शनिवार, 8 नवंबर 2008

मुखौटेधारी ब्लागरों को धिक्कार है,थू है उन पर....

पिछले कुछ दिनों से अर्धसत्य पर कुछ भी लिख पाना निजी कारणों से संभव नहीं हो पा रहा था। आज जब मामा जी डा.रूपेश श्रीवास्तव के घर गयी तो बच्चों के लिये काम करने वाली एक संस्था CRY के दो लोग बैठ कर उनसे पैसे जुगाड़ने के लिये तरह-तरह से समझा रहे थे और मामाजी हैं कि सुन रहे थे लेकिन जब मामा जी ने हमारे बारे में बात शुरू करी तो महानता का ताज सिर पर रख कर कट लिये। ब्लागिंग में भी ऐसे ही मुखौटेधारियों की कमी नहीं है जो बस एक दूसरे को महान-महान कह कह कर अंहकार की तुष्टि करते रह्ते हैं। जब शास्त्री जी ने सारथी पर हमारे बारे में लिखा तो टिप्पणियां करने लोग दौड़ पड़े कि हम भी उदार हैं, हम भी अर्धसत्य पढ़ते हैं, हम भी लैंगिक विकलांगो के प्रति सहानुभूति और प्रेम रखते हैं। उन मुखौटाधारियों को उस पेज पर धिक्कारने के बाद मैं आज उन लोगों के मुखौटे को अपने पन्ने पर भी धिक्कार रही हूं। हममें ऐसे किसी भी खोखली हड्डियों वाले मुखौटेधारी ब्लागर की सहानुभूति की जरूरत कहां है हम तो अपने मार्गदर्शक डा.रूपेश की दी हुई ताकत से ही नयी शुरूआत करने का साहस जुटा चुके हैं। ऐसे लोग अर्धसत्य न ही देखें तो बेहतर है क्योंकि हम तो शारीरिक लैंगिक विकलांग है,हिजड़े हैं लेकिन ऐसे लोग आत्मा के स्तर पर हिजड़े हैं, थू है थू है थू है ऐसे लोगों पर.........

3 टिप्‍पणियां:

ई-गुरु राजीव ने कहा…

सही बात है हिजडों को न कोई सम्मान देता है न देना चाहता है. मैं पूरी तरह से सहमत हूँ.
मैं भी काफ़ी हद तक चिढ़ता हूँ, कभी ब्लॉग में विस्तार से लिख कर बताऊंगा कि क्यों चिढ़ता हूँ.
कोई भी उन्हें समाज में रहने लायक नहीं समझता और शायद मैं भी.
पहले भी कई बार यह ब्लॉग पढ़ा पर आज शायद यह पहली टिप्पणी है. उम्मीद है कि हम दोनों ही एक दूसरे को समझ पायेंगे और शायद साथ-साथ समाज में रहना सीख जायेंगे.

Dr.Rupesh Shrivastava ने कहा…

राजीव जी क्या आपके चिढ़ने वाली सोच का सामाजिक संदर्भ है या मात्र निजी पूर्वाग्रह हैं?जब मैं बच्चा था तो मुझे काले लोगो से चिढ़ होती थी। आपने जो बात कही कि आप उन्हें समाज में रहने लायक नहीं समझते यह बात आप कल की बता रहे हैं या आज भी आप ऐसा ही सोचते हैं?क्या आपने कई बार पढ़ कर कभी कोई टिप्पणी नहीं करी लेकिन क्या आज चिढ़ कर मजबूरन टिप्पणी करना पड़ा?भूमिका आपकी ही समवयस्क होगी तो आप अंदाज लगाइये कि उसके भीतर किस-किसके प्रति और कितनी चिढ़ और नफ़रत है चाहे वह समाज हो या स्वयंभू सभ्यजन........
टिप्पणी के लिये मेरा व्यक्तिगत धन्यवाद स्वीकारिये।

बेनामी ने कहा…

सही बात है हिजडों को न कोई सम्मान देता है शायद
राजीव जी जो कहना चाहरे थे वो कहे naa पाए .
आज हम अपने चारो तरफ़ देखते है की होली दिवाली पर जबर्दस्ती पीसे मागना,रेल में भी असी हरकते करना क्या एक शुभा देता है.

अब तक की कहानी

 

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