरेआम परेशान नहीं करते. भले ही वे गरीब ठेली वालों को भी ना बख्शते हों. लेकिन, ये हिजडे तो सभी को एक ही डंडे से हांकते हैं.

मेरे चार आलेखों में इन सब प्रश्नों का जवाब आ चुका है. उम्मीद है आप विषय को सही कोण से देखेंगे.  अंत में दो वरिष्ठ मित्रों की टिप्पणियां देखे:

(राज भाटिया) शास्त्री जी. यह तो एक शरीरिक कमी है जेसा कि आप ने लिखा है, कै बच्चे अंधे लगडे लुले भी तो पेदा होते है, या फ़िर किसी दुर्घटना मै किसी का लिंघ खो जाये तो? मुझे समझ नही आता हमारे समाज मै क्यो ऎसे बच्चे को त्याग देते है, इस कमी मै उस बच्चे का क्या कसुर, क्यो नही उसे भी अन्य बच्चो की तरह से आम प्यार मिलता, आम डांट नही मिलती, जिस से वो अपने आप को ओरो से अलग ना सम्झे.

यहां युरोप मे भी ऎसे लोग मिलते है, लेकिन इन की कोई अलग पहचान नही होती, इन्हे कोई अलग हक नही मिलते,कोई इन पर दया भाव नही दिखाता, कोई इन्हे आरक्षण नही मिलता, जिस से यह अपने आप को आम लोगो जेसा ही समझते है, हम सब मै मिलते जुलते है.

लगडे लुले या अन्य शरीरिक कमी के लिये तो आराक्षण मिलना चाहिये लेकिन ऎसी बात पर अगर हम चाहते है कि यह भी हमारे समाज मै घुल मिल जाये तो इन की कोई अलग पहचान नही होनी चाहिये, बल्कि यह भी हमारी तरह हर हक के बराबर हिस्से दार हो, चाहे वो शिक्षा हो या नोकरी, आरक्षण देने से इन की अलग पहचान होगी ओर फ़िर इन्हे वोही मुश्किले आयेगी जिस से यह बचना चहाते है, या समाज जिस से इन्हे बचाना चाहता है.

अन्त मै इतना ही कहुगां कि यह हमारे ही बच्चे है कृप्या इन्हे ना त्यागे, इन्हे अन्य बच्चो की तरह से ही पाले, उतना ही गुस्सा, उतना ही प्यार दे जितना अन्य बच्चो को देते है, ओर जिस के यह हक दार है. इन की आंखॊ मे झांक कर देखो… क्या कहती है यह मासुऊम आंखे.

धन्यवाद, यह सवाल कई बार मेरे दिल मै उठता था, ओर अन्दर तक बेचेन करता है क्यो हमारे समाज मै इन्हे अलग समझा जाता है ?

 

(दिनेशराय द्विवेदी) हम अन्य विकलांगों को जिस तरह से अपनाते हैं उसी तरह इन शिशुओं को भी अपना सकते हैं। इस तरह के अनेक लोग परिवारों में पलते हैं और जीवन जीते हैं। उन्हें परिवारों द्वारा अपनाने की आवश्यकता है।

लैंगिक विकलांगो द्वारा जबरन लैंगिक विकलांग बनाना अपवाद हो सकता है। लेकिन मैं ने ऐसे उदाहरण भी देखे हैं कि परिवार के लोगों द्वारा लैंगिक विकलांग को हिजड़ों को सौंप देने के उपरांत हिजड़ों ने बच्चे को पढ़ाया और वह सरकारी अस्पताल में नर्स का काम कर रहा है, पुरुष वेश में ही। यहाँ तक कि एक महिला नर्स के साथ रहता भी है। क्यों नहीं हम इसी तरह इन्हें समाज में स्वीकार कर सकते?

[क्रमश:] (मूल लेख सारथी चिट्ठे पर शास्त्री जी के द्वारा लिखा गया था. उनकी विशेष व्यक्तिगत अनुमति के कारण इस लेखन परंपरा को  अर्धसत्य पर पुन: प्रकाशित किया जा रहा है.)

रविवार, 5 अप्रैल 2009

हिजडों की गुंडागर्दी देखी है क्या?

(सारथी पर हाल ही में छपा शास्त्री जी का लेख)  आज का विषय है कि “आप ने हिजडों की गुंडागर्दी देखी है क्या?” आप में से अधिकतर लोग कहेंगे कि हां घरबाहर इन लोगों को जबर्दस्ती पैसा वसूल करते बहुत देखा है! ठीक है, पर अब इसका एक दूसरा पहलू देखें -- आप ने कभी इन लोगों को बिना इनका अपमान या उपहास किए पैसे दिये हैं क्या? या किसी व्यक्ति को पैसे देते देखा है क्या, बिना उपहास के?  आप में से अधिकतर इस प्रश्न का उत्तर “हां” में नहीं दे पायेंगे.

अब जरा निम्न बातों पर ध्यान दें

  • सामान्य परिवारों में जन्मे इन शिशुओं को जन्मते ही इनका परिवार ऐसे फेंक देता है जैसे उनके हाथ में एक नवजात शिशु नहीं बल्कि जलते अंगारे थमा दिये गये हों.
  • (कारण या लक्ष्य कुछ भी हो लेकिन) आपके घर की इस पैदाईश को हिजडे लोग ले जाकर पालते हैं, खाना देते हैं, बडा करते हैं.
  • हर व्यक्ति को भूख लगती है, कपडे की जरूरत होती है, एक छत की जरूरत होती है, लेकिन आप ने अपने खुद के जन्माये शिशु को इन सब बातों से वंचित कर दिया. कभी आप के मन में यह बात नहीं आई कि आप के बच्चे को गैर लोग पाल रहे हैं, इस कारण चलों कम से कम कुछ पैसा नियमित रूप से उस बच्चे के लिये उसके लालनपालन करने वालों को दे दिया जाये. कहां से आयगा उसका खानाकपडा?
  • बडा होने के बाद उसे नौकरी नहीं मिल पाती क्योंकि उसके लालनपालन करने वाले जो खुद अपढ हैं उसे भी नहीं पढा पाये.
  • पढ जाये तो भी उसे नौकरी नहीं मिलती. कौन किसी हिजडे को नौकरी पर रखता है.
  • आजकल बारात में नाचने के लिये उनकी मांग न के बराबर रह गई है. सामाजिक परिवर्तन के साथ उनके अन्य परंपरागत पेशे, मंदिरों महलों से जुडे काम आदि भी खतम हो गये हैं.
  • पब्लिक में वह पुरुषों के टायलट में जाये तो पुरुषों को आपत्ति है कि साडी पहन कर यहां क्यों आये. स्त्रियों के टायलट में जाये तो उनको आपत्ति है कि तुम औरत नहीं हो.
  • समाज में कहीं भी उनको न तो आदर मिलता है, न संवेदनशीलता दिखाई देती है.

ऐसे समाज में अपने भूखे पेट के लिये ये लोग क्या कर सकते हैं. भीख नहीं मांग सकते क्योंकि कोई हिजडा भीख मांगने बैठ जाये तो मनचले लोग उसका जीना हराम कर दे. कोई नौकरी नहीं देता. सरकार की ओर से कोई मदद नहीं मिलती, न शिक्षादीक्षा की कोई व्यवस्था है.  अत: कुल मिला कर कहा जाये तो अधिकतर हिजडों के सामने जीने का एक ही तरीका है कि वह लोगों से पैसे मांगे. इन के क्रूर मांबाप ने पैदा होते ही इनको “फेंक” कर अपनी कठिनाई से मुक्ति पा ली, लेकिन जीवन के हर दिन व्यंग, आक्षेप, कटूक्तियों द्वारा मानसिक स्तर पर मरने के लिये इनको छोड दिया.

जब एक हिजडा आकर आप से दस रुपया मांगे तो उसे इस पृष्ठभूमि में देखें. तब आप को समझ में आ जायगा कि वे भी मनुष्य हैं. उनके भी दिल है जो शायद आप के दिल से भी अधिक कोमल है. मानुषिक संवेदनशीलता मुझआप से भी अधिक है. जरा एक बार कोशिश करके देखें. जरा एक बार बिना हंसे, बिना परिहास किये, एक दस का नोट भीख के रूप में नहीं बल्कि  उन के जीवनयापन के लिये एक प्रोत्साहन के रूप में दे दें. आप को एक नया संसार दिखाई देगा. [क्रमश:] (मूल लेख सारथी चिट्ठे पर शास्त्री जी के द्वारा लिखा गया था. उनकी विशेष व्यक्तिगत अनुमति के कारण इस लेखन परंपरा को  अर्धसत्य पर पुन: प्रकाशित किया जा रहा है.)

मंगलवार, 31 मार्च 2009

हिजडा योनि में जन्म 002

(सारथी पर हाल ही में छपा शास्त्री जी का लेख) मुझे खुशी है कि यह वैज्ञानिक-सामाजिक लेखन परंपरा को पाठकों के लिये उपयोगी सिद्ध हो रही हैं. नीचे दी गई टिप्पणी इस बात का एक अच्छा उदाहरण है. माना जाता है कि प्रति टिप्पणी पीछे कम से कम दस लोग होते हैं जो वही बात लिखना चाहते थे लेकिन लिख न पाये. सारथी पर यह संख्या प्रति टिप्पणी कम से कम पच्चीस की है जो वही बात कहना चाहते थे लेकिन समयाभाव के कारण लिख न पाये.

(अन्तर सोहिल) आदरणीय,  नमस्कार!! जब से आपको पढना शुरू किया है, आपकी बातों पर(मुझे नही पता क्यों) सहज ही विश्वास हो जाता है। अभी तक मेरी विचारधारा यही थी कि हिजडे पैदाईशी नही होते, ये वो पुरुष होते हैं जो जानबूझ कर अपना लिंग बदल या विकृत कर लेते हैं या रूप बदल लेते हैं । श्री रूपेश जी ने भी जब तब लैंगिक विकलांगों का जिक्र किया, तब भी मैं अपने मानसिकता को सही रास्ते पर नही ला पाया। हालांकि मुझे लैंगिक विकलांगों से ना कोई कुंठा, नफरत और ना ही कोई लगाव है। मैं अर्धसत्य का भी नियमित पाठक हूं । क्योंकि कहीं भी कुछ लिखा जाता है तो मैं उसमें से कुछ (जिन्दगी) सीखने की कोशिश करता रहता हूं।

अब आपने बताया है तो सचमुच विश्वास हो गया है कि यह जन्मजात विकलांगता होती है। मैं आपसे, रूपेश जी से और सभी लैंगिक विकलांगों से अपनी मानसिकता के लिये क्षमाप्रार्थी हूं।

पिछले आलेख हिजडा योनि में जन्म 001 में जैसा मैं ने कहा कि एक मानव भूण में करोडों जीन होते हैं. भूण के विकास के साथ साथ इनकी अरबों प्रतियां बनाई जाती हैं. इस जटिल प्रक्रिया में करोडों बार गलतियां हो जाती हैं लेकिन जीन की गलतियों को सुधारने वाली जैव-रासायनिक प्रक्रियायें उनको सुधार देती हैं. इसके बावजूद करोडों गलतियों में से कई बार एकाध विकृत जीन सुधर नहीं पाता और उसके कारण बच्चे विकलांग पैदा होते हैं. जब यह विकलांगता यौनांगों की होती है तो बाह्य तौर बच्चा न तो पुरुष होता है न स्त्री. इनको हिजडा कहा जाता है. लेकिन चूंकि यह शब्द कई बार इन लोगों को नीचा दिखाने के लिये प्रयुक्त होता है, अत: “लैंगिक विकलांग”  का प्रयोग बेहतर, वैज्ञानिक एवं अधिक मानवीय है. मेरी जानकारी के अनुसार,  चिट्ठाजगत में इस शब्द का सबसे पहला प्रयोग डॉ रूपेश श्रीवास्तव ने अपने चिट्ठे आयुषवेद पर किया था. उनकी प्रेरणा से आरंभ किये गये चिट्ठे अर्धसत्य पर भी आप इसे देख सकते हैं.

  डॉ रूपेश के अथक प्रयास एवं प्रोत्साहन के कारण अर्धसत्य पर कई लैंगिक विकलांग चिट्ठालेखन की कोशिश करते हैं. इस तरह  लैंगिक विकलांगों को एक नवजीवन प्रदान करने के जरिये के रूप में हिन्दी चिट्ठाकारी उभर रहा है. मेरा अनुरोध है कि पाठगण इन लोगों को जरूर प्रोत्साहित करें एवं अर्धसत्य  पर नियमित रूप से टिपिया कर इस शुभ कार्य को अंजाम दें.

टिपियाते समय इस बात को न भूलें कि आनुवांशिकी की समस्या बढ रही है. इस कारण जो लोग सामान्य सामाजिक जीवन से वंचित हो जाते हैं उनके प्रति समाज की काफी बडी जिम्मेदारी है. निम्न दो टिप्पणियां इस बात को बडे सकारात्मक तरीके से प्रस्तुत करती हैं:

(दिनेशराय द्विवेदी) हम अन्य विकलांगों को जिस तरह से अपनाते हैं उसी तरह इन शिशुओं को भी अपना सकते हैं। इस तरह के अनेक लोग परिवारों में पलते हैं और जीवन जीते हैं। उन्हें परिवारों द्वारा अपनाने की आवश्यकता है।

(संजय बेंगाणी) लैंगिक विंकलांगों को विकलांगों को मिलने वाले आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए. और धनार्जन की वर्तमान व्यवस्था खत्म होनी चाहिए.

इस नजरिये के साथ आईये आज कुछ करें. (क्रमश:)

(मूल आलेख सारथी चिट्ठे पर शास्त्री जी के द्वारा लिखा गया था. उनकी विशेष व्यक्तिगत अनुमति के कारण इस लेखन परंपरा को  अर्धसत्य पर पुन: प्रकाशित किया जा रहा है.)

रविवार, 29 मार्च 2009

हिजडा योनि में जन्म 001

(सारथी पर हाल ही में छपा शास्त्री जी का लेख)  मेरे पाठकों में से अधिकतर या तो पुरुष हैं या स्त्री. इन में से अधिकतर को लिंगाधारित विषमता का सामना करना नहीं पढता है. पुरुष को पुरुष होने के कारण या स्त्री को स्त्री होने मात्र के कारण समाज में मजाक का पात्र नहीं बनना पडता है.  लेकिन समाज का एक तबका ऐसा भी है जिसको हर ओर से उपेक्षा, तिरस्कार, निंदा आदि सहन करना पडता  है महज इस कारण कि वे न तो पुरुष हैं न स्त्री.

यह एक जनितक (Genetic) समस्या है जो भारत के उत्तरी प्रदेशों में अधिक दिखती है. जब शुक्राणु का संयोजन होता है उसी क्षण यह तय हो जाता है कि बच्चा नर होगा या मादा. लेकिन इसके बाद काफी जटिल प्रक्रियायों द्वारा उनके लैंगिक अवयवों का निर्माण होता है. न केवल बाह्य अवयव, बल्कि उनसे जुडे आंतरिक अवयवों की भी रचना होती है.

इस जटिल प्रक्रिया को उस भूण के जीन नियंत्रित करते हैं. लेकिन प्रक्रिया अपने आप में इस कदर जटिल है, एवं इतने समय तक चलती रहती है कि उसमें यदा कदा अडचन आ जाती है और अंत में बालक या बालिका के लक्षण स्पष्ट होने के बदले मिलेजुले लक्षणों/अवयवों के साथ जन्म होता है. और इसके साथ जन्म लेती है एक ऐसी विषमता जो आजीवन उस नवजात शिशु को नहीं छोडती.

हिन्दुस्तान के अधिकांश इलाकों में इस तरह के शिशु के (जिस के जननांग स्पष्टतया बालक या बालिका के नहीं होते)  जन्मते ही उसे उसका परिवार त्याग देता है. ऐसे शिशुओं को सामान्यतया हिजडा कहा जाता है, एवं उसकी आगे की विधि यह होती है कि उसे अन्य हिजडे पालें. होता भी ऐसा ही है कि अपवादों को छोड कर  ऐसे शिशुओं को हिजडे लोग ही ले जाकर पालते हैं.

आगे बढने के पहले मैं यह स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि चूंकि एक व्यक्ति लिंगनिर्धारण के समय होने वाले जनितक समस्या के कारण हिजडा बन जाता है, अत: यह एक प्रकार की शारीरिक विकलांगता है. जैसे एक बच्चा अंधा, बहरा, या लंगडा पैदा होता है वैसे ही एक लैंगिक विकलांगता के कारण बच्चा इस तरह पैदा होता है. इस कारण हिजडा कहने के बदले इनको “लैंगिक विकलांग” कहना सही होगा, और मैं इसी नामकरण का उपयोग करता हूँ.  लेकिन इस आलेख में मैं हिजडा और लैंगिक विकलांग दोनों शब्दों का प्रयोग करूंगा. [क्रमश:]

(मूल लेख सारथी चिट्ठे पर शास्त्री जी के द्वारा लिखा गया था. उनकी विशेष व्यक्तिगत अनुमति के कारण इस लेखन परंपरा को  अर्धसत्य पर पुन: प्रकाशित किया जा रहा है.)

बुधवार, 4 मार्च 2009

लैंगिक विकलांग बच्चे अपने परिवारों को वापिस लौटेंगे एक प्रयोग के तहत....

अर्धसत्य परिवार ने अपने निरंतर प्रयासों के चलते तथा अपने बुजुर्ग मार्गदर्शकों के आशीर्वाद के सहारे से एक अभिनव प्रयोग करा है जिसके कारण कुछ समय से ब्लाग पर लिखने का समय नहीं निकाला जा सका। इस प्रयोग के अंतर्गत जो लैंगिक विकलांग बच्चे परिस्थितियों वश बरसों बरस से अपने परिवारों से अलग रह रहे थे उन्हें विश्वास में लेकर उनके परिवार की जानकारी हासिल करके बच्चों के माता-पिता व भाई बहन आदि से संपर्क कर संवाद स्थापित करना और उन्हें समझाने का प्रयास करना। इस प्रयोग के अंतर्गत जो बच्चे दस से पंद्रह सालों से अपने परिवारों से नहीं मिले थे एक प्रयोग के चलते वापस अपने घर लौटे हैं जिनमें कि कीर्ति(केतना), भूमिका, देवी, दिव्या और स्वयं अर्धसत्य परिवार की ज्येष्ठ संचालिका मनीषा नारायण हैं अब देखना है कि क्या होता है कौन स्वीकारा जाता है और कौन वापिस आ जाता है लेकिन हम सब इन बच्चों को इतना साहस दे पाए कि वे जैसे हैं उसी हाल में वापस जा सकें इस शर्त के साथ कि उन्हें यथावत स्वीकारा जाए बिना किसी शर्म या सामाजिक लोकलाज के....। ईश्वर करे के हमें इस मुहिम में कामयाबी मिले। बाबूजी श्री जे.सी.फिलिप कहते हैं कि सामाजिक बदलाव अत्यंत धीमी गति से होते हैं , जिस गति से शुरू हो कम से कम शुरू तो हुआ ये प्रयास; बस आप सबका आशीर्वाद बना रहे।

सोमवार, 23 फ़रवरी 2009

मार्कण्डेय भाई समस्याएं कुछ अलग ही हैं.....

आज मार्कण्डेय भाई का प्रोफ़ाइल देखा तो पता चला कि वे पंखों वाली भड़ास के भी सदस्य हैं तो वहां उनकी लिखी एक पोस्ट पढ़ डाली और उसका एक अंश भी भड़ासियों के लिये डाका मार लायी। भाईसाहब ने लिखा है कि सरकार पर कमेंट करना मूर्खता है तो बस इतना कहने का साहस है कि सरकार कोई एक आदमी नहीं है इसे तो हम आप जैसे लोग बाकायदा लोकतांत्रिक तरीके से वोट देकर बनाते हैं और अगर हम ही जाति-धर्म-भाषा-लिंग-क्षेत्र जैसे मुद्दों के कारण वोट देते हैं तो ये हमारे प्रतिनिधि के चयन में गलती है। यदि आप मौजूदा सरकार की बात कर रहे हैं तो बस इतना ही कहूंगी कि साठ सालों में किस पार्टी ने शासन में आकर समस्याएं सुलझाई हैं? यदि जाति-धर्म-भाषा-लिंग-क्षेत्र के बकवास मुद्दे समाप्त हो गये तो देश समेकित प्रगति करने लगेगा। सुप्रीम कोर्ट ने जो कहा वह "कोडीआइड ला" के अंतर्गत कहा है लेकिन उसका पालन कौन करवाएगा यह तो साठ सालों से समस्या बनी है इसी लड़ाई को तो हमारे जस्टिस आनंद सिंह पिछले पंद्रह सालों से तकलीफ़ें उठाते हुए भी जारी रखे हैं। नागरिकता का कोई प्रमाण पत्र तो मुझ जैसे लैंगिक विकलांग(हिजड़ॊ) के पास भी नहीं है चाहे वह राशन कार्ड हो या पासपोर्ट...............................
देश की मूल समस्याएं कुछ अलग हैं जिनकी तरह कुछ कमीने किस्म के कुटिल राजनेता जनता का ध्यान ही नहीं जाने देते ताकि हम बेकार के मुद्दों में उलझे रहें
भाई मार्कण्डेय ने लिखा है......
हमारी सरकार ........ उसपर तो कमेन्ट करना मुर्खता है । जानते हुए छोटे घाव को कैसे नासूर बनाया जाता है ? यह सीखना हो तो कोई इसे सरकार से सीखे ।सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है की हरेक भारतीय के पास पहचान पत्र होना चाहिए । जिससे की उनकी नागरिकता पहचानी जा सके । सीमावर्ती इलाकों में तो इसे अनिवार्य कर देना चाहिए । कोर्ट ने सरकार से जबाब भी माँगा ......पर वह लगता है सो गई है । यह नासूर इस कंट्री को ही तबाह कर देगा जिस तरह स्पेन का नासूर नेपोलियन को और साउथ का नासूर औरंगजेब को बरबाद कर दिया । समय रहते चेत जाने में ही समझदारी है ।ऐसे लोगो को भी सबक सिखाया जाय जो बिना सोचे समझे बंगालादेशिओं को नौकर बना लेते है । कैम्पों में अबैध बंगालादेशिओं को वे समान उपलब्ध है जो यहाँ के अधिकाँश नागरिकों को भी नही है । रासन कार्ड , नौकरी , शिक्षा का अधिकार देश के नागरिकों को है न की अबैध नागरिकों को ।बन्ग्लादेशिओं को पनाह देने में पश्चिम बंगाल और असाम का बड़ा हाथ है । वह वे पहचान में ही नही आते की कौन देशी है और कौन विदेशी ...... नेता अपनी नेतागिरी से बाज नही आते । एक दिन देश की जनता उनसे सवाल जरुर करेगी । तब उन्हें बचाने के लिए कोई बंगलादेशी नही आयेगा ।

सोमवार, 16 फ़रवरी 2009

मैं कोई बड़ी हस्ती हो गयी हूं जो लोग मेरे साथ ऐसा व्यवहार करने लगे हैं?

क्या मैं कोई बड़ी हस्ती हो गयी हूं जो लोग मेरे साथ ऐसा व्यवहार करने लगे हैं? जब से मैं ब्लागिंग के द्वारा अपनी समस्याएं लिख रही हूं मेरे दिल का बोझ तो उतर रहा है ये सच है। कल जब मैं भायखला स्टेशन पर ट्रेन में मांगने के बाद घर जाने के लिये अपनी बाकी बहनो रम्भा अक्का और सोना अक्का वगैरह का इंतजार कर रही थी तो देखा कि एक कोने में खड़ी एक युवती अपनी पांच साल की बेटी के साथ सुबक-सुबक कर रो रही है और लोग उसके अगल-बगल से गुजर रहे हैं लेकिन कोई नहीं पूछता कि क्या हुआ क्यों रो रही हो....। मुझसे रहा नहीं गया तो मैंने पास जाकर पूछ लिया कि बहन क्या समस्या है क्यों रो रही हो क्या मैं तुम्हारे लिये कुछ कर सकती हूं? इस पर उसने सिर उठा कर मुझे देखा तो अपलक दो मिनट तक देखती ही रह गयी फिर जोर से लिपट कर रोने लगी। दिलासा देने के बाद चुप कराने पर उसने सीधे मेरा नाम लेते हुए बात शुरू करी कि मनीषा दीदी मेरे पति ने दूसरी शादी कर ली है और मुझे घर से निकाल दिया है मेरे पास कुछ नहीं है और वो आदमी कहता है कि बिना तलाक दिये वह दूसरी या ग्यारह तक शादियां कर सकता है इस्लाम में जायज़ है, पीटता है खाना नहीं देता मैं ज्यादा पढ़ी लिखी नहीं हूं दसवी पास हूं मेरा पति डाक्टर है उसका नाम अज़हर है वगैरह वगैरह............। वह लड़की बोलती जा रही थी मैं अवाक सी ये सोच रही थी कि वो मुझे कैसे जानती है? फिर उसने ही बताया कि उसने मुझे इंटरनेट पर भड़ास में देखा था और फिर तब से अर्धसत्य देख रही है और पहचानती है। वो मुझसे ऐसा व्यवहार कर रही थी जैसे कि मैं कोई बहुत बड़ी हस्ती हूं और उसकी समस्या चुटकी बजाते ही हल कर दूंगी।
तब तक मेरी बहनें आ गयी और मैं उस लड़की को बच्ची के साथ मुनव्वर आपा के घर भेज आयी हूं। आप सब बताइये कि इस विषय पर मैं क्या करूं? क्या अर्धसत्य पर उसकी कहानी लिखूं कुछ होगा? न्याय मिलेगा?ब्लाग का इस दिशा में कैसे प्रयोग कर सकती हूं?अभी वह हमारे सम्पर्क में मुनव्वर आपा के साथ ही है।

बुधवार, 4 फ़रवरी 2009

मेरी बहन की खुशी.......

अर्धसत्य परिवार के मार्गदर्शकों में से एक श्री मोहम्मद उमर रफ़ाई व मनीषा नारायण दिल खोल कर ठहाके लगाते हुए
जब हम किसी काम को "बस यूं ही" अपनी खुशी के लिये शुरू करते हैं और वह काम बढ़ते-बढ़ते एक महाअभियान का रूप धारण कर ले तब आपको उसमें होने वाली छोटी सी सफलता भी उसी अनुपात में विशालता लिये हुए लगती है। कुछ समय पहले तक शायद मेरी बहन मनीषा नारायण की मुस्कराहट मुझे इतना आह्लादित न करती रही हो लेकिन आज अब मैं इस बात को देख रहा हूं कि मुझे उनकी हर मुस्कान, हर हंसी बहुत बड़ा सुख दे जाती है; ठीक ऐसा ही होता है जब भूमिका या दिव्या जैसे मेरे प्यारे बच्चे किसी बात पर मुझसे चुटकी लेकर बात करते हैं। आदरणीय बाबू जी शास्त्री श्री जे.सी.फिलिप ने जो पुस्तकें भेजी हैं वह एक नया उत्साह लेकर आयी हैं विशेष तौर पर मेरे लिये। अब मैं दीदी को दिल खोल कर हंसते देखता हूं तो लगता है कि जीवन सफ़ल सा होता प्रतीत हो रहा है।
 

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आयुषवेद by डॉ.रूपेश श्रीवास्तव