सार्थक चीख
समाज में तिरछी नजरों से देखे जाने वाले एक वर्ग के व्यक्ति ने ब्लॉगजगत में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई है। ब्लॉग 'लैंगिक विकलांग' द्वारा बनाया गया है। ब्लॉगर अपने अनुभवों पर यहां बात करती हैं। आधासच डॉट ब्लॉगस्पॉट नाम से बनाया गया यह ब्लॉग समाज में होते परिवर्तन को रेखांकित करता है। परिवर्तन, जो वक्त के साथ आता ही है। ब्लॉग का टाइटल कहता हैः हम अधूरे इंसान अगर सच भी बोलें तो लोग कहते हैं उसे अर्धसत्य। ब्लॉग इसी साल बनाया गया है और आमतौर पर नियमित अपडेट होता है।
यह रिव्यू पूजा बहन ने लिख कर यह जाहिर करा है कि लोग अर्धसत्य की तरफ ध्यान दे रहे हैं, मैं अपनी उस उपस्थिति को आज के समाज में दर्ज करा पा रही हूं जिसे लगभग तीस साल पहले नकार दिया गया था और मेरे माता-पिता को मेरा जन्म प्रमाणपत्र यह कह कर नहीं दिया गया था कि न तो यह लड़का है न ही लड़की तो सर्टिफ़िकेट पर क्या लिखें? मेरे माता पिता ने मुझे बड़ी ही उहापोह में लड़का(क्योंकि लड़का नहीं था) मान कर पाला लेकिन ग्रेजुएशन तक आते-आते तो मुझे हर कदम पर चुभो-चुभो कर यह एहसास दिलाया गया कि मैं मानवों की सामजिक मुख्यधारा में स्वीकार्य नहीं हूं। तब मुझे सहारा दिया मेरी लैंगिक विकलांग गुरू "शीला अम्मा" ने जो खुद भी अपने समय में य तिरस्कार की पीड़ा भुगत चुकी होंगी। अब मैं अपने प्रेरणास्रोत व मार्गदर्शक से मिल चुकी हूं जो कि सही अर्थों में गुरुदेव कहलाने के अधिकारी हैं, जिन्होंने मुझे अच्छी हिंदी सिखाई, कम्प्यूटर सिखाया, ब्लागिंग सिखाया और यह बताया कि मैं ईश्वर की गलती नहीं बल्कि उनकी सर्वश्रेष्ठ रचना हूं जिसमे कि स्त्री और पुरुष दोनो के गुण हैं और अवगुण किसी के भी नहीं; जीवन को नया अर्थ मिल गया है। अब भगवान से प्रार्थना है कि मेरे भाई डा.रूपेश श्रीवास्तव का कद इतना बड़ा हो जाए कि हर लैंगिक विकलांग को इनका साया नसीब हो सके। एक बात और लिखना है कि अब तक जो शब्द मेरे जैसे लोगों के लिये प्रयोग करे जाते थे उनसे भाईसाहब असहमत थे जैसे कि हिजड़ा या किन्नर, तो उन्होंने एक सर्वथा नए सार्थक शब्द की रचना करी "लैंगिक विकलांग",जोकि अब प्रयोग में आने लगा है और आशा है कि आने वाले समय में हिंदी के शब्दकोश भी इस शब्द को स्वीकार लेंगे।
रविवार, 24 अगस्त 2008
रफ़्तार डॉट काम के ब्लाग रिव्यू में अर्धसत्य : पूजा बहन को धन्यवाद
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गुरुवार, 21 अगस्त 2008
निर्बल के बलराम और रक्षा का वचन
आज मुझे मेरे सारे भड़ासी भाईयों और यशवंत दादा के साथ रजनीश की बहुत याद आयी है वैसे तो ये सब मेरे दिल में हैं....
मेरे डाक्टर मामा ने दिया रक्षा का वचन राखी के त्योहार पर....
अब तक मैं सही तरीके से ब्लागिंग करना सीख ही नहीं पायी थी ये मेरी लापरवाही थी लेकिन अब सब कर सकती हूं।
शुक्रवार, 25 जुलाई 2008

कुछ दिन पूर्व मैने अपनी एक संस्मरण की पोस्ट डाली थी, मुंबई में भडास परिवार के मिलन से लेकर नए और अबूझ लेकिन अपने से रिश्तों की दास्ताँ थी, रुपेश भाई का प्यार तो मुनव्वर आपा का स्नेह, हरभुशनभाई का आत्मिक व्यवहार मगर सबसे जुदा हमारी मनीषा दीदी का प्रेम ऐसा की जैसे वो हमारी माँ हो या बड़ी बहन या फ़िर ऐसा रिश्ता की अधिकार के साथ हम एक दुसरे पर लाड प्यार या फ़िर गुस्सा भी कर सकें।
मेरा ये पोस्ट कहने को तो सिर्फ़ एक स्वजन मिलन कार्यक्रम जैसा था मगर सच कहें तो रिश्तों की नींव थी जो निश्चित ही बेहद मजबूती के साथ डाली गयी। मगर इस पोस्ट को डालने के बाद ही हमारी मनीषा दीदी ने एक प्यारा सा मेल मुझे कर दिया, कहने को सिर्फ़ ये का मेल है मगर मानवीय संवेदना का अथाह सागर, सच कहूं तो इसे कई बार पढ़ा और बार बार पढ़ा, अभी भी पढता हूँ और जब ये मेल आया तभी विचार की इसे भडास पर डालूँ , गुरुवार से सलाह भी लिया मगर एक छोटे भाई को भेजे इस निजी पत्र को सार्वजानिक करुँ या ना करुँ के ऊहापोह में रहा। मेल पढ़ें.......भाई,आपने जो तस्वीरें भड़ास पर डाली हैं उन्हें देख कर एक बार मैं रूपेश दादा से लिपट कर रो ली क्योंकि एक मेरा वो बायोलाजिकल परिवार था जो मुझे कब का भूल चुका है और एक आप लोग हैं जिनसे मेरा कोई रक्त संबंध न होने पर भी लगता है कि जन्म जन्म का साथ है। आज भाई के घर पर ही रुक गयी हूं।आपको बहुत सारा प्यार,अच्छे से नौकरी करो और खूब नाम कमाओ ताकि आपकी ये बहन आप सब पर गर्व कर सके।प्रेम सहितमनीषा दीदी
ये मेरी वो बहन है जो लैंगिक विकलांग है, समाज जिसे अछूत समझती है और जिम्मेदारी से भागने वाले हमारे समाज के मठाधीश का समाज के इन बच्चों के लिए कोई दायित्व नही मगर मेरे लिए ये मेरी बहन का केसा ख़त है जिसमे वर्णित संवेदना मुझे अभी के सम्पूर्ण मनुष्यों में नही नजर आती, एक छोटा सा संवाद छोटी सी मुलाक़ात मगर रिश्ते का जोड़ ऐसा की जैसे हमारी कई जन्मों की पहचान हो।
सच कहूं तो इसे सामने रखने का कार्य सिर्फ़ इसलिए की आज के समाज में सच्चे अर्थों में मेरे लिए तो मनीषा दीदी ही सबसे अपनी हैं क्यूंकि ऐसा प्रेम नि : स्वार्थ भाव मुझे नही लगता की आपको अपने घरों में भी मिलेगा।
दीदी हम आपके साथ हमेशा हैं।
आपके चरणों में इस छोटे भाई का चरणवंदन
आपका छोटा भाई
रजनीश के झा
बुधवार, 9 जुलाई 2008
सेक्स वेबसाइट का अर्धसत्य को प्रस्ताव.......

आज एक बार फिर से शिद्दत से एहसास हुआ था कि मैं बाकी सामान्य लोगों से अलग हूं क्योंकि मेरे बड़े भाई साहब डा.रूपेश श्रीवास्तव ने जिस तरह मुझे बताया कि उन्हें क्या और किससे प्रस्ताव आया... हमेशा की तरह से हम भाई-बहन मिले तो मैंने देखा कि भाई कुछ उदास से महसूस हो रहे हैं लेकिन अपनी उदासी को मुझसे छिपाने की नाकामयाब कोशिश कर रहे हैं। जब मैंने बहुत पूंछा तो उन्होंने बताया कि उन्हें किसी सेक्स वेबसाइट चलाने वाले ने फोन किया था कि क्या आप अर्धसत्य को उस वेबसाइट से जोड़ना चाहेंगे? हम लोग गे-लेस्बियन सेक्शन के साथ में एक नया सेक्शन हिजड़ों के लिये शुरू करने जा रहे हैं. हमारी व्यापारिक नीति व शर्तें ये...ये और वो ...वो हैं। यह जान कर थोड़ा सा पल भर को तो मुझे भी दुःख हुआ पर ये सोच कर कि इंटरनेट पर तो इस विषय की भरमार है तो वो बस एक व्यवसायी था जिसने हमें भी अपने जैसा समझा होगा और अपनी नीति बता दी, इस पर सहजता से उसे मना कर देना चाहिये बस लेकिन हम दोनो तो क्षुब्ध हो गये। शायद अभी हम दोनो को इन कटुताओं को झेलने के लिये और अधिक मजबूत होना पड़ेगा। हम लोगों ने इस विषय को चाय की चुस्की में ग़र्क करके जो कष्ट हुआ उसे निगल लिया और फिर चल पड़े हैं अपने रास्ते पर.......... ये सोच कर कि इस तरह के लोगों के अलावा ऐसे भी लोग तो हैं जो मुझे प्रेम करते हैं ,सम्मान देते हैं,आदर से दीदी कह कर पुकारते हैं। भाई ने खुद मुझे संबल दिया है किन्तु शायद मुझे भरमाने के लिये चिंतित दिखाते हैं खुद को कि वे भी साधारण इंसान हैं।
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शनिवार, 21 जून 2008
एक विचार की शुरूआत: श्री दीनबंधु प्रसाद

किताबी शिक्षा अधिक न होने के बाद भी बेहद ऊंची सोच, उच्च आदर्श और स्वच्छ विचारों के धनी हैं श्री दीनबंधु भोलानाथ प्रसाद। बिहार के रोहतास जिले के एक गांव के रहने वाले तीस वर्षीय दीनबंधु जी ने दसवी कक्षा तक पढ़ाई करी है घर की माली हालत ज्यादा अच्छी न होने के कारण ज्यादा पढ़ न सके और नौकरी के लिये मुंबई आना पड़ा, मध्यरेल में प्वाइंट्समैन के पद पर कार्यरत दीनबंधु जी के तीन बेटे हैं। जब मैंने इनसे लैंगिक विकलांगो के विषय में बात करना शुरू करी तो उन्होंने जो विचार दर्शाए वे अत्यंत आशास्पद प्रतीत होते हैं कि भविष्य सुखद होगा। इनका मानना है कि माता-पिता स्वयं ही रूढ़ियों में जकड़े रहते हैं इसीलिये किसी लैंगिक विकलांग बच्चे की पैदाइश पर अकुला जाते हैं जबकि मां ने उतनी ही प्रसव पीड़ा झेली है जितनी कि सामान्य बच्चों के जन्म में होती है फिर क्यों उसका आंचल छोटा पड़ जाता है,क्यों वह मां अपने जने बच्चे को भले ही दुःखी हो कर, रोकर ही सही लैंगिक विकलांगों की टोली को सौंप देती है? दीनबंधु भरपूर आक्रोश में इस बात को कहते हैं कि यदि आप कुतिया कि पिल्ले को उठाने की कोशिश करें तो वह आपको एक पशु होकर भी अपना बच्चा नहीं ले जाने देती और भौंक कर, काट कर अपना विरोध जता देती है लेकिन एक इंसानी माता कैसे सहन कर लेती है कि कोई उसके बच्चे को ले जाए। मांओ की ममता लिंग पर टिकी सड़ी परंपरा के आगे बौनी हो जाती है। चिढ़ होती है उन बुद्धिजीवियों से जो महिला विमर्श पर सिर फोड़े रहते हैं और लैंगिक विकलांग बच्चे की बात आते ही सांप सूंघ जाता है इनकी बुद्धि को। सब को बदलाव की पहल करनी होगी कि हम अपने बच्चों से इतना प्रेम करें कि उन्हें किसी को देने से इन्कार कर सकें और यदि कोई जबरन उस बच्चे को ले जाए तो कानून का सहारा लें। क्या आज तक किसी माता-पिता ने पुलिस में इस बात की रिपोर्ट दर्ज कराई है कि हिजड़ों की टोली उनका बच्चा ले गई? दीनबंधु जी चाहते हैं कि उनका ये संदेश मांओ तक पहुंचे जिन्होंने उन बच्चों को भी नौ माह कोख में पाला होता है वे अपने बच्चों को रोकें इस नर्क में जाने से...........
आज दीनबंधु जी से बात करके लग रहा है कि ये तो विचार का पहला धमाका है जो कि एक चैन रिएक्शन के रूप में शुरू हो जाएगा, आज एक है कल सौ, हजार, लाख और करोड़ होते देर न लगेगी। मैं ईश्वर से प्रार्थना करती हूं कि अगर कुछ करना है तो दीनबंधु जी जैसी सोच रखने वाले कुछ लोग दुनिया में भेज दे ताकि मेरा काम सरल हो जाए।
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शोषण का पोषण करते ये गुरूघंटाल
सभ्य समाज के ढांचे में प्रगतिवादी सोच को जब परंपराओं में कमी नजर आती है तो स्वाभाविक है कि नई सोच रूढ़ियों का विरोध करेगी। इस वैचारिक विरोध से ही समाज की कमियां क्रमशः दूर होती जाती हैं। स्वस्थ समज के लिये जो परंपराएं हानिकारक रहती हैं वे समाप्त हो पाती हैं। ऐसी है बुरी परंपराएं थीं - बाल विवाह, सती प्रथा, दहेज प्रथा, पशु बलि, बंधुआ मजदूरी,छुआछूत आदि। जब श्रेष्ठ लोगों ने इन बुरी परंपराओं को समझा कि ये समाज के विकास में बाधक हैं तो इनका पुरजोर विरोध किया लेकिन यकीन मानिये कि एक बहुत बड़ा वर्ग ऐसा भी था जिसने इन परंपराओं को अपनी सभ्यता की पहचान बताते हुए इनके पक्ष में हो कर इन्हें जीवंत रखने के लिये बाहुबल, धर्म और कानून आदि के हथियार उठा लिये। एक बारगी सामने से देखने से लगता है कि ये मात्र रूढ़िवादियों और प्रगतिवादियों के बीच असहमति का परिणाम है परंतु अंदर से पर्तें उघाड़ कर देखने पर ये मात्र निहित स्वार्थों की रक्षा के लिये होती लड़ाई थी।
लैंगिक विकलांगों के समाज में भी ठीक ऐसा ही चल रहा है। जब कोई लैंगिक विकलांग गुरू-शिष्य परंपरा से इस समाज में प्रवेश करता है तब गुरू कहलाने वाले शख्स के मन में सत्यतः ऐसा कोई भाव होता ही नहीं है गुरूजी तो बस सुंदर-कमाउ शिष्यों की कमाई पर नजरें गड़ाए रखते हैं ताकि जल्द से जल्द बैठ कर खाने की जुगाड़ हो सके। समय बीतता जाता है और नए नायक, गुरू और चेले इस परंपरा में जुड़ते जाते हैं लेकिन स्वार्थ पर टिकी शोषण की प्रक्रिया निरंतर सदियों से चलती चली आ रही है। हर गुरू का कर्तव्य होता है कि वह अपने जीवन के अनुभवों तथा जानकारियों के आधार पर अपने शिष्यों को खुद से दो कदम आगे बढ़कर बेहतर जीवन जीने की प्रेरणा दे। यही गुरू-शिष्य परंपरा की सार्थकता है। किन्तु लैंगिक विकलांगों के परंपरागत समाज में गुरू भी भीख ही मांगते थे या देहव्यापार करते व नाच-गाकर बधाई देते और शिष्य भी वही करते रहे। गुरू भी समाज की मुख्यधारा से बाहर बहते रहे और शिष्यों को भी रहस्यमय परंपराओं की आड़ में यही सब कराते रहे। किसी गुरू ने अपने शिष्यों को आजीविका के लिये किसी अन्य कार्य के लिये न तो प्रेरित करा और न ही यह प्रेरणा दी कि बेटा मैं तो न पढ़ सकी कम से कम तुम तो पढ़ सको इसलिये मैं तुम्हारे लिये घर पर ही ट्यूटर लगा देती हूं? किसी गुरू ने समाज द्वारा किये गये बहिष्कार के खिलाफ़ आवाज को इतना बुलंद क्यों नहीं किया कि कानून उस आवाज को सुन सकता? खुद तो जाहिल बने रहे और नए आने वाले बच्चों को भी जाहिल-बेहया बनाए रखा। कुछ जगहों से यदा-कदा आपको सूचनाएं मिलती होंगी कि अमुक शहर या गांव में फलां लैंगिक विकलांग ने अपने धन से स्कूल खोला है लेकिन क्या आज तक किसी ने देखा है कि उस स्कूल में कोई लैंगिक विकलांग बच्चा पढ़ रहा हो अपनी सही पहचान के साथ? अरे हिन्दुओं ने सरस्वती विद्या मंदिर बना लिये मुस्लिमों ने अंजुमन इस्लाम बना डाले अपने अपने समुदाय के बच्चों को पढा़-लिखा कर उनकी पहचान समाज में ऊंची उठाने के लिये लेकिन किसी लैंगिक विकलांग गुरू ने ऐसा हरगिज नहीं करा कि जो पीड़ा मैंने झेली है वो इन बच्चों को न उठाने दूंगी, इन्हें पढा़-लिखा कर इस काबिल बनाऊंगी कि आने वाले समय में ये अपने जायज़ हक़ के लिये सही तरीके से मांग कर सकें। ये स्कूल वगैरह खोलना मात्र प्रसिद्धि पाने के टोटके रहते हैं। अगर सचमुच गुरू पद के उच्च आदर्श को पालने के इच्छुक ये गुरू लोग होते तो समाज में चेतना लाने का प्रयास करते कि अपने बच्चों को किसी हिजड़ो की टोली को मत दो और अगर कोई जबरदस्ती करता है तो कानून का सहारा लेकर अपहरण का मामला दर्ज करवाओ, क्यों कोई गुरू किसी NGO को इस बात के लिये प्रेरित नहीं करता कि मेरे शिष्यों को प्रौढ़ शिक्षाकेंद्र ले जाओ .......... । ये गुरू बने हुए गुरूघंटाल जानते हैं कि अगर उन्होंने ऐसा करा तब तो अनिर्णीत लिंग के आधार पर जीवित इनका थोथा,खोखला और शोषण पर टिका समाज महज दो पीढ़ियों मे ही समाज की मुख्यधारा में विलीन हो कर लुप्त हो जाएगा और फिर इन्हें खाने के लिये मेहनत-मजदूरी या कोई रोजगार करना पड़ेगा जो कि ये गुरूघंटाल लोग नहीं चाहते यही कारण है कि ये लोग शोषण का पोषण कर उसे जीवंत बनाए हुए हैं। मुझे पता है कि मैं जिस बात की शुरुआत कर रही हूं उसका सुखद अंत देखने के लिये जीवित न रहूं लेकिन मेरे भाई जो कि सच्चे अर्थों में गुरूपद के अधिकारी हैं उनकी प्रेरणा से इस नए वैचारिक धरातल पर इन तथ्यों को ला रही हूं।
लैंगिक विकलांगों के समाज में भी ठीक ऐसा ही चल रहा है। जब कोई लैंगिक विकलांग गुरू-शिष्य परंपरा से इस समाज में प्रवेश करता है तब गुरू कहलाने वाले शख्स के मन में सत्यतः ऐसा कोई भाव होता ही नहीं है गुरूजी तो बस सुंदर-कमाउ शिष्यों की कमाई पर नजरें गड़ाए रखते हैं ताकि जल्द से जल्द बैठ कर खाने की जुगाड़ हो सके। समय बीतता जाता है और नए नायक, गुरू और चेले इस परंपरा में जुड़ते जाते हैं लेकिन स्वार्थ पर टिकी शोषण की प्रक्रिया निरंतर सदियों से चलती चली आ रही है। हर गुरू का कर्तव्य होता है कि वह अपने जीवन के अनुभवों तथा जानकारियों के आधार पर अपने शिष्यों को खुद से दो कदम आगे बढ़कर बेहतर जीवन जीने की प्रेरणा दे। यही गुरू-शिष्य परंपरा की सार्थकता है। किन्तु लैंगिक विकलांगों के परंपरागत समाज में गुरू भी भीख ही मांगते थे या देहव्यापार करते व नाच-गाकर बधाई देते और शिष्य भी वही करते रहे। गुरू भी समाज की मुख्यधारा से बाहर बहते रहे और शिष्यों को भी रहस्यमय परंपराओं की आड़ में यही सब कराते रहे। किसी गुरू ने अपने शिष्यों को आजीविका के लिये किसी अन्य कार्य के लिये न तो प्रेरित करा और न ही यह प्रेरणा दी कि बेटा मैं तो न पढ़ सकी कम से कम तुम तो पढ़ सको इसलिये मैं तुम्हारे लिये घर पर ही ट्यूटर लगा देती हूं? किसी गुरू ने समाज द्वारा किये गये बहिष्कार के खिलाफ़ आवाज को इतना बुलंद क्यों नहीं किया कि कानून उस आवाज को सुन सकता? खुद तो जाहिल बने रहे और नए आने वाले बच्चों को भी जाहिल-बेहया बनाए रखा। कुछ जगहों से यदा-कदा आपको सूचनाएं मिलती होंगी कि अमुक शहर या गांव में फलां लैंगिक विकलांग ने अपने धन से स्कूल खोला है लेकिन क्या आज तक किसी ने देखा है कि उस स्कूल में कोई लैंगिक विकलांग बच्चा पढ़ रहा हो अपनी सही पहचान के साथ? अरे हिन्दुओं ने सरस्वती विद्या मंदिर बना लिये मुस्लिमों ने अंजुमन इस्लाम बना डाले अपने अपने समुदाय के बच्चों को पढा़-लिखा कर उनकी पहचान समाज में ऊंची उठाने के लिये लेकिन किसी लैंगिक विकलांग गुरू ने ऐसा हरगिज नहीं करा कि जो पीड़ा मैंने झेली है वो इन बच्चों को न उठाने दूंगी, इन्हें पढा़-लिखा कर इस काबिल बनाऊंगी कि आने वाले समय में ये अपने जायज़ हक़ के लिये सही तरीके से मांग कर सकें। ये स्कूल वगैरह खोलना मात्र प्रसिद्धि पाने के टोटके रहते हैं। अगर सचमुच गुरू पद के उच्च आदर्श को पालने के इच्छुक ये गुरू लोग होते तो समाज में चेतना लाने का प्रयास करते कि अपने बच्चों को किसी हिजड़ो की टोली को मत दो और अगर कोई जबरदस्ती करता है तो कानून का सहारा लेकर अपहरण का मामला दर्ज करवाओ, क्यों कोई गुरू किसी NGO को इस बात के लिये प्रेरित नहीं करता कि मेरे शिष्यों को प्रौढ़ शिक्षाकेंद्र ले जाओ .......... । ये गुरू बने हुए गुरूघंटाल जानते हैं कि अगर उन्होंने ऐसा करा तब तो अनिर्णीत लिंग के आधार पर जीवित इनका थोथा,खोखला और शोषण पर टिका समाज महज दो पीढ़ियों मे ही समाज की मुख्यधारा में विलीन हो कर लुप्त हो जाएगा और फिर इन्हें खाने के लिये मेहनत-मजदूरी या कोई रोजगार करना पड़ेगा जो कि ये गुरूघंटाल लोग नहीं चाहते यही कारण है कि ये लोग शोषण का पोषण कर उसे जीवंत बनाए हुए हैं। मुझे पता है कि मैं जिस बात की शुरुआत कर रही हूं उसका सुखद अंत देखने के लिये जीवित न रहूं लेकिन मेरे भाई जो कि सच्चे अर्थों में गुरूपद के अधिकारी हैं उनकी प्रेरणा से इस नए वैचारिक धरातल पर इन तथ्यों को ला रही हूं।
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