सोमवार, 10 नवंबर 2008

संवेदनशीलता या भय?

मनीषाबहन ने अपने आलेख मुखौटेधारी ब्लागरों को धिक्कार है,थू है उन पर.... में कुछ महत्वपूर्ण मुद्दे उठाये हैं. शास्त्री जी ने लैंगिक विकलांगों या हिजडों के बारे में अर्धसत्य की दुखद असलियत ! लिखा तो कई लोगों ने शास्त्री जी के चिट्ठे पर हमारे बारें में टिप्पणी की, लेकिन उन में से किसी ने भी अर्धसत्य पर एक टिप्पणी देने की हिम्मत नहीं की.

मुझे उम्मीद थी कि सारथी पर हमारे बारे में पढ कर कम से कम कुछ लोग अर्धसत्य को प्रोत्साहित करेंगे. मुझे अभी भी यह उम्मीद है कि समाज से डरने के बदले कम से कम कुछ मित्र हम लोगों के प्रति टिप्पणियों द्वारा संवेदनशीलता दिखायेंगे.

4 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

" उन मुखौटाधारियों को उस पेज पर धिक्कारने के बाद मैं आज उन लोगों के मुखौटे को अपने पन्ने पर भी धिक्कार रही हूं।"
आप कुछ बी करले आप के ब्लॉग पर ये सफेदपोश लोग
नही आयेगे कूकि ये सब हिजडा है

Shastri ने कहा…

प्रिय बेनामी, समाज में परिवर्तन एकदम नहीं आता. हर चीज के लिये समय लगता है. अत: जल्दबाजी न करें.

इस बात पर ध्यान दें कि आप भी बेनामी हैं एवं जो आप ने कहा है वह आप पर सबसे पहले लागू होता है.

कम से कम एक टिप्पणीकार (मैं) बिना हिचकिचाये टिप्पणी दे रहा हूँ. सबर करें, और भी आयेंगे टिप्पणीकार!

rajiv maheshwari ने कहा…

सर अपने सही कहा है की"और भी आयेंगे टिप्पणीकार!"
बस थोड़ा इंतजार.

कुमार आशीष ने कहा…

इंतजार का फल तो मीठा होता ही है।

अब तक की कहानी

 

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